Sunday, February 5, 2017

रिहाई

जाओ !
एक नफ़ासत से जुदा हो जाओ
तल्खियों को यतीम कर दो
हो सके तो इस विदाई को हसीन कर दो

मैंने चुन लिए चंद मासूम लहजे
मैं बुन रही हूँ ख्यालों की रेशमी डोर
मै कात रही हूँ यादों के चरखे पर
अच्छी बातों का सूत
जिनके भरोसे पोंछा जा सकेगा
आषाढ़ की भरी उमस में पसीना

नही मुझे कोई शिकायत नही तुमसे
ये कोई बड़प्पन नही
ना ये दिखावे की ख़ुशी की कोई नुमाईश है
दरअसल जब जाना ही तय हुआ है
मैं चाहती हूँ तुम जाओ
सावन के बादल की तरह
जनवरी की धूप की तरह
इतवार की छुट्टी की तरह

आओ ! तुम्हारे माथे पर
एक शुष्क बोसा चस्पा कर दूं
तुम्हें इतने नजदीक देख
अब साँसे तरल न रह सकेंगी
दरअसल ये महज एक बोसा नही
ये दो अलग टापूओं का नक्शा है
रिहाई और विदाई यहीं भटका करेगी
आज के बाद

जाओं !
अब कोई पुकार नही शामिल
तुम्हें मुड़ते हुए देखना चाहती हूँ
उस मोड़ से
जहां चौराहे छोड़ देते है रास्तों का साथ
मुसाफिर जहां असमंजस के साथ
बदल लेता है रास्ता
इस उम्मीद पर
वो पहुंच जाएगा एकदिन कहीं न कहीं

यही मैं चाहती हूँ
तुम पहुँच जाओं कहीं न कहीं
बस अब यहां नही।

© डॉ.अजित

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