अभ्यास में चन्द्रबिन्दु सा विस्मृत हूँ
अनाभ्यास में मात्रा की त्रुटि हूँ
व्याकरण में वाक्य दोष हूँ
प्रेम में,लुप्त हुई लिपि का मध्य का एक अक्षर हूँ
मैत्री में विस्मयबोधक अवयव हूँ
लोक में भाषा की दासता से मुक्त एक गीत हूँ
इतना परिचय देना उल्लेखनीय चीज़ नहीं है
दरअसल
परिचय और अपरिचय के मध्य खड़ा एक त्रिकोण हूँ
जिसे शुभता का प्रतीक समझ लिया गया है
शास्त्र का स्वास्तिक इस बात पर नाराज़ है।
©डॉ. अजित
अनाभ्यास में मात्रा की त्रुटि हूँ
व्याकरण में वाक्य दोष हूँ
प्रेम में,लुप्त हुई लिपि का मध्य का एक अक्षर हूँ
मैत्री में विस्मयबोधक अवयव हूँ
लोक में भाषा की दासता से मुक्त एक गीत हूँ
इतना परिचय देना उल्लेखनीय चीज़ नहीं है
दरअसल
परिचय और अपरिचय के मध्य खड़ा एक त्रिकोण हूँ
जिसे शुभता का प्रतीक समझ लिया गया है
शास्त्र का स्वास्तिक इस बात पर नाराज़ है।
©डॉ. अजित