--
गांव कस्बा शहर छोड़िए
उन्हें कभी जिले से बाहर तक न जाना था
ऐसा नहीं कि वे जाना नहीं चाहती थी
मगर कभी गई न थी
उनके सभी सांसारिक काम
भाई, पिता,चाचा करते रहे सदा
एकदिन वे अपना सीमित संसार लेकर उड़ गई विदेश
जहां पति था शहर था और बाद में बच्चे भी थे
वे खुश थी
ये सब रिश्तेदार घर परिवार के लोग जानते थे
मगर कितना खुश थी
कोई न जानता था
विदेश में जाकर उन्हें खराब लगा हो
ऐसा भी नहीं था
मगर अच्छा कितना अच्छा था
वे खुद भी न जानती थी
उनके जीवन पर रश्क़ था सभी को
खुद से किए वायदे के मुताबिक
पहले उन्हें साल में एक बार देश आना था
फिर ये साल कई-कई साल में बदल जाते
वीडियो कॉल के जरिए वे मिलजुल लेती
पीछे छूटे हुए लोगो से
जन्मदिन, एनिवर्सरी,नए साल पर
व्हाट्सएप स्टेट्स से पता चलता रहता उन्हें
परिजनों के जीवन का हाल
देश में उनके प्रतीक्षारत दोस्त,परिजन
उनके साथ आने वाले सस्ते आईफोन की प्रतीक्षा में अधिक व्याकुल रहते
मनुष्य के जरिया बन जाने का अच्छा उदाहरण बन गई थी वे
विदेशी भाषा में इतनी निपुण थी
कि अकेले कर सकती थी शॉपिंग
यात्राएं अभी भी पति के भरोसे थी
विदेश की धरती में वे आजाद थी
मगर उनकी आजादी देखने वाले लोग
पहले से पर्याप्त आजाद थे
वे सच्ची विश्व नागरिक थी
मगर उनकी नागरिकता संदिग्ध थी
कभी कभी वे पति से पूछती एकांत में
क्या हम वापस जाएंगे कभी
जिस पर पति अन्यमनस्कता से देता जवाब
पता नहीं। देखते हैं।
पति के संग विदेश बस गई लड़कियों को
एक बात स्पष्ट पता थी
देश हो या विदेश
उनकी खुशी का केंद्र एक ही व्यक्ति था
जिसके कारण वे भूगोल और मनोविज्ञान के मध्य
साधे रहती एक सन्तुलन
और फोन पर हँसते हुए
अपनी सबसे अच्छी सहेली से कहती
एक ही बात
जो सुख यहां है वो वहां नहीं
जो वहां है वो यहाँ नहीं
सुख की ऐसी दार्शनिक व्याख्या
वही कर सकता है
जो किसी के साथ बस गया कहीं सुदूर
अपनों दूर सदा के लिए।
©डॉ. अजित
सटीक
ReplyDeleteनव वर्ष की मंगलकामनाएं |
ReplyDeleteस्त्रियां अक्सर भावनात्मक रूप से बेल सी होती है जहां सहारा मिला वहीं स्वार्गिक सुख मान लेती हैं।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लिखे हैं सर।
सादर।
_____
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
विदेश में रहकर देश से मुक्त न हो पाई महिलाओं की भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDelete