उससे किसी ने आग्रह न किया
कि बने रहो उसके जीवन में
उसके बिना किसी की शाम उदास न थी
वो जरूर उदास रहा
सुनकर वे सब किस्से
जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था
उसे कहा गया प्रिय
मगर वो अतिप्रिय कभी न था
उसके बिना सबका चल जाता था काम
वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा
और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था
उसकी याद देर तक पीछा न करती थी
उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल
उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता
वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था
उसका कोई समय न था
उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं
मगर पहले ही खून पर
उसे सुना दी जाती सजा ए मौत
उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी
वो जरूर रुक-रुक कर देखता था
दुनिया का यूँ रुकना।
©डॉ. अजित
सुंदर
ReplyDeleteसहूलियत के अनुसार व्यवहार करते लोग बहुत
ReplyDeleteतकलीफ़ पहुंचाते हैं।
भावपूर्ण अभिव्यक्ति सर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा
ReplyDeleteऔर जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था
बहुत सटीक...
सार्थक सृजन।
शायद हर आम आदमी के जीवन की यही दास्तान है
ReplyDeleteसुंदर भावपूर्ण रचना
ReplyDeleteबेहतरीन
ReplyDeleteसाक्षी भाव .. तटस्थता और कसक.. स्वागत है !
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