Wednesday, October 21, 2026

स्वर्ग

 डिस्क्लेमर: 


अब मैं नई कविताएँ नहीं लिखता हूँ. कविताएँ मेरे घर का रास्ता भूल गयी हैं. कभी-कभी सोमेश शुक्ल की कविता मुझे उकसा देती है और मैं प्रतिक्रिया में कुछ आशुकविताएँ टाइप चीजें उन्हें लिखकर भेजता हूँ. मसलन पिछले दिनों सोमेश ने स्वर्ग पर एक शानदार उद्धरण कहा तो उस पर मेरे प्रतिक्रियावादी मन ने कुछ कूक्ति टाइप की बातें की. हालांकि ऐसा करना मुझे गहरी शर्मिंदगी से भी भरता हैं वास्तव में ऐसा करना अश्लील है.  मगर बाद में मुझे यह ठीक वैसे लगने लगता है जैसे गाँव का एक ‘चुका हुआ’ निशानेबाज अपेक्षाकृत युवा बच्चों की टोली को अपनी निशानेबाजी के अतियुक्तिपूर्ण किस्से सुनाता रहता है. बच्चे उसे सुनते हैं इस कारण उसके बताने का उत्साह बचा रहता है. मैं आपको पढ़वा रहा हूँ ताकि मेरे पास पढ़वाने का उत्साह बचा रहे. 


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स्वर्ग की सबसे खराब बात यही है

कि यह नरक के विकल्प में मिलता है

कितना सुंदर होता है

स्वर्ग यदि केवल स्वर्ग होता

किसी का विकल्प न होता

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स्वर्ग से पृथ्वी 

स्वर्ग से बेहतर दिखती थी

मगर पृथ्वी से स्वर्ग 

कैसा भी नहीं दिखता था

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स्वर्ग और नरक के बीच

एक जगह आती थी

जहाँ रुकना सब चाहते हैं

मगर रुक कोई न पाता

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स्वर्ग की कृत्रिमता 

उसके प्रति अनासक्ति भरती थी

मगर

मैं नरक जाने को भी उत्सुक न था

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स्वर्ग के दरवाजे दो तरफ खुलते थे

इसलिए जाने वाले आते हुए दिखाई देते थे 

कई बार

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मैं नरक को देखकर 

स्वर्ग जाना कभी न चुनूंगा

इतना मोह मेरे अंदर

मृत्य के उपरांत भी बचेगा

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स्वर्ग में कोई किसी की प्रतीक्षा न करता

यह बात स्वर्ग को मनुष्य के लिए रहने लायक बनाती है

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जो स्वर्ग में रहते हैं

वे नीचे देखते हुए कहते हैं

एक स्वर्ग वहां भी है


© डॉ. अजित

दोष

 पुरोवाक:

कभी-कभी जीवन में यकायक सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह दुकान बढ़ाने (असमय बंद करने) जैसा काम है, जिसमे दुकानदार मारे आलस के दोपहर के बाद शाम होने  का इंतज़ार न करने का फैसला करते हुए दिन ढ़लने से पहले शटर डाउन कर निकल कहीं दूर अकेला निकल जाता है।

कविता में यह सबसे खराब बिम्ब प्रयोग है मगर जीवन इन्हीं खराबों के भरोसे चलता है!

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एक अधूरी आशा 

बार-बार देती थी दुःख

उन्हीं से मन रखता था उम्मीद

जो शायरी की तरह नहीं जानते थे कि

'उम्मीद-ए-वफ़ा' क्या है! 


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सबसे मुश्किल था

उस बात के लिए 

खुद को समझाना

जिसे दुनिया को समझाते हुए

उम्र कटी थी।


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क्षणिक आवेग की हिंसाएं

अपेक्षाकृत कम क्रूर थी

सबसे अधिक क्रूर था

खुद को सदैव प्रस्तुत रखना

उनके मुताबिक़।


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प्रेम में कृतज्ञता

बहुत धूमिल चीज बन जाती 

अधिकार और निर्णय के समक्ष

यह दिखती बेहद दयनीय

छूटा साथ कृतघ्न नहीं था

मगर कृतज्ञ भी एकदम न था।

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एक सामान्य खेद

मरहम हो सकता था

एक छोटी कोशिश 

दवा की शीशी जैसी ठंडक दे सकती थी

मगर 

अंततः उखड़ी हुई त्वचा 

कष्ट देकर ही अलग होती थी।


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दो असंगत ध्रुवों के मध्य

लटके रहना बेताल सा

किंकर्तव्यविमूढ़

और कहना खुद से बार-बार

माफ़ी चाहता हूँ दोस्त

जैसे चाहने से मिल ही जाती हो

माफी।

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रोकर पूछा जाता

हंसकर सलाह दी जाती

गंभीर होकर कहा जाता

आप भी किस चक्कर में फंस गए

जी साब, उसी चक्कर में

जिसकी आकृति गोल नहीं है।

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जिसके लिए

बदलाव सामान्य था

उसके लिए असामान्य होना

व्याधि नहीं अनुराग कहा विद्वानों ने

अनुराग दोष की औषधि

एक समय बाद अनुराग भी न थी।



©डॉ. अजित 


Monday, May 25, 2026

शिकायत

शिकायत 

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जो आदमी शिकायत रखता है 

उसकी शिकायत रखने से भी 

शिकायत होने लगती है प्रियजन को 


भूलने वाले याद दिलाने को 

मानने लगते हैं खराब आदत


आदतें बनती चुपचाप हैं 

और बिगड़ती हैं  गहरा शोर करके  


आदमी खिसकता हुआ एकदिन 

खुद वहां पाता है 

जहाँ से नीचे देखकर डर लगता है 

और ऊपर देखने पर कुछ दिखता नहीं है 


एक ही धरती के कई गुरूत्वाकर्षण होते हैं 

इसलिए किसी के दिल से गिरकर 

आदमी हमेशा पैरो में नहीं पड़ता 


वो विलीन हो जाता है 

किसी दूसरे सौरमंडल में 

बिना किसी चमक के 

एकदम अकस्मात. 


©डॉ. अजित

Saturday, May 16, 2026

अकर्मक

 उससे किसी ने आग्रह न किया

कि बने रहो उसके जीवन में


उसके बिना किसी की शाम उदास न थी


वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था


उसे कहा गया प्रिय

मगर वो अतिप्रिय कभी न था


उसके बिना सबका चल जाता था काम


वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा

और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था


उसकी याद देर तक पीछा न करती थी

उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल


उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता

वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था


उसका कोई समय न था

उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं


मगर पहले ही खून पर

उसे सुना दी जाती सजा ए मौत


उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी

वो जरूर रुक-रुक कर देखता था

दुनिया का यूँ रुकना।


©डॉ. अजित

Saturday, January 3, 2026

पति सँग विदेश बस गई लड़की

 

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गांव कस्बा शहर छोड़िए

उन्हें कभी जिले से बाहर तक न जाना था

ऐसा नहीं कि वे जाना नहीं चाहती थी

मगर कभी गई न थी


उनके सभी सांसारिक काम

भाई, पिता,चाचा  करते रहे सदा


एकदिन वे अपना सीमित संसार लेकर उड़ गई विदेश

जहां पति था शहर था और बाद में बच्चे भी थे


वे खुश थी

ये सब रिश्तेदार घर परिवार के लोग जानते थे

मगर कितना खुश थी

कोई न जानता था


विदेश में जाकर उन्हें खराब लगा हो

ऐसा भी नहीं था

मगर अच्छा कितना अच्छा था

वे खुद भी न जानती थी


उनके जीवन पर रश्क़ था सभी को

खुद से किए वायदे के मुताबिक

पहले उन्हें साल में एक बार देश आना था

फिर ये साल कई-कई साल में बदल जाते


वीडियो कॉल के जरिए वे मिलजुल लेती

पीछे छूटे हुए लोगो से

जन्मदिन, एनिवर्सरी,नए साल पर 

व्हाट्सएप स्टेट्स से पता चलता रहता उन्हें 

परिजनों के जीवन का हाल


देश में उनके प्रतीक्षारत दोस्त,परिजन 

उनके साथ आने वाले सस्ते आईफोन की प्रतीक्षा में अधिक व्याकुल रहते 

मनुष्य के जरिया बन जाने का अच्छा उदाहरण बन गई थी वे


विदेशी भाषा में इतनी निपुण थी 

कि अकेले कर सकती थी शॉपिंग

यात्राएं अभी भी पति के भरोसे थी 


विदेश की धरती में वे आजाद थी

मगर उनकी आजादी देखने वाले लोग

पहले से पर्याप्त आजाद थे 


वे सच्ची विश्व नागरिक थी

मगर उनकी नागरिकता संदिग्ध थी


कभी कभी वे पति से पूछती एकांत में 

क्या हम वापस जाएंगे कभी 

जिस पर पति अन्यमनस्कता से देता जवाब


पता नहीं। देखते हैं।


पति के संग विदेश बस गई लड़कियों को 

एक बात स्पष्ट पता थी

देश हो या विदेश 

उनकी खुशी का केंद्र एक ही व्यक्ति था

जिसके कारण वे भूगोल और मनोविज्ञान के मध्य 

साधे रहती एक सन्तुलन 


और फोन पर हँसते हुए 

अपनी सबसे अच्छी सहेली से कहती 

एक ही बात 

जो सुख यहां है वो वहां नहीं 

जो वहां है वो यहाँ नहीं


सुख की ऐसी दार्शनिक व्याख्या

वही कर सकता है

जो किसी के साथ बस गया कहीं सुदूर 

अपनों दूर सदा के लिए।


©डॉ. अजित