Wednesday, July 21, 2021

बातें

 

उसने मेरा हाथ देखकर कहा था

ये एक मर्डरर का हाथ है

क्या तुम कभी कत्ल कर सकते हो किसी का?

मैंने कहा, शायद हां !

मुझे नहीं लगता तुम्हारे अंदर इतना साहस है, उसने कहा  

साहस कई बार क्षणिक रूप से घटित हो जाता है, मैंने कहा

मैंने नहीं चाहती वह क्षण कभी आए, उसने कहा

तो क्या एक कायर व्यक्ति प्रिय रहेगा तुम्हें?

हाँ !मैं पराजित की बजाए कायर को पसंद करती हूँ.

उसने ये कहा और मेरा हाथ पलट कर छोड़ दिया.

**

क्या हम एक दूसरे की गंध पहचानते हैं?

उसने पूछा एक दिन

मैंने कहा,  गंध हमें पहचानती हैं

हम गंध को नहीं

उसने मेरी पलके सूंघते हुए कहा

तुम्हारी इस बात से सहमति है मेरी.

**

तुम्हें ईश्वर के दंड का भय नहीं लगता

उसने पूछा

ईश्वर के दंड का भय उन्हें लगता है

जिनके अंदर छल छिपा होता है

मैंने जवाब दिया

तुम्हारे अंदर क्या छिपा है? उसने पूछा

मैंने कहा

एक भरोसा इस बात का

कि तुम रहते छल की जरूरत नहीं पड़ेगी मुझे.

**

मैंने कहा एकदिन

सही-गलत उचित-अनुचित की

सबकी अपनी परिभाषाएं होती हैं

उसने मेरे कथन को लगभग अनसुना करते हुए

विषयांतर करते हुए कहा

कुछ चीजों की परिभाषाएं और वजहें नहीं होती

बस वे क्या तो होती है

या नहीं होती हैं

जैसे कि तुम.

© डॉ. अजित

 

 

 

 

 

Monday, June 7, 2021

मूर्खताएं

 मेरी मूर्खताओं का 

कोई अन्त नहीं था


वे इतनी सुव्यवस्थित थी

कि उन्हें देख 

सन्देह होने लगता था

अपने अनुभव और ज्ञान पर


मूर्खताओं को

पहचाने के लिए 

एक काम करना होता था बस मुझे


नियमित मूर्खताएं करना।


©डॉ. अजित


Saturday, February 6, 2021

कवि दोस्त

 उन्होंने सदा मुझे माना

एक प्रतिभाशाली कवि 


वे पेश आते रहे

बेहद विनम्रता से


खुद उत्कृष्ट कवि/पाठक होने के बावजूद

हमेशा संकोच के साथ बताते 

अपनी कविता के बारे में


बल्कि बताते भी नहीं थे

मैं खुद मांगता उनकी कोई कविता 

तो वे बदले में अपनी कविता भूल 

जिक्र करने लगती मेरी किसी पुरानी कविता का


जब-जब कहता मैं

कि अब कवि नहीं रहा हूँ मैं 

तो वे केवल फैला देते एक 

इमोजी वाली मुस्कान


उन्हें इस कदर भरोसा था 

मेरे कवित्त्व पर कि 

मेरे द्वारा प्रंशसित कविता को पढ़कर

वे याद दिला देते मेरी ही कोई कविता

ताकि मैं खुद का मूल्य कमतर न मानू 


उन्हें लगता था खराब

मुझे शब्दहीन और भाव निर्धन देखकर

मगर कभी कहते नहीं थे ये बात


वे प्रार्थनारत थे 

वे उम्मीदजदां थे

कि एकदिन मैं लौट आऊंगा 

अपने फ्लेवर,कलेवर और तेवर में 


उन्हें देख मुझे 

कोई कविता न सूझती थी 

निरुपाय होकर 

बस मैं देखता था उनके हाथ


जिन्हें थामे हुए 

मैं लांघ रहा था 

एकांत का वो गहरा निर्वासन 

जहाँ कविता 

अपना रास्ता भूल गई थी।


©डॉ. अजित