Thursday, February 13, 2020

ऋतु कर्म

भारतीय पंचांग के भरोसे कुछ प्रेम कविताएँ
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चैत्र
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राग-बिराग से इतर
बदलते मौसम में
मैं भटकता हूँ एक जंगली फूल की तरह
तुम्हारी खुशबू की तलाश
मुझे ले जाती है अज्ञात नगरों तक
ईश्वर भी जानता है यह बात
तुम्हें देखें बिना
नही करूंगा मैं घोषणा नूतन वर्ष की.
 -
वैशाख
जैसे शाख से लचक कर
टूट जाता है कोई पत्ता
जैसे धरती सिल लेती है
अपनी छोटी मगर गहरी चोट
वैसे ही मिलूंगा मैं तुमसे
इस बार
अवांछित से अप्रत्याशित होकर
-
ज्येष्ठ
सुख मेरा बड़ा भाई है
और दुःख छोटा
बड़े और छोटे के मध्य
मैं हूँ नितांत अकेला 
मेरे पास प्रेम की अनेक कहानियाँ हैं
इसलिए दोनों मुझसे करते रहते हैं
बारी-बारी बात
मैं भूल गया हूँ  दिन,महीने और साल 
सुख-दुःख की माया से बचाना
तुम्हारी जिम्मेदारी है अब.

आषाढ़
-
वो एक बादल था
जो लौटकर जाता था उस तक
हर बार
वो एक धरती थी
जो बदल लेती थी अपना अक्षांश
अकाल और बारिश
दोनों के मध्य फंसकर हो जाते थे भ्रमित
और धरती पर हमेशा
रहस्यमयी लगता था प्राकृतिक न्याय.
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श्रावण
बूंदे समझाने आती थी
एक बात
तुम यहीं कहीं हो मेरे आसपास
हवा देती अर्घ्य
बादल पढ़ते थे मन्त्र
मैं समिधा सा जल उठता था
अपने बिस्तर पर
और
तुम्हें लगता था
बिजली चमकी है कहीं पर. 
-
भाद्रपद
ताप से लड़ता था तन
मगर ये संक्रमण मन का था
जिसके लिए
नही बनी थी कोई दवाई
मैं मन ही बडबडाता था तुम्हारा
दिल को देता था झूठी तसल्ली
दवा और डॉक्टर को भले  ही मिला हो श्रेय
मगर सच यह है कि
तुम्हें याद करते-करते
ठीक हुआ हूँ मैं. 
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आश्विन
दुनिया बड़ी सात्विक लगती थी तब
लगता था येन केन प्रकारेण
पहुँच ही जाऊँगा तुम तक
ये अलग बात है
शास्त्रों में कहा गया जिसे योग
वह वियोग था दरअसल
जिसे नही बदल पाया
कोई दैवीय उपवास.
-
कार्तिक
तुम्हारे बिना
मैं शरद का कैसे करता अभिनंदन
इसलिए मैंने चुना मौन
इस बात का बदला रात के तीसरे पहर में
मुझसे लिया रोज.
-
मार्गशीर्ष
ना कोई मार्ग था
ना मैं कहीं शीर्ष पर था
ऐसे में तुम्हें कैसे नजर आता भला?
तुमने जिसदिन याद किया मुझे
वो बात मुझे पता चली
अज्ञातवास में भी
इसलिए मैं जानता हूँ तुमसे मिलने का वो मार्ग
जो शीर्ष होने की अपेक्षा से मुक्त है.
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पौष
संबंधों में यदि शीत पसर जाए
उसे देखना चाहिए हस्तक्षेप रहित होकर
इस तरह देखना आपको कर सकता है मुक्त
पारस्परिक दोषारोपण से
इस तरह से देखना
शीत को नही आता है पसंद
वो पिघलने लगता है
खुद-ब-खुद.
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माघ
कई कहावतें सुनी
कई आशंकाएं जन्मी
मगर प्रेम का फलादेश
बांचने से बच गया मैं
इसलिए बच गयी
हमेशा संभवानाएँ
इसी कारण
ऋतु दोष का
निर्धारण करने के लिए
खुद अधिकृत किया मुझे ईश्वर ने.
-
फाल्गुन
जीवन में वसंत
और वसंत में जीवन
महसूसने के लिए
तुम एक माध्यम रही
प्रेम ने मुझे भावुक नही
कृतज्ञ होना सिखाया.


© डॉ. अजित

Monday, December 23, 2019

लकीरें


उसने पूछा नही
और मैंने बताया नही
हवा में झूलती एक महीन लकीर
हम दोनों को नजर आती थी मगर

वो लकीर दो देशों के मध्य खींची सीमा रेखा नही थी

इसलिए हम टहल सकते थे उसके आर-पार
अपनी सुविधा से

निर्वासन से पहले
जब मैं तलाश रहा था
उस देश का नक्शा
जहाँ मनुष्य को रुकने लिए
अपना परिचय नही देना पड़ता

तब मुझे याद आती थी वो महीन लकीर

उसका मिलान
मैंने किया कई मानचित्रों से
उससे मिलती जुलती कोई लकीर नही थी
इसलिए मुझे हमेशा संदिग्ध लगता था
विश्व नागरिक का विचार

यदि उसने पूछा होता
तो मैं शायद यह बात जरूर बताता
कोई भी लकीर कितनी महीन क्यों ना हो
वो हमें बांटती जरूर है
थोड़ा हिस्सों में
थोड़ा किस्सों में

दुनिया ऐसी ना दिखने वाली
महीन लकीरों का मानचित्र हैं

जहां हम मान सकते हैं
कि जो हमारे साथ खड़ा है
या हम जिसके साथ खड़े हैं
वो एक ही जगह से सबंधित है.

© डॉ. अजित


Friday, November 29, 2019

कविता काल

मैंने कविता का नही
कविता ने मेरा चुनाव किया था

कविता ने खुद तय किया था
अपना रुकने का काल

मैं इतना मुग्ध था कविता के
इस निर्णय पर
कि लिखता गया सबके मन की बात
अपने मन की बात

दरअसल, मैंने कुछ भी नही लिखा
सब लिखा हुआ कहीं पहले से
मैं जरिया भर था
शब्दों को आकर देने का

मैंने कोई कविता नही लिखी
कविता ने मेरे जरिए लिखी अपनी बात

मेरे अंदर कभी न उपज सका
एक कवि जितना आत्मविश्वास
नही कर सका मैं कोई नियोजन
ताकि लोक में मुझे समझा जाए कवि

यह कविता का ही था कोई प्रयोजन
ईश्वर जाने!

अब जब कविता नही है मेरे पास
मैं खुद को देखता हूँ अवाक

जब कोई पढ़वाता है
मेरी कविता मुझे
और करता है प्रशंसा

मैं देखता हूँ आसमान की तरफ
यह सोचकर

कविता मुझे यूं देखकर
जरूर मुस्कुराती होगी।

© डॉ. अजित

Wednesday, November 27, 2019

बदलाव


उसने कहा
तुम्हारी आदतें बदल गई कुछ
इस बात मुझे खुश होना चाहिए
मगर मुझे अच्छा नही लग रहा है

कुछ आदतें कभी नही बदलनी चाहिए

इस बात का अहसास अब हुआ है मुझे

मैंने कहा
बदलाव जीवन का सच है

मगर ज़िन्दगी जीने के लिए हमेशा हमें
चाहिए होता है कुछ प्रतिशत झूठ

इस प्रतिशत को निचोड़ा जा सकता है
वर्तमान और भविष्य से बारी-बारी
उसने कहा

फिर मैंने कुछ नही कहा
और देखा बदलाव को सूखते हुए
कामना के तार पर  
धूप और हवा के बिना.

© डॉ. अजित

Tuesday, September 24, 2019

आदत


मैंने तुम्हें
मेरी आदत नही होने दी
जब-जब ऐसा लगा
तुम राग से हो रही हो अधीर
हंसकर पूछती हो प्रश्न अति-गम्भीर
मैं सतर्क हो गया
ठीक उसी वक्त
बदल दिया बातचीत का विषय
और हमारे मध्य
खींच दी एक महीन लकीर

जानता हूँ
तुम्हें मेरा उपरोक्त दावा
एकदम झूठा लगेगा
मगर यह उतना भी झूठा नही है

मैं जानता था यह बात
आदत बहुत धीरे-धीरे लगती है
मगर एक बार अगर लग जाए यह
फिर मुश्किलें होती हैं बहुत
मन हो जाता चातक
और बुद्धि भाग्यवादी  

ऐसा नही है कि
मैं हमेशा था चालाक
अलबत्ता तुम्हारे सामने
चल भी नही पाती
मेरी कोई चालाकी

बस, मैंने बचाया तुम्हें
आदत होने के उपक्रम से
क्योंकि
अगर किसी भी आदत नही होनी चाहिए
चाहे वो दोस्त हो या प्रेमी

तुमसे मिलनें से पहले
मैं जानता था यह बात
किसी की आदत होना
उसे खोना है

इसलिए मैंने बचाया
तुम्हें और खुद को
उस खोने से
हमेशा के लिए.
© डॉ. अजित

Monday, September 23, 2019

स्त्री मन की कविताएँ


स्त्री बड़ी देर से करती है
किसी का तिरस्कार
वो ओढ़ लेती है
प्यार को बचाने की
सारी जिम्मेदारी खुद पर
वो करती रहती है रफू
मन को देकर तसल्ली
मगर
जब कोई होता है
उसके जीवन से
उसकी इच्छा से अनुपस्थित
फिर तिरस्कार बन जाता है
एक बेहद छोटा शब्द.
**
स्त्री प्रेम न करे
ऐसा संभव नही
जरूरी नही वो प्रेम
किसी पुरुष से किया जाए
स्त्री प्रेम करने के लिए बनी है
दुनिया में बचा हुआ प्रेम
स्त्रियों के कारण
पुरुषों के पास प्रेम की व्याख्याएं है
और स्त्रियों के पास
प्रेम की मूल पांडुलिपि.
**
स्त्री और पुरुष
दो स्वतंत्र सत्ताएं है
दरअसल
जिन्हें समानांतर कह कर
हम एक सूत्र में बाँधने का
करते है प्रयास
यह एक मानवीय भूल है
दुनिया के तमाम बिगड़े हुए रिश्तें
इसी भूल का हैं परिणाम.
**
घृणा और प्रेम
किसी से भी किया जा सकता है
मगर
किसी से एक साथ यह कर सकती
केवल स्त्री.
**
थकी हुई स्त्री
और हारा हुआ पुरुष
दिखतें है एक जैसे
मगर जानबूझकर वो
कम पड़ते है
एकदूसरे के सामने
इसलिए भी रहते हैं दोनों
एकदूसरे से अजनबी.

© डॉ. अजित

Thursday, September 19, 2019

बीमारी

बीमारी अकेले आती है
एकदम दबे पांव

लेती है घर का जायज़ा
एकदम चुपचाप

चुनती है अपने ठिकाने
सिलसिलेवार

विजय-पराजय के भाव से
औषधियों से
करती है रोज़ खुलकर सामना

सदकामनाएं खोजती है
अपने बिछड़े हुए भाई बन्धु
जाती है दोस्तों के सपनों में
भेष बदलकर
ताकि उन्हें बता सके हमारा हालचाल
जो ईश्वर से भी पहले
हर बीमारी में आते हैं हमें याद

बीमार आदमी दवाई के साथ
हिचकियों को भी रखता है हिसाब

बीमारी देर से जाती है
और जाते-जाते छोड़ जाती
अपने निशान

ताकि मनुष्य को याद रहे
खुद का मनुष्य होना
और ईश्वर को याद रहे
मनुष्य का दृष्टा होना।

©डॉ. अजित

Wednesday, September 18, 2019

अपना खेत


खेत खलिहान पर जाती हर पगडंडी
की स्मृति इतनी मजबूत है
वह बता सकती है
मेरे पूर्वजों की जूती का नाप  
उनकी फटी बिवाई से झरी हुई  
मिट्टी की मात्रा

खेत की हवा और पानी
दोनों जानती है
पीढ़ियों तक की देहगंध और प्यास
उन्हें नही जरूरत किसी विज्ञान की
मुझे पहचानने के लिए

खेत मुझे दूर से आता देख
खुश हो सकता है
फसलों को दे सकता है आदेश
मुझे आता देख झूमने के लिए
वो बाट जोह सकता है मेरी
कई पीढ़ियों तक

वो हो सकता है चिंतित
मेरे न आने पर
वो भेज सकता है मेरे पास
अपनी शुभकामनाएं शहर तक

वो आ सकता है अपनी इच्छा से कभी भी
भोर के सपनें में किसी पुराने दोस्त की शक्ल लेकर उधार

खेत की जिस मिट्टी में
उगता है अन्न
वहीं उगता है मेरा एक दूसरा मन
जो सबकी खबर रखता है
मगर खुद की खबर नही देता है किसी को

जानने के लिए उसका हाल चाल
मुझे एक खेत चाहिए बस
और
जरूरी नही वो मेरा अपना खेत हो.

© डॉ. अजित  

Tuesday, September 17, 2019

वेग

कभी नदियों के वेग से
तराशे हुए पत्थर देखना
कितने स्वच्छ निर्मल
और पुनीत नजर आएंगे

निरंतर चोट से बने कटाव
गहरे मगर साफ होते है

चोट देना हर बार
हिंसा नही होती हर बार
किसी के पास जाकर
बार-बार वापस लौटना

मांग करता है
एक खास किस्म की तैयारी की

दरअसल यह
एक अभ्यास है
उस भविष्य का
जब पत्थर रह जाता है अकेला
और वेग को चुनना पड़ता है
एक नया पत्थर
सतत चोट के लिए

यह बात प्रेम पर भी
लागू की जा सकती है

बशर्ते पत्थर और नदी
का नाम बताने का
आग्रह न किया जाए।

© डॉ. अजित

Friday, May 17, 2019

अधूरी बातें


हमारी कुछ बातें
हमेशा अधूरी ही रही
हम निष्कर्षों को टालते रहते

अधूरेपन के साथ जीना आसान था
निष्कर्षों के साथ मुश्किल
अधूरी बातें उम्मीद जगाती थी
और पूरी बातें हमेशा के लिए खो जाती थी

उसके हाथों की लकीरों में
कुछ ऐसी मारकाट थी
जैसे किसी युद्ध का अमूर्त चित्र  ईश्वर ने
संरक्षित कर दिया हो उसकी हथेली पर

उसका हाथ देखते हुए
होती थी दुनिया से युद्ध लड़ने की हर बार
मगर वो हमेशा देखती मेरा हाथ
लेती मेरी रेखाओं की प्रतिलिपि
अपने माथे पर

ऐसे करते हुए उसकी आँखों में पढ़ी
जा सकती थी एक बात
वही बातें अधूरी अच्छी लगती है
जो पूरी हो सकती हो मगर
न की गई हो पूरी.

© डॉ. अजित  


Sunday, May 12, 2019

कहना


तुम करना उससे निवेदन
पूछना उससे उसका नैतिक बोझ
बताना, मगर समझाना नही
सही गलत के अपने दृष्टिकोण

छोड़ देना समय के पास
वर्जनाओं के सारे ज्ञात संस्करण

स्वत: तय होने देना
प्रेम और कामना का वर्गीकरण

स्पर्शों की आंच में सिकने देना
ज्ञात-अज्ञात के सारे अनुभव

निहारना उसे
किसी निर्वासित ऋषि की दृष्टि से
सुनना उसकी अन्तस् पुकार

होने देना घटित
प्रिय-अप्रिय सब एक साथ

एकदिन पता चलेगा तुम्हें खुद
सम्बन्धों का सारांश

फिर कहना यह बात
मैं ठीक से समझ नही पाया उसको.

©डॉ. अजित

   

Thursday, May 2, 2019

निपुण

बतौर कवि इन दिनों
इतना कमजोर आत्मविश्वास है मेरा
कोई यदि कहें
कविता की फलां पंक्ति में
वाक्य दोष है
तो मैं बिना कविता की अनुमति  लिए
बदल देता हूँ
पूरा भाव

कविता मुझे कमजोर देख
खुश नही होती
बस दुआ देती है
चुपचाप

कवि चाहे कितना हो जाए
अनिपुण
कविता कभी नही होती
निष्ठुर.

© डॉ. अजित 

Wednesday, March 20, 2019

श्राप

उसे एक आत्मीय स्त्री ने
क्रोध में श्राप दिया था
सदा भरम से घिरे रहने का

कलयुग में श्राप से डरना
चलन में नही था
मगर उसे वास्तव में
लगा था इस श्राप से डर

उसनें अपने डर को
छिपाते हुए कहा
तुम खुश रहो
मेरे लिए आशीर्वाद है
तुम्हारा श्राप

इस पर स्त्री चुप रही
स्त्री की ऐसी चुप्पी
सबसे गहरा श्राप बना
उसके जीवन का

इसके बाद

उसको खुश रहने की बोलकर
वो खुद भूल गया खुश रहना

इस तरह
कलियुग में सच्चा सिद्ध हुआ
एक आहत स्त्री का श्राप।

© डॉ. अजित

Monday, March 11, 2019

जिम्मेदारी

पेट के बाद बच्चा
उनके कंधों से लगा रहता
कई-कई साल
सोने और खाने का
उनका समय तय होता है
बच्चे के हिसाब से

इसका अभ्यास
एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह
शामिल रहा स्त्री के जीवन में

बच्चे की बीमारी से लेकर
उसके स्कूल जाने की तैयारी तक
यदि स्त्री के जीवन की अस्त-व्यस्तता
को देखा जाए तो
उसका श्रम अपरिमेय होता जाता

माता-पिता की अपनी अपनी
जिम्मेदारियों के मध्य
पिता के पास उकताने की सुविधा थी
वो रोते बच्चे को चुप कराने में
असमर्थता जताकर कभी भी सौंप सकता था
उसकी मां को

मां के पास ऐसी सुविधा नही थी
चुप कराने से सुलाने तक को
समझा जाता था उसका स्थायी कौशल

परवरिश के सेमिनारों में
मां के लिए बताए गए नए नए सूत्र
ताकि बच्चे बन सके
स्वस्थ सभ्य सुशील

बिगड़ैल बच्चों के कारणों में
सबसे ऊपर रखा गया
मां का लाड-दुलार

ऐसा नही है कि
पिता की कम भूमिका रही
बच्चों के लालन-पोषण में

मगर
ऐसा जरूर है
पिता के हिस्से में अधिक आए
बच्चों के यश,गौरव और एकांत
इसलिए बच्चों को
बीमारी में सबसे पहले याद आती  थी मां
और उपलब्धि पर पिता।

©डॉ. अजित