Sunday, October 14, 2012

रात,चांदनी और तारा...



रात के सन्नाटें में
अंधकार के विराट छायाचित्रों
के बीच चांदनी को निमंत्रण देना
अपने पास बैठाने का
और चांदनी का मुस्करा कर रह जाना
एक सपना हो सकता है
मगर छत पर पसरी हुई चांदनी को
देखने और महसूस करने के लिए
मन को शांत करने की
अजीब सी कोशिस करता हूँ
ठहरता हूँ उस पल में
बुदबुदाता हूँ खुद ही खुद पर
खुद को छू कर देखता हूँ
कि ये मै ही हूँ
या मेरे देह से बाहर निकल आया है
कोई आदि पुरुष
जो दिन भर के झंझावतों में फंसा
दिन ब दिन खुद से दूर
होता जा रहा है
चांद से बतियाते हुए
एक धन्यवाद भेजने का मन होता है
चांदनी को उसने अपने प्रणय पाश
छोड कर
अंधकार के आतंक के बीच
मुझ तक भेजा
भले ही चांदनी का  मन नही था
मेरे एकांत का हिस्सा बनने का
दूर एक मद्धम टिमटिमाते तारें की
शिकायत मुझे नजर आती है
जो बेवजह जल-बुझ रहा है
ठीक मेरी तरह
मै उसको देखता हूँ
वो मुझे
और देखते देखते
सारी रात बीत जाती है
चांद और चांदनी के रिश्ते की तरह
बहुत से किरदार खुद के अन्दर
रोज जीते है और रोज दम तोड देते है
मद्धम तारें की तरह
न मै उनकी सुनता हूँ
और वें मेरी
हाँ, मेरी उलझन से चांदनी अक्सर
खुश नजर आती है...।
डॉ.अजीत

Saturday, October 13, 2012

मुकाम


आधी रात का मुकाम अभी बाकी है
दोस्तों से दुश्मनी निभानी अभी बाकी है

वो मेरा था नही ये बात जानते है सब  
लेकिन क्यों ये कहानी अभी बाकी है

नाकामियों की मुनादी कर दी हमने खुद
किसका था हाथ ये बताना अभी बाकी है

न साथ ही चले तुम न रास्ता ही दिया
फिर भी चेहरे पर थकान अभी बाकी है

करीब आकर दूर गये यूँ ही चलतें-चलतें
मिलनें पर मगर मुस्कान अभी बाकी है

डॉ.अजीत 

Friday, September 28, 2012

विदा



विदा पर
सभी कहते है
फिर मिलेंगे
इस औपचारिक झूठ
के सहारे लोग जिन्दगी काट देते है
कुछ दोस्त बिना कुछ कहे
अचानक नेपथ्य
मे चले जाते है
कुछ साथ रहकर भी
बोझिल बने रहते थे
ये विदा के समय के
सम्बोधन किसने बनाएं और क्यों
यह सोचकर दिल उदास हो जाता है
बेहतर होता
मिलने और बिछडने के क्रम में
न कुछ कहा जाता
न कुछ सुना जाता
बस जीया जाता वो लम्हा
जिस की वजह से कोई मिलता है
तो कोई यूँ की खो जाता है..।
डॉ.अजीत

Monday, September 24, 2012

तरकीब



विश्वास नही होता
तुम्हारे बदल जाने का
खुद के मुकर जाने
वक्त के दोहराने का

हैरान हूँ
तेरी जिद पर
खुद की बेबसी पर
दूनिया की हंसी पर

इंतजार है
वक्त के बदलनें का
तेरे सम्भलनें का
खुद के सिमटने का 

देखतें है
कब तक ये खेल चलेगा
वक्त कब तक छलेगा

उम्मीद है
कोई रास्ता जरुर निकलेगा

तब तक
दुआ करें
यकीन करें
और जुदा हो जाएं...

बेवफाई से ये तरकीब अच्छी है।

डॉ.अजीत

Saturday, August 4, 2012

खबर



खुद बेखबर हूँ मगर लोग खबर रखते है
मेरे करीबी लोग शीशे की नजर रखते है

उदासी देखकर उदास होने वाले दोस्त
न जाने क्यों बस उपरी नजर रखते है

कहाँ मै जाता हूँ कहाँ नही जाता और क्यों
महफिल के दरबान भी इसकी खबर रखते है

किसी को अपनाकर छोडना है मुश्किल
हम तो अपनी दीवार मे शज़र रखते है

मुमकिन है अब बीमार होकर मर जाना
चारागर अब दवा की शीशी मे जहर रखते है

तन्हाई मे सलूक निभाना है जरा मुश्किल
इस दौर के लोग कम ही सबर रखते है

डॉ.अजीत  

Thursday, May 10, 2012

जंगल


तुमने कहा
चलो चलते है
मै चला
फिर कहा ऐसे नही चलते
मै रुक गया
फिर हम चले
और चलते गये
निसंवाद
आज भी उन्ही कदमों
का पीछा करते चल रहा हूँ
तुम कभी बोझिल हो जाते हो
कभी जीवंत
ऐसे हमसफर के साथ
चल कर मंजिल को देखना
अब बस एक शगल है मेरा
न तुम्हे कहीं पहूंचना है
और न मुझे ही
फिर लोग क्यों अपेक्षाओं के
शुष्क जंगल में
हमारा पीछा कर रहे है
डरो नही!
हमारी परछाई हम से बडी
नज़र आ रही है
इसलिए खतरे की बात नही
बस चलो...
इससे पहले कि सांझ हो जाएं...।
डॉ.अजीत

Sunday, April 29, 2012

सफीना

लम्हों में खुद को कैद कर नही सकता
महफिल उनकी है हद से गुजर नही सकता 


तकसीम जब दिल के अफसाने हो जाए
जख्म हल्का भी हो तो भर नही सकता


खुद की जुस्तजु में सफर पर निकला हूँ
एक तेरे लिए ये सफीना डूबो नही सकता 


शिकवे शिकायत छोड यूँ भी मिलना कभी
हमारा अहसास इतनी जल्दी खो नही सकता


बारहा कभी यूँ ही तन्हाई में रो लेंगे हम भी
आपकी तरह सबके सामने मै रो नही सकता


डॉ.अजीत

Monday, March 26, 2012

मुताबिक

तेरे मुताबिक नजर आना जरुरी तो नही

अपनापन मेरा सलीका है मजबूरी तो नही


तुझे खुद अपनी अना का अहसास नही

इंसान है दोस्त तू मृग कस्तूरी तो नही


यूँ हर बात पर तेरी हाँ मे हाँ कहना

रवायत हो सकती है मगर जरुरी तो नही


दम कब के निकल जाते तेरे दम से

किसी के पास खुदा की मंजूरी तो नही


रबहर-ए-मंजिल के और भी है तलबगार

ऐसा भी अकेला तू हीरा कोहिनूरी तो नही


डॉ.अजीत

Monday, January 23, 2012

आईना..

मुश्किल वक्त

कितना मुश्किल लगने

लगता है जब

दोस्ती की बीच में

समझदारी उग आयें

रात के अक्सर नींद न आयें

पत्नि बिना वजह समझाए

दुश्मनों से सलाह लेनी पड जाए

मर्ज़ की दवा कम पड जाए

ऐसे बुरे वक्त से गुजरता

अक्सर यह सोचता हूँ

रात के बाद सवेरा है

ये सब कहते-सुनते आयें है

लेकिन रात कितनी बडी हो जाती है

इसके लिए अपने से सूरज़ की

दूरी मापनी होगी

जिसे मापते हुए

मै पसीना-पसीना हो रहा हूँ

इस सर्द रात में...

नया साल भी

कितना जालिम निकला...!

डॉ.अजीत

Thursday, December 8, 2011

कयास

अपने वहम औ कयास रहने दो

मुझे अपने आस-पास रहने दो


थक गया है अब किरदार मेरा

कुछ दिन इसे बेलिबास रहने दो


दोस्त फनकार बन गए है सब

नाचीज़ को बस खाकसार रहने दो


हंसने मे जो शख्स माहिर था

उसे कुछ दिन उदास रहने दो


नज़रो से जो गिर गया हो बेवजह

उसे अब बस मयख्वार रहने दो


डॉ.अजीत

Wednesday, December 7, 2011

गज़ल

यूँ ही वहम औ कयास लगाते रहिए

जख्मों से आदतन पट्टी हटाते रहिए


फिक्रमंद होना तहजीब की बात है

हक जताने पर ऐतराज़ जताते रहिए


इंसान को खुदा कहने वाले बहुत मिले

गुजारिश है आईना मुझे दिखाते रहिए


बेसबब दुनिया से जब जी भर जाए

हम से दिल अपना बहलाते रहिए


मुमकिन है भीड मे पहचान न पाउँ

हम कब क्यों कैसे मिले बताते रहिए


मेरा अक्स मुकम्मल नही हैं कतरा-कतरा

अधूरेपन मे दिलचस्पी हो तो आते रहिए


बोझिल आँखों पर तब्सरा क्यों करुँ

आप फकत बस यूँ ही मुस्कुराते रहिए


डॉ.अजीत

Tuesday, November 29, 2011

अदा

जख्मों को इस तरह सीना चाहता हूँ

बस अपनी शर्तों पर जीना चाहता हूँ


आप जिद कर ही बैठे है सुनने की

तो फिर पहले थोडी पीना चाहता हूँ


वो वक्त भी अजीब था जब शौक था

आजकल लोगो की फरमाईश पर गाता हूँ


दर्द जिसके साथ बांटे वो बेकद्र निकला

अब अक्सर हँसकर जख्म छुपाता हूँ


अपनी फकीरी का ये अन्दाज़ भी अजीब है

जो दर बेआस है उस पर अलख जगाता हूँ


मुझसा कोई न मिला होगा अब से पहले

चलिए ये फैसला आप पर ही छोड जाता हूँ


डॉ.अजीत

Friday, November 25, 2011

बहाना

अक्सर शाम होते ही उदास हो गये

झुठा बहाना सुनकर बच्चे सो गये


दुनिया के लिए जो था मशहूर बहुत

किस्से उसके कहानियों में खो गये


महफिल की तन्हाई देखकर शेख बोले

इतने लोगो कैसे खुदा पसंद हो गये


रोज जीना रोज़ मरना खेल नही है

ऐसे बेअदब हम यूँ ही नही हो गये


नज़र ब्याँ कर गयी दिलों के फांसले

अपनों के अन्दाज़ अजनबी हो गये


उदासी का लुत्फ अजीब ही निकाला

मुस्कुराने की बात पर भी रो गये


डॉ.अजीत

Thursday, November 3, 2011

दौर

आपकी तकलीफ काबिल-ए-गौर है

ये इंसानो को जल्दी भुला देने का दौर है


पहले अक्सर उदास हो जाता था मै भी

आजकल अपनी याददाश्त कमजोर है


उदास आंखो में चमक नही फबती

ऐसा नही है मेरा ध्यान कही और है


दो आँसू छलक जातें जिसकी याद में

वो समझता है बंदा दिल का कमजोर है


मंजिल मुबारक तुम्हे ए हमराह

अपने काफिले का रास्तों पर ठौर है


महफिल मे आदाब सीख कर जाना

वहाँ सभी कहते है एक जाम और है


डॉ.अजीत

Sunday, September 4, 2011

इन दिनों...

इन दिनों

मै बेबात नाराज़

हो जाता हूँ

मिलने हमेशा देर से

जाता हूँ

जीने के लिए

रोज़ाना एक नई कहानी बनाता हूँ

इन दिनों

बहुत पुराने दोस्तों से मन

भर गया है

कुछ दुश्मन शिद्दत से याद आ रहें है

वैसे एकदम खाली हूँ

लेकिन व्यस्त होने का

बढिया नाटक कर रहा हूँ

अप्रासंगिक होकर भी

अपने होने को जस्टीफाई करने

के तमाम तर्क गढ लिए है मैने

इन दिनों

ऐसा अक्सर होता है कि

फोन जानबूझ कर बंद कर देता हूँ

ताकि मिलने/पूछने पर

लोग फोन न मिलने की शिकायत कर सकें

और मै खिसिया कर महान बन सकूँ

इन दिनों

दिन मे सोना,रात मे खोना

और मन ही मन रोना

अच्छा लगने लगा है

इन दिनों

मुझे यह भी लगने लगा है कि

जल्दी ही सबसे मन ऊब रहा है

चाहे वो पुराने-नये दोस्त हों

या कोई शगल

ऐसा भी लगता है जैसे

रोज़ सफर पर हूँ

लेकिन जाना कहीं नही

ज़िन्दगी से आकर्षण बिछड

गया है

न ये अवसाद है

न तनाव

न अस्थाई होने की कुंठा

फिर कुछ तो है

जो इन दिनों

मुझे रोज़ ज़िन्दा करती है

और रोज़ मार देती है

वैसे इस तमाम उधेडबुन में

एक बात अच्छी है

इन दिनों

मै अपने साथ हूँ....!

डॉ.अजीत