Saturday, May 16, 2026

अकर्मक

 उससे किसी ने आग्रह न किया

कि बने रहो उसके जीवन में


उसके बिना किसी की शाम उदास न थी


वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था


उसे कहा गया प्रिय

मगर वो अतिप्रिय कभी न था


उसके बिना सबका चल जाता था काम


वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा

और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था


उसकी याद देर तक पीछा न करती थी

उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल


उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता

वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था


उसका कोई समय न था

उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं


मगर पहले ही खून पर

उसे सुना दी जाती सजा ए मौत


उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी

वो जरूर रुक-रुक कर देखता था

दुनिया का यूँ रुकना।


©डॉ. अजित

Saturday, January 3, 2026

पति सँग विदेश बस गई लड़की

 

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गांव कस्बा शहर छोड़िए

उन्हें कभी जिले से बाहर तक न जाना था

ऐसा नहीं कि वे जाना नहीं चाहती थी

मगर कभी गई न थी


उनके सभी सांसारिक काम

भाई, पिता,चाचा  करते रहे सदा


एकदिन वे अपना सीमित संसार लेकर उड़ गई विदेश

जहां पति था शहर था और बाद में बच्चे भी थे


वे खुश थी

ये सब रिश्तेदार घर परिवार के लोग जानते थे

मगर कितना खुश थी

कोई न जानता था


विदेश में जाकर उन्हें खराब लगा हो

ऐसा भी नहीं था

मगर अच्छा कितना अच्छा था

वे खुद भी न जानती थी


उनके जीवन पर रश्क़ था सभी को

खुद से किए वायदे के मुताबिक

पहले उन्हें साल में एक बार देश आना था

फिर ये साल कई-कई साल में बदल जाते


वीडियो कॉल के जरिए वे मिलजुल लेती

पीछे छूटे हुए लोगो से

जन्मदिन, एनिवर्सरी,नए साल पर 

व्हाट्सएप स्टेट्स से पता चलता रहता उन्हें 

परिजनों के जीवन का हाल


देश में उनके प्रतीक्षारत दोस्त,परिजन 

उनके साथ आने वाले सस्ते आईफोन की प्रतीक्षा में अधिक व्याकुल रहते 

मनुष्य के जरिया बन जाने का अच्छा उदाहरण बन गई थी वे


विदेशी भाषा में इतनी निपुण थी 

कि अकेले कर सकती थी शॉपिंग

यात्राएं अभी भी पति के भरोसे थी 


विदेश की धरती में वे आजाद थी

मगर उनकी आजादी देखने वाले लोग

पहले से पर्याप्त आजाद थे 


वे सच्ची विश्व नागरिक थी

मगर उनकी नागरिकता संदिग्ध थी


कभी कभी वे पति से पूछती एकांत में 

क्या हम वापस जाएंगे कभी 

जिस पर पति अन्यमनस्कता से देता जवाब


पता नहीं। देखते हैं।


पति के संग विदेश बस गई लड़कियों को 

एक बात स्पष्ट पता थी

देश हो या विदेश 

उनकी खुशी का केंद्र एक ही व्यक्ति था

जिसके कारण वे भूगोल और मनोविज्ञान के मध्य 

साधे रहती एक सन्तुलन 


और फोन पर हँसते हुए 

अपनी सबसे अच्छी सहेली से कहती 

एक ही बात 

जो सुख यहां है वो वहां नहीं 

जो वहां है वो यहाँ नहीं


सुख की ऐसी दार्शनिक व्याख्या

वही कर सकता है

जो किसी के साथ बस गया कहीं सुदूर 

अपनों दूर सदा के लिए।


©डॉ. अजित