उससे किसी ने आग्रह न किया
कि बने रहो उसके जीवन में
उसके बिना किसी की शाम उदास न थी
वो जरूर उदास रहा
सुनकर वे सब किस्से
जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था
उसे कहा गया प्रिय
मगर तो अतिप्रिय कभी न था
उसके बिना सबका चल जाता था काम
वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा
और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था
उसकी याद देर तक पीछा न करती थी
उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल
उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता
वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था
उसका कोई समय न था
उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं
मगर पहले ही खून पर
उसे सुना दी जाती सजा ए मौत
उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी
वो जरूर रुक-रुक कर देखता था
दुनिया का यूँ रुकना।
©डॉ. अजित