Saturday, May 16, 2026

अकर्मक

 उससे किसी ने आग्रह न किया

कि बने रहो उसके जीवन में


उसके बिना किसी की शाम उदास न थी


वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था


उसे कहा गया प्रिय

मगर तो अतिप्रिय कभी न था


उसके बिना सबका चल जाता था काम


वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा

और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था


उसकी याद देर तक पीछा न करती थी

उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल


उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता

वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था


उसका कोई समय न था

उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं


मगर पहले ही खून पर

उसे सुना दी जाती सजा ए मौत


उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी

वो जरूर रुक-रुक कर देखता था

दुनिया का यूँ रुकना।


©डॉ. अजित

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