Saturday, May 16, 2026

अकर्मक

 उससे किसी ने आग्रह न किया

कि बने रहो उसके जीवन में


उसके बिना किसी की शाम उदास न थी


वो जरूर उदास रहा 

सुनकर वे सब किस्से 

जिसमें मनुष्य निरुपाय दिखता था


उसे कहा गया प्रिय

मगर वो अतिप्रिय कभी न था


उसके बिना सबका चल जाता था काम


वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा

और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था


उसकी याद देर तक पीछा न करती थी

उसकी यादें जल्द हो जाती थी धूमिल


उसका जिक्र कभी नेपथ्य में नहीं होता

वो अतीत वर्तमान और भविष्य का पात्र न था


उसका कोई समय न था

उसे कहा जाता तुम्हारे हजार खून माफ़ हैं


मगर पहले ही खून पर

उसे सुना दी जाती सजा ए मौत


उसके बिना किसी की दुनिया न रुकती थी

वो जरूर रुक-रुक कर देखता था

दुनिया का यूँ रुकना।


©डॉ. अजित

7 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर

Sweta sinha said...

सहूलियत के अनुसार व्यवहार करते लोग बहुत
तकलीफ़ पहुंचाते हैं।
भावपूर्ण अभिव्यक्ति सर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

Sudha Devrani said...

वो सम्बंध को बचाने को एक काम समझता रहा

और जीवन उसे नकारा सिद्ध करने पर तुला था
बहुत सटीक...
सार्थक सृजन।

Anita said...

शायद हर आम आदमी के जीवन की यही दास्तान है

Bharti Das said...

सुंदर भावपूर्ण रचना

हरीश कुमार said...

बेहतरीन

नूपुरं noopuram said...

साक्षी भाव .. तटस्थता और कसक.. स्वागत है !