बातें बहुत कहना चाहता हूं, कहता भी हूं, पर हमेशा अधूरी रह जाती हैं, सोचता हूं, कहूंगा...शेष फिर...
Thursday, May 10, 2012
जंगल
Sunday, April 29, 2012
सफीना
Monday, March 26, 2012
मुताबिक
तेरे मुताबिक नजर आना जरुरी तो नही
अपनापन मेरा सलीका है मजबूरी तो नही
तुझे खुद अपनी अना का अहसास नही
इंसान है दोस्त तू मृग कस्तूरी तो नही
यूँ हर बात पर तेरी हाँ मे हाँ कहना
रवायत हो सकती है मगर जरुरी तो नही
दम कब के निकल जाते तेरे दम से
किसी के पास खुदा की मंजूरी तो नही
रबहर-ए-मंजिल के और भी है तलबगार
ऐसा भी अकेला तू हीरा कोहिनूरी तो नही
Monday, January 23, 2012
आईना..
मुश्किल वक्त
कितना मुश्किल लगने
लगता है जब
दोस्ती की बीच में
समझदारी उग आयें
रात के अक्सर नींद न आयें
पत्नि बिना वजह समझाए
दुश्मनों से सलाह लेनी पड जाए
मर्ज़ की दवा कम पड जाए
ऐसे बुरे वक्त से गुजरता
अक्सर यह सोचता हूँ
रात के बाद सवेरा है
ये सब कहते-सुनते आयें है
लेकिन रात कितनी बडी हो जाती है
इसके लिए अपने से सूरज़ की
दूरी मापनी होगी
जिसे मापते हुए
मै पसीना-पसीना हो रहा हूँ
इस सर्द रात में...
नया साल भी
कितना जालिम निकला...!
Thursday, December 8, 2011
कयास
अपने वहम औ’ कयास रहने दो
मुझे अपने आस-पास रहने दो
थक गया है अब किरदार मेरा
कुछ दिन इसे बेलिबास रहने दो
दोस्त फनकार बन गए है सब
नाचीज़ को बस खाकसार रहने दो
हंसने मे जो शख्स माहिर था
उसे कुछ दिन उदास रहने दो
नज़रो से जो गिर गया हो बेवजह
उसे अब बस मयख्वार रहने दो
डॉ.अजीत
Wednesday, December 7, 2011
गज़ल
यूँ ही वहम औ’ कयास लगाते रहिए
जख्मों से आदतन पट्टी हटाते रहिए
फिक्रमंद होना तहजीब की बात है
हक जताने पर ऐतराज़ जताते रहिए
इंसान को खुदा कहने वाले बहुत मिले
गुजारिश है आईना मुझे दिखाते रहिए
बेसबब दुनिया से जब जी भर जाए
हम से दिल अपना बहलाते रहिए
मुमकिन है भीड मे पहचान न पाउँ
हम कब क्यों कैसे मिले बताते रहिए
मेरा अक्स मुकम्मल नही हैं कतरा-कतरा
अधूरेपन मे दिलचस्पी हो तो आते रहिए
बोझिल आँखों पर तब्सरा क्यों करुँ
आप फकत बस यूँ ही मुस्कुराते रहिए
डॉ.अजीत
Tuesday, November 29, 2011
अदा
जख्मों को इस तरह सीना चाहता हूँ
बस अपनी शर्तों पर जीना चाहता हूँ
आप जिद कर ही बैठे है सुनने की
तो फिर पहले थोडी पीना चाहता हूँ
वो वक्त भी अजीब था जब शौक था
आजकल लोगो की फरमाईश पर गाता हूँ
दर्द जिसके साथ बांटे वो बेकद्र निकला
अब अक्सर हँसकर जख्म छुपाता हूँ
अपनी फकीरी का ये अन्दाज़ भी अजीब है
जो दर बेआस है उस पर अलख जगाता हूँ
मुझसा कोई न मिला होगा अब से पहले
चलिए ये फैसला आप पर ही छोड जाता हूँ
डॉ.अजीत
Friday, November 25, 2011
बहाना
अक्सर शाम होते ही उदास हो गये
झुठा बहाना सुनकर बच्चे सो गये
दुनिया के लिए जो था मशहूर बहुत
किस्से उसके कहानियों में खो गये
महफिल की तन्हाई देखकर शेख बोले
इतने लोगो कैसे खुदा पसंद हो गये
रोज जीना रोज़ मरना खेल नही है
ऐसे बेअदब हम यूँ ही नही हो गये
नज़र ब्याँ कर गयी दिलों के फांसले
अपनों के अन्दाज़ अजनबी हो गये
उदासी का लुत्फ अजीब ही निकाला
मुस्कुराने की बात पर भी रो गये
डॉ.अजीत
Thursday, November 3, 2011
दौर
आपकी तकलीफ काबिल-ए-गौर है
ये इंसानो को जल्दी भुला देने का दौर है
पहले अक्सर उदास हो जाता था मै भी
आजकल अपनी याददाश्त कमजोर है
उदास आंखो में चमक नही फबती
ऐसा नही है मेरा ध्यान कही और है
दो आँसू छलक जातें जिसकी याद में
वो समझता है बंदा दिल का कमजोर है
मंजिल मुबारक तुम्हे ए हमराह
अपने काफिले का रास्तों पर ठौर है
महफिल मे आदाब सीख कर जाना
वहाँ सभी कहते है एक जाम और है
डॉ.अजीत
Sunday, September 4, 2011
इन दिनों...
इन दिनों
मै बेबात नाराज़
हो जाता हूँ
मिलने हमेशा देर से
जाता हूँ
जीने के लिए
रोज़ाना एक नई कहानी बनाता हूँ
इन दिनों
बहुत पुराने दोस्तों से मन
भर गया है
कुछ दुश्मन शिद्दत से याद आ रहें है
वैसे एकदम खाली हूँ
लेकिन व्यस्त होने का
बढिया नाटक कर रहा हूँ
अप्रासंगिक होकर भी
अपने होने को जस्टीफाई करने
के तमाम तर्क गढ लिए है मैने
इन दिनों
ऐसा अक्सर होता है कि
फोन जानबूझ कर बंद कर देता हूँ
ताकि मिलने/पूछने पर
लोग फोन न मिलने की शिकायत कर सकें
और मै खिसिया कर महान बन सकूँ
इन दिनों
दिन मे सोना,रात मे खोना
और मन ही मन रोना
अच्छा लगने लगा है
इन दिनों
मुझे यह भी लगने लगा है कि
जल्दी ही सबसे मन ऊब रहा है
चाहे वो पुराने-नये दोस्त हों
या कोई शगल
ऐसा भी लगता है जैसे
रोज़ सफर पर हूँ
लेकिन जाना कहीं नही
ज़िन्दगी से आकर्षण बिछड
गया है
न ये अवसाद है
न तनाव
न अस्थाई होने की कुंठा
फिर कुछ तो है
जो इन दिनों
मुझे रोज़ ज़िन्दा करती है
और रोज़ मार देती है
वैसे इस तमाम उधेडबुन में
एक बात अच्छी है
इन दिनों
मै अपने साथ हूँ....!
Friday, August 26, 2011
शून्य
दोस्तों से शेयर
करने के लिए
उपलब्धि या दुख
का होना जरुरी है
लेकिन क्या
दोस्ती के व्याकरण
मे ऐसा भी कोई
नियम है कि
जब मन के उस
विराट शून्य को
जहाँ न कोई
उपलब्धि हो
न कोई दुख
बस एक निर्वात हो
और उसे बिना
कहे शेयर किया जा सके
जहाँ न किन्तु हो न परंतु
बस अबोला संवाद हो
सुख-दुख हार-जीत
अपेक्षा से परे एक ऐसा भाव
जिसमे ठहराव है जन्मजात
बैचेनी है
और शून्य मे विलीन होने
की एक मूकबधिर सी अभिलाषा
अफसोस!
ऐसे दोस्त संविदा पर नही मिलते
होते है किसी-किसी के पास
फिर वहाँ ऐसा शून्य
आधार बनता है किसी
नए आत्मीय संवाद का....!
डॉ.अजीत
Saturday, August 13, 2011
बात-बेबात
सवालों की ज़बान मे जवाबों की बातें करें
मिलने की आरज़ू मे खो जाने की बातें करें
मुडकर भी जिसने देखा न हो एक बार
हम फिर क्यों उसके जाने की बातें करें
जब कशिस खो गई गुलदानों की
फिर कैसे उनके सजाने की बातें करें
मौत तो मारेगी एक बार ये तय है
आज कुछ जीने के बहानों की बातें करें
हौसला उससे उधार मिल ही नही सकता
जो महफिल से बेबात जाने की बातें करें
माना कि वो बदनाम है बहुत महफिलों में
फिर भी सभी उसी को बुलानें की बातें करें
डॉ.अजीत
Thursday, August 4, 2011
एनसीआर
अपने कामयाब
दोस्तों से मिलने
के लिए एनसीआर
से बढिया जगह कुछ और
हो ही नही सकती
अपने वक्त के कुछ बेहद सफल समझे गए
दोस्तों से मिलने के लिए
एनसीआर में एक जगह
की तलाश जारी है
रिंग रोड की तरह
खुद पर घुमकर आ जाता हूँ
और पाता हूँ कि
अपने-पराये रिश्तों के समकोणों
के बीच का सफर
कितना जोखिम भरा हो सकता है
लेकिन मिलना भी जरुरी है
आग्रह है कि दिल्ली से जब भी
गुजरो कम से कम
एक मिस्स कॉल ही कर दिया करों
अपने करीबी दोस्तों को मिस्स
करते हुए ये ख्याल आता है
कि एनसीआर की हवा पानी में
ऐसा क्या है कि
जो आदमी को बदलने की जिद पर
उतर आती है
प्रेक्टिकल होने का रोज सबक सिखाती है
खामोशी खुद ब खुद गुनगुनाती है
तभी तो न जाने क्यूँ
अपने करीबी दोस्तों से
एनसीआर मे मिलनें
की ख्वाहिश
एक हफ्ता और खिसक जाती है....!
डॉ.अजीत
Tuesday, June 14, 2011
मुखबिर
परेशान दोस्तों के लिए एक कविता
चला जाऊँगा एक दिन
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए
चला जाऊँगा जैसे चला जाता है सभा के बीच से उठाकर कोई
जैसे उम्र के साथ जिंदगी से चले जाते हैं सपने तमाम
जैसे किसी के होठों पर एक प्यास रख उम्र चली जाती है
इतने परेशान न हो मेरे दोस्तों
कभी सोचा था बस तुम ही होगे साथ और चलते रहेंगे क़दम खुद ब खुद
बहुत चाहा था तुम्हारे कदमो से चलना
किसी पीछे छूट गए सा चला जाऊँगा एक दिन दृश्य से
बस कुछ दिन और मेरे ये कड़वे बोल
बस कुछ दिन और मेरी ये छटपटाहट
बस कुछ दिन और मेरे ये बेहूदा सवालात
फिर सब कुछ हो जाएगा सामान्य
खत्म हो जाऊँगा किसी मुश्किल किताब सा
कितने दिन जलेगी दोनों सिरों से जलती यह अशक्त मोमबत्ती
भभक कर बुझ जाऊँगा एक दिन सौंपकर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अन्धेरा
उम्र का क्या है खत्म ही हो जाती है एक दिन
सिर्फ साँसों के खत्म होने से ही तो नहीं होता खत्म कोई इंसान
एक दिन खत्म हो जाऊँगा जैसे खत्म हो जाती है बहुत दिन बाद मिले दोस्तों की बातें
एक दिन रीत जाउंगा जैसे रीत जाते है गर्मियों में तालाब
एक मुसलसल असुविधा है मेरा होना
तिरस्कारों के बोझ से दब खत्म हो जायेगी यह भी एक दिन
दृश्य में होता हुआ हो जाऊँगा एक दिन अदृश्य
अँधेरे के साथ जिस तरह खत्म होती जाती हैं परछाईयाँ
एक दिन चला जाउंगा मैं भी
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए....
अशोक कुमार पाण्डेय
ब्लॉग: http://asuvidha.blogspot.com/
Saturday, March 5, 2011
काश!
काश!
सपनें गिरवी रख कर
नींद उधार मिल जाती
पुरानी फिल्मों की तरह
याददाश्त चली जाती
और कोई कोशिस भी न करता
वापिस लाने की
दोस्त शिष्टाचार की क्लास छोड
अपनेपन को बचाने की सोचतें
दुश्मन डर कर योजनाएं बनाने की बजाए
खुल कर ललकारता युद्द के लिए
बोलता..... आक्रमण.... महाभारत की तरह
पत्नि बेवजह फिक्र करना छोड देती
और दोस्तों पर तंज कसना भी
माँ कभी-कभी बीमारी न बताकर
जो मेरी बडाई वो सुनती है
उसका कोई किस्सा सुनाती
पिता की अपेक्षाएं घट जाती
स्वीकार कर लेता मेरा नालायक होना
प्रेमिका मुझे अपना मोबाईल नम्बर
बदलने का एसएमएस कर देती
पुराना दोस्त मिलने पर
बच्चों की खैरियत न पूछता
बच्चा मेरी हैसियत से ज्यादा
कोई चीज़ लाने की जिद न करता
भाई मुझे ले जाता एकांत में
और समझाता अपनी मजबूरी
जो नाराज़ है बरसो से वो
बिना किसी सफाई के मान जाता
जिनके चेहरे नापसंद हैं बेहद
उनसे रोज़ाना मिलना न होता
शुभकामनाओं के औपचारिक
फोन/एसएमएस न आतें नये साल/जन्मदिन पर
रिश्तेंदार कद,पद और कर्जे की
तफ्तीश न करते पाये जातें
तब शायद इस बेवजह मशरुफ
रहने वाली दूनियादारी में