Sunday, October 27, 2013

अंतिम सलाह...



उससे बिछडते वक्त  
एक आखिरी सलाह
देना चाहता था वह
लेकिन
न जाने क्यों
लब कंप कपा गए
और शब्द अपना
अर्थ खो बैठे
आखिरी वक्त पर
दी जाने वाली सलाह
वैसे तो नसीहत सी लगती है
लेकिन न माने जाने
की पर्याप्त सम्भावना होने के बावजूद भी
दिल कह ही उठता है
कुछ करने और कुछ न करने के लिए
वक्त,समीकरण और
सम्बन्धो की धुरी के आसपास
घूमता शब्दों का दायरा
प्रयास तो करता है
अर्थ को अनर्थ से बचाने का
लेकिन
संयोग या विडम्बना देखिए
जब वक्त अंतिम होता है
सम्बन्धो की जोड-तोड का
तब
सलाह नसीहत लगने लगती है
और नसीहत का प्रतिरोधी होना
अंतिम सलाह के अर्थ,मूल्य और महत्व को समाप्त कर
सम्बन्धो की परिभाषा बदल देता है
अंतिम सलाह अर्थहीन हो जाती है
लोग सयाने लगने लगते है
सलाह
मात्र एक बौद्धिक प्रलाप...।
डॉ.अजीत  

Sunday, September 15, 2013

गजल



मुद्दतों बाद खुद से मिला हूँ मैं
मत समझो कि बदल गया हूँ मै

चोट खाकर मुस्कुराता हूँ इस तरह 
दूनिया समझती है संभल गया हूँ मै

आपकी आंखो की चमक कहती है  
अब ख्यालों से भी निकल गया हूँ मैं

खुद से मुकरने की सजा मिली ऐसी
वक्त पर रेत सा फिसल गया हूँ मै

अजनबी महफिल का जश्न देखकर
दोस्तों संग पीने को मचल गया हूँ मै
डॉ.अजीत 

Sunday, August 18, 2013

ताजा गज़ल

जब भी कोई निराश होता है
वो खुद के पास होता है

तन्हा रहना उसकी शीरत
जो सबका खास होता है

हौसला तभी देंते है सब
खुदा जब साथ होता है

मंजिल अनेक रास्ता एक
सफर बेहद उदास होता है


जरुरतें सिमट आई इतनी
हर दिन इंकलाब होता है

डॉ.अजीत



Tuesday, May 7, 2013

नियति



कुछ दोस्तों को हम
घसीटते हुए शराबबाजी
की किस्सागोई तक ले आएं
अक्सर
शराबी दोस्तों
के सदन में उनका ही प्रश्नकाल
चलता है
जबकि हमारे ऐसे कामयाब दोस्त
ठीक उसी वक्त
बना रहे होते है योजनाएं
जा रहे होतें है मन्दिर सपरिवार
अपनी उपलब्धियों के आंतक से
मजबूर कर रहे होते है
असहमति के स्वरों को
बलात सहमति में बदलनें के लिए
मिलनें पर अजनबी लहज़े
में बतियाना अब अचरज़ की बात नही
हंसी आती है उन लोगो की सलाह पर
जो कहते है दूनिया गोल है
वक्त बदलेगा
अहसास कचोटेगा
कुछ खोने का
न वक्त कभी बदलता है
और न अहसास कचोटता है
दूनिया की दुकानदारी में माहिर दोस्तों
अब तुम्हारी कलाकारी को सलाम करता हूँ
स्वीकार करता हूँ
खुद का ‘झक्की’ होना
और अव्यवहारिक होना भी
न तुम बदलें
न हम
शायद यह उस अंत की शुरुवात है
जो नियति के हाथों बरसों पहले
लिख दी गई थी
हमारे माथे पर...।
डॉ.अजीत 

Saturday, November 17, 2012

गज़ल


करीब आकर भी दूर चले जाते है
कुछ लोग नजरों से उतर जाते है

हर साल कैलेंडर की तरह
दोस्त क्यूँ बदल जाते है

वो बुत बना देखता है तमाशा
फिर क्यों उसके दर पे जाते है

कुछ पैमाने हमसे इसलिए खफा है
छोटे जाम हम अक्सर छोड जाते है

मगरुर होती है जब भी शख्सियत
फकीर अपनी फूंक से तोड जाते है
डॉ.अजीत 

Tuesday, October 30, 2012

किताब..



तुमसे मिलना
कविता की तरफ लौटना है
तुमसे बिछ्डने का डर
कोई उदास गजल कहने जैसा है
कभी तुम कठिन गद्य की भांति नीरस हो जाती हो
कभी शेर की तरह तीक्ष्ण  
तो कभी तुम्हारी बातों में दोहों,मुहावरों,उक्तियों की खुशबू  आती है
तुम्हारे व्याकरण को समझने के लिए
मै दिन मे कई बार संधि विच्छेद होता हूँ
अंत में
तुम्हारी लिपि को समझने का अभ्यास करते करते
सो जाता हूँ
उठते ही जी उदास हो जाता है
तुमको भूलने ही वाला होता हूँ कि
तुम्हारे निर्वचन याद आ जाते है
जिन्दगी की मुश्किल किताब सा हो गया है
तुम्हे बांचना...
प्रेम के शब्दकोश भी असमर्थ है
तुम्हारी व्याख्या करने में
मेरे जीवन की मुश्किल किताब
तुम्हे खत्म करके मै ज्ञान नही बांटना चाहता
बल्कि मुडे पन्नों
और शब्दों के चक्रव्यूह में फंसकर
दम तोड देना चाहता हूँ
क्योंकि गर्भ ज्ञान के लिहाज़ से
मै तो अभिमन्यू से भी बडा अज्ञानी हूँ।

डॉ.अजीत 

Sunday, October 14, 2012

रात,चांदनी और तारा...



रात के सन्नाटें में
अंधकार के विराट छायाचित्रों
के बीच चांदनी को निमंत्रण देना
अपने पास बैठाने का
और चांदनी का मुस्करा कर रह जाना
एक सपना हो सकता है
मगर छत पर पसरी हुई चांदनी को
देखने और महसूस करने के लिए
मन को शांत करने की
अजीब सी कोशिस करता हूँ
ठहरता हूँ उस पल में
बुदबुदाता हूँ खुद ही खुद पर
खुद को छू कर देखता हूँ
कि ये मै ही हूँ
या मेरे देह से बाहर निकल आया है
कोई आदि पुरुष
जो दिन भर के झंझावतों में फंसा
दिन ब दिन खुद से दूर
होता जा रहा है
चांद से बतियाते हुए
एक धन्यवाद भेजने का मन होता है
चांदनी को उसने अपने प्रणय पाश
छोड कर
अंधकार के आतंक के बीच
मुझ तक भेजा
भले ही चांदनी का  मन नही था
मेरे एकांत का हिस्सा बनने का
दूर एक मद्धम टिमटिमाते तारें की
शिकायत मुझे नजर आती है
जो बेवजह जल-बुझ रहा है
ठीक मेरी तरह
मै उसको देखता हूँ
वो मुझे
और देखते देखते
सारी रात बीत जाती है
चांद और चांदनी के रिश्ते की तरह
बहुत से किरदार खुद के अन्दर
रोज जीते है और रोज दम तोड देते है
मद्धम तारें की तरह
न मै उनकी सुनता हूँ
और वें मेरी
हाँ, मेरी उलझन से चांदनी अक्सर
खुश नजर आती है...।
डॉ.अजीत

Saturday, October 13, 2012

मुकाम


आधी रात का मुकाम अभी बाकी है
दोस्तों से दुश्मनी निभानी अभी बाकी है

वो मेरा था नही ये बात जानते है सब  
लेकिन क्यों ये कहानी अभी बाकी है

नाकामियों की मुनादी कर दी हमने खुद
किसका था हाथ ये बताना अभी बाकी है

न साथ ही चले तुम न रास्ता ही दिया
फिर भी चेहरे पर थकान अभी बाकी है

करीब आकर दूर गये यूँ ही चलतें-चलतें
मिलनें पर मगर मुस्कान अभी बाकी है

डॉ.अजीत 

Friday, September 28, 2012

विदा



विदा पर
सभी कहते है
फिर मिलेंगे
इस औपचारिक झूठ
के सहारे लोग जिन्दगी काट देते है
कुछ दोस्त बिना कुछ कहे
अचानक नेपथ्य
मे चले जाते है
कुछ साथ रहकर भी
बोझिल बने रहते थे
ये विदा के समय के
सम्बोधन किसने बनाएं और क्यों
यह सोचकर दिल उदास हो जाता है
बेहतर होता
मिलने और बिछडने के क्रम में
न कुछ कहा जाता
न कुछ सुना जाता
बस जीया जाता वो लम्हा
जिस की वजह से कोई मिलता है
तो कोई यूँ की खो जाता है..।
डॉ.अजीत

Monday, September 24, 2012

तरकीब



विश्वास नही होता
तुम्हारे बदल जाने का
खुद के मुकर जाने
वक्त के दोहराने का

हैरान हूँ
तेरी जिद पर
खुद की बेबसी पर
दूनिया की हंसी पर

इंतजार है
वक्त के बदलनें का
तेरे सम्भलनें का
खुद के सिमटने का 

देखतें है
कब तक ये खेल चलेगा
वक्त कब तक छलेगा

उम्मीद है
कोई रास्ता जरुर निकलेगा

तब तक
दुआ करें
यकीन करें
और जुदा हो जाएं...

बेवफाई से ये तरकीब अच्छी है।

डॉ.अजीत