Wednesday, December 24, 2014

मुड़ना

कई बार
लौट कर शुरू करना चाहतें है
वहीं से
जहां से मिले थे
और चले थे साथ
अतीत की यात्रा
एक तरफा होती है
वहां केवल जा सकते है
आने के दरवाजे बंद कर देती है
सुखद स्मृतियां
वर्तमान की खीझ
अतीत पर नही लाद सकते
इसलिए भविष्य से डर जाते है
अचानक
फिर भटकते है
भूत वर्तमान और भविष्य के जंगल में
बेहद अकेले
अतीत मासूम
वर्तमान षडयंत्रकारी
और भविष्य उलझा हुआ लगता है तब
कभी खुद को प्रश्न उत्तर से छलते तो
कभी समझदार होने का अभिनय करते
अतीत सदैव आकर्षित करता है
वर्तमान की कीमत पर
भविष्य को नेपथ्य में धकेल
जीना चाहते है वे कुछ पल
जब सब कुछ कितना
साफ़ सहज और सरल था
यात्रा का मध्यांतर
उलझने पर
आरम्भ के चंद कदम याद आतें है अक्सर
चलते चलते पीछे मुड़कर देखना
शायद आदत या आस नही
एक किस्म की मजबूरी होती है।

© डॉ. अजीत

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