पुरोवाक:
कभी-कभी जीवन में यकायक सब कुछ समाप्त हो जाता है। यह दुकान बढ़ाने (असमय बंद करने) जैसा काम है, जिसमे दुकानदार मारे आलस के दोपहर के बाद शाम होने का इंतज़ार न करने का फैसला करते हुए दिन ढ़लने से पहले शटर डाउन कर निकल कहीं दूर अकेला निकल जाता है।
कविता में यह सबसे खराब बिम्ब प्रयोग है मगर जीवन इन्हीं खराबों के भरोसे चलता है!
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एक अधूरी आशा
बार-बार देती थी दुःख
उन्हीं से मन रखता था उम्मीद
जो शायरी की तरह नहीं जानते थे कि
'उम्मीद-ए-वफ़ा' क्या है!
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सबसे मुश्किल था
उस बात के लिए
खुद को समझाना
जिसे दुनिया को समझाते हुए
उम्र कटी थी।
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क्षणिक आवेग की हिंसाएं
अपेक्षाकृत कम क्रूर थी
सबसे अधिक क्रूर था
खुद को सदैव प्रस्तुत रखना
उनके मुताबिक़।
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प्रेम में कृतज्ञता
बहुत धूमिल चीज बन जाती
अधिकार और निर्णय के समक्ष
यह दिखती बेहद दयनीय
छूटा साथ कृतघ्न नहीं था
मगर कृतज्ञ भी एकदम न था।
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एक सामान्य खेद
मरहम हो सकता था
एक छोटी कोशिश
दवा की शीशी जैसी ठंडक दे सकती थी
मगर
अंततः उखड़ी हुई त्वचा
कष्ट देकर ही अलग होती थी।
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दो असंगत ध्रुवों के मध्य
लटके रहना बेताल सा
किंकर्तव्यविमूढ़
और कहना खुद से बार-बार
माफ़ी चाहता हूँ दोस्त
जैसे चाहने से मिल ही जाती हो
माफी।
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रोकर पूछा जाता
हंसकर सलाह दी जाती
गंभीर होकर कहा जाता
आप भी किस चक्कर में फंस गए
जी साब, उसी चक्कर में
जिसकी आकृति गोल नहीं है।
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जिसके लिए
बदलाव सामान्य था
उसके लिए असामान्य होना
व्याधि नहीं अनुराग कहा विद्वानों ने
अनुराग दोष की औषधि
एक समय बाद अनुराग भी न थी।
©डॉ. अजित