मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती, मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती । (उपरोक्तपंक्तियाँमेरीमौलिकनहींहैंमैंनेकहीपरपढ़ीऔरअच्छीलगीसोअपनेब्लॉगपरपोस्टकरदीहै,वैसेजिसनेभीलिखीहैकाफीदमदारलिखीहैउसकोआभार)
युक्तियुक्त सात्विक झुठ बोझिल बातें औपचारिक वायदे अनमने मन मे अभिनय के पुट के साथ अपनेपन का आत्मीय प्रदर्शन उधार के शब्द और संवेदना का प्रमाणिक यांत्रिक दस्तावेज़ मेरा फोन मुझे साक्षी भाव से स्वीकार करना वाला अब तक का सबसे विश्वसनीय साथी लगा पल भर के लिए सोचता हूं अगर इसमे कोई सजीवता होती तो कब का छोड गया होता सार्वजनिक करके मेरे दोहरे व्यक्तित्व को एक अजीब सा सम्बन्ध है अपना जब भी अकेलेपन ने घेरा मेरे एक सच्चे दोस्त की तरह इसने संवाद बचाया उन लोगो के साथ जो मेरी तमाम बदतमीजियों के बाद भी मेरी फिक्र करतें है ऐसा कई बार हुआ कि आत्महत्या करने का मन हुआ तब इसके सहारे ही दिलासा मिली और मै बच गया अगर यह निमित्त न होता तो आज मै कृतज्ञता प्रकट करने के लिए न बचता अपनी आखिरी सांस तक यह मुझे जोडे रखता है इस औपचारिक दूनिया से एक आग्रह के साथ ऐसा दिन मे कईं बार होता है जब मै उकता कर इसको क्या तो बंद कर देता हूं या छोड देता हूं इसका गला घोंट कर वाईब्रेशन मोड पर लेकिन यह मुझे कभी नही छोडता और सच कहूं तो इसके बंद होने पर अब मुझे गहरी चिंता होने लगी है ऐसा लगता है कि वो सेतु टूट गया है जिसके एक पार मै अकेला खडा हूं और दूसरी तरफ सारी दूनिया है अपने शिकवे-शिकायतों के साथ कोई इतना अपना कैसे हो सकता है जब आपको पता है कि इसका अपना कुछ भी नही कुछ भी हो इसे खरीदते वक्त मैने नही सोचा था कि इतना अपनापन होगा इसमें बिना स्वार्थ के कम से कम उन औपचारिक संबन्धो से बेहतर है इसका होना जिनके लिए मै कभी काम का नही रहा हूं और शायद हम दोनो एक दूसरे के बडे काम के हैं...। डॉ.अजीत
एकांत के कुछ पल अधुरे सपनो की बुनावट के सच्चे गवाह हो सकते है भले ही इनकी गवाही की कभी जरुरत न पडे लेकिन इन सपनो की उधेडबुन मे उलझा मन अपनी झुठी तारीफ से कुछ पल के लिए ही सही सुलझ सकता है जी सकता है कुछ पल अपनी तरह से अपने वजूद के साथ सपनें देखना और जीना इनके साथ आज की नही कल की जरुरत थी और कल के सहारे आज की हकीकत मन के अवसाद को संजो कर रखने का साहस इतना आसान भी नही कि हम जी सके बिना सपनो की समीक्षा किए अधुरे सपने दरअसल एक अहसास है खुद के अधुरे होने का जिसे पुरा करने के लिए दिल की नही दिमाग की जरुरत है ऐसे सपनों के सहारे एक समानांतर जिन्दगी जीने बाद सपनों पर बहस करना जरुरी नही लगता लेकिन जब कोई अपना सपना बदलता है किसी भी वजह से तब अधुरे सपनें भर देते है एक अजीब एहसास से और दिल करता है एक और उधार के सपने के साथ जीने का अपने अधुरेपन के साथ...। डॉ.अजीत
साथ रहने के लिए साथ खडे होना भी जरुरी होता है एक मित्र ने समझाया कि साथ देखने की सीमाएं क्या होती है देखा जा सकता दायें-बायें या फिर अपने से ऊपर छदम गर्व के साथ नीचे देखने का वक्त नही होता है साथ के लोगो के पास और न ही साहस अपने साथ चले लोगो को नीचे देखने के लिए सर्वाइकल से कुछ ज्यादा दर्द होता है प्रेक्टिकल होना और साथ खडा होना दोनो एक सी बात है कदमो की लडखडाहट के तब ज्यादा मायनें नही है जब साथ मे चल रहे हो कुछ शुभचिंतक साथ की यात्रा के लिए सावधानी और अभिनय दोनो जरुरी है क्योंकि आपने मार्ग क्यों बदला इसकी समीक्षा और कारण जाने बिना साथ छुट जाता है फिर अभिनय ही आत्मघाती होने से बचा सकता है अभिनय खुद के लिए इतना जरुरी नही होता जितना कि साथ के लोगो के एहसास मे बनें रहने की मानवीय कमजोरी के लिए लेकिन उपलब्धि के समीकरण से उपजी साथ चलने की इस शर्त से यात्रा कितनी पीडादायक हो सकती है इसका अहसास भावुकता की आड लेकर चेता रहा है बार-बार और मै साथ खडे रहने की तैयारी कर रहा हूं सपनो की कीमत पर....। डॉ.अजीत
कल रात बिना पूर्व कार्यक्रम के अपने गांव मे गुजारी। अनुभव एकदम नया तो नही लेकिन सोचने पर रोचक लगने लगा जो शायद देहाती परिवेश के प्रति एक आन्तरिक लगाव की उपज हो सकता हैं।पहले शिक्षा और अब अर्थ पर केन्द्रित हमारी विवशताएं जो हमे शहर ले ही आई,सोचा नही था कि कुछ बडा या विशेष करना है लेकिन सपनों मे बसी रंगीनीयत और तथाकथित बौद्दिक परिवेश ने शहर मे समायोजन करने के लिए पर्याप्त सहयोग किया और गांव के चौडे आंगन से टू रुम फ्लैट मे स्थापित हो गये। लेकिन एक बैचेनी हमेशा हमारे अंदर बनी ही रहती है भले ही ऊँची डिग्रीयां,रसूखदार लोगो मे उठ-बैठ और पर्याप्त सामाजिक स्वीकृति हो लेकिन अपने अन्दर के एक देहाती मन को जब भी अवसर मिलता है वो उडान भर कर गांव की गलियों,चौपालो पर भटकता ही रहता हैं। लम्बी भूमिका लिखने की आवश्यकता नही है लेकिन कभी-कभी हम भी शहर के ‘शहरी’ होने के चक्कर में गांव और समस्या दोनो को एक ही मान बैठते है मसलन यार! गांव मे न बिजली होती है और न ही पानी(मिनरल),न ही अखबार आदि-आदि। लेकिन हम यह कभी अनुभूति नही कर पातें कि गांव की मौलिकता उसकी खास जीवनशैली और वस्तुओं/साधनों पर निर्भरता न होने से हैं,वहां पर अभाव का भी एक अलग भाव है। एक सहजता का बोध है और सबसे बडी बात विशुद्द संवेदना है। शहर मे थोडी देर के लिए बिजली गुल होते ही लगने लगता है कि जीवन कितना असहनीय है,पानी का टैंक तुरन्त खाली हो जाता है पीने के पानी की किल्लत अलग से और सबसे बडी बात समय काटने का वैद्यानिक यंत्र टी.वी.के न चलने पर श्रीमती की पीडा अपने आप मे अबुझ प्रतीत होती है। मोबाइल डिसचार्ज़ होने लगता है ये स्थिति तो एक-दो घंटे के कट की है अगर ये समय सीमा बढी तो भइया फिर तो हम यंत्र की भांति वही रुक कर खडे हो जाते है,कितने यांत्रिक हो गये है हम! अब गांव की बात खासकर यू.पी.के गांव वाले बन्धु इस सार्वभौमिक सत्य से तो अवगत ही होंगे कि हमारी शाम चिरकालिक रुप से डिब्बी/लैंप से ही रोशन रहती है अपने 28 वर्ष के अल्पजीवन मे शायद ही कभी शाम का भोजन बिजली के प्रकाश मे किया हो लेकिन इस बात का भी लिखित मलाल हमें नही होता है। अथकथारम्भे: जब मैन गांव पहुंचा रात्री के लगभग 8 बजे थे,गलियों मे घुप्प अंधेरा कही-कही किस घर मे डिब्बी(डीज़ल से जलने वाली) टिमटिमा रही थी, दूर से ही विरक्ति भाव के साथ हर अजनबी पर भौंक कर कुत्ते अपने सजग होने का परिचय दे रहे थे।एक ये शहरी कुत्ते भौंकते ज्यादा है और घर के अन्दर जाते ही क्या तो आप टूट पडेंगे या डराकर फिर पैर चाटना शुरु कर देंगे अपने बेवफा मालिक वो वफादारी का सबूत देते हुए। घर पहूंचा तो चूल्हा उदास ही पडा मेरी प्रतिक्षा मे सुलग रहा था, नमस्कार/चरण-स्पृश आदि होने के बाद माताजी ने भोजन परोस दिया बस अपन का देहाती मन यंही से जाग उठा और तुलना एक तन्त्र स्वत: विकसित होता गया मन मे...। खाने मे दाल-चावल और चटनी(सिल-बट्टे वाली) बनी थी ये तो माताजी से पता चल गया लेकिन उनके रंग-रुप,मात्रा के दर्शन मैने अनुभूति के माध्यम से ही किए। प्रकाश के नाम पर एक डिब्बी जल रही थी जो कभी भभक पडती तो कभी मंद पड जाती थी लैम्प भी अपनी ठीक से सफाई न होने की शिकायत करता हुआ एक चिडचिडा सा प्रकाश फैला रहा था लेकिन प्रोढो वाली सहजता के साथ। शहर मे भिन्न तरकारियों,बून्दी रायता,दही,पनीर और सलाद के आकर्षक प्रस्तुतिकरण के बाद भी मैने वो स्वाद नही महसूस किया जो मैने घर के मंद प्रकाश के दाल-चावल चटनी का था,शहर मे उचित/अनुचित परम्पराओं के चलते रोमांटिकता के जबरन पैदा किए गये बोध के साथ अनुशासित वेटरो की उपस्थिति मे बडे रेस्त्राओं के तथाकथित कैंडल लाईट डिनर का स्वाद भी फीका ही लगा मुझे घर के उस आत्मीय भोजन के समक्ष। अपने गांव की जीवनशैली का एक आत्मीय ठहराव मुझे सोचने पर विवश करने लगा कि संभवत: शहर की सी.एफ.एल. और हाई मास्ट लाईट से बचकर कुछ राहत मिलती है तो वो गांव के इस बेरौनक प्रकाश मे ही, यहां कुछ तय नही है एक सहजता है जो सुविधाओं पर निर्भर नही है। भोजन के उपरांत ‘दूध’ जो गांव की एक स्थाई परम्परा है किस ‘टोन’ का होता है ये हमे भी पता नही,जहाँ शहर मे बच्चो को डायटिशियन की सलाह पर अलग और बीमारो के लिए अलग (तीसरी श्रेणी को दूध की जरुरत नही,क्योंकि वो दूध नही काफी पीते है,मुझे अब लगने लगा है कि चाय भी ओल्ड फैशन हो गयी है) दूध खरीदा जाता है और ऊपर से तूर्रा ये कि शक्कर(चीनी) नाम मात्र की होनी चाहिए एकदम लौ कैलोरी डाईट। घर का दूध एकदम गाढा और बडा गिलास पीकर ऐसा लगा कि ये प्यास कब दफन हो गई मुझे खुद पता नही चला। अब सोने की बारी है,गांव मे बिजली का कोई भरोसा नही है सो पंखे के नीचे बंद कमरो मे सोने की परम्परा नही है,बिजली का आना एक संयोग की विषय-वस्तु होती है। लोग बगड(घर का आंगन/चौक) मे लाईन से खाट(चारपाई) लगा कर सोते है और अपन सौभाग्य की एक झुठी आस पर प्रतिदिन एक बडा फर्राटा पंखा (तूफान फैन) लगा दिया जाता है जो गर्मियों मे कभी-कभी चलता है वो भी कुछ देर के लिए लेकिन लगता प्रतिदिन है। पिताजी के आदेश पर मेरी चारपाई छत पर उनके साथ लगा दी गई और मै चारपाई मे पैक हो गया मच्छरदानी के साथ क्या बढिया विकल्प है गुड नाईट/आल आऊट का एकदम प्राकृतिक।ओस से बिस्तर पर एक ठंड का अहसास लेटते ही हुआ उपर आकाश तारो से भरा हुआ है एकदम शांत न कूलर/पंखे की आवाज न टी.वी.मोबाईल का शोर, कल्पना ऐसी ऊंची उडान भरती है कि एक बढिया कविता लिखी जा सकती है। यह अहसास अभिव्यक्त नही किया जा सकता है जो मैने शहर के सुविधाभोगी मे कभी महसूस नही किया। मोबाईल नेटवर्क कभी साथ छोड देता है कभी आ जाता हैं,मन मे एक अजीब सी शांति है शहर मे नेटवर्क बिज़ी हो जाएं या चला जाए तो मन आशंका और दूविधा से भर उठता है लगता है कि सारी महत्वपूर्ण काल इसी समय आनी थी लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल भी नही है अंत मे मैने फोन स्विच आफ किया और आकाश की कल्पनाओं के रथ पर सवार होकर अपलक निहारता कब नींद के आगोश मे चला गया पता ही नही चला....।
अभी बस इतना ही हो सकता इस बार होली गांव मे ही मनाई जाए...उसके बारे बाद मे लिखूंगा। डा.अजीत
बहुत दिनो से मैंने अपना फोन को स्विच आफ नही किया इस डर से कंही उसी वक्त तुम मुझे फोन करके यह बताना चाह रही हो कि मै अब उतना ही आउटडेटड हूं तुम्हारे जीवन मे जितना कि तुम्हारे कम्पयूटर का कभी न डिलीट होने वाला एंटी वायरस हर एसएमएस पर चौकना अभी तक जारी है इस उम्मीद पे कि तुम मेरी घटिया शायरी और फारवर्ड किए गये संदेशो पर आदतन वाह-वाह के दो शब्द भेज रही होगी दवा के माफिक बहुत दिनो से मुझे एक आदत और हो गयी है मै बिना बात ही लोगो से बातचीत मे तुम्हारा जिक्र ले आता हूं चाहे बात वफा की हो या बेवफाई की सुनो ! मैने अभी-अभी सोचा है कि मैं अपना सिम बदल लूं ताकि जब कभी हम मिले तो तुमसे औपचारिक रुप से यह सुन सकूं कि बिना बताए नम्बर क्यों बदल लिया तुम्हे बिना बताए किए जाने वाले कामों की एक लम्बी लिस्ट है मेरे पास और तुम्हारे पास इतना भी वक्त नही कि मुझसे बोल के जा सको अलविदा.... डॉ.अजीत
अक्सर तुमने कही गई बातों को एक श्रृंखला के साथ याद रखा जो अक्सर सन्दर्भ के साथ तुम प्रस्तुत भी करती हो लेकिन क्या कभी तुमने यह नही जानना चाहा कि इतने कहे गये के बीच कुछ अनकहा भी हो सकता है जिसके लिए उपयुक्त अवसर न मिला हो ऐसा बहुत बार हुआ है कि मैने जो सोचा वो कहा नही और जो कहा वो सोच कर नही कहा जिसे क्षणिक उत्तेजना मानकर मैने छोड दिया था यू ही आज मैने देखा उस हर बात एक अर्थ था एक ऐसा अर्थ जो समर्थ न हो सका ऐसी अनकही बातो पर मै एक लम्बा चौडा पत्र लिख सकता हू पत्र ही नही और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है कविता,कहानी या गज़ल ऐसी तमाम अनकही बातो पर मै बेवक्त बात करना चाहता हू तुमसे बिना तुम्हारे मूड की परवाह किए हुए शायद तुम बहुत सी बातो पर चौंक जाओ और कहो पहले क्यों नही बताया हो सकता तुमको ये सब बोझिल लगे एक चिड-चिडी शाम की तरह या मै भी बेतुका लग सकता हूँ मै कहूंगा और रस के साथ कहूंगा वे सब अनकही बातें जो मुझे कभी बैचेन करती है कभी एक राहत भी देती है और फिर मेरी सब से बडी जिज्ञासा तो इन बातो के साथ तुम्हारा मन टटोलने की है चलो एक शाम अपनी अपनी अनकही बातो से रोशन करके देखें शायद फिर यह अधेंरा छट जाए जिसमे हम एक दूसरे को ठीक से देख नही पा रहे हैं इस बात पर विचार करना आग्रह है मेरा...। डॉ.अजीत
तुम्हारे साथ मै अकेला नही होता मेरा साथ होता मेरा अकेलापन जिसको बिसरा कर तुम आग्रह पर आग्रह किए जाती हो और मै सापेक्ष अभिनय इस नाट्यशाला मे ऐसा नही मुझे हमेशा द्वन्द होता हो कभी कभी मै लुत्फ भी ले रहा होता हू बिना तुम्हे बताए तुम्हारी अपेक्षाओं के अनुसार मै हर चीज उधार की ले आया हूं ये जो हंसी है यह भी किस्तो पर है जिसकी ईएमआई मुझे देनी पडेगी अवसाद के आलाप के साथ सच कहूँ तो मुझे कभी कभी जलन भी होती है तुमसे जब तुम हंसती हो बिना वजह मै कोई नीरस जीवन के एकाकीपन को मिटाने वाला साधन तो नही बन गया हू तुम्हारे जीवन मे ऐसा भी नही है कि मेरा कोई विकल्प न हो तुम्हारे पास फिर कोई अकारण बिना किसी राग के कैसे साथ-साथ घंटो बिता सकते है बौद्धिक चवर्णा करते हुए जिसका कोई अर्थ भी नही है मै कभी कभी सोचता हूँ कंही ऐसा तो नही कि तुम्हारा अपने वर्ग से बहिष्कार किया गया हो सपने बुनने वाली विलासित पीढी से आउटडेटड होकर तुम दार्शनिक बन गई हो कुछ भी हो मैने एक बात का अनुभव किया है नदी और स्त्री तट से विद्रोह करके एक अंजानी प्यास मे आगे बढती जाती है कही तुम विद्रोहणी तो नही अन्यथा मत लेना इस आभासी दूनिया की इस आभासी यात्रा मे न तो तुम मेरी सहयात्री हो न ही सम्बन्धी न मित्र न परिचित फिर ऐसा क्या है कि अक्सर हम असहमत होते हुए भी सहमत होते है और सच कहूँ तुम्हारे सत्संग से मै तो निरुद्देश्य जीवन जीने का अभ्यस्त सा हो गया हू क्योंकि तुम्हारे पास प्रेमी-प्रेमिका वाली लम्बी चौडी योजनाए नही है न ही तुम्हारी दिलचस्पी मेरी आर्थिक प्रगति मे है तुमने आज तक नही पूछा कि मुझे क्या बनना है जीवन मे इस तरह से तो तुम इस निजता के ध्यान मे सहयोग ही कर रही हो सच-सच बताना क्या तुम सच मे जी सकती हो बिना सम्बोधन के बिना बंधन के सोच समझ के जवाब देना अभी कोई जल्दी नही है वैसे मुझे पता है तुम्हारा जवाब तुम जोर से हंसोगी और कहोगी तुम तो पागल हो चलो कही कॉफी पीते है चल के अब मै क्या कहूँ ...। डॉ.अजीत
ठहर के पानी मे देखा है गहराई को भीड मे अक्सर महसूस किया है तन्हाई को माजी के हाथ से लिखी थी तहरीर मेरी दोष कैसे दूँ रोशनाई को जो हमेशा फांसले पे खडे थे वे ही सबसे करीब नजर आये बिनाई को नसीहत, सफर, हादसा,हकीकत किस पर यकीन करुँ वक्त के दायरे मे सिमटते रोक न सका खुदाई को लबो पर खामोशी,बेसबब उदासी जिस्त पर पहरा वक्त का जज्बात जब तक तक्सीम न हो हाकिम क्या गुनाह मुकर्रर करेगा सुनवाई को...। डॉ.अजीत
त्रासदीपूर्ण जीवनशैली अवसादो से भरी नियति सुख के छींटे शायद ही पडे हो कभी- कभी और दुख एक स्थाई भाव इतने निराशावादी प्रतिमानो के साथ जीवन मे आत्मविश्वासपूर्वक ‘सामान्य’ एवम लौकिक सम्भावनाए तलाशने के तुम्हारे प्रयास पर कोई भी सम्वेदनशील व्यक्ति हतप्रभ हो सकता है ठीक उसी तरह जैसे मैने अपना बचाव किया था दार्शनिकता एवम बौधिकता से पूर्ण अभिव्यक्ति मे तार्किकता तलाश कर इस प्रकार के प्रयास मेरे जैसे व्यक्ति के लिए सदैव बौधिक हथकंडे रहे है प्रभाव उत्पादन के लिए लेकिन यथार्थ की सीमाओ से शंकित मन से स्वत: तंत्र विकसित किया स्वीकृति के साथ अस्वीकृति के बोध का प्रतिमान/दृष्टिकोण/अनुभव और सम्भावनाओ के विकल्प के रुप मे इतनी पारस्परिक भिन्नता होने के बाद भी तुम्हारा प्रखर आशावाद मेरे लिए प्राय:बौधिक बैचेनी का विषय रहा है ऐसी बैचेनी जिसको कभी अभिव्यक्ति नही मिली घुटन/अवसाद/कुंठा का संताप भोगते हुए कभी-कभी लगा कि तुम्हारी समझ मे समग्रता का अभाव है या व्यक्तिविश्लेषण का अचानाक ख्याल आता है संक्षिप्त विरोधाभास आंशिक अपेक्षाबोध और व्यापक सम्वेदना के धरातल पर कुछ नये सम्बन्धो का ’अर्थ’ तलाशते तुम्हारे परिपक्व प्रयास कही प्रतिभासी विरोधाभास से उपजी महज एक बौधिक फसल तो नही जीवन के समानांतर यथार्थ/नियति और असामान्यबोध के बीच तुम्हारी उपस्थिति उपलब्धि है अथवा एक बौधिक त्रासदी जिसको भोगना कभी सुखद लगता है तो कभी बडा असहनीय....। डा.अजीत
अक्सर मित्र/परिचित शुभचिंतक एवम हितचिंतक एक तार्किक सवाल करते है और क्या चल रहा है आजकल? इस चलने का अभिप्राय कुछ करने से होता है पता नही उनका सवाल गतिशीलता के मानक तय करता है अथवा जडता की गहराई की सम्भावना तलाशता है हो सकता उनकी जिज्ञासा नियोजन से सम्बन्धित हो लेकिन कुछ करना और कुछ भी न करना दोनो दर्शनो की तात्विक समीक्षा का अधिकार सदैव इनके पास सुरक्षित रहता है और मेरी प्रतिक्रिया इनके बौधिक आग्रह,अपेक्षाओ से विरोधाभासी रही है मेरे चिंतन की दिशा कुछ करने और कुछ भी न करने के मध्य से रेंगती हुई क्या करु? क्या किया जा सकता है आदि की दिशा मे बढती जाती है प्राय:ऐसे सवाल मानसिक खीझ का विषय बनते है और निजता का हनन का बोध अलग से लेकिन कुछ भी अप्रत्याशित करना उपलब्धि एवम सम्बन्धता के संयुक्त मनोविज्ञान की उपज होती है. जिससे अभिप्रेरणा प्राप्त हमारे ‘आत्मीय’ अपने प्रश्नो के साथ बहुत सारे करने के विकल्प भी साधिकार प्रस्तुत करते है जिनकी व्यंजना कभी परामर्श लगती है तो कभी एक नसीहत भी बडा सवाल यह पैदा होता है कि समग्र व्यक्तित्व के मूल्यांकन के मानक क्या कुछ करने या कुछ विशेष करने से ही तय होते है? मानवीय अस्तित्व का कोई महत्व नही समग्र निजता का भी कोई अर्थ नही कुछ भी न करने का दर्शन कुछ करने से कही अर्थो मे न केवल व्यापक है बल्कि जटिल भी जिसे अक्सर मेरी अकर्मण्यता मानकर विभिन्न विकल्पो के प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते है और मेरे लिए ये शायद की कभी सम्भव हो कि अस्तित्व/चिंतन/निजता/अभिप्ररेणा/महत्वकाक्षाओ के नितांत ही व्यक्तिगत स्रोत त्याग कर उनकी कुंठाओ/ महत्वकाक्षाओ के बोझ को ढो संकू लेकिन रोचक बात यह है कि उनके प्रयासो की उर्जा एवम बौधिक आग्रह को देखकर कभी- कभी मुझे भी लगने लगता है कि आखिर मै कर क्या रहा हू....? डा.अजीत
सन्दर्भ प्रसंग व्याख्या तीनो के समन्वय मे उर्जा का नही सम्वेदना का कितना व्यय हुआ इसका विवरण जीवन के बीजगणित मे तलाशना चाहता हू सम्बन्ध जीने से जीया जाता है इससे कोई औपचारिक आपत्ति नही है लेकिन यदि सम्बन्ध जीते- जीते यह अहसास होने लगे कि इस कौशल का प्रयोग कभी भी अप्रत्याशित दिशा तय कर लेगा स्वत: तब खिन्नता का बोध नही ‘बोझ’ कदमो मे लडखडाहट भर देता है आवाज मे रिक्त कम्पन सम्वेदना/अतीत/स्मृति के दर्शन से पोषित सम्बन्धो की धरा सदैव उर्वरा रहने का स्वाभाविक अधिकार रखती है लेकिन पारस्परिक अनुभुतियो के व्यापक संसार मे वेदना का एक पक्षीय व्यापार सम्बन्धो की समसामयिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाता प्रतीत होता है और प्रासंगिकता पर अप्रासंगिक होने का सतत भय एक दिन स्थाई रुप से मौन कर देता है समस्त अपेक्षाबोध को जीवन की अस्थाई रिक्तता के बोध प्रणय से उपजे सम्बन्ध बचपन की स्मृतियो की भांति व्यस्क होने से पूर्व ही अपना अर्थ खो देते है अर्थ खोना उतना बडा खेद का विषय नही है जितना इस अप्रमेय समीकरण मे अपने व्यक्ति विश्लेषण की समीक्षा की पुनर्समीक्षा की बात सोचना क्योंकि अतीत के स्थाई भाव,प्ररेणा को एक झटके से छोडकर सहजभाव से जी पाना मुश्किल नही असम्भव है किसी भी सम्वेदनशील व्यक्ति के लिए मुझे ऐसा लगता है अक्सर पता नही क्यों...? डा.अजीत