Thursday, August 26, 2010

किस्सा

तवज़्जो का तालिब दिल निकला

तकसीम होकर भी

हासिल सिफर निकला

वो ठहर कर प्यासा रह गया

मुनासिब दिल के वतन नही निकला

मुजरिम भी वो मुंसिफ भी वो

गवाह सच बोलकर बच निकला

दोस्त यारी के किस्सो मे रह गये

पुरानी डायरी से आज उनका खत निकला

हाजिरजवाबी दगा दे गई

वक्त इतना संगदिल निकला

तन्हा खडा था जो भीड मे

वो ही बडा गाफिल निकला

उम्मीद-ए-वफा जुर्म से कम नही इस दौर मे

अदावत जिससे थी वो ही दोस्त निकला

चलो भीड मे फिर से खो जाए

मिलने का यही सबब निकला...।

डा.अजीत

Wednesday, August 25, 2010

एक ख्याल

कुछ बेतरतीब ख्याल

और बेफिक्री की फिक्र मे

गुजरता वक्त

स्याह होती रात से

ज्यादा डरावना होता

आधी रात का अधूरा सपना

और पुराने रिश्तों को बुनती

नई सलाई

उस अहसास को

चाट रही है रात दिन

जिस पर नुक्कड के नाई की दुकान

पर अपनी बारी का इंतजार करना बुरा

नही लगता था

अब बहुत जल्दी बहुत कुछ बुरा लग जाता है

और अदरवायिज़ भी

पुराने दोस्त का तंज नही चुभता

कहकहो की हँसी चीर देती है बहुत कुछ

वक्त बदला

या वक्त ने मिज़ाज बदला

पता नही कुछ

पर कुछ तो बदला है

क्योंकि अब

उदासी बेवजह नही होती

पहले की तरह

लेकिन मेरे होने की वजह

सुबह का सवाल बन कर

घिर आयी है शाम को....

पुराने दरख्त की और लौटते

पंछियों को देखकर एक नम

हँसी लौट आई और कहा

छोड ये देश

चल परदेश

बदलकर भेष...।
डा.अजीत

Tuesday, August 17, 2010

उदास

वो दो शब्द थे

और एक बात

जिस पर हम मिले

और जुदा हुए

बेसबब उदासी की वजह

इतनी बेसबब भी नही थी

कुछ मेरे और कुछ तुम्हारे

ज़ज्बात हसीन अहसास के

गवाह न बन सके

स्याह रात की खामोशी

उस खामोशी से थोडी कम ही होगी

जब हमने तय किया

कुछ दूर तक साथ चलना

साथ चलना नसीब था

चल कर बदलना हकीकत

कुछ कदम सुस्त से

कुछ मे रफ्तार

सोचता हूं आज भी वो

रास्ते किस्से सुनाते होंगे आपस मे

जब दो मुसाफिर

साथ चले थे चार मील

कभी जरुरत पडी तो उन पेडों

की गवाही ली जा सकती है

जिसकी पत्तियां

तुमने मसलते हुए कहा था

ऐसे कैसे जीया जा सकता है

मै बदला

तुम बदली

हम दोनो बदल गये

लेकिन नही बदले वो रास्ते

जो गवाह है

हमारी खामोश रातों के

कभी आपस मे बतियाते होंगे

तो वो भी उदास हो जाते होंगे

मेरी तरह

जैसे मै आज उदास बैठा हूं

तुम्हारे बिना

और तुम्हारी मुस्कान पर

कही कविता लिखी जा रही है...।

डा.अजीत

Saturday, August 7, 2010

सफर

मौसम का मिज़ाज हादसों से क्या कहते

गुनाहगार बन कर हमराह कैसे रहते

वजूद बेख्याली मे बिखर गया

किनारे कब तक नदी के साथ बहते

हिम्मत पे तनकीद सब्र का इम्तिहान थी

तजरबे पर सवाल कैसे सहते

मै बिखरा हूं अपनी कमजोरियों से

तुम संवरने से पहले अपना हाल कहते

मंजिल ही न तय कर सका वो मुसाफिर

मील के पत्थर सफर की क्या दास्तां कहते

लौट आए हो तो ये मशविरा करके जाना

तन्हा मुसाफिर के इंतजार मे रस्ते नही रहते

दुआ उस फकीर की महफूज रखना

अंधेरा जब ज्यादा हो

जरा सी हवा चराग नही सहते..।

डा.अजीत

Wednesday, July 28, 2010

सज़ा

तन्हाई का सबब खुद्दारी मे निकला

रहबर जिसे समझा

वो माहिर अय्यारी मे निकला

इम्तिहान इतने लिए ज़िन्दगी ने

हर लम्हा किसी गैर की तरफदारी मे निकला

फकीर जब उसके दर पर बेआबरु हुआ

किरदार तब उसका अदाकारी से निकला

खामोशी बेबसी की तहरीर थी

इल्जाम गवाह की ईमानदारी पे निकला

खुदा भी हैरान रहा इस बात पर

ताउम्र खुशियाँ बेचने वाले का

आखिरी वक्त बडी बेज़ारी मे निकला...।

डा.अजीत

Wednesday, July 7, 2010

सबक

हौसलों की बात करते रहे

बुझदिलो की महफिल मे सजते रहे

हम वो चराग है अपनी महफिल के

जो उजालो मे भी जलते रहे

बुझना तो चाहा कई बार

मगर कुछ मरासिम हसरतो मे पलते रहे

बुलन्दी का नशा होता तो कैसे होता

जिन्दगी किराये का घर था बदलते रहे

लबो पे हँसी आई तो टिक न सकी

आँसू पलको तले पलते रहे

अदब न समझ मे आया दूनिया का

तहजीब सीखाने वाले अब हद मे रहे

न अब दोस्ती किसी से न अदावत

न कोई शिकवा न शिकायत

सबक यही मिला हँसी से कही बेहतर है

याद बनकर किसी के चश्मेतर मे रहे...।

डा.अजीत

Saturday, July 3, 2010

विकल्प

कभी यह सोचकर

एक अजीब सी बैचेनी होती है

कि

विकल्प संकल्प की बाधा है

या एक ऐसी युक्ति

जिस पर गाल बजाई की जा सके

आदमी का अपनी सुविधा के लिए

गढा हुआ एक बहाना भी हो सकता है

जिसके होने और न होने से

कोई खास फर्क नही पडता

फिर यदि मित्र का विकल्प शब्दकोश

पत्नि का प्रेमिका

और दूसरे सम्बन्धो का कुछ और

बन सकता है

या बनाया जा सकता है

तो फिर कोई असुविधा ही नही रही

सम्बन्धो में

यह एक भटकन भी तो सकती है

अपने आपसे

अपने को भुलाने का एक उपचारिक

प्रयास

अलझाईमर की बीमारी अगर

जवानी मे हो जाए

कुछ दिन के लिए और फिर ठीक हो जाए

तो विकल्पों के रोजगार करने

की जरुरत ही न पडे शायद

यादें खट्ठी-मिट्ठी होती है

लेकिन खटास का मैल मन से धुलता क्यों नही

इसका धोने का कोई डिटरजेंट

नही बन पाया आजतक

समानांतर जिन्दगी के पडाव

पल भर सुस्ताने की मोहलत नही देते

और अगर फुर्सत मिल भी जाए

तो वो लोग नही मिलते

जिनकी जिद पर हमने रचा है

अपने वैकल्पिक सम्बन्धों

का पूरा हरा-भरा संसार

यह सोचकर एक ठंडी सांस भरी जा सकती है

या रोया जा सकता एकांत मे

शराब पीकर

लेकिन इन सब प्रपंचो से

किसी को कोई फर्क नही पडता
क्योंकि कोई हमारा विकल्प है
और हम किसी के विकल्प...।
डा.अजीत

Friday, June 4, 2010

शर्ते लागू

उस विज्ञापन गुरु की

व्यवहारिक सोच की खुले मन से तारीफ की जा सकती है

जिसने स्टार युक्त शर्ते लागू

का कांसेप्ट बनाया

बात की बात और बिना चोट की लात

यह बात मात्र विज्ञापन की दूनिया के लिए ही

नही बनी

इसका खुब प्रयोग रिश्तो मे भी किया जा सकता है

न बात कहने मे बुरी लगे

और न सुनने मे

बार कोड के टैग की तरह

जज़्बात दिखेगा खुब

लेकिन अहसास आपका

कितना महसूस कर पाते है

अक्सर शर्ते लगाकर जीना

एक शगल हो सकता है

जिसमे तडका लगा अपने को सुरक्षित

करने का

लेकिन दोस्त! शर्ते लागू

के स्टार मे वो चमक नही होती

जो बिना लाग-लपेट के मोल भाव मे

बाजार और रिश्तें देखने मे अलग-अलग है

और न ही इनमे तुलना की जा सकती

लेकिन एक बात जो अक्सर

सामने आ ही जाती है

शर्ते लागू होने के स्टार से मन

आकर्षित तो सकता है

लेकिन प्राइस टैग

बार-बार पलट कर देखते हुए यही ख्याल

आता है

कही हमे ठगा तो नही जा रहा है

फिर चाहे वो बाजार हो या

ज़ज्बात पर टिके रिश्तों की बुनियाद...।

डा.अजीत

Thursday, June 3, 2010

ऐसा ही हूँ मैं

मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,
मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती
किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था
मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।
(उपरोक्त पंक्तियाँ मेरी मौलिक नहीं हैं मैंने कही पर पढ़ी और अच्छी लगी सो अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दी है,वैसे जिसने भी लिखी है काफी दमदार लिखी है उसको आभार)

Sunday, May 23, 2010

द लास्ट एडवाइस

आखिरी सलाह

बता कर उसने मुझसे

जो बात कही

उसे तर्क के आधार पर तो खारिज़ नही

किया जा सकता है

लेकिन यदि इतना बुद्दिवादी मन

पहले से होता तो मै सलाह ले

नही दे रहा होता

क्योंकि विकल्पो का रोजगार

करना कोई बडी बात नही है

सलाह के कारोबार मे कोई बुराई भी नही है

अपनेपन मे ही ये सब होता है

लेकिन आखिरी मान कर दी गई सलाह

नसीहत का भी मिला-जुला काम

करती है

उसने जो भी कहा

मै उसे अगर मान भी लूं

तब भी सलाह की जरुरत मेरी जिन्दगी

से कम होनी वाली नही है

दरअसल यह एक लत की जैसी है

एक बार लग जाए तो

फिर किसी भी निर्णय की

बिना सार्वजनिक/व्यक्तिगत पुष्टि

किए मन अनमना सा ही रहता है

शायद मेरी इसी आदत से

परेशान होकर उसने जबरन

अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया

और आक्रमक होकर कहा-

इट्स माई लास्ट एडवाइस

मै एक मिनट तक यही सोचता रहा कि

क्या एडवाइस भी लास्ट हो सकती है

दिल ने कहा नही

दिमाग ने कहा जरुरत क्या है किसी की एडवाइस की

ज्ञान बघारते वक्त नही सोचा जाता

कि सलाह का लेन-देन

कितना जोखिम भरा काम है

किसी को समझना और उसको

ठीक-ठीक वही बता देना जो वह कभी नही

सुनना चाहता

और खुश हो जाना अपनी वाकपटुता पर

ऐसी बहुत से सलाहें मेरे पास आज भी

सुरक्षित रखी है जो शायद मेरा

जीवन ही बदल देती

मै वो न होता जो आज हूं

नही लिख रहा होता कविता

न ही बात बेबात पर किसी से नाराज़ हो जाता

एक सधी मुस्कान और

औपचारिकता की चासनी मे लिपटे शब्द होते मेरे पास

और सबसे बडी चीज़ उपलब्धि होती

जिसकी ठसक पर मै

लोगो को मजबूर कर सकता था अपनी

घटिया से घटिया बात पर

स्तुति गान करने के लिए

और शायद सहमति मे उठे हाथों

की एक लम्बी फेहरिस्त होती मेरे पास

ऐसी सलाहें मैने अभी तक इसलिए

बचाए रखी कि

क्या पता कब जरुरत पड जाए

बुरे वक्त मे

और आज जब मैने लास्ट एडवाइस ली

तब मुझे लगा कि

अगर मैने मान ली होती उसकी कुछ पुरानी सलाहें

तो मै भी अपनी आधी-अधुरी अंग्रेजी

और पूरी बेशर्मी के साथ कह पाता

इट्स माई लास्ट एडवाइस

कैन यू बिलिव ओन इट?

डा.अजीत

Tuesday, May 4, 2010

माफी चाहूंगा दोस्त

कुछ ऐसी बातें

जिनका जिक्र करना जरुरी हो

गया है आज

ये मेरी-तुम्हारी नही हमारे बीच की बातें है

एक दशक से भी ज्यादा

वक्त जिया है तुम्हारे साथ

ऐसा कई बार हुआ है कि

बिना किसी प्रतिक्रिया के मैने तुम्हारे

उस व्यवहार को स्वीकार किया

जिस पर कोई भी बिफर सकता था

आहत हो सकता था

या फिर संबन्ध तोड सकता था

मुझे लगा कि मेरा मौन रह जाना

शायद तुम्हारे संवेदनशील मन को सोचने के लिए मजबूर करें

कि कोई किसी के लिए क्यों अपरिहार्य होता हैं

लेकिन शायद तुम्हें

स्पष्ट बोलने और कडवा बोलने मे फर्क

नज़र नही आया

तमाम ज्ञान बांटने के बाद भी

कभी-कभी तुम कितने निर्धन लगे

आग्रह के मामले में

अपनी शर्तों पर जीना प्रशंसा की बात है

लेकिन शर्तो को जीने की बाधा बनाना

मुझे ठीक नही लगा कभी

मेरे जैसे बहुत से लोग

तुम्हें स्वीकार करते गये

तुम्हारी तमाम बदतमिजियों के बाद भी

क्योंकि उनकी आशा का केन्द्र रहे तो तुम

तुम्हारें संघर्ष से प्ररेणा मिली है

तुम्हें शायद ही कभी इस बात का अंदाजा हो

कि तुम्हारें छ्द्म स्वाभिमान की कीमत

लोगो ने अपने संबन्धो को खोकर चुकाई हैं

तुम्हारा व्यवहार न कभी औपचारिक बन पाया

और न आत्मीय ही

बस तुमने अपनी सुविधा से हर संबन्ध की परिभाषा गढी

और उसको जिया अपनी तरह से

खेद है कि तुमको इस स्वरुप मे स्वीकार करने के बाद

तुम अपने आपको ही स्वीकार नही कर पाये

अपनी अपेक्षा के केन्द्र मे लोगो को सतत बनाए रखना

और उनकी अपेक्षाओं को सिद्दांत की ओट लेकर

तार्किकता से खारिज करना

तुम्हारी एक अतिरिक्त योग्यता रही हैं

जो शायद तुम्हे अपनी विशिष्टता लगी हो

मित्र उपदेशक न लगे इसी वजह से

मैने कभी प्रतिकार नही किया

लेकिन आज जब तुम अपने दोष को योग्यता के रुप

मे जीने के आदी हो गये हो

तब तुम्हारा ही ब्रह्म वाक्य

जिसके सहारे तुमने कितनी बार

अपने दायित्व से पलायन किया हैं बुद्दिमानी के साथ

सौंप रहा हूं तुम्हे

अब

माफी चाहूंगा दोस्त...

डॉ.अजीत

Thursday, March 18, 2010

फोन

युक्तियुक्त सात्विक झुठ
बोझिल बातें
औपचारिक वायदे
अनमने मन
मे अभिनय के पुट के
साथ अपनेपन का आत्मीय
प्रदर्शन
उधार के शब्द और संवेदना
का प्रमाणिक
यांत्रिक दस्तावेज़
मेरा फोन मुझे
साक्षी भाव से स्वीकार करना वाला
अब तक का सबसे विश्वसनीय साथी लगा
पल भर के लिए सोचता हूं
अगर इसमे कोई सजीवता होती
तो कब का छोड गया होता
सार्वजनिक करके मेरे दोहरे व्यक्तित्व को
एक अजीब सा सम्बन्ध
है अपना
जब भी अकेलेपन ने घेरा
मेरे एक सच्चे दोस्त की तरह
इसने संवाद बचाया
उन लोगो के साथ
जो मेरी तमाम बदतमीजियों के बाद भी
मेरी फिक्र करतें है
ऐसा कई बार हुआ कि
आत्महत्या करने का मन हुआ
तब इसके सहारे ही दिलासा मिली
और मै बच गया
अगर यह निमित्त न होता तो
आज मै कृतज्ञता प्रकट करने के लिए
न बचता
अपनी आखिरी सांस तक यह मुझे जोडे
रखता है इस औपचारिक दूनिया से
एक आग्रह के साथ
ऐसा दिन मे कईं बार होता है
जब मै उकता कर इसको क्या तो बंद
कर देता हूं
या छोड देता हूं इसका गला घोंट कर
वाईब्रेशन मोड पर
लेकिन यह मुझे कभी नही छोडता
और सच कहूं तो
इसके बंद होने पर
अब मुझे गहरी चिंता होने लगी है
ऐसा लगता है कि
वो सेतु टूट गया है
जिसके एक पार मै अकेला खडा हूं
और दूसरी तरफ सारी दूनिया है
अपने शिकवे-शिकायतों के साथ
कोई इतना अपना कैसे हो सकता है
जब आपको पता है कि
इसका अपना कुछ भी नही
कुछ भी हो
इसे खरीदते वक्त मैने नही
सोचा था कि इतना अपनापन होगा इसमें
बिना स्वार्थ के
कम से कम उन औपचारिक संबन्धो से
बेहतर है इसका होना
जिनके लिए मै कभी काम का नही रहा हूं
और
शायद हम दोनो
एक दूसरे के बडे काम के हैं...।
डॉ.अजीत

Wednesday, March 17, 2010

सपनें

एकांत के कुछ
पल अधुरे सपनो की
बुनावट के सच्चे
गवाह हो सकते है
भले ही इनकी गवाही की
कभी जरुरत न पडे
लेकिन
इन सपनो की उधेडबुन
मे उलझा मन अपनी झुठी
तारीफ से कुछ पल के लिए ही सही
सुलझ सकता है
जी सकता है कुछ पल अपनी तरह से
अपने वजूद के साथ
सपनें देखना और जीना इनके साथ
आज की नही कल की जरुरत थी
और कल के सहारे आज की हकीकत
मन के अवसाद
को संजो कर रखने का साहस
इतना आसान भी नही कि
हम जी सके बिना सपनो की
समीक्षा किए
अधुरे सपने
दरअसल एक अहसास है
खुद के अधुरे होने का
जिसे पुरा करने के लिए
दिल की नही दिमाग की जरुरत है
ऐसे सपनों के सहारे
एक समानांतर जिन्दगी जीने बाद
सपनों पर बहस करना
जरुरी नही लगता
लेकिन
जब कोई अपना सपना
बदलता है
किसी भी वजह से
तब अधुरे सपनें
भर देते है
एक अजीब एहसास से
और दिल करता है
एक और उधार के
सपने के साथ जीने का
अपने अधुरेपन के साथ...।
डॉ.अजीत

Sunday, March 7, 2010

यात्रा

साथ रहने के लिए
साथ खडे होना भी जरुरी होता है
एक मित्र ने समझाया कि
साथ देखने की सीमाएं क्या होती है
देखा जा सकता
दायें-बायें या फिर अपने से ऊपर
छदम गर्व के साथ
नीचे देखने का वक्त नही होता है
साथ के लोगो के पास
और न ही साहस
अपने साथ चले लोगो को
नीचे देखने के लिए
सर्वाइकल से कुछ ज्यादा दर्द होता है
प्रेक्टिकल होना और साथ खडा होना
दोनो एक सी बात है
कदमो की लडखडाहट के तब ज्यादा
मायनें नही है
जब साथ मे चल रहे हो
कुछ शुभचिंतक
साथ की यात्रा के लिए
सावधानी और अभिनय
दोनो जरुरी है
क्योंकि आपने मार्ग क्यों
बदला इसकी समीक्षा और कारण
जाने बिना
साथ छुट जाता है
फिर अभिनय ही आत्मघाती होने से बचा सकता है
अभिनय खुद के लिए
इतना जरुरी नही होता
जितना कि
साथ के लोगो के एहसास मे बनें
रहने की मानवीय कमजोरी के लिए
लेकिन उपलब्धि के समीकरण
से उपजी साथ चलने की इस
शर्त से
यात्रा कितनी पीडादायक
हो सकती है
इसका अहसास
भावुकता की आड लेकर
चेता रहा है बार-बार
और मै साथ खडे रहने की
तैयारी कर रहा हूं
सपनो की कीमत पर....।
डॉ.अजीत

Thursday, February 25, 2010

एक साल पहले की बात

कल रात बिना पूर्व कार्यक्रम के अपने गांव मे गुजारी। अनुभव एकदम नया तो नही लेकिन सोचने पर रोचक लगने लगा जो शायद देहाती परिवेश के प्रति एक आन्तरिक लगाव की उपज हो सकता हैं।पहले शिक्षा और अब अर्थ पर केन्द्रित हमारी विवशताएं जो हमे शहर ले ही आई,सोचा नही था कि कुछ बडा या विशेष करना है लेकिन सपनों मे बसी रंगीनीयत और तथाकथित बौद्दिक परिवेश ने शहर मे समायोजन करने के लिए पर्याप्त सहयोग किया और गांव के चौडे आंगन से टू रुम फ्लैट मे स्थापित हो गये।
लेकिन एक बैचेनी हमेशा हमारे अंदर बनी ही रहती है भले ही ऊँची डिग्रीयां,रसूखदार लोगो मे उठ-बैठ और पर्याप्त सामाजिक स्वीकृति हो लेकिन अपने अन्दर के एक देहाती मन को जब भी अवसर मिलता है वो उडान भर कर गांव की गलियों,चौपालो पर भटकता ही रहता हैं।
लम्बी भूमिका लिखने की आवश्यकता नही है लेकिन कभी-कभी हम भी शहर के ‘शहरी’ होने के चक्कर में गांव और समस्या दोनो को एक ही मान बैठते है मसलन यार! गांव मे न बिजली होती है और न ही पानी(मिनरल),न ही अखबार आदि-आदि।
लेकिन हम यह कभी अनुभूति नही कर पातें कि गांव की मौलिकता उसकी खास जीवनशैली और वस्तुओं/साधनों पर निर्भरता न होने से हैं,वहां पर अभाव का भी एक अलग भाव है। एक सहजता का बोध है और सबसे बडी बात विशुद्द संवेदना है।
शहर मे थोडी देर के लिए बिजली गुल होते ही लगने लगता है कि जीवन कितना असहनीय है,पानी का टैंक तुरन्त खाली हो जाता है पीने के पानी की किल्लत अलग से और सबसे बडी बात समय काटने का वैद्यानिक यंत्र टी.वी.के न चलने पर श्रीमती की पीडा अपने आप मे अबुझ प्रतीत होती है।
मोबाइल डिसचार्ज़ होने लगता है ये स्थिति तो एक-दो घंटे के कट की है अगर ये समय सीमा बढी तो भइया फिर तो हम यंत्र की भांति वही रुक कर खडे हो जाते है,कितने यांत्रिक हो गये है हम!
अब गांव की बात खासकर यू.पी.के गांव वाले बन्धु इस सार्वभौमिक सत्य से तो अवगत ही होंगे कि हमारी शाम चिरकालिक रुप से डिब्बी/लैंप से ही रोशन रहती है अपने 28 वर्ष के अल्पजीवन मे शायद ही कभी शाम का भोजन बिजली के प्रकाश मे किया हो लेकिन इस बात का भी लिखित मलाल हमें नही होता है।
अथकथारम्भे:
जब मैन गांव पहुंचा रात्री के लगभग 8 बजे थे,गलियों मे घुप्प अंधेरा कही-कही किस घर मे डिब्बी(डीज़ल से जलने वाली) टिमटिमा रही थी, दूर से ही विरक्ति भाव के साथ हर अजनबी पर भौंक कर कुत्ते अपने सजग होने का परिचय दे रहे थे।एक ये शहरी कुत्ते भौंकते ज्यादा है और घर के अन्दर जाते ही क्या तो आप टूट पडेंगे या डराकर फिर पैर चाटना शुरु कर देंगे अपने बेवफा मालिक वो वफादारी का सबूत देते हुए।
घर पहूंचा तो चूल्हा उदास ही पडा मेरी प्रतिक्षा मे सुलग रहा था, नमस्कार/चरण-स्पृश आदि होने के बाद माताजी ने भोजन परोस दिया बस अपन का देहाती मन यंही से जाग उठा और तुलना एक तन्त्र स्वत: विकसित होता गया मन मे...।
खाने मे दाल-चावल और चटनी(सिल-बट्टे वाली) बनी थी ये तो माताजी से पता चल गया लेकिन उनके रंग-रुप,मात्रा के दर्शन मैने अनुभूति के माध्यम से ही किए। प्रकाश के नाम पर एक डिब्बी जल रही थी जो कभी भभक पडती तो कभी मंद पड जाती थी लैम्प भी अपनी ठीक से सफाई न होने की शिकायत करता हुआ एक चिडचिडा सा प्रकाश फैला रहा था लेकिन प्रोढो वाली सहजता के साथ।
शहर मे भिन्न तरकारियों,बून्दी रायता,दही,पनीर और सलाद के आकर्षक प्रस्तुतिकरण के बाद भी मैने वो स्वाद नही महसूस किया जो मैने घर के मंद प्रकाश के दाल-चावल चटनी का था,शहर मे उचित/अनुचित परम्पराओं के चलते रोमांटिकता के जबरन पैदा किए गये बोध के साथ अनुशासित वेटरो की उपस्थिति मे बडे रेस्त्राओं के तथाकथित कैंडल लाईट डिनर का स्वाद भी फीका ही लगा मुझे घर के उस आत्मीय भोजन के समक्ष।
अपने गांव की जीवनशैली का एक आत्मीय ठहराव मुझे सोचने पर विवश करने लगा कि संभवत: शहर की सी.एफ.एल. और हाई मास्ट लाईट से बचकर कुछ राहत मिलती है तो वो गांव के इस बेरौनक प्रकाश मे ही, यहां कुछ तय नही है एक सहजता है जो सुविधाओं पर निर्भर नही है।
भोजन के उपरांत ‘दूध’ जो गांव की एक स्थाई परम्परा है किस ‘टोन’ का होता है ये हमे भी पता नही,जहाँ शहर मे बच्चो को डायटिशियन की सलाह पर अलग और बीमारो के लिए अलग (तीसरी श्रेणी को दूध की जरुरत नही,क्योंकि वो दूध नही काफी पीते है,मुझे अब लगने लगा है कि चाय भी ओल्ड फैशन हो गयी है) दूध खरीदा जाता है और ऊपर से तूर्रा ये कि शक्कर(चीनी) नाम मात्र की होनी चाहिए एकदम लौ कैलोरी डाईट।
घर का दूध एकदम गाढा और बडा गिलास पीकर ऐसा लगा कि ये प्यास कब दफन हो गई मुझे खुद पता नही चला।
अब सोने की बारी है,गांव मे बिजली का कोई भरोसा नही है सो पंखे के नीचे बंद कमरो मे सोने की परम्परा नही है,बिजली का आना एक संयोग की विषय-वस्तु होती है। लोग बगड(घर का आंगन/चौक) मे लाईन से खाट(चारपाई) लगा कर सोते है और अपन सौभाग्य की एक झुठी आस पर प्रतिदिन एक बडा फर्राटा पंखा (तूफान फैन) लगा दिया जाता है जो गर्मियों मे कभी-कभी चलता है वो भी कुछ देर के लिए लेकिन लगता प्रतिदिन है।
पिताजी के आदेश पर मेरी चारपाई छत पर उनके साथ लगा दी गई और मै चारपाई मे पैक हो गया मच्छरदानी के साथ क्या बढिया विकल्प है गुड नाईट/आल आऊट का एकदम प्राकृतिक।ओस से बिस्तर पर एक ठंड का अहसास लेटते ही हुआ उपर आकाश तारो से भरा हुआ है एकदम शांत न कूलर/पंखे की आवाज न टी.वी.मोबाईल का शोर, कल्पना ऐसी ऊंची उडान भरती है कि एक बढिया कविता लिखी जा सकती है।
यह अहसास अभिव्यक्त नही किया जा सकता है जो मैने शहर के सुविधाभोगी मे कभी महसूस नही किया। मोबाईल नेटवर्क कभी साथ छोड देता है कभी आ जाता हैं,मन मे एक अजीब सी शांति है शहर मे नेटवर्क बिज़ी हो जाएं या चला जाए तो मन आशंका और दूविधा से भर उठता है लगता है कि सारी महत्वपूर्ण काल इसी समय आनी थी लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल भी नही है अंत मे मैने फोन स्विच आफ किया और आकाश की कल्पनाओं के रथ पर सवार होकर अपलक निहारता कब नींद के आगोश मे चला गया पता ही नही चला....।

अभी बस इतना ही हो सकता इस बार होली गांव मे ही मनाई जाए...उसके बारे बाद मे लिखूंगा।

डा.अजीत

Tuesday, February 23, 2010

अलविदा

बहुत दिनो से मैंने
अपना फोन को स्विच आफ नही किया
इस डर से कंही उसी वक्त तुम मुझे फोन करके
यह बताना चाह रही हो कि
मै अब उतना ही आउटडेटड हूं
तुम्हारे जीवन मे
जितना कि
तुम्हारे कम्पयूटर का कभी न डिलीट होने वाला
एंटी वायरस
हर एसएमएस पर चौकना अभी तक जारी है
इस उम्मीद पे कि तुम मेरी घटिया शायरी और
फारवर्ड किए गये संदेशो पर आदतन
वाह-वाह के दो शब्द भेज रही होगी
दवा के माफिक
बहुत दिनो से मुझे एक आदत और
हो गयी है मै बिना बात ही लोगो से बातचीत मे
तुम्हारा जिक्र ले आता हूं
चाहे बात वफा की हो या बेवफाई की
सुनो ! मैने अभी-अभी सोचा है कि मैं
अपना सिम बदल लूं
ताकि जब कभी हम मिले तो
तुमसे औपचारिक रुप से
यह सुन सकूं कि
बिना बताए नम्बर क्यों बदल लिया
तुम्हे बिना बताए किए जाने वाले
कामों की एक लम्बी लिस्ट है
मेरे पास
और तुम्हारे पास इतना भी वक्त नही
कि मुझसे बोल के जा सको
अलविदा....

डॉ.अजीत

Sunday, February 7, 2010

आग्रह

अक्सर
तुमने कही गई बातों
को एक श्रृंखला के साथ याद रखा
जो अक्सर सन्दर्भ के साथ
तुम प्रस्तुत भी करती हो
लेकिन क्या कभी तुमने यह
नही जानना चाहा कि
इतने कहे गये के बीच
कुछ अनकहा भी हो सकता है
जिसके लिए उपयुक्त अवसर न मिला हो
ऐसा बहुत बार हुआ है कि
मैने जो सोचा वो कहा नही
और जो कहा वो सोच कर नही कहा
जिसे क्षणिक उत्तेजना मानकर
मैने छोड दिया था यू ही
आज मैने देखा उस हर बात एक अर्थ था
एक ऐसा अर्थ जो समर्थ न हो सका
ऐसी अनकही बातो पर मै एक लम्बा चौडा पत्र
लिख सकता हू
पत्र ही नही
और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है
कविता,कहानी या गज़ल
ऐसी तमाम अनकही बातो पर
मै बेवक्त बात करना चाहता हू तुमसे
बिना तुम्हारे मूड की परवाह किए हुए
शायद तुम बहुत सी बातो पर चौंक जाओ
और कहो पहले क्यों नही बताया
हो सकता तुमको ये सब बोझिल लगे
एक चिड-चिडी शाम की तरह
या मै भी बेतुका लग सकता हूँ
मै कहूंगा और रस के साथ कहूंगा
वे सब अनकही बातें
जो मुझे कभी बैचेन करती है
कभी एक राहत भी देती है
और फिर मेरी सब से बडी
जिज्ञासा तो इन बातो के साथ
तुम्हारा मन टटोलने की है
चलो एक शाम अपनी अपनी
अनकही बातो से रोशन करके देखें
शायद फिर यह अधेंरा छट जाए
जिसमे हम
एक दूसरे को ठीक
से देख नही पा रहे हैं
इस बात पर विचार करना
आग्रह है मेरा...।
डॉ.अजीत

Saturday, February 6, 2010

एक बात


तुम्हारे साथ
मै अकेला नही होता
मेरा साथ होता
मेरा अकेलापन
जिसको बिसरा कर
तुम आग्रह पर आग्रह किए जाती हो
और मै सापेक्ष अभिनय
इस नाट्यशाला मे ऐसा नही
मुझे हमेशा द्वन्द होता हो
कभी कभी मै लुत्फ भी ले रहा होता हू
बिना तुम्हे बताए
तुम्हारी अपेक्षाओं के अनुसार मै हर
चीज उधार की ले आया हूं
ये जो हंसी है
यह भी किस्तो पर है
जिसकी
ईएमआई मुझे देनी पडेगी
अवसाद के आलाप के साथ
सच कहूँ तो
मुझे कभी कभी जलन भी होती है
तुमसे
जब तुम हंसती हो बिना वजह
मै कोई नीरस जीवन के एकाकीपन
को मिटाने वाला
साधन तो नही बन गया हू
तुम्हारे जीवन मे
ऐसा भी नही है
कि मेरा कोई विकल्प न हो तुम्हारे पास
फिर कोई अकारण बिना किसी राग के
कैसे साथ-साथ घंटो बिता सकते है
बौद्धिक चवर्णा करते हुए
जिसका कोई अर्थ भी नही है
मै कभी कभी सोचता हूँ
कंही ऐसा तो नही
कि
तुम्हारा अपने वर्ग से बहिष्कार किया गया हो
सपने बुनने वाली विलासित पीढी से
आउटडेटड होकर तुम दार्शनिक बन गई हो
कुछ भी हो
मैने एक बात का अनुभव किया है
नदी और स्त्री तट से विद्रोह करके
एक अंजानी प्यास मे आगे बढती जाती है
कही तुम विद्रोहणी तो नही
अन्यथा मत लेना
इस आभासी दूनिया की इस
आभासी यात्रा मे
न तो तुम मेरी सहयात्री हो
न ही सम्बन्धी
न मित्र
न परिचित
फिर ऐसा क्या है कि
अक्सर हम असहमत होते हुए भी
सहमत होते है
और सच कहूँ
तुम्हारे सत्संग से
मै तो
निरुद्देश्य जीवन जीने का अभ्यस्त सा हो गया हू
क्योंकि तुम्हारे पास
प्रेमी-प्रेमिका वाली लम्बी चौडी योजनाए नही है
न ही तुम्हारी दिलचस्पी
मेरी आर्थिक प्रगति मे है
तुमने आज तक नही पूछा कि
मुझे क्या बनना है
जीवन मे
इस तरह से तो तुम
इस निजता के ध्यान मे सहयोग ही कर रही हो
सच-सच बताना
क्या तुम सच मे जी सकती हो
बिना सम्बोधन के
बिना बंधन के
सोच समझ के जवाब देना
अभी कोई जल्दी नही है
वैसे मुझे पता है तुम्हारा जवाब
तुम जोर से हंसोगी
और कहोगी
तुम तो पागल हो
चलो कही कॉफी पीते है चल के
अब मै क्या कहूँ ...।
डॉ.अजीत

बेवजह...

ठहर के पानी मे देखा है गहराई को
भीड मे अक्सर महसूस किया है तन्हाई को
माजी के हाथ से लिखी थी तहरीर मेरी
दोष कैसे दूँ रोशनाई को
जो हमेशा फांसले पे खडे थे
वे ही सबसे करीब नजर आये बिनाई को
नसीहत, सफर, हादसा,हकीकत किस पर यकीन करुँ
वक्त के दायरे मे सिमटते रोक न सका खुदाई को
लबो पर खामोशी,बेसबब उदासी जिस्त पर पहरा वक्त का
जज्बात जब तक तक्सीम न हो हाकिम क्या गुनाह
मुकर्रर करेगा सुनवाई को...।
डॉ.अजीत

Tuesday, January 5, 2010

विरोधाभास

त्रासदीपूर्ण जीवनशैली
अवसादो से भरी नियति
सुख के छींटे शायद ही पडे हो
कभी- कभी
और
दुख एक स्थाई भाव
इतने निराशावादी
प्रतिमानो के साथ
जीवन मे
आत्मविश्वासपूर्वक ‘सामान्य’
एवम लौकिक सम्भावनाए तलाशने
के तुम्हारे प्रयास पर
कोई भी सम्वेदनशील व्यक्ति
हतप्रभ हो सकता है
ठीक उसी तरह
जैसे मैने अपना बचाव किया था
दार्शनिकता एवम बौधिकता से पूर्ण
अभिव्यक्ति मे
तार्किकता तलाश कर
इस प्रकार के प्रयास
मेरे जैसे व्यक्ति के लिए
सदैव बौधिक हथकंडे रहे है
प्रभाव उत्पादन के लिए
लेकिन
यथार्थ की सीमाओ
से शंकित मन से स्वत:
तंत्र विकसित किया
स्वीकृति के साथ
अस्वीकृति के बोध का
प्रतिमान/दृष्टिकोण/अनुभव
और सम्भावनाओ के विकल्प
के रुप मे इतनी पारस्परिक भिन्नता
होने के बाद भी
तुम्हारा प्रखर आशावाद
मेरे लिए प्राय:बौधिक बैचेनी का
विषय रहा है
ऐसी बैचेनी जिसको कभी
अभिव्यक्ति नही मिली
घुटन/अवसाद/कुंठा का
संताप भोगते हुए
कभी-कभी लगा
कि
तुम्हारी समझ मे समग्रता का अभाव है
या व्यक्तिविश्लेषण का
अचानाक ख्याल आता है
संक्षिप्त विरोधाभास
आंशिक अपेक्षाबोध
और व्यापक सम्वेदना के धरातल पर
कुछ नये सम्बन्धो का
’अर्थ’ तलाशते
तुम्हारे परिपक्व प्रयास
कही प्रतिभासी
विरोधाभास से उपजी
महज एक बौधिक फसल
तो नही
जीवन के समानांतर यथार्थ/नियति
और असामान्यबोध
के बीच
तुम्हारी उपस्थिति उपलब्धि है
अथवा
एक बौधिक त्रासदी
जिसको भोगना
कभी सुखद लगता है
तो कभी
बडा असहनीय....।
डा.अजीत

Monday, January 4, 2010

चिंतन

अक्सर
मित्र/परिचित
शुभचिंतक एवम हितचिंतक
एक तार्किक सवाल करते है
और क्या चल रहा है आजकल?
इस चलने का अभिप्राय
कुछ करने से होता है
पता नही उनका सवाल
गतिशीलता के मानक तय करता है
अथवा
जडता की गहराई की
सम्भावना तलाशता है
हो सकता उनकी जिज्ञासा
नियोजन से सम्बन्धित हो
लेकिन कुछ करना
और कुछ भी न करना
दोनो दर्शनो की
तात्विक समीक्षा का अधिकार
सदैव
इनके पास सुरक्षित रहता है
और
मेरी प्रतिक्रिया इनके बौधिक आग्रह,अपेक्षाओ
से विरोधाभासी रही है
मेरे चिंतन की दिशा
कुछ करने
और कुछ भी न करने के मध्य से
रेंगती हुई
क्या करु?
क्या किया जा सकता है
आदि की दिशा मे
बढती जाती है
प्राय:ऐसे सवाल
मानसिक खीझ का विषय
बनते है
और निजता का हनन का बोध
अलग से
लेकिन
कुछ भी अप्रत्याशित करना
उपलब्धि एवम सम्बन्धता के
संयुक्त मनोविज्ञान की उपज होती है.
जिससे अभिप्रेरणा प्राप्त
हमारे ‘आत्मीय’
अपने प्रश्नो के साथ
बहुत सारे करने के
विकल्प भी साधिकार
प्रस्तुत करते है
जिनकी व्यंजना
कभी परामर्श लगती है
तो कभी एक नसीहत भी
बडा सवाल यह पैदा होता है
कि समग्र व्यक्तित्व के मूल्यांकन
के मानक क्या कुछ करने
या कुछ विशेष करने से ही
तय होते है?
मानवीय अस्तित्व का
कोई महत्व नही
समग्र निजता का भी कोई अर्थ नही
कुछ भी न करने का दर्शन
कुछ करने से कही अर्थो मे
न केवल व्यापक है
बल्कि जटिल भी
जिसे अक्सर
मेरी अकर्मण्यता मानकर
विभिन्न विकल्पो के प्रस्ताव
प्रस्तुत किए जाते है
और मेरे लिए
ये शायद की कभी सम्भव हो
कि अस्तित्व/चिंतन/निजता/अभिप्ररेणा/महत्वकाक्षाओ
के नितांत ही
व्यक्तिगत स्रोत त्याग कर उनकी कुंठाओ/ महत्वकाक्षाओ
के बोझ को ढो संकू
लेकिन
रोचक बात यह है
कि
उनके प्रयासो की उर्जा
एवम बौधिक आग्रह को देखकर
कभी- कभी
मुझे भी लगने लगता है
कि
आखिर मै कर क्या रहा हू....?
डा.अजीत

Saturday, January 2, 2010

बीजगणित

सन्दर्भ
प्रसंग
व्याख्या
तीनो के समन्वय
मे उर्जा का नही
सम्वेदना का कितना
व्यय हुआ
इसका विवरण
जीवन के बीजगणित मे
तलाशना चाहता हू
सम्बन्ध जीने से जीया जाता है
इससे कोई औपचारिक आपत्ति नही है
लेकिन यदि सम्बन्ध जीते- जीते यह अहसास होने लगे
कि
इस कौशल का प्रयोग
कभी भी अप्रत्याशित दिशा तय कर लेगा
स्वत:
तब
खिन्नता का बोध नही ‘बोझ’
कदमो मे लडखडाहट भर देता है
आवाज मे रिक्त कम्पन
सम्वेदना/अतीत/स्मृति के दर्शन से पोषित
सम्बन्धो की धरा
सदैव उर्वरा रहने का
स्वाभाविक अधिकार रखती है
लेकिन
पारस्परिक अनुभुतियो के
व्यापक संसार मे
वेदना का एक पक्षीय व्यापार
सम्बन्धो की समसामयिकता
पर प्रश्नचिन्ह लगाता
प्रतीत होता है
और
प्रासंगिकता पर
अप्रासंगिक होने का सतत भय
एक दिन स्थाई रुप से मौन कर देता है
समस्त अपेक्षाबोध को
जीवन की अस्थाई रिक्तता के बोध प्रणय से उपजे सम्बन्ध
बचपन की स्मृतियो की भांति
व्यस्क होने से पूर्व ही
अपना अर्थ खो देते है
अर्थ खोना उतना बडा खेद का विषय नही है
जितना इस अप्रमेय समीकरण मे
अपने व्यक्ति विश्लेषण की समीक्षा की
पुनर्समीक्षा की बात सोचना
क्योंकि अतीत के स्थाई भाव,प्ररेणा
को एक झटके से छोडकर
सहजभाव से जी पाना
मुश्किल नही
असम्भव है
किसी भी सम्वेदनशील व्यक्ति के लिए
मुझे ऐसा लगता है
अक्सर
पता नही क्यों...?
डा.अजीत