Wednesday, September 8, 2010

काफिर

तेरी इस बात पर सोच कर हैरान हूं

दोस्त के घर लगता है मेहमान हूं

वक्त के आईने से छिपता फिरा

चेहरे से अपने अंजान हूं

नज़र ने नज़र से राज ये कह दिया

अब मै कहाँ उनकी पहचान हूं

काफिर को यकीन कैसे आता

मै सहर की अजान हूं

सब्र मेरा टूटने पर हुआ यकीन

देवता नही मै भी इंसान हूं

शराफत जहाँ बिकती है बेमौल

ज़ज्बात की मै वो दूकान हूं

डा.अजीत

Sunday, September 5, 2010

आदत

ज़बान की कीमत लफ्जो मे बह गई

जिन्दगी एक तमाशा बन कर रह गई

मुक्कमल ख्वाबों की बैचनी थी नसीब

ये बात नदी समन्दर से कह गई

मुस्कान नजर मे थी अफसाने दिल मे

हकीकत उसकी उदासी कह गई

न मिलने की फिक्र न बिछडने का गम

दोस्ती फिर आपसे किस बात की रह गई

उसने छोडा बेफिक्री से मुझे क्यों

वो हालात मेरी फटी जेब कह गई

मदारी का तमाशा देखा तो समझ मे आया

हुनर अब हाथ की सफाई और नजरबन्दी रह गई

तन्हाई मे उदासी ने टोक कर पूछा

मन भर गया अब या कुछ कमी रह गई

दिल से लगा लेता हूं हर बात

बस ये आदत बुरी रह गई....।

डा.अजीत

Friday, August 27, 2010

अंजाम

अब जीने का रोजाना अन्दाज बदलना पडता है

भीगें पर वाले परीन्दे को परवाज़ बदलना पडता है

जवाब उनसे मांगू क्या अपनी हसरत का

रिश्तों का लिहाज करके सवाल बदलना पडता है

अंजाम का अब डर ज्यादा है पहले से

ख्याल आने पर आगाज़ बदलना पडता है

मिलकर खो जाने का डर वो कब कह पाया

अब कहता है तो ज़ज्बात बदलना पडता है

महफिल मे जान आ जाती थी जिसके आने से

अब मिलने पर उसको नाम बदलना पडता है

वक्त के फिकरे जब कस जातें है

बिकना है तो अपना दाम बदलना पडता है

डा.अजीत

Thursday, August 26, 2010

किस्सा

तवज़्जो का तालिब दिल निकला

तकसीम होकर भी

हासिल सिफर निकला

वो ठहर कर प्यासा रह गया

मुनासिब दिल के वतन नही निकला

मुजरिम भी वो मुंसिफ भी वो

गवाह सच बोलकर बच निकला

दोस्त यारी के किस्सो मे रह गये

पुरानी डायरी से आज उनका खत निकला

हाजिरजवाबी दगा दे गई

वक्त इतना संगदिल निकला

तन्हा खडा था जो भीड मे

वो ही बडा गाफिल निकला

उम्मीद-ए-वफा जुर्म से कम नही इस दौर मे

अदावत जिससे थी वो ही दोस्त निकला

चलो भीड मे फिर से खो जाए

मिलने का यही सबब निकला...।

डा.अजीत

Wednesday, August 25, 2010

एक ख्याल

कुछ बेतरतीब ख्याल

और बेफिक्री की फिक्र मे

गुजरता वक्त

स्याह होती रात से

ज्यादा डरावना होता

आधी रात का अधूरा सपना

और पुराने रिश्तों को बुनती

नई सलाई

उस अहसास को

चाट रही है रात दिन

जिस पर नुक्कड के नाई की दुकान

पर अपनी बारी का इंतजार करना बुरा

नही लगता था

अब बहुत जल्दी बहुत कुछ बुरा लग जाता है

और अदरवायिज़ भी

पुराने दोस्त का तंज नही चुभता

कहकहो की हँसी चीर देती है बहुत कुछ

वक्त बदला

या वक्त ने मिज़ाज बदला

पता नही कुछ

पर कुछ तो बदला है

क्योंकि अब

उदासी बेवजह नही होती

पहले की तरह

लेकिन मेरे होने की वजह

सुबह का सवाल बन कर

घिर आयी है शाम को....

पुराने दरख्त की और लौटते

पंछियों को देखकर एक नम

हँसी लौट आई और कहा

छोड ये देश

चल परदेश

बदलकर भेष...।
डा.अजीत

Tuesday, August 17, 2010

उदास

वो दो शब्द थे

और एक बात

जिस पर हम मिले

और जुदा हुए

बेसबब उदासी की वजह

इतनी बेसबब भी नही थी

कुछ मेरे और कुछ तुम्हारे

ज़ज्बात हसीन अहसास के

गवाह न बन सके

स्याह रात की खामोशी

उस खामोशी से थोडी कम ही होगी

जब हमने तय किया

कुछ दूर तक साथ चलना

साथ चलना नसीब था

चल कर बदलना हकीकत

कुछ कदम सुस्त से

कुछ मे रफ्तार

सोचता हूं आज भी वो

रास्ते किस्से सुनाते होंगे आपस मे

जब दो मुसाफिर

साथ चले थे चार मील

कभी जरुरत पडी तो उन पेडों

की गवाही ली जा सकती है

जिसकी पत्तियां

तुमने मसलते हुए कहा था

ऐसे कैसे जीया जा सकता है

मै बदला

तुम बदली

हम दोनो बदल गये

लेकिन नही बदले वो रास्ते

जो गवाह है

हमारी खामोश रातों के

कभी आपस मे बतियाते होंगे

तो वो भी उदास हो जाते होंगे

मेरी तरह

जैसे मै आज उदास बैठा हूं

तुम्हारे बिना

और तुम्हारी मुस्कान पर

कही कविता लिखी जा रही है...।

डा.अजीत

Saturday, August 7, 2010

सफर

मौसम का मिज़ाज हादसों से क्या कहते

गुनाहगार बन कर हमराह कैसे रहते

वजूद बेख्याली मे बिखर गया

किनारे कब तक नदी के साथ बहते

हिम्मत पे तनकीद सब्र का इम्तिहान थी

तजरबे पर सवाल कैसे सहते

मै बिखरा हूं अपनी कमजोरियों से

तुम संवरने से पहले अपना हाल कहते

मंजिल ही न तय कर सका वो मुसाफिर

मील के पत्थर सफर की क्या दास्तां कहते

लौट आए हो तो ये मशविरा करके जाना

तन्हा मुसाफिर के इंतजार मे रस्ते नही रहते

दुआ उस फकीर की महफूज रखना

अंधेरा जब ज्यादा हो

जरा सी हवा चराग नही सहते..।

डा.अजीत

Wednesday, July 28, 2010

सज़ा

तन्हाई का सबब खुद्दारी मे निकला

रहबर जिसे समझा

वो माहिर अय्यारी मे निकला

इम्तिहान इतने लिए ज़िन्दगी ने

हर लम्हा किसी गैर की तरफदारी मे निकला

फकीर जब उसके दर पर बेआबरु हुआ

किरदार तब उसका अदाकारी से निकला

खामोशी बेबसी की तहरीर थी

इल्जाम गवाह की ईमानदारी पे निकला

खुदा भी हैरान रहा इस बात पर

ताउम्र खुशियाँ बेचने वाले का

आखिरी वक्त बडी बेज़ारी मे निकला...।

डा.अजीत

Wednesday, July 7, 2010

सबक

हौसलों की बात करते रहे

बुझदिलो की महफिल मे सजते रहे

हम वो चराग है अपनी महफिल के

जो उजालो मे भी जलते रहे

बुझना तो चाहा कई बार

मगर कुछ मरासिम हसरतो मे पलते रहे

बुलन्दी का नशा होता तो कैसे होता

जिन्दगी किराये का घर था बदलते रहे

लबो पे हँसी आई तो टिक न सकी

आँसू पलको तले पलते रहे

अदब न समझ मे आया दूनिया का

तहजीब सीखाने वाले अब हद मे रहे

न अब दोस्ती किसी से न अदावत

न कोई शिकवा न शिकायत

सबक यही मिला हँसी से कही बेहतर है

याद बनकर किसी के चश्मेतर मे रहे...।

डा.अजीत

Saturday, July 3, 2010

विकल्प

कभी यह सोचकर

एक अजीब सी बैचेनी होती है

कि

विकल्प संकल्प की बाधा है

या एक ऐसी युक्ति

जिस पर गाल बजाई की जा सके

आदमी का अपनी सुविधा के लिए

गढा हुआ एक बहाना भी हो सकता है

जिसके होने और न होने से

कोई खास फर्क नही पडता

फिर यदि मित्र का विकल्प शब्दकोश

पत्नि का प्रेमिका

और दूसरे सम्बन्धो का कुछ और

बन सकता है

या बनाया जा सकता है

तो फिर कोई असुविधा ही नही रही

सम्बन्धो में

यह एक भटकन भी तो सकती है

अपने आपसे

अपने को भुलाने का एक उपचारिक

प्रयास

अलझाईमर की बीमारी अगर

जवानी मे हो जाए

कुछ दिन के लिए और फिर ठीक हो जाए

तो विकल्पों के रोजगार करने

की जरुरत ही न पडे शायद

यादें खट्ठी-मिट्ठी होती है

लेकिन खटास का मैल मन से धुलता क्यों नही

इसका धोने का कोई डिटरजेंट

नही बन पाया आजतक

समानांतर जिन्दगी के पडाव

पल भर सुस्ताने की मोहलत नही देते

और अगर फुर्सत मिल भी जाए

तो वो लोग नही मिलते

जिनकी जिद पर हमने रचा है

अपने वैकल्पिक सम्बन्धों

का पूरा हरा-भरा संसार

यह सोचकर एक ठंडी सांस भरी जा सकती है

या रोया जा सकता एकांत मे

शराब पीकर

लेकिन इन सब प्रपंचो से

किसी को कोई फर्क नही पडता
क्योंकि कोई हमारा विकल्प है
और हम किसी के विकल्प...।
डा.अजीत

Friday, June 4, 2010

शर्ते लागू

उस विज्ञापन गुरु की

व्यवहारिक सोच की खुले मन से तारीफ की जा सकती है

जिसने स्टार युक्त शर्ते लागू

का कांसेप्ट बनाया

बात की बात और बिना चोट की लात

यह बात मात्र विज्ञापन की दूनिया के लिए ही

नही बनी

इसका खुब प्रयोग रिश्तो मे भी किया जा सकता है

न बात कहने मे बुरी लगे

और न सुनने मे

बार कोड के टैग की तरह

जज़्बात दिखेगा खुब

लेकिन अहसास आपका

कितना महसूस कर पाते है

अक्सर शर्ते लगाकर जीना

एक शगल हो सकता है

जिसमे तडका लगा अपने को सुरक्षित

करने का

लेकिन दोस्त! शर्ते लागू

के स्टार मे वो चमक नही होती

जो बिना लाग-लपेट के मोल भाव मे

बाजार और रिश्तें देखने मे अलग-अलग है

और न ही इनमे तुलना की जा सकती

लेकिन एक बात जो अक्सर

सामने आ ही जाती है

शर्ते लागू होने के स्टार से मन

आकर्षित तो सकता है

लेकिन प्राइस टैग

बार-बार पलट कर देखते हुए यही ख्याल

आता है

कही हमे ठगा तो नही जा रहा है

फिर चाहे वो बाजार हो या

ज़ज्बात पर टिके रिश्तों की बुनियाद...।

डा.अजीत

Thursday, June 3, 2010

ऐसा ही हूँ मैं

मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,
मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती
किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था
मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।
(उपरोक्त पंक्तियाँ मेरी मौलिक नहीं हैं मैंने कही पर पढ़ी और अच्छी लगी सो अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दी है,वैसे जिसने भी लिखी है काफी दमदार लिखी है उसको आभार)

Sunday, May 23, 2010

द लास्ट एडवाइस

आखिरी सलाह

बता कर उसने मुझसे

जो बात कही

उसे तर्क के आधार पर तो खारिज़ नही

किया जा सकता है

लेकिन यदि इतना बुद्दिवादी मन

पहले से होता तो मै सलाह ले

नही दे रहा होता

क्योंकि विकल्पो का रोजगार

करना कोई बडी बात नही है

सलाह के कारोबार मे कोई बुराई भी नही है

अपनेपन मे ही ये सब होता है

लेकिन आखिरी मान कर दी गई सलाह

नसीहत का भी मिला-जुला काम

करती है

उसने जो भी कहा

मै उसे अगर मान भी लूं

तब भी सलाह की जरुरत मेरी जिन्दगी

से कम होनी वाली नही है

दरअसल यह एक लत की जैसी है

एक बार लग जाए तो

फिर किसी भी निर्णय की

बिना सार्वजनिक/व्यक्तिगत पुष्टि

किए मन अनमना सा ही रहता है

शायद मेरी इसी आदत से

परेशान होकर उसने जबरन

अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया

और आक्रमक होकर कहा-

इट्स माई लास्ट एडवाइस

मै एक मिनट तक यही सोचता रहा कि

क्या एडवाइस भी लास्ट हो सकती है

दिल ने कहा नही

दिमाग ने कहा जरुरत क्या है किसी की एडवाइस की

ज्ञान बघारते वक्त नही सोचा जाता

कि सलाह का लेन-देन

कितना जोखिम भरा काम है

किसी को समझना और उसको

ठीक-ठीक वही बता देना जो वह कभी नही

सुनना चाहता

और खुश हो जाना अपनी वाकपटुता पर

ऐसी बहुत से सलाहें मेरे पास आज भी

सुरक्षित रखी है जो शायद मेरा

जीवन ही बदल देती

मै वो न होता जो आज हूं

नही लिख रहा होता कविता

न ही बात बेबात पर किसी से नाराज़ हो जाता

एक सधी मुस्कान और

औपचारिकता की चासनी मे लिपटे शब्द होते मेरे पास

और सबसे बडी चीज़ उपलब्धि होती

जिसकी ठसक पर मै

लोगो को मजबूर कर सकता था अपनी

घटिया से घटिया बात पर

स्तुति गान करने के लिए

और शायद सहमति मे उठे हाथों

की एक लम्बी फेहरिस्त होती मेरे पास

ऐसी सलाहें मैने अभी तक इसलिए

बचाए रखी कि

क्या पता कब जरुरत पड जाए

बुरे वक्त मे

और आज जब मैने लास्ट एडवाइस ली

तब मुझे लगा कि

अगर मैने मान ली होती उसकी कुछ पुरानी सलाहें

तो मै भी अपनी आधी-अधुरी अंग्रेजी

और पूरी बेशर्मी के साथ कह पाता

इट्स माई लास्ट एडवाइस

कैन यू बिलिव ओन इट?

डा.अजीत

Tuesday, May 4, 2010

माफी चाहूंगा दोस्त

कुछ ऐसी बातें

जिनका जिक्र करना जरुरी हो

गया है आज

ये मेरी-तुम्हारी नही हमारे बीच की बातें है

एक दशक से भी ज्यादा

वक्त जिया है तुम्हारे साथ

ऐसा कई बार हुआ है कि

बिना किसी प्रतिक्रिया के मैने तुम्हारे

उस व्यवहार को स्वीकार किया

जिस पर कोई भी बिफर सकता था

आहत हो सकता था

या फिर संबन्ध तोड सकता था

मुझे लगा कि मेरा मौन रह जाना

शायद तुम्हारे संवेदनशील मन को सोचने के लिए मजबूर करें

कि कोई किसी के लिए क्यों अपरिहार्य होता हैं

लेकिन शायद तुम्हें

स्पष्ट बोलने और कडवा बोलने मे फर्क

नज़र नही आया

तमाम ज्ञान बांटने के बाद भी

कभी-कभी तुम कितने निर्धन लगे

आग्रह के मामले में

अपनी शर्तों पर जीना प्रशंसा की बात है

लेकिन शर्तो को जीने की बाधा बनाना

मुझे ठीक नही लगा कभी

मेरे जैसे बहुत से लोग

तुम्हें स्वीकार करते गये

तुम्हारी तमाम बदतमिजियों के बाद भी

क्योंकि उनकी आशा का केन्द्र रहे तो तुम

तुम्हारें संघर्ष से प्ररेणा मिली है

तुम्हें शायद ही कभी इस बात का अंदाजा हो

कि तुम्हारें छ्द्म स्वाभिमान की कीमत

लोगो ने अपने संबन्धो को खोकर चुकाई हैं

तुम्हारा व्यवहार न कभी औपचारिक बन पाया

और न आत्मीय ही

बस तुमने अपनी सुविधा से हर संबन्ध की परिभाषा गढी

और उसको जिया अपनी तरह से

खेद है कि तुमको इस स्वरुप मे स्वीकार करने के बाद

तुम अपने आपको ही स्वीकार नही कर पाये

अपनी अपेक्षा के केन्द्र मे लोगो को सतत बनाए रखना

और उनकी अपेक्षाओं को सिद्दांत की ओट लेकर

तार्किकता से खारिज करना

तुम्हारी एक अतिरिक्त योग्यता रही हैं

जो शायद तुम्हे अपनी विशिष्टता लगी हो

मित्र उपदेशक न लगे इसी वजह से

मैने कभी प्रतिकार नही किया

लेकिन आज जब तुम अपने दोष को योग्यता के रुप

मे जीने के आदी हो गये हो

तब तुम्हारा ही ब्रह्म वाक्य

जिसके सहारे तुमने कितनी बार

अपने दायित्व से पलायन किया हैं बुद्दिमानी के साथ

सौंप रहा हूं तुम्हे

अब

माफी चाहूंगा दोस्त...

डॉ.अजीत

Thursday, March 18, 2010

फोन

युक्तियुक्त सात्विक झुठ
बोझिल बातें
औपचारिक वायदे
अनमने मन
मे अभिनय के पुट के
साथ अपनेपन का आत्मीय
प्रदर्शन
उधार के शब्द और संवेदना
का प्रमाणिक
यांत्रिक दस्तावेज़
मेरा फोन मुझे
साक्षी भाव से स्वीकार करना वाला
अब तक का सबसे विश्वसनीय साथी लगा
पल भर के लिए सोचता हूं
अगर इसमे कोई सजीवता होती
तो कब का छोड गया होता
सार्वजनिक करके मेरे दोहरे व्यक्तित्व को
एक अजीब सा सम्बन्ध
है अपना
जब भी अकेलेपन ने घेरा
मेरे एक सच्चे दोस्त की तरह
इसने संवाद बचाया
उन लोगो के साथ
जो मेरी तमाम बदतमीजियों के बाद भी
मेरी फिक्र करतें है
ऐसा कई बार हुआ कि
आत्महत्या करने का मन हुआ
तब इसके सहारे ही दिलासा मिली
और मै बच गया
अगर यह निमित्त न होता तो
आज मै कृतज्ञता प्रकट करने के लिए
न बचता
अपनी आखिरी सांस तक यह मुझे जोडे
रखता है इस औपचारिक दूनिया से
एक आग्रह के साथ
ऐसा दिन मे कईं बार होता है
जब मै उकता कर इसको क्या तो बंद
कर देता हूं
या छोड देता हूं इसका गला घोंट कर
वाईब्रेशन मोड पर
लेकिन यह मुझे कभी नही छोडता
और सच कहूं तो
इसके बंद होने पर
अब मुझे गहरी चिंता होने लगी है
ऐसा लगता है कि
वो सेतु टूट गया है
जिसके एक पार मै अकेला खडा हूं
और दूसरी तरफ सारी दूनिया है
अपने शिकवे-शिकायतों के साथ
कोई इतना अपना कैसे हो सकता है
जब आपको पता है कि
इसका अपना कुछ भी नही
कुछ भी हो
इसे खरीदते वक्त मैने नही
सोचा था कि इतना अपनापन होगा इसमें
बिना स्वार्थ के
कम से कम उन औपचारिक संबन्धो से
बेहतर है इसका होना
जिनके लिए मै कभी काम का नही रहा हूं
और
शायद हम दोनो
एक दूसरे के बडे काम के हैं...।
डॉ.अजीत

Wednesday, March 17, 2010

सपनें

एकांत के कुछ
पल अधुरे सपनो की
बुनावट के सच्चे
गवाह हो सकते है
भले ही इनकी गवाही की
कभी जरुरत न पडे
लेकिन
इन सपनो की उधेडबुन
मे उलझा मन अपनी झुठी
तारीफ से कुछ पल के लिए ही सही
सुलझ सकता है
जी सकता है कुछ पल अपनी तरह से
अपने वजूद के साथ
सपनें देखना और जीना इनके साथ
आज की नही कल की जरुरत थी
और कल के सहारे आज की हकीकत
मन के अवसाद
को संजो कर रखने का साहस
इतना आसान भी नही कि
हम जी सके बिना सपनो की
समीक्षा किए
अधुरे सपने
दरअसल एक अहसास है
खुद के अधुरे होने का
जिसे पुरा करने के लिए
दिल की नही दिमाग की जरुरत है
ऐसे सपनों के सहारे
एक समानांतर जिन्दगी जीने बाद
सपनों पर बहस करना
जरुरी नही लगता
लेकिन
जब कोई अपना सपना
बदलता है
किसी भी वजह से
तब अधुरे सपनें
भर देते है
एक अजीब एहसास से
और दिल करता है
एक और उधार के
सपने के साथ जीने का
अपने अधुरेपन के साथ...।
डॉ.अजीत

Sunday, March 7, 2010

यात्रा

साथ रहने के लिए
साथ खडे होना भी जरुरी होता है
एक मित्र ने समझाया कि
साथ देखने की सीमाएं क्या होती है
देखा जा सकता
दायें-बायें या फिर अपने से ऊपर
छदम गर्व के साथ
नीचे देखने का वक्त नही होता है
साथ के लोगो के पास
और न ही साहस
अपने साथ चले लोगो को
नीचे देखने के लिए
सर्वाइकल से कुछ ज्यादा दर्द होता है
प्रेक्टिकल होना और साथ खडा होना
दोनो एक सी बात है
कदमो की लडखडाहट के तब ज्यादा
मायनें नही है
जब साथ मे चल रहे हो
कुछ शुभचिंतक
साथ की यात्रा के लिए
सावधानी और अभिनय
दोनो जरुरी है
क्योंकि आपने मार्ग क्यों
बदला इसकी समीक्षा और कारण
जाने बिना
साथ छुट जाता है
फिर अभिनय ही आत्मघाती होने से बचा सकता है
अभिनय खुद के लिए
इतना जरुरी नही होता
जितना कि
साथ के लोगो के एहसास मे बनें
रहने की मानवीय कमजोरी के लिए
लेकिन उपलब्धि के समीकरण
से उपजी साथ चलने की इस
शर्त से
यात्रा कितनी पीडादायक
हो सकती है
इसका अहसास
भावुकता की आड लेकर
चेता रहा है बार-बार
और मै साथ खडे रहने की
तैयारी कर रहा हूं
सपनो की कीमत पर....।
डॉ.अजीत