Saturday, December 13, 2014

बारिश

बारिश और तुम
----
अनजान शहर
बेमौसमी बारिश
सर्दी का मौसम
एक साथ इतने षडयंत्र
देखकर डर जाता हूँ
कभी खुद को याद करता हूँ
कभी तुम्हें
ईश्वर इस बात पर नाराज़ है।
***
बाहर बारिश का शोर है
एक शोर अंदर है
दोनों शोर मिलकर
रचते है विचित्र आलाप
जिसमें शास्त्रीयता तलाशता हूँ मैं।
***
बारिश आसमां से
बगावत कर रही है
कुछ बूंदे मांगती है पनाह
इनकार में
मै सुबक पड़ता हूँ
तुम्हें याद करके।
***
टिप टिप पड़ती बूंदे
बेघर है
बह रही है ढलान के साथ
यह देख
सूख जाते है आंसू
पलकों की हदों में।
***
दरवाजें बंद है
और खिड़कियाँ भी
कुछ बूंदे
एक झोंका
आता है देखने
सोया कि जाग रहा हूँ मैं।
***
बिस्तर पर
बैचैनियों की सिलवटें है
और ठंड की नमी
एक तकिये का एकांत
चिंतित करता है
करवट लेकर आश्वासन ओढ़ता हूँ।
***
धड़कनें दौड़ती है
कम ज्यादा
बाहर पानी है
गीले पैर
लौट आती है
दिल का तापमान
शून्य से नीचे चला जाता है।
***
बारिश इसलिए भी
खराब लगती है
ये ख्वाहिशों को
मरने नही देती
और उनका मरना
जीने की अनिवार्य शर्त है।
***
बादल खुद नही आ सकता
धरती से मिलनें
तो भेज देता है
खुद के आंसू
बारिश की शक्ल में
ये ठंड दरअसल
बादल के नम दिल की
ठंडक है।
***
और तुम
बारिश होने पर खुश हो
तुम्हारी खुशी
कभी कभी
कितनी भारी गुजरती है
मुझ पर
अंदाज़ा भी है तुम्हें।

© डॉ. अजीत

Friday, December 12, 2014

पॉज़

तो चलूँ
हम्म !
नही..
चलों जाओं
मिलतें हैं।
***
मुश्किल है
हम्म..
अब
देखतें है
देख लेना।
***
सुनों
क्या है यह
पता नही
बनो मत।
***
अच्छा !
बहुत बढ़िया !
खुश रहो
मेरी फ़िक्र छोड़ो।
***
क्या !
पागल हो गए हो
हाँ !
तुम्हारा कुछ नही हो सकता।
***
क्या है !
फिर
मेरी बला से
सुनों ना
सुन लिया
फोन रखो।
***
कहां हो
यहीं
नहीं
क्यों
ओके बाय।
***
ऐसा कैसे
अच्छा
रहने दो बस
ठीक है
जैसी तुम्हारी मर्जी।
***
अरे सुनो तो सही
सुन रही हूँ
हम्म
हो गया
झूठ बोलना
सीख लो पहले किसी से।
***
प्लीज़
ओके
अब
कुछ नही
जस्ट ग्रो अप !
बच्चें नही हो तुम।

© डॉ. अजीत

डिस्क्लेमर: ये कुछ टूटे हुए सम्वाद है इनके कविता होने का मेरा कोई दावा नही है। काव्य समीक्षकों से अग्रिम मुआफ़ी।शब्दों के पॉज़ के बीच बहती कविता यदि आप जी पाएं तो लिखना सफल है बाकि अच्छा बुरा सब मेरा है।



गज़ल

कभी कमजोरी थी तुम अब ताकत बना लिया
दिल को आज  हमनें मुस्तकिल समझा लिया

दुनिया भर की हंसी में तुम्हें कहां तलाशते हम
घर की दीवार पर तेरा एक फोटो सजा लिया

रोशनी के सफर में अंधेरों से तुमने दोस्ती की
तुम्हें नजर आ जाएं इसलिए दिल जला लिया

तेरी महफ़िल में तन्हाई का किरदार मिला हमें
हर बार बहाना करके तुमनें हमको बुला लिया

कभी खुद को भी सता कर देखों एक लम्हा
हमारा दिल तो तुमनें जी भर के सता लिया

© डॉ. अजीत

Wednesday, December 10, 2014

आग

एक आग जलती है
सीलन इतनी ज्यादा है
ताप को धुआं निगल जाता है
जलने का मतलब
प्रकाश ही नही होता है हर बार
कुछ आग अंधेरे में भी जलती है
जिसके ताप में
कतरा कतरा पिंघलते जाते है हम
रोशनी की आस में
ताप खो जाता है
खुद ही जलते है और
खुद को ही जलाते है
मन की दहलीज पर
इस आग की अंधी रोशनी होती है
वक्त हमें सेंकता है
अपनी शर्तों पर
समझदारी इसी को
कहते है शायद।

© डॉ.अजीत

Tuesday, December 9, 2014

बोलचाल

चंद लड़ाईयां वाया बोलचाल
----
उसने कहा कॉफी
पियोगे
मैंने कहा नही
मुझे चाय पसंद है
उसने चाय और कॉफी मिलाकर बनाई
अब ना वो चाय थी ना कॉफी
उसकी ऐसी जिद
हैरानी और प्यार से भरती थी मुझे।
***
उसने कहा
वेज खाते हो या नॉन वेज़
मैंने कहा शुद्ध शाकाहारी हूँ
फिर उसने
नॉन वेज मेरे सामने बैठकर खाया
मगर बोन लैस।
***
उसने कहा
चाय पीते वक्त
आवाज़ बहुत करते हो तुम
मैंने कहा हां आदत है
फिर उसने कहा
ये आदत कभी मत छोड़ना
चाहे मै भी कहूँ।
***
उसने कहा
रुमाल क्यों नहीं रखते तुम
मैंने कहा
आदत नही है
उसने कहा
हर वक्त मेरे पास
कॉटन का दुपट्टा नही होता है
आदत बदल लो अपनी।
***
उसने कहा
फोन क्यों नही रिसीव करते तुम
मैनें कहा
वाइब्रेशन मोड पर था
उसने कहा ये मोड बदलों जल्दी
फोन को रखों रिंगिंग मोड पर
और खुद को वाइब्रेशन मोड पर
आजकल तुम्हें महसूस नही पा रही हूँ मैं।
***
उसने कहा
कंधे झुकाकर क्यों चलतें हो
मैंने कहा कद की वजह से
उसने कहा
कद हद पद की परवाह मत किया करों
परवाह ही करनी है तो
मेरी गर्दन की करों
जो तुम्हारी वजह से हमेशा
ऊंची रहती है।
***
उसने कहा
बहुत कम बोलते हो
इतना चुप रहना अच्छा नही होता
मैंने कहा
ऐसा ही हूँ मै
उसने कहा
ऐसे ही रहना हमेशा
तुम्हें बदलना नही
तुम्हारे संग संवरना चाहती हूँ मैं।
***
उसने कहा
बाल बहुत छोटे रखते हो
फौज़ में भर्ती होने का
कोई अधूरा सपना है क्या
मैंने कहा
नही लम्बें बाल पसन्द नही है
उसने अनमना होकर कहा
कभी दुसरे की पसंद का भी
ख्याल रखना चाहिए तुम्हें।
***
उसने कहा
तुम इतने बोरडम से
क्यों भरे रहते हो
मैंने कहा
भरा हुआ ही तो हूँ
खाली तो नही हूँ
उदास होकर वो बोली
थोड़ी जगह खाली करों
मुझे आना है अभी इसी वक्त।
***
उसने कहा
मुझसे कभी मत मिलना
आज के बाद
मैंने कहा
ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी
वो गुस्सें में भी हंस पड़ी
और बोली
मेरी मर्जी की परवाह करने वाले से
एक बार तो मिलना ही पड़ेगा।

© डॉ. अजीत

Monday, December 8, 2014

सच

सात अधूरे सच
----

यात्रा बिंदु से बिंदु की है
चित्र में
वृत्त आयत वर्ग रेखा
हो सकता है
कोई एक
निर्भर करता है
समय की सुखद
अनुकूलताओं पर।
***
सच और झूठ
एक ही बात या घटना के
दो संस्करण है
हमारा चयन कितना
तटस्थ है
यह नितांत की
संयोग का मसला है।
***
विश्वास छल का
बंधुआ मजदूर है
जो जितने छले गए
उतने बड़े अविश्वासी
और उतने बड़े
विश्वासी।
***
समय रचता है भरम
मनुष्य रचता है अपेक्षा
दोनों मिलकर
देखना चाहते है
मनुष्य को मजबूर।
***
जन्म और मृत्यु
मनुष्य के निर्वासन के
मध्य की यात्रा है
उस निर्वासन की
जिसे ईश्वर देता है
वरदान की शक्ल में।
***
अतीत का मोह
वर्तमान को जीने नही देता
भविष्य की चिंता
वर्तमान को मरने नही देती
समय के सारे षडयंत्र
वर्तमान के विरुद्ध होते है।
***
खुद को तलाशना
बाहर
खुद से भागना
अंदर
खुद से अज्ञात रहनें के
आसान तरीके है
मनुष्य जिन्हें पसन्द
करता है बेहद।

© डॉ. अजीत

चुप

चुपचाप हो जाना
अचानक से
समझदार बनने जैसा है
कुछ चुप्पियाँ
नासमझी की भी होती है
कहते हुए याद आता है
ख़्वाब के बिछड़नें से बड़ा दुःख
ख़्वाब बदलनें का होता है
वक्त की करवट
आहस्ता कोण बदलती है
पीठ पर उगे
शंकाओं के जंगल से गुजर कर
चेहरा नही देखा जा सकता
भले वो आंसूओं से तर हो
सहसा टपकी बूँद
मौसम का अनुमान बिगाड़ देती है जैसे
ठीक वैसे ही
एक चुप बदल देती है
संबंधों का बीजगणित
खुद के प्रश्न खुद के उत्तर से हमेशा
बड़े पाये जाते है
सांसों का अंदर बाहर होना
एक भौतिक प्रक्रिया है
उनके अंतराल को गिनने लगना
एक यौगिक
कहे अनकहे के बीच
शब्दों को वापिस निगलना
अज्ञात किस्म का योग है
मौन और चुप के मध्य
ऊब का आश्रम है
वहां सुस्ताते हुए
नींद नही आती
वहां जो अनुभूतियां होती
उसे योग्यतम शिष्य से भी नही
बांटा जा सकता
रिक्तता से उपजी ऊर्जा का
शक्तिपात खुद पर कर
भस्म या चैतन्य हो जाना
खुद को बचाने का
एकमात्र अज्ञात तरीका है।

© डॉ. अजीत


Friday, December 5, 2014

सात दिन

'वो सात दिन...'
----

उसने अचानक कहा
अपनी कविताओं को नीचे
कॉपीराईट का निशान क्यों लगाते हो
मैंने कहा
कोई उन्हें चुरा न सकें इसलिए
फिर वो उदास होकर बोली
मेरे लिए भी कभी
कुछ ऐसा सोच लिया करो।
***
उसने लगभग
चिल्लातें हुए कहा
तुम खुद को समझते क्या है
मेरी हंसी छूट गई
और हंसते-हंसते बोला
आधा अधूरा इंसान
वो चिढ़कर बोली
जो हो वही रहो
मोहन राकेश न बनों।
***
उसने एक दिन
चाय का कप थमाते हुए कहा
तुम दिन ब दिन नापसन्द होते जा रहे हो
मैंने चाय की घूंट भरी और कहा
बढ़िया है
फिर से नए सिरे से पसन्द करना मुझे
वो इतनी हंसी कि चाय न पी पायी।
***
उसने एक दिन
हंसते हुए कहा
तुम्हें भूलना आसान नही है
उस हंसी में एक फ़िक्र घुली थी
उसके बाद
मै हंसना भूल गया।
***
उसने एक दिन
चिंतित होकर कहा
बाल उड़ते जा रहे है तुम्हारें
इतना मत सोचा करो
मैंने कहा
सच्ची ! छोड़ देता हूँ
फिर बोली
मेरे बारें में जरूर सोचते रहना।
***
एक शाम उसने
चिढ़कर कहा
तुमसे मिलना मेरी सबसे बड़ी भूल थी
मैंने कहा
भूल सुधार में मदद करूँ कुछ
वो बोली बनो मत !
इस भूल का कोई अफ़सोस नही है मुझे।
***
एक दिन उदास होकर
उसनें कहा
अब तुमसे मिलना सम्भव नही होगा
उस दिन
मै भी चुप हो गया
मेरी हाजिरजवाबी जवाब दे गई थी
उस दिन उदासी का सही अर्थ समझ पाया।

© डॉ. अजीत



रात

खो जाता हूँ रोज रात
सुबह तुम्हारी ध्वनि
कान में कहती है
खोना नही जीना है
खोना मेरी नियति है
और जगाना तुम्हारा प्रारब्ध
हमारा मिलना कहा जाएगा
ब्रह्माण्ड का षडयंत्र
महज बोलने से रात्रि
शुभ नही हो जाती
मेरे कान रोज़
दिल और दिमाग को
भड़काते है
तुम्हारी शुभकामनाओं के खिलाफ।

© डॉ. अजीत 

Wednesday, December 3, 2014

चंद आवारा ख्याल

चंद आवारा ख्याल...
---

ऐसे भी खो जाता हूँ
किसी दिन
जैसे बाथरूम में
तुम्हारा हेयरपिन।
***
भरता रहता हूँ
आहिस्ता-आहिस्ता
मन की पींग
जैसे हंसते हुए हिलते है
तुम्हारे इयररिंग।
***
नही बांधता कोई
स्नेह के बंधन
रहता हूँ ऐसे
जैसे
चूड़ियों के बीच
तुम्हारे कंगन।
***
मेरी खिड़की पर
बरसते है कभी कभी
ऐसे भी बादल
जैसे
आंसूओं के बीच
तुम्हारा फैला हो काजल।
***
भीगें पर से अक्सर
भरता हूँ मै उड़ान
जैसे
तुम्हारी अधूरी मुस्कान।
***
उड़ जाते है
तुमसें मिलनें के सारे ख्याल
जैसे
धूप में सूखते तुम्हारे बाल।
***
आईना देख आती है
कभी कभी  मुस्कान
जैसे
तुम्हारे चेहरे की थकान।
***
यादें तुम्हारी
रखती है मुझे एवरग्रीन
जैसे
सर्दी में ख्याल रखें तुम्हारा
तुम्हारी कोल्ड क्रीम।
***
बातें लगने लगती है मुझे
कभी कभी बेहद झूठी
जैसे
तुम्हारी अनामिका की
मैली अंगूठी।
***
पढ़ता हूँ
तेरी खुशबू में रंगे
पुराने खतों की
खूबसूरत लिखावट
जैसे
तुम्हारे तराशे गए नाखूनों की
हो बुनावट।

© डॉ. अजीत

यक्ष प्रश्न

हम उनकी गोद से
परित्यक्त प्रेमी थे
न हमें उनकी
उंगलियों की कंघी नसीब हुई थी
और न धूप में आंचल
हमारी पवित्र भावनाएं
झूठ और षडयंत्रो का पुलिंदा साबित हुई
हमारे होठ लगभग सिले हुए थे
उन पर शिकायतों की झूठी मुस्कान थी
बेहद सच्ची दिल की बातों को
अन्यथा लिए जानें के लिए शापित थे हम
तपते दुखते माथे को कभी
नसीब नही हुए उनकी जुल्फ के साए
हम प्रेमी थे भी या नही
इस पर सबको सन्देह था
शंका संदेह की कमान पर कसा रहा प्रेम
और घायल होते रहे हम
हमारी हथेलियों पर नीरसता का सीमेंट पुता था
हाथ मिलाते वक्त बेहद बोझिल होते थे हम
गले लगने से पहले
हीनता का जंगल हमारी छाती पर उग जाता था
तमाम विडम्बनाओं के मध्य
प्रेम को जीवित रखने के लिए
देते रहें हम खुद की बलि
इस उम्मीद पर कि
प्रेम बदल देता है इंसान को
किसको कितना बदला
मुश्किल है बता पाना
एक चीज़ जरूर बदल गई
अब कुछ बातों का बुरा लगने लगा था
हमारे आसपास उग आया था अब
विविधता भरा शुष्क जंगल
जहां प्रेम को तलाशना
खुद को खोने के जैसा था
अपनी गुमशुदगी को दर्ज कराना
अब अनिवार्य नही था
क्योंकि
दिल और दिमाग से निर्वासन जीते हुए हम
भूल गए थे
खुद की ठीक ठीक पहचान
हम परित्यक्त प्रेमी जी रहे थे
अपनेपन के बीच
शूद्रों से भी बदतर जीवन
प्रेम निसन्देह नई सामाजिक असमानता का जन्मदाता था
कोई आरक्षण जिसे खत्म नही कर सकता
एक ऐसी असमानता का हिस्सा थे हम
सम्बन्धों के समाजशास्त्र का सबसे
खतरनाक पक्ष यही था
सतत साथ चलते जाना अजनबीपन के साथ
और पहुँचना कहीं भी नही
हम कुछ प्रेमी इसे जीने ढोने के लिए
प्रकृति द्वारा सबसे उपयुक्त पाएं गए
ये बात हमारा दिल दुखाती रहेगी उम्र भर
न्याय अन्याय से परे
हम इस युग का नया सामाजिक सच बनें थे
समझ नही आता था
इस पर गर्व किया जाए या कोसा जाए खुद को
एकांत के सन्नाटे में
ये हमारे दौर का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न था।

© डॉ. अजीत

कहा सुनी

'दस कहा-सुनी'
----

मैंने कहा
थोड़ा उलझ गया हूँ
सुलझा दो
उसने कहा
तुम उलझे हुए ही
अच्छे लगते हो
ये उस पल की
एक मात्र सुलझी हुई बात थी।
***
मैंने कहा
इतनी चुप क्यों हो
उसने कहा
तुम्हारे असर में हूँ
उसके बाद
देर तक हंसते रहें हम दोनों।
***
मैंने कहा
ऐसे कब तक चलेगा
उसने कहा
जब तक
डर को वक्त से नापना
नही छोड़ देते तुम।
***
मैंने कहा
तुम्हारी हंसी उधार चाहिए
वो बोली
मुस्कान ही दे सकती हूँ
हंसी तो खुद उधार लाती हूँ
तुम्हारे लिए।
***
मैंने कहा
चलों चलते है
उसके बाद
मंजिल पर जाकर उसने पूछा
अब किधर चलना है
ये मासूमियत यादगार थी।
***
मैंने कहा
क्या योजना है
भविष्य की
वो बोली
मै कुछ और हूँ तुम्हारी
प्रेमिका नही।
***
मैंने कहा
प्यार अधूरा ही रहता है अक्सर
वो हंसते हुए बोली
पूरा करके
खत्म नही करना है मुझे।
***
मैंने कहा
बिन मेरे रह सकोगी
उसने उदास होकर कहा
बिलकुल
समझदारी में
तुमसे कम नही हूँ मैं।
***
मैंने कहा
बिछड़ना शाश्वत है
वो बोली
जानती हूँ  मिलने से पहले से
कोई नई बात कहो
दर्शन से इतर
थोड़ी रूमानी।
***
मैंने कहा
अच्छा लगता है
तुम्हारा साथ
उसनें कहा
यही एक समान बात है हमारी
बाकि सब तो
मतलब के भरम है।

© डॉ. अजीत

Tuesday, December 2, 2014

चाहतें

'चाहतों का बाईपास'
-----

बस इतनी सी चाहत है
मै जो कहूँ
उसे उतना ही समझ जाओं
बिना सन्देह शंका की
जोड़ तोड़ किए।
***
बस इतनी चाहत है
सुनों तुम
शब्दों के पीछे ध्वनि
जो रह जाती है
उपेक्षा के शोर में गुम।
***
बस इतनी सी चाहत है
घटा दो खुद से कभी
चौबिस घंटे
फिर बातें हो
सिर्फ बेफिक्र बातें।
***
बस इतनी सी चाहत है
कहो तुम
सब अनकहा
तुम खाली हो जाओं
और मै भर जाऊं।
***
बस इतनी सी चाहत है
साथ बैठकर पीएं
चाय से लेकर शराब
तुम्हारी नसीहतें हो
और मै हंसता चला जाऊं
बेहिसाब।
***
बस इतनी सी चाहत है
किसी दिन
तुम्हें सुबह सुबह देखूँ
बिना मुंह धोए हुए
तुम्हारी आँख खुले
और चाय का कप थमा दूं
तुम्हें।
***
बस इतनी सी चाहत है
तुम्हें खुश देखकर
मुझे डर न लगें
तुम खुशी को
सम्भालना सीख जाओं
आदतन।
***
बस इतनी सी चाहत है
दुआओं में इतना असर बचा रहें
तुम्हें खुदा पर यकीन
और मुझे खुद पर
होता रहे बार बार।
***
बस इतनी सी चाहत है
वक्त भले ही फिसलें
तो तुम खर्च न हो
तुम्हारी हंसी ब्याज़ की तरह
मिलती रहें
हर तिमाही।
***
बस इतनी सी चाहत है
सफर और मंजिल
दोनों दूर हो जाए
तुम्हारी नजदीकियां
यूं भी करीब आएं
मेरे।

© डॉ.अजीत

Monday, December 1, 2014

लेनदेन

दस लेन-देन...
----

देना चाहता हूँ तुम्हें
ख्वाबों की कतरन
एक मुट्ठी प्रेम
और थोड़ी उदासी
ताकि खुशी का मतलब
तुम मुझसे समझ सको।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
नूतन सम्बंधों की प्रमेय
जहां सिद्ध करने के लिए
समीकरण या सूत्र की नही
विश्वास की
आवश्यकता हो।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
चंद अधूरे ख्याल
जिन्हें तुम मुक्कमल करों
अपने अधूरेपन से।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
अपनी पलकों का विस्तार
अपनी आँखें मूँद
तुम देख सको
मेरे आवारा ख्याल।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
एक निमन्त्रण
तलाशी लो
जेब में सूखते ख़्वाबों की
बेफिक्री से देखूँ
तुम्हें उनका उपचार करते हुए।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
हस्तरेखाओं का मानचित्र
ताकि अपने स्पर्श से
साफ़ कर सको
उस पर ज़मी
वक्त की गर्द और नमी को।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
कुछ आधे लिखे खत
उन पर खुद का पता लिखों
और सुरक्षित कर लो खुद को
उनकी लिखावट के बीच।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
अन्तस् का पता
जहां आ सको
तुम निर्बाध
नंगे पाँव।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
वह सबकुछ
जो फिलहाल
मेरे पास भी नही है
जिंदादिली का
इससे बड़ा प्रमाण
नही है मेरे पास।
***
देना चाहता हूँ तुम्हें
धड़कनों को गिनने का काम
शर्ट के बटन से उलझते
तुम्हारे कान
दिल के शास्त्रीय संगीत के साथ
सुन सकें खुद का नाम।


© डॉ. अजीत

Friday, November 28, 2014

तुम्हारा साथ

तुम्हारा साथ: कुछ बात
-----

तुम्हारे साथ
वक्त ही नही बीतता
बहुत कुछ रीतता भी है अंदर
चाहता हूँ अंदर से भरना
तुम अंजुली भर के
एक खाली जगह
छोड़ देती हो हमेशा।
***
तुम्हारे साथ
घंटो बात करने के बाद भी
चूक जाता हूँ बहुत कुछ कहने से
इस तरह खुद को बचाता हूँ
एक नई मुलाक़ात के लिए।
***
तुम्हारे साथ
हंसते हुए पढ़ लेता हूँ
तुम्हारी उदासी
फिर लिखता हूँ
उन पर प्रेम कविताएँ
इतना मतलबी तुम समझ सकती हो मुझे।
***
तुम्हारे साथ
नजर तलाशती है
एक खुला आकाश
एक साफ़ मौसम
जहां उड़ सके
मन के परिंदे
बेपरवाह।
***
तुम्हारे साथ
मन की गिरह
वेणी की गिरह की तरह
उलझी होती है
जो सुलझती है
वक्त की कंघी से
आहिस्ता आहिस्ता।
***
तुम्हारे साथ
गिन सकता हूँ
छूटे लम्हों की कतार
उनसे करता हूँ
रिक्त स्थानों की पूर्ति
बिना किसी विकल्प के साथ।
***
तुम्हारे साथ
सीखा है
खुद को साधना
निर्जन गुफा सा एकांत मिला
तुम्हारे कहकहों के बीच।
***
तुम्हारे साथ
स्पर्शों ने जीया
पवित्रता का सुख
सम्वेदना ने जाना
देह से इतर
चेतना का अमूर्त पता।
****
तुम्हारे साथ
मौन और चुप का अंतर पता चला
हंसी और उदासी का रिश्ता समझ आया
जुड़ने टूटने की खरोंचों को देख पाया
लिखने और जीने का फर्क महसूस किया
ये साथ पूर्णविराम जैसा है
शंका सन्देह के प्रश्नचिन्ह के बाद।
***
तुम्हारे साथ
बीज से घना दरख़्त बना
बोझ को ढोना नही जीना आया
तुम्हारे साथ खुद से मिल पाया
तुम्हारे साथ की कृतज्ञता
शब्दों से व्यक्त नही हो सकती
यह मेरी सबसे बड़ी ज्ञात
असफलता है।
© डॉ. अजीत

Thursday, November 27, 2014

दस बातें

हमारी दस बातें : वाया सवाल जवाब
-----

मैंने पूछा
तुम मेरी क्या हो
आँख निकालते हुए
उसने कहा
बताना जरूरी नही समझती।
***
मैंने पूछा
खुशी किसे कहती हो
हंसते हुए बोली
तुम्हें और किसे।
***
मैंने पूछा
उदासी अच्छी लगती है
उसने कहा
हाँ खुद की
मगर तुम्हारी नही।
***
मैंने पूछा
डर लगता है कभी
उसने कहा
ख़्वाब नही देखती मै।
***
मैंने पूछा
मुझमे क्या पसन्द है
उसने कहा
जो दुनिया को नापसन्द है।
***
मैंने पूछा
मुझमें क्या नापसन्द है
उसने कहा
जेब में रुमाल न रखना।
***
मैंने पूछा
क्या चीज़ बिना सोचकर करती हो
उसने कहा
तुम पर विश्वास।
***
मैंने पूछा
किस बात को लेकर निश्चिन्त  हो
उसने कहा
तुम्हें एक दिन खोना है।
***
मैंने पूछा
जिंदगी को कैसे देखती हो
चश्मा उतार कर बोली
तुम्हारी आँखों से।
***
मैंने पूछा
कोई ख्वाहिश बताओ अपनी
उसने कहा
एक नही तीन है
कभी खुलकर हंसा करो
अकेले शराब मत पिया करो
कभी कभी मिलते रहा करो।

© डॉ. अजीत




Wednesday, November 26, 2014

उसने कहा

दस बातें उसकी...
---

उसने कहा
तुम झूठे हो
उसके बाद
झूठ और सच का
भेद समाप्त हो गया।
***
उसने कहा
तुम सच्चे हो
उसके बाद
झूठ पकड़ा जाने लगा।
***
उसने कहा
तुम्हें बदलना चाहिए
उसके बाद
वो खुद बदल गईं
बदलाव एक अपेक्षित छल था।
***
उसने कहा
तुम्हारे अंदर
सच्चाई शेष है
उसके बाद
वो विभाजित हो गया
अपनी  बुराई के बीच।
***
उसने कहा
तुम कल्पना में जीते हो
उसके बाद
कल्पना यथार्थ में रूपांतरित हो गई।
***
उसने कहा
तुम्हारी चुप्पी खलती है
उसके बाद
मौन का गहरा शोर
पसर गया दोनों के बीच।
***
उसने कहा
तुम पागल हो
उसके बाद
समझ ने गहराई की गोद से
जन्म लिया।
***
उसने कहा
मुझे तुमसे कुछ कहना है
उसके बाद
उसने कहा कुछ नही
बस जीया उस लम्हें को।
***
उसने कहा
तुम्हारे अंदर बचपना है
उसके बाद
उसने बचपन को
बचाकर रखा खुद के अंदर।
***
उसने कहा
दफा हो जाओ
उसके बाद
वो दफन हो गया
उसके अंदर।
© डॉ. अजीत

Monday, November 24, 2014

ख्वाहिशें

सात अधूरी ख्वाहिशें...
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कुछ ख़्वाब
बो देता हूँ रोज़ तुम्हारे सिराहने
तकिया गवाह है इसका
ख़्वाब जो देखती हो तुम
उनमें शामिल हूँ
एक साजिश की तरह।
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देना चाहता हूँ तुम्हें
कुछ ख़्वाब उधार
लौटा देना मुझे
जब क्या तो मै थक जाऊं
या थक जाओं तुम।
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मांगना चाहता हूँ
उधार
तुम्हारा कॉटन का दुपट्टा
वक्त का पसीने पौंछते हुए
आस्तीन गिली हो जाती है मेरी
अक्सर।
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एक शाम ऐसा भी हो
तुम आओं चुपचाप
और जाओं
खिलखिलाती हुई
ऐसी चाय पर इन्तजार है
तुम्हारा।
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करना चाहता हूँ
खुशी का कारोबार
तुम्हारे साथ
दोनों बेचकर अपनी अपनी उदासी
थोड़े खुश हो जाएं
तो इसमें बुराई क्या है।
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सोचता हूँ अक्सर
बता दूं तुम्हें
अब तुम आदत में नही
जिंदगी में शामिल हो
मगर
सोचता ही रह जाता हूँ
सोचना बुरी चीज़ है।
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कहता हूँ तुमसे
बेफिक्री पर
एक सफेद झूठ अक्सर
अब फर्क पड़ता है
तुम्हारे होने और
न होने पर
सच क्या है
तुम ही जानों।

© डॉ. अजीत

Friday, November 21, 2014

हिज्र

हिज्र पर जाते घटने लगा हूँ
हिस्सों में रोज कटने लगा हूँ

गुनाह कम भी नही है मेरा
ज़बान देकर पलटने लगा हूँ

खूबसूरत आँखों के फरेब थे
रोशनी में भी भटकने लगा हूँ

उदासी का असर गहरा था
हंसते हुए सिसकने लगा हूँ

नजर आता भी कैसे अब
दायरों में  सिमटने लगा हूँ
© डॉ. अजीत 

Tuesday, November 18, 2014

पाठ

वो पढ़ लेती थी
लिखे हुए अक्षरों के बीच पसरे निर्वात को
वो सूंघ लेती थी
सच को झूठ के जंगल के बीच
वो देख लेती थी
माथे की शिकन को मीलों दूर
वो समझ लेती थी
अनकही बात का मूल्य
किसी की फ़िक्र करते हुए जीना
उसकी आदत में शामिल था
नही देख सकती वो
उदास बच्चें
अवसाद में दोस्त
अनमनें परिजन
खुद को भूल दिन भर
ढोंती रहती न जाने
किस-किस के हिस्से का तनाव
खुद की पीड़ाओं पर बात करना
उसके लिए ऊब का विषय था
वो कविता की नही
जीने और समझने का विषय थी
जब यह न कर सका
तो लिख कर कुछ शब्द
निकला आया
उससे बेहद दूर
क्योंकि अपने मतलब के लिए
उसे खर्च नही करना चाहता था
उसका बचा रहना
वक्त और हालात से लड़ते
लोगो के लिए जरूरी था
केवल खुद के बारें में ही न सोचना
उसका पढ़ाया हुआ पाठ था
जो काम आया
इस मुश्किल वक्त में।

© डॉ. अजीत

Friday, November 14, 2014

जैसे

'जैसे-कैसे-वैसे...'
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तुम्हारा खफा होना
जैसे
वक्त का खुदा होना
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तुम्हारा जुदा होना
जैसे
भीड़ में तन्हा खोना
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तुम्हारी खुशी
जैसे
बुखार में दवा की शीशी
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तुम्हारी हंसी
जैसे
कवियों में शशि
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तुम्हारी मुस्कान
जैसे
उम्मीद की दुकान
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तुम्हारे अश्क
जैसे
बड़ी उम्र का इश्क
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तुम्हारा गुस्सा
जैसे
फकीर मांगे अपना हिस्सा
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तुम्हारी बेरुखी
जैसे
जिन्दगी हो रुकी
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तुम्हारी फ़िक्र
जैसे
आयतों का हो जिक्र !
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तुम्हारा प्यार
जैसे
बारिश का बुखार
© डॉ.अजीत

Sunday, November 9, 2014

गजल

मुझे आदत नही है हंसने की
बेवजह भी हंसा देते हो तुम

थक कर कब्र में सो जाता हूँ मै
सुबह नींद से जगा देते हो तुम

जो गुनाह मैंने ख्वाबों में किए है
हकीकत में उनकी सजा देते हो तुम

रफ़्ता रफ़्ता दूर जा रहे हो हमसें
बातों ही बातों में ये बता देते हो तुम

तन्हाई में मिलो कभी तो बातें हो
भीड़ का अक्सर पता देते हो तुम

फ़िक्र बहुत करते हो मेरी सच है
अफ़सोस ये कि जता देते हो तुम

© डॉ. अजीत

Friday, November 7, 2014

गजल

सम्भालों अपने रंज ओ' गम कि खत्म होता हूँ मैं
अपने मतलब न निकालो कि हसंते हुए रोता हूँ मैं

वक्त की रंजिशें है कि पाकर सबको खोता हूँ मैं
रोशनी कमजोर है कि धागा गम का पिरोता हूँ मैं

जमीं परेशां में है कि कांटे रोज सुबह बोता हूँ मैं
आसमां हैरत में है कि फूलों पर क्यूँ सोता हूँ मैं

तन्हाई मायूस है कि बस तेरे साथ खुश होता हूँ मैं
हकीकत तल्ख है कि ख़्वाबों में तुझे संजोता हूँ मैं

© डॉ. अजीत



Thursday, November 6, 2014

स्त्री होना

तुम देवता बनने की
फिराक में थे
मैत्रयी पुष्पा कहती है
स्त्रियों को देवताओ से लगता है डर
वो खुश रहती है
एक आम इन्सान के साथ
बशर्ते उसे अपने आम होने का
अभिमान या ग्लानि न हो
स्त्री चाहती है
एक छोटा आकाश
जिसमें देख सके वो अपने चाँद को
बेहद अपने करीब
तुम्हारी बेहद मामूली बातें
स्त्री को प्रभावित कर सकती है
बशर्ते उनमें सच्ची संवेदना हो
तुम्हारा यह सोचना कि
एकदिन कोई भौतिक सफलता
दूर कर देगी उपेक्षा से उपजी दूरी
बेहद गलत है
स्त्री नही चाहती सफलता की कीमत पर
रोज रोज किस्तों में किसी अपने को खोना
स्त्री को एक ही बात डराती है
कोई उसका पढनें लगे मन
उस पुरुष की समझ पर संदेह और डर
दोनों एक साथ उपजता है
क्योंकि वो इसकी अभ्यस्त नही होती
स्त्री क्या चाहती है
यह समझने के लिए
दरअसल
स्त्री होना पड़ता है
जिसकी इजाजत
तुम्हारा पुरुष होने का अभिमान कभी नही देगा
वाचिक दिलासाएं
शब्दों का रचा भ्रम
प्रेम/अप्रेम का भेद
खूब समझती है स्त्री
चूँकि वो उम्मीद को जनना जानती है
इसलिए बचा कर रखती है
एक मुट्ठी उम्मीद कि
एक दिन तुम उसे समझोगे
ठीक उसी की तरह।

© डॉ.अजीत

Sunday, November 2, 2014

मंचन

दृश्य एक:

नदी नंगे पांव बिरहन सी चली आई
पत्थरों को न गोद नसीब हुई न आंचल
झरना अपने गुमान में बेशऊर गिरता रहा
पहाड बुजुर्ग सा नाराज़ रहा
हवा अपनी दिशा खो बैठी और समकोणों पर बहने लगी
पेड गवाही देने से मुकर गए
झाडियों ने खुसर फुसर की
रास्ते बगावत की उम्मीद में धूल फांकते रहें
फूलों ने सूरज़ की तरफ पीठ कर ली
काटों नें धागा पिरो लिया
सन्नाटा ने चादर फैला दी

दृश्य दो:

समन्दर बेहोश है
नदियां उलझ रही है आपस में
नदियां अपने वजूद को याद कर रोती है
मछलियों अपने दांव और दावें के खेल मे है
हरे शैवाल अपने निर्जन होने दुखी-सुखी है
समन्दर को वादे याद दिलाए जा रहे है
समन्दर न मुकरता है न अपनी बांह फैलाता है
समन्दर ऊकडू बैठा है
गीले रास्ते अपनी जगह बदलते जा रहे है

दृश्य तीन:
सूरज़ नें रोशनी का जाल फैंका
क्षितिज़ ने भ्रम रचा
लहर ने खुश होने का नाटक किया
पानी ने अपना खारापन और बैचेनी दोनो छिपाई
और शाम होते होते
आदतन सब कुछ सुन्दर और व्यवस्थित दिखा
सब कुछ तय सब कुछ निर्धारित।

सूत्रधार:
खुश दिखना और खुश होना दो अलग बातें है
सच कहना और सच जीना दो अलग-अलग संस्करण है
झूठ हर बार छल नही होता
और छल हर बार अज्ञात नही रह पाता
जो ज्ञात है वो अज्ञात का भ्रम है
ज्ञान का चिमटा अकेला नही बजता है
शून्य का सच वृत्त के सच से भिन्न होता है
हर त्रिकोण से त्राटक नही सधता
रेखाएं बिना मदद सीधी नही खींचती
भिन्नता इंसान की मानक त्रुटि है !
खेल खतम
पैसा हजम।

© डॉ.अजीत