Monday, February 23, 2015

पिता

पौरुष के तमाम
पौराणिक अभिमान के बीच
यह मेरी सबसे बडी ज्ञात हीनता है कि
एक बेटी का पिता नही हूं मैं
बेटी का पिता होने का अर्थ है
दरख्त का घना होना
चिडियाओं की भाषा पता होना
खुशियों की घर में दस्तक होना
जटिल से सरल होना
यदि विज्ञान इसकी आश्वस्ति देता हो तो
निसन्देह एक बेटी का पिता होना चाहता हूं मैं
ताकि घर मे बची रहे कविता
उत्सवों मे रौनक
और घर के बेटों में तहजीब
अजन्मी बेटी की कल्पना भर
भर देती है अंतस का रिक्त आकाश
जगाती है उम्मीद कि
दुनिया उतनी भी बुरी नही है
यहां लडा जा सकता है कुछ दिन और
बात बेटा और बेटी मे भेद की नही है
दरअसल
घर में बेटी का होना
उस अहसास का होना है
जिसके जरिए
एक बेहतर इंसान बनने के बारें मे
सोचा जा सकता है
मनुष्य के अन्दर बची रही मनुष्यता
इसके लिए बेहद जरुरी है
एक बेटी का पिता होना
साल भर घर मे पसरें
पुरुषोचित व्यवहार
और नीरस होते त्योहार में
अक्सर सोचता हूं
कितना अभागा है
पिता होते हुए भी
एक बेटी का पिता न होना
यह ऐसी ज्ञात निर्धनता है
जो और गरीब करती जाती है
मुझे हर साल।


© डॉ.अजीत

पतझड़

आठ कतरन: वाया पतझड़
---------------------------
स्थगित करता हूँ
तुम्हें पाना
कुछ काम
अगले जन्म के लिए
छोड़ता आया हूँ
अभी काट लेता हूँ
पिछले जन्म के
प्रारब्ध
तुमसे दूरी के शक्ल में।
***
ब्रह्माण्ड था मैं
तुम आकाशगंगा
इसलिए
नही देख पाए
एक दुसरे को
बाकि तो सब
अनुमान है
सबके अपनें अपनें।
***
मेरा पता
ठीक तुम्हारे कान के पीछे लिखा था
जिसे पढ़ने के लिए
रोशनी नही
स्पर्शों का लिपिबोध जरूरी था
अफ़सोस
तुम्हारे हाथ में कलम थी
इसलिए तुम्हारे खत मुझ तक पहूँचे
तुम नही।
***
तुम्हारे कोहनी पर
मैंने एक शिकायत लिख छोड़ी है
ताकि देख न पाओं
मेरा बचपना
मेरे अंदर इतनी ही
होशियारी शेष थी।
***
तुम्हारी अनामिका से
गहरी दोस्ती थी मेरी
हाथ मिलाते वक्त
दोनों को खुशी मिलती थी
तुम्हारे बाद
नमस्ते करने लगा हूँ सबसे
हाथ जोड़कर
शिष्टाचार का
एक क्रूर पक्ष यह भी था।
***
तुम्हारे काजल के डिब्बी के नीचे
एक जवाब लिखा था मैंने
तुम उसे कभी नही
पढ़ सकोगी
क्योंकि बेकार की चीज़ो में
तुम्हारी दिलचस्पी नही रहती
जवाब बेकार नही था
बस डिब्बी बेहद मामूली थी
तुमने फेंक दी होगी कब की
निर्वासन के लिए
सही चुनी मैनें।
***
चलो ! खुश रहो
अपनी बनाई दुनिया में
ऐसी सलाह तो दी जा सकती है
अक्सर सभी देते है
मगर
कोई खुश है या नही
ये देखने कोई नही जाता
इसलिए मुझे दुःख का
भाईचारा पसन्द है।
***
कभी चाहा था
तुम्हें ओक में भरके देखना
फिर चाहा
आचमन के जल सा चखना
अब चाहता हूँ
कपूर की तरह कैद करना
चाहतों का एक ही मतलब है
तुम्हें लगातार खोना
आज से बंद करता हूँ
तुम्हें चाहना।

© डॉ. अजीत


Sunday, February 22, 2015

उम्र

हमारी उम्र में सीधें सीधे
आठ साल का चक्रव्यूह सा
अंतराल रहा होगा
कौन छोटा कौन बड़ा
यह कहना मुश्किल था
जिंदगी के मध्यांतर पर पहूंच
निर्णय लिया जा सकता था
इस बात का
मगर
तब तक धैर्य ने जवाब दे दिया
अहसासों की जगह वक्त ने ले ली
समय का बोध
बुद्धि की नियोजित चाल थी
संतुष्टि और असंतुष्टि का मिला जुला मन
उस वक्त की सबसे बड़ी चालाकी
कही जा सकती है
जिसे देख
हंसा जा सकता था भीड़ में
रोया जा सकता था एकांत में
रोने और हंसने के बीच
उम्र बीत रही थी आहिस्ता आहिस्ता
मगर वक्त ठहरा हुआ था
उस इन्तजार में
जब हमें जन्म लेना था
एक ही दिन
समान घड़ी और समान नक्षत्र में
इस ब्रह्मांडीय घटना का
घटित होना
चमत्कार से कम न था
किसी अभागे पुरुष की तरह
चमत्कार का इन्तजार करना
सबसे बोझिल काम था
इन्तजार दार्शनिक शून्य से भरा होता है
पुरुषार्थ पर प्रश्नचिन्ह के साथ
ये तभी ज्ञात हुआ
जब उम्र घट रही थी
और वक्त बढ़ रहा था
और हम तुम ठहरे हुए थे
अपनी अपनी
मान्यताओं के घने जंगल में
एकदम अकेले।

© डॉ. अजीत





Tuesday, February 17, 2015

लाचारी

सात लाचारियां...
----------------

गरीब आदमी
बनाते है सरकार
अमीर बनाते है
प्रधानमन्त्री।
***
वो बो देता है
भूख
और उगाता है अन्न
मरता है जिल्लत से
नही मांगता मगर
राहत पैकेज
वो किसान है
सफल उद्यमी नही।
***
डर जाता है
एक नोटिस से
जोड़ता है साहब के आगे हाथ
नही सीख पाया
व्यवस्था में
सेंधमारी
चोरी को समझता है पाप
देश का राजस्व
उसी के सहारे है।
***
देश का प्रधानमंत्री
एक चायवाला है
एक प्रदेश का मुख्यमन्त्री
पूर्व ईमानदार अफसर
अफसर साहित्यकार उद्यमी पूर्व नौकरशाह
कहीं कहीं राज्यपाल भी है
सबका हिस्सा तय है
व्यवस्था में
मजदूर ढोता है बोझ
किसान ढोता है कर्जा
दोनों हाशिए पर है
मेरा देश कृषि प्रधान है
इस पर ग्लानि है मुझे।
***
सुना है अब
खेती बाड़ी की आमदनी पर
लगेगा टैक्स
कुछ नौकरीपेशा कुछ उद्यमी लोगों को
इस बात पर था सख़्त ऐतराज़ कि
वो टैक्स भरें
और किसान मुक्त रहे
अब किसानों को भरना होगा
आईटीआर
गाँव में लगेंगे पेन कार्ड बनाने के शिविर
देश का विकास
अब किसानों की जेब से होगा
जिन्हें सिस्टम कुतर रहा है रोज़।
***
किसान का बेटा बनता है
डॉक्टर
इंजीनियर
अफसर
टीचर
नही बनना चाहता
किसान
वजह इक्कीस वीं सदी के
विकास मॉडल में तलाशिए
पूछिए नियति नियंताओं से
मुझसे क्या पूछते हो
मैं तो खुद बन गया हूँ
एक छद्म कवि।
***
देशभक्ति अनिवार्य थी
शिक्षा स्वास्थ्य परिवहन
और सामाजिक न्याय
बुनियादी जरूरतें थी
जब भी इन पर खड़ा करता सवाल
जवाब देने की बजाय
वो मुझे घोषित कर देते
राष्ट्रविरोधी
अपने ही देश में
राष्ट्रभक्ति और निष्ठा का एक ही प्रमाण था
चुप रहना।
***

© डॉ. अजीत

आरोप

उसका यह मुझ पर
बड़े शास्वत किस्म का
आरोप था
'तुम अस्थिर मन के हो'
इसलिए भी
तुमसे प्रेम किया जाना
असम्भव है
प्रेम की अनिवार्य शर्त थी
मन की स्थिरता
जहां शर्त हो क्या वहां प्रेम बचा रहेगा
मैं यह सोचता था
अपने अस्थिर मन से
स्थिर और अस्थिर से अधिक
महत्वपूर्ण हो जाता है
एक कदम का बढ़ाना
प्रेम में सोच विचार करना
बुद्धिमान होने के लक्षण है
परन्तु
प्रेम मांगता है
दीवानापन
इसलिए प्रेम में शर्तें
प्रेम का रास्ता बाधित करती है
अचानक सोचता हूँ
यदि इस किस्म की बाधाएं न होती
तो आज हर दूसरा व्यक्ति
प्रेमी न होता
प्रेम की दुलर्भता को
बचाती है ये कुछ शर्तें
अपने तरीके से
इसलिए उसके आरोप को
प्रेम की तरह
शास्वत लिखा मैनें।

© डॉ. अजीत

Monday, February 16, 2015

प्रेम पथ

एक व्यक्ति प्रेम लिखता है
एक व्यक्ति प्रेम करता है
एक व्यक्ति प्रेम में जीता है
तीनों व्यक्ति आपस में
कभी नही मिलते
प्रेम रूपांतरित करता है
तीनों को अलग अलग ढंग से
प्रेम करता व्यक्ति
नही लिखता प्रेम पर एक भी शब्द
उसे इतनी फुरसत कहां कि
ख्यालों को शब्दों का आकार दे
वो मंद मंद मुस्कुराता है
प्रेम कविताएँ पढ़कर
विस्मय से भरता है
लिखने वाले की नादानी पर
प्रेम में जीता व्यक्ति
प्रायः आध्यात्मिक लगता है
समझ नही आता है
उसकी भक्ति शक्ति और प्रेम का अंतर
इन तीनों में सबसे
निर्धन वो व्यक्ति है
जो लिखता है प्रेम
प्रेम कविताओं और कहानियों की शक्ल में
वो शापित है
प्रेम का उधार अपने कंधें पर ढ़ोने के लिए
जिन कविताओं के
बिम्ब प्रतीक और रूपकों को पढ़
हम लगाते है उसका रूमानी होनें का अनुमान
वो दरअसल होता है
शिल्प और सम्वेदना का गढ़ा हुआ
एक कोरा अनुमानित झूठ
वो अन्तस् से हो सकता है
बेहद कठोर और शुष्क
प्रेम करना
प्रेम में जीना
प्रेम लिखने से हमेशा बड़ा काम है
इसलिए साहसी लोग बन पाते है प्रेमी
और अपेक्षाकृत छलिया और कायर
बन जाते है प्रेम के लिखनें वाले
जिनके वाग विलास में
प्रेम खेलता जरूर है
मगर हार या जीत का सुख
हमेशा आता है उन्हीं के हिस्से
जो करते है प्रेम या
जो जीते है प्रेम
प्रेम कविताओं की रुमानियत
गल्प का ही एक विस्तार है
जिन्हें पढ़कर हम
चमत्कृत हो सकतें
जिनके पास है प्रेम की वास्तविक अनुभूतियाँ
वो कवि या लेखक नही है
वो पाठक हो सकते है
गुमनाम से
जो लिख रहे है प्रेम
वो दुनिया के सबसे अभागे शख्स है
जिनके हिस्से जब प्रेम नही आया
तब वो लिख कर बताने लगे
प्रेम की दिव्यता
कल्पना सच से ज्यादा खतरनाक और जीवन्त होती है
इसकी पुष्टी करता है मनोविज्ञान
तभी तो जानकार लोग
प्रेम कविताओं को पढ़ मुस्कुरा देते है
प्रेम कर रहे लोग
प्रेम में जीते लोग
नही पढ़ पाते प्रेम के आख्यान
उन्हें जरूरत भी नही इनकी
प्रेम को लिखने वाले
और प्रेम को पढ़ने वाले
सम्भवतः दुनिया के सबसे रिक्त लोग है
जो भरते है रोज़ खुद को
प्रेम के सहारे
प्रेम रहस्यमयी होने के साथ साथ
होता है उदार
जो सबको देता ही है
कुछ न कुछ
चाहे वो
प्रेम लिखने वाले हो
प्रेम करने वाले हो या
प्रेम को जीने वाले हो
प्रेम को समझना आसान है
प्रेम को जीना थोड़ा मुश्किल
प्रेम को लिखना चालाकी से भरा
ताकि पढ़ने वाला यह
भेद न कर सकें कि
आप प्रेमी है या
प्रेम को लिखने वाले
एक खाली मजदूर।

© डॉ. अजीत

Friday, February 13, 2015

आशीर्वाद

बत्तीस-तैंतीस साल की उम्र में
जब एक ठीक ठाक सामाजिक परिचय होना चाहिए
पर्स में रखा विजिटिंग कार्ड का वजन
आपके वजन को कुछ पौंड बढ़ाता हुआ हो
घर के बाहर टंगी हो
नाम और पद की एक कलात्मक तख्ती
जिसके सहारे
परिजनों के सामूहिक गौरव का
विषय भी होना हो आपको
ठीक उस वक्त यदि आप
प्रेम की खोज में निकल आते है
लगभग दस साल आगे
तो आपको
बुद्ध समझे जाने की शून्य सम्भावना है
इस यात्रा को हद दर्जे की
आसामान्य जिद करार दिया जा सकता है
उम्र के लिहाज़ से प्रत्येक दशक की होती है
अपनी सीमाएं अपने अभिमान
खुद से लगभग दस साल बड़ी प्रेमिका के साथ
प्रेम करना
विचित्र नही गरिमापूर्ण है
दर्शन कहता है ऐसा
इसके जोखिम और मांग एकदम अलग किस्म की होती है
दरअसल उम्र एक मनोवैज्ञानिक भरम है
जो तय करता है हमारे दायरें
दायरों से बाहर का प्रेम
मांगता है किस्म किस्म के प्रतिदान
मसलन आपकी प्रेमिका आपसे मांग सकती है
प्रेम पर एक शोधपरक वैधानिक स्पष्टीकरण
या फिर पूछ सकती है अपने हमउम्र लोगों में दिलचस्पी न होने की वजह
सवाल आपके पुरुषार्थ से लेकर जीन्स की आनुवांशिकी तक पर भी उठ सकता है
सलाह यह मिल सकती है कि
तुम्हें मिलना चाहिए किसी मनोवैज्ञानिक से
यथाशीघ्र
यदि इन सबके बावजूद
बचा लेते हो अपना प्रेम
नही खोते सबंधो की न्यूनतम गरिमा
आहत हृदय को समझाना नही पड़ता हो
दूर क्षितिज़ की तरह देख सको मन का डूबना और निकलना
साँसों के स्पंदन में  पिरो सको उसका नाम
बिना नजर के चश्में की मदद से
तब कहा जा सकता है
तुम प्रेम में हो गए हो सिद्ध
यह बात देर सबेर उसको भी समझ आनी ही है
इसलिए इन्तजार करों
होकर समाधिस्थ
ये वेलेंटाइन डे तो आता है हर साल
इस पर दे सकते हो
आशीर्वाद दो नव युगलों को
प्रेम के अभिनव विस्तार का
जिसकी सिद्ध पात्रता रखते हो तुम।

© डॉ. अजीत

Thursday, February 12, 2015

पाठशाला

अनुराग आसक्ति या
प्रेम में
सतत गुणवत्ता को बनाए रखने के
समस्त औपचारिक दबाव मुझ पर थे
तुम चुन सकती थी
अपनी सुविधा से
मैत्री और प्रेम की कर्क रेखा
वक्त के नाजुक टुकड़े से
खेलती तुम
आसानी से आ जा सकती थी
इस पार या उस पार
सब कुछ इतना अनिश्चित था
तय नही कर पा रहा था
तुमसें प्रेम करूँ
या तुम्हारा विश्लेषण
अस्त व्यस्त जिंदगी के हाशिए पर
तुम्हारे हस्ताक्षर पढ़ता
और उसे अंतिम वसीयत समझ लेता
फिर अचानक तुम
ऐसी मद्धम चोट करती
कौतुहल की शक्ल में
मुझे खुद पर सन्देह होने लगता
एक बेहद गैरसांसारिक रिश्तें में
बहुत कुछ मायावी भी था
हमारी बातों में दर्शन के सूक्त
मनोविज्ञान की सच्चाई
और देह का भूगोल शामिल था
परन्तु किसी उपग्रह की तरह
मेरी परिधि में तुम्हारे
चक्कर काटने की कक्षा निर्धारित नही थी
तुम आ जाती कभी बेहद नजदीक
तो चली जाती कभी बेहद दूर
हमारे मन संकेत की लिपि को
पढ़ने में थे बेहद असमर्थ
हर बार बहुत कुछ कहे गए के बीच बचता रहा
बहुत कुछ अनकहा
दरअसल
हमारे बीच जो भी अमूर्त था
उसको समझनें के लिए
समय से ज्यादा खुद की जरूरत थी
मैं खुद के शत प्रतिशत होने के प्रमाण दे सकता था
तुम्हारे विषय में कुछ कहना मुश्किल था मेरे लिए
क्योंकि
तुम्हारे पास एक ऐसा अधूरा पैमाना था
जो रोज मेरा कद घटा-बढ़ा देता था
इसलिए मेरी नाप की हर चीज
छोटी बड़ी होती रही
प्रेम भी उनमें से एक चीज़ थी
यह तय है एक दिन तुम शायद
समझ जाओगी सब ठीक ठीक
नही होंगे पूर्वाग्रह के बादल
संशय की बारिश और
अपराधबोध के पतनालें
मगर तब तक
बचा रहूंगा मै इसी शक्ल में
यह बिलकुल तय नही है
प्रेम आसक्ति या अनुराग का यह
सबसे त्रासद पक्ष है
जो जान पाया
तुम्हारी मैत्री की पाठशाला में।
© डॉ. अजीत





Sunday, February 8, 2015

टूटे स्वर: वक्त के वाद्य यंत्र के

तुम्हारा मिलना
अस्तित्व का नियोजन था
तुम्हारा बिछड़ना
मानवीय त्रुटि
अधूरापन ईश्वर की युक्ति है
जिसके सहारे रचा जाता है
प्रार्थना का सतही खेल।
***
प्रेम में आहत मन का
पुनर्वास
मन के वैज्ञानिक नही कर सकते
कोई सांत्वना असर नही रखती
प्रेम की चोट पर
प्रेम ही लगा सकता है मरहम
मगर जख़्म बचा रहता है
किन्तु परन्तु शक्ल में
हंसते हुए चेहरों का
एक सच यह भी है।
***
तुम्हारे लिए उपलब्ध
विकल्पों में
शायद एक सबसे बेहतर विकल्प था मैं
मगर मेरे लिए तुम
विकल्प नही संकल्प थी
विकल्प और संकल्प के
मध्यांतर पर
तुम लौट आई स्वेच्छा से
अब मेरे पास
ना कोई विकल्प था ना संकल्प
यह एक बड़ी अज्ञात निर्धनता थी मेरी।
***
बहरहाल
तुमनें रच ली अपनी
समानांतर दुनिया
हवा,धरती,आकाश, चाँद,सूरज और सितारें
इस दुनिया का
एक संक्षिप्त हिस्सा था मै
जो मिटता गया
कच्ची पेंसिल की लिखावट सा
सबसे जोखिम भरा था
ऐसे चित्रकार से प्रेम करना
जिसका अनुराग अस्थाई था।
***
जिस वक्त
तलाश रहा था मैं
प्रेम
उस वक्त तुम
प्रेम की उपकल्पना का परीक्षण कर
सिद्ध कर चुकी थी
अपना प्रयोग
मेरी तलाश में तुम्हारा होना
एक संयोग था
और तुम्हारे प्रयोग में मेरा होना
एक चयन
सबकुछ विज्ञानसम्मत था
प्रेम को छोड़कर।
***
तमाम त्रासद
असहमतियों के बावजूद
प्रेम दशमलव में बचता रहा
इस बात पर गर्व किया जा सकता है
हमारे प्रेम में सब कुछ लौकिक था
बस प्रत्यारोप नही थे
इसी वजह से
आज शर्मिंदा नही है हम।
***
सम्भव है आज से
ठीक दस साल बाद
तुम्हें मेरी बातें
असामान्य न लगें
समय रचता है
कालबोध के साथ भ्रम भी
जो टूटता है
एक अप्रासंगिक
संधिकाल पर
बिना आवाज़ के साथ।

© डॉ. अजीत 

Saturday, February 7, 2015

उन दिनों

उन दिनों : जब बहुत समझदार थी तुम
--------------------------------------

उन दिनों जब
तुमसे बातचीत बंद थी
तुम्हें भूलने ही वाला था जब
अचानक
तुम्हारा एक पुराना खत
सामने आया
जिस पर लिखा था
अब एक आदत हो तुम
और आदतें यूं ही नही जाती
पता नही वो झूठ था या सच
मगर मुझे यकीन था
यकीन के रूप में बच गई तुम मेरे अंदर
जो न घटता है न बढ़ता है
और न खत्म ही होता है।
***
उन दिनों तुम
थोड़ी जटिल थी
और मै सरल
इन दिनों मै
बेहद जटिल हूँ
और तुम सरल
साथ बदल देता है
मगर इतना
ये सोचा न था।
***
उन दिनों
तुम अचानक उखड़ जाती
बेहद तल्ख हो जाती
मेरे अंदर जो धैर्य
रहता है
उन दिनों की वजह से है
तुमनें सिखाया
अंतिम सांस तक इन्तजार करना
जो आज सबसे बड़ी ताकत है मेरी।
***
उन दिनों
अकेले तेजी से आगे बढ़ा जा सकता था
मगर तुम्हारा हाथ थामे चलना अच्छा अनुभव था
और अनुभव से बढ़कर
एक आश्वस्ति थी
किसी भी परिस्थिति में
अकेला नही हूँ मै
जीवन को विलम्बित कर
तुम्हारे साथ का चयन
एकमात्र सही निर्णय था
पिछले बीस सालों का।
***
उन दिनों
हम वास्तव में क्या चाहतें है
नही जानते थे
हमारी चाहतें वास्तविक नही
थोड़ी काल्पनिक थोड़ी चैतन्य थी
जिनसे गुजर कर
बनना था हमें एकांतसिद्ध
अपनी अपनी शर्तों पर।
***
उन दिनों
स्पर्श गढ़ रहे थे
अपने गहरे आकार
देह की ऊष्मा
सोख लेती थी अपनत्व की नमी
सबसे गहरे परिचय
शुष्क मरुस्थलों में हुए
जहां नदी और समन्दर का फर्क समाप्त हुआ
बिना किसी मरीचिका के।
***
उन दिनों
तुम उलझ गई थी
सही-गलत पाप-पुण्य के मुकदमों में
तुम्हारा बड़प्पन
उकड़ू बैठ आँखों में देखने की
इजाजत नही देता था
पहली बार
खुद के कद का अफ़सोस था मुझे
जो नही समा पा रहा था तुम्हारी हदों में।

© डॉ. अजीत

Wednesday, February 4, 2015

समिधा

सात समिधा यज्ञ की...
-----------------------

तुम्हारी हथेली के
मानचित्र पर नही मिलता
एक कप चाय का पता
मिलता है बस
सही गलत के द्वन्द का
इतिहास
उपदेश की शक्ल में।
***
तुम्हारी आँखों में
रतजगों के किस्से थे
जैसे ही पढ़ना शुरू करता
मूंद लेती तुम आँखें
जितना जानता हूँ तुम्हें
वो लिखा था पलकों पर
आंसूओं की महीन लिखावट से।
***
तुम्हारी कलाई पर बंधा था
शुभता का धागा
उसी के पास बंधी थी घड़ी
दुआ और वक्त
लड़ते रहते थे आपस
जब भी मुझसे
हाथ मिलाती थी तुम।
***
तुम्हारी सांसो की खुशबू
व्याप्त थी मेरे अस्तित्व में
तुमसे मिलने के बाद
मेरे देह की गंध
छोड़ गई मुझे अकेला
तुम्हारे भरोसे
जबकि तुमनें कभी नही ली
मेरी सुध
महकता रहता हूँ रोज
तुम्हें याद करके।
***
तुम्हारी देह के ताप में
भाप बन उड़ जाते थे
हमारें संयुक्त स्वप्न
बादलों में देखे जा सकते थे
उनके प्रतिबिम्ब
वो बरसते बेमौसम
मन की छत पर
फिर बह जाते
आँखों के पतनालें से
आंसूओं की यात्रा
इतनी ही लम्बी थी।
***
कुछ महीन बातें तुमने
सबसे बाद में कही
उनके अर्थ सबसे पहले
समझ गया था
तुम्हारे प्रतिप्रश्न
मेरे भय और सन्देह
की पुष्टि भर थे
जिनके अंतराल में अकेला टंगा था
हमारा प्रेम।
***
तुम्हारे मन में
मेरी स्मृतियों का एक हिस्सा
ग्लानि की शक्ल में था
इसलिए
अपनत्व होता जाता था
निर्धन
मेरे पास तुम्हारी स्मृतियों की
स्थाई पूंजी थी
इसलिए चरम अवसाद में भी
अमीर था मैं।

© डॉ. अजीत

Tuesday, February 3, 2015

अक्स

छोड़ो !
ये अक्स की पैमाईश
गिनों साँसों की बंदिशे
जो आते-जाते
तेरे दर पे पनाह पाती है
तुझे देख बेवजह मुस्कुराती है
जिंदगी लम्हों में ठहर जाती है
इबादत का सच
सजदों से जुदा था
पलकों पर दिखता खुदा था
सिमटती जाती हो क्यों
अपनें बेवजह के ख्यालों में
आँखें मूंद कर देखो एक बार
अंधेरों के उजालों में
मेरे मन की गिरह तेरे मन से बंधी है
ये अलग बात
वो जज्बात की तह में दबी है
कभी ऐसा भी हो
तुम बिना कहें वो सब समझ जाओं
आँखों में अपने
मेरे यकीं का काजल लगाओं
सांसो की लय पर छेड़ो
रूह का तराना
बिखरे तबस्सुम को
एक शाम फिर से सजाना
जिस्मों के पते पर भेजो
वो सब खत पुराने
कुछ करवटों के हिसाब
कुछ बेरुखी के अफसानें
मुन्तजिर रहूंगा
उस दिन तक
जब तुम्हें
यकीं आएगा
किसी की जिंदगी में बेवजह होने का
हर बात की कोई वाजिब वजह हो
यह जरूरी नही
कुछ आवारा ख्याल होते है
बेवजह
जिनकी यादों में कटती है
उम्र तमाम
फिलहाल
तुम इतनी ही जरूरी हो
मेरे वजूद में
जितना गैर जरूरी हूँ
तुम्हारी जिंदगी में मै।
© डॉ. अजीत

Friday, January 30, 2015

अनुमान

सात कोरे अनुमान ...
--------------
मुझे जब मिली तुम
अपने हिस्से का प्रेम कर चुकी थी
मेरे हिस्से आई
प्रेम की गुठली
जिसे बो दिया मैंने
खुद के अंदर
अब वो वटवृक्ष है
कभी थक जाओं तो
सुस्ताने आ जाना
निसंकोच
उसी के नीचे मिलूँगा
समाधिस्थ
तुम्हारी प्रतिक्षा में।
***
प्रेम कब देखता है
उम्र,कद,पद और हद
ये होता है बेहद और बेतरतीब
प्रेम का होना एक घटना है
और प्रेम में होना एक उपलब्धि
जिसका पता चलता है
प्रेम को खोकर।
***
तुम्हारे अंदर
एक सूखती झील थी
अनुपयोगी समझ
जिसके किनारे टूट रहे थे
खुद ब खुद
मैंने देखा उसके तल में
बैठा प्रेम
उसका जलस्तर बढ़ाने के लिए
उधार मांग लिए आंसू
प्रेम बेहद तरल था
समझा जाता था जिसे गरल।
***
समानांतर जीवन जीने के
जोखिम बड़े थे
छाया धूप पर आश्रित थी
मेरे हिस्से की धूप
निगल गई थी
तुम्हारे हिस्से का सुख
यह अपराधबोध
प्रेम को चाट रहा था
घुन की तरह।
***
नदी की तरह
तुम्हारे तट
अस्त व्यस्त थे
सागर की तरह मेरी परिधि
अज्ञात थी
ज्वार भाटों की मदद से
देखता था तुम्हारा आना
तुम सूख गई
चार कोस पहले
इसलिए आजतक खारा हूँ मैं।
***
प्रेम रचता है
अधूरेपन के षडयंत्र
ईश्वर की मदद लेकर
दो अधूरी समीकरणों को
सिद्ध करने के लिए
मनुष्य बनाता है प्रमेय
सही उत्तर भी
किसी भी हद तक
हो सकता है गलत प्रेम में
विज्ञान गल्प है प्रेम के समक्ष।
***
खो देगी सम्वेदना
जब त्वचा
स्पर्श हो जाएंगे
जब अनाथ
मेरी पलकों पर
सुरक्षित रहेंगे
तुम्हारी पलकों के निशान
पवित्र आलिंगन की शक्ल में
सम्बन्धों के महाप्रलय के बाद
इतना बचाने में
सफल रहूंगा मैं
एक पराजित योद्धा का यह अंतिम
घोषणा पत्र है।

© डॉ. अजीत 

Thursday, January 29, 2015

वनवास

सात वनवास...
----------------
कॉफी का एक मग
चाय की एक कुल्हड़
बीयर की एक कैन
शराब का एक पैग
आंसूओं की जगह पीने के
कितने विकल्प थे
इसलिए नही देख पाई तुम कभी
मेरे आंसू
इसका अर्थ यह नही था कि
बहुत खुश था मैं।
***
दुःखो के चयन में
सुख एक शाश्वस्त छल था
जो बचाये रखता था
दुःख के बीच
अपनी प्रासंगिकता
अपनी अकाल मृत्यु के साथ।
***
हाथों की सरंचना में
अनुपस्थित थी
पुरुषोचित्त कठोरता
इसलिए स्पर्श सुखद थे
परन्तु आश्वस्तिविहीन
तुम्हारा हाथ छूटने की
बड़ी वजह एक यह भी थी।
***
आत्मीयता और आसक्ति के बोझ
जब एकतरफा हुए
बोध रोया दहाड़ मारकर
जानते हुए सब
खुद को ठगना
दिल के साथ
सबसे बड़ी ज्ञात ज्यादती थी।
***
जूतों पर धूल
आँखों में सपनें
जेब में महामृत्युंजय मन्त्र
ये तीन जीवित दस्तावेज़ मिले
उसकी मृत्यु पर
वो इस तरह
जीना चाहता था
उसकी स्मृतियों में।
***
उसे विजेता साहसी योद्धा
पसन्द थे
पलायन बर्दाश्त नही कर सकती थी वो
उसकी हार पर
वो समझ नही पायी
वो सही थी कि गलत
उसकी हार को
जीत से अलग कर पाना मुश्किल था
उसके लिए।
***
यात्री की धुरी
दलदली जमीन का हिस्सा थी
वहां से निकलना
फंसने की अनिवार्यता लिए था
इसलिए वो लौट आता
खुद से खुद तक
यात्रा पूर्ण होती
अपने अधूरेपन के साथ।

© डॉ. अजीत 

Saturday, January 24, 2015

वो सात दिन

हफ्ता: सात दिन,सात युग
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इतवार
तुम्हारी यादों की
छुट्टी का नही
खुद को समेटने का दिन
हफ्ते भर
उघड़ता रहता हूँ
इस दिन इकट्ठा करता हूँ
खुद को
और बंद कर देता हूँ
अनुभव की किताब में
जिसे कभी नही पढ़ा जाता।
***
हफ्ते का पहला दिन
सोमवार
नही होता पहला मेरे लिए
इतवार के बोझ और
तुम्हारी बेरुखी से झुकी मेरी पीठ
आधी ही आँखें खोलने की इजाज़त देती है
धुंधलके में नही देख पाता तुम्हें ठीक से
इसलिए नही मानता
पहला दिन होता है
सोमवार।
***
मंगल जितना सात्विक ध्वनि देता है ना
उतना सात्विक कभी नही रहा मेरे लिए
समय के षडयन्त्रों
मेरी कमजोरियों और
तुम्हारी बुद्धिमत्ता के बीच
रेंगती है मेरी परछाई
शाम को याद में किसी संकटमोचक के
जाता हूँ मन्दिर
संकट और मै एक दिन पैदा हुए
जिसमें संकट मेरा बड़ा भाई है।
***
बुध के वार
प्राय: खाली ही जाते रहे मुझ पर
जब मेरी पीठ तुम्हारी उपेक्षा से होती घायल
मै बुध की तरफ अपना माथा कर देता
बुध तुम्हारा लिहाज़ करके
छोड़ देता मुझे
क्योंकि
वहां उसे दिख जाते
तुम्हारी अनामिका के निशान
रेखाओं की शक्ल में।
***
गुरुवार
मुझे सिखाता
तुम्हारी चालाकियों से बचनें के रास्ते
तुम्हारे कथन और करन के अंतर
फिर दक्षिणा में मांग लेता
मेरा दिल
मना करने पर मिलता श्राप
दिल के हाथों ठगे जाने का।
***
शुक्रवार
हरारतों, शरारतों का दिन होता प्रायः
भूल जाता इस दिन
नैतिक प्रश्न
ढीली कर देता वर्जनाओं की लगाम
भौतिक कैवल्य बन जाता लक्ष्य
शाम होते ही डूब जाता
गहरे अवसाद में
अच्छाई के अपने बोझ होते है
जान पाता इसी दिन।
***
शनि की छाया
और तुम्हारे प्रेम की साढ़ेसाती
मुझ पर चल रही है
कई जन्मों से
इसका उपचार ज्योतिष में नही
तुम्हारे मन की किताब में है
जो न तुम खुद पढ़ती हो
न मुझे पढ़नें देती हो।
***
उफ़्फ़....! आज फिर इतवार है !

© डॉ. अजीत

Friday, January 23, 2015

उम्मीद

उम्मीद
तुम्हें मेरे अंदर
जिन्दा रखती है
स्वप्न की शक्ल में
एक ऐसा स्वप्न
जिसे देखता रहता हूँ
खुली आंख भी
उम्मीद का झूठ
बंद आँख का स्वप्न है।
***
तुम्हारे जीवन में
जीरो वॉट के बल्ब जैसा था
मेरा होना
उपयोगी की हद तक
अनुपयोगी।
***
तुम जीवन में
पर्यायवाची की तरह मिलें
मेरी संज्ञाए
विशेषण न पा सकी
शायद
समय के व्याकरण में
कोई मानक त्रुटि थी।
***
तुम्हारे सत्संग में
जान पाया
जीवन का शाश्वस्त सच
हर अस्थाई और खोने वाली चीज़
सबसे प्रिय होती है
जैसे तुम्हारा प्रेम।
***
तुम्हारे लिए प्रेम का विस्तार
एक अनुभव था
मेरे लिए जीवन
दो समानांतर यात्राएं
समाप्त होनी थी
एकांत के टापू पर।
***
तुम्हारी आँखों में
पढ़ लिया था मैंने
समय का कौतुहल
तुम्हारा सिमटना
उसी का षडयन्त्र था
थोड़ा ज्ञात थोड़ा अज्ञात।
***
जीवन की अन्य
प्राथमिकताओं के समक्ष
सबसे छोटा था प्रेम
इसलिए तुम्हें
नजर तब आया
जब उपलब्धि के शिखर पर
नितांत अकेली थी तुम।
***
तलाशता हूँ तुम्हें
अधूरे शब्दों में
छोटी छोटी शिकायतों में
तुम्हारा पता नही मिलता
मिलता है
कतरों में अपनें हिस्से का सच
तुम्हारा सच लापता है
और मेरा झूठ गुमशुदा।
***
© डॉ. अजीत

Thursday, January 22, 2015

नाराज़गी

तुम्हारा नाराज़ होना: जैसे वक्त का खुदा होना
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मुझ पर नाराज़ होने का
हक सिर्फ तुम्हारा था
गुस्से में तुम ऐसे बरसती
जैसे सावन में बदरी
भीग जाता था
गहरे अपनेपन से
तुम्हारी आखिरी
प्यार भरी बात भले याद न हो
तुम्हारा गुस्सा
रहता है हमेशा याद।
***
लम्बे अरसे से
तुम नाराज़ नही हुई मुझ पर
सन्देह होने लगा है
खुद की समझदारी पर।
***
पहली बार जब तुम
नाराज़ हुई
मुझे बुरा लगा
और जब आख़िरी बार नाराज़ हुई
तब अच्छा लगा
एक यात्रा की पूर्णता थी
तुम्हारी नाराज़गी
प्रायः प्यार से बढ़कर।
***
कभी कभी तुम इतनी
तल्ख हो जाती थी
बातचीत में कि
सन्देह होने लगता था
तुम्हारे स्त्री मन पर
दरअसल तुम्हारी वो तल्खी
मुझे भीड़ में खोने से बचाने की थी
यह समझ पाया तुम्हें खोकर।
***
नाराज़गी में कर देती तुम
बातचीत बंद
नही उठाती फोन
नही देती जवाब किसी एसएमएस का
फिर भी हो जाती थी
हमारी बातें आपस में
नाराज़गी में
मेरे सबसे करीब रहती थी तुम
ख्याल रखना किसे कहते है
समझ पाया
तुम्हारी नाराज़गी में।
***
तुम्हारी नाराज़गी ने
कभी इतना नही डराया कि
तुमसे प्रेम करने में असुविधा हो
तुम्हारी नाराज़गी
मनुहार नही
थोड़ा समय चाहती थी बस
संयोग से जो भरपूर था
मेरे पास।
***
जब भी तुमसे
नाराज़ होने की सोचता
तुम खुद नाराज़ हो जाती
मन को पढ़ना जानती थी तुम
इसलिए बचा ली
मेरी नाराज़गी
और खर्च कर दी अपनी नाराज़गी।
***
अक्सर तुम्हारी नाराज़गी
इस बात पर होती कि
केवल खुद के लिए जीता हूँ मैं
और
जब तुम्हारे लिए जीना चाहा
तुम नाराज़ हो गई इस पर भी
जीना मेरे जीवन का
सबसे बड़ा अभिशाप था।
***
तुम्हारी नाराज़गी
हमारे अलग होने का
पूर्वाभ्यास थी
यह बात दिमाग समझता था
मगर नाराज़गी
दिल के हिस्से आई
दिमाग हंसता रहा बस।
***
कितनी लम्बी हो गई
इस बार तुम्हारी नाराज़गी
खत्म होनें का नाम नही लेती
मान जाना
कम से कम उससे पहले कि
मै खुद से नाराज़ हो जाऊं
जो तुम कभी नही चाहती।

© डॉ. अजीत

हासिल

इक वक्त बहुत मुश्किल था मैं
फिर भी तुझको हासिल था मैं

रफ्ता रफ्ता बदतमीज़ हुआ हूँ
कभी अदब का कामिल था मैं

तुम मिलें भी उस नाजुक वक्त
जब घटता हुआ हासिल था मैं

खो दिया तुम्हें अक्सर पाकर भी
थोड़ा बेबस थोड़ा गाफिल था मैं

झील सी खूबसूरत नाजुक तुम
सूखते तालाब का साहिल था मैं

© डॉ. अजीत

Wednesday, January 21, 2015

ख़्वाब

पा कर खोना है
यही एक रोना है

दिमाग के भीतर
दिल का कोना है

कल कुछ नही है
आज सब होना है

ख्वाब दिखा नही
वही बस सलोना है

जाग लो कितना
एकदिन सोना है

©डॉ. अजीत

Tuesday, January 20, 2015

मिलना

जब दिल में है सच्चाई
क्यों हम हिजाबों में मिलें

न जाने कौन सी जंग थी
दोस्त भी नकाबों में मिलें

कुछ सवाल ऐसे भी थे
जवाब न किताबों में मिलें

सफर पर बदन रहता है
तुम अक्सर ख़्वाबों में मिलें

सवाल पूछकर शर्मिंदा हूँ
लहज़े ऐसे जवाबों में मिलें

थक गया जब तलाश कर
पते पुरानी शराबों में मिलें

© डॉ. अजीत

Friday, January 16, 2015

कतरन

टेली ऑपरेटर की तरह
उस दिन तुमने कहा
आपका दिन शुभ हो
इस तरह से
शुभ होना
पहली बार लगा
बेहद अशुभ।
***
उन दिनों तुम
कहावतों में बातें करती थी
एकदिन तुमने कहा
जब जागो तभी सवेरा
तुम्हारी याद में रात भर जाग कर भी
सवेरा नही होता
सिर्फ दिन निकलता है
कितना झूठ बोलती थी तुम।
***
चाहे कुछ भी भूल जाओं
नही भूलती थी कहना
टेक केयर
तुम्हारी अनुपस्थिति में
इन दो निसक्त शब्दों ने
कोई मदद नही की मेरी
जान लो तुम।
***
तमाम शब्द सामर्थ्य के बावजूद
आज भी नही जानता
तुम्हारे एक सवाल का
सही जवाब
जो अक्सर पूछती हो तुम
कैसे हो तुम...!
***
तुम्हें भरोसा था
वक्त हर जख्म भर देगा
वक्त के बढ़ने के साथ
जख्म होते गए और गहरे
जख्मों से ज्यादा
तुम्हारा भरोसा टूटने का दुःख है।

© डॉ. अजीत

Wednesday, January 14, 2015

काम

काम कितना भी जरूरी हो भले न बिना मेरे होता हो
फोन उठा ही नही सकता जब बच्चा गोद में सोता हो

एक दिन बेवजह हंसने का मतलब समझ जाओगे
चुप करा देना किसी रोते हुए को न जो चुप होता हो

ये बाजार के कायदे तरक्क़ी के हुनर क्या बताओगे
रोज सब कुछ पाकर भी जो सबकुछ यूं ही खोता हो

महलों की रौनक क्या रोक पाएगी देहाती परिन्दें को
थकान के बिस्तर पर ख़्वाबों को बिछाकर जो सोता हो

लबों पर मुस्कान दिल पर छाले मिलेंगे उसके देखना
खुलकर जो हंसता हो अक्सर मगर तन्हाई में रोता हो

© डॉ. अजीत

Tuesday, January 13, 2015

निस्तेज

थके कदमों से
लौट आता हूँ
उस बिस्तर की ओर
जो रोज़ सुबह
गर्द के रूप में
झाड़ देता है
संचित पुरुषार्थ
निस्तेज होने से पूर्व की करवट
निराशा को ओढ़ने से
करती है इनकार
एकमात्र इसी कारण से
बिस्तर सहता है
अपवाद का बोझ।

© डॉ.अजीत 

Monday, January 12, 2015

मतिभ्रम

जब खुद की लिखी बातों से
चरम असंतुष्ट होता हूँ
उन्हें खारिज़ कर रहा होता हूँ
वहीं बातें
लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ती जाती है
मेरे पास एक कोरा विस्मय होता है
उस समय
इसके ठीक उलट
खुद के लिखे जिन शब्दों पर
खुद ही होता है रश्क
आत्ममुग्धता में
थपथपाना चाहता हूँ खुद की पीठ
वो शापित हो जाती है
उपेक्षा का निर्वासन झेलने के लिए
तमाम बुद्धजनों की साध संगत के बावजूद
नही सीख पाया
लोक की लोकप्रिय और खुद की प्रिय
रचनाओं के मध्य संतुलन साधना
शायद
मै समय से थोड़ा आगे-पीछे चल रहा हूँ
मतिभ्रम का शिकार भी हो सकता हूँ
इसलिए अपने दोस्तों पाठकों
की आँखों में आँखें डालकर
पूरे आत्मविश्वास से कहता हूँ
मेरा एक लोकप्रिय कवि/लेखक बनना
सदैव संदिग्ध है
ऐसा कहना आपके
प्रेम और अपनत्व का अपमान नही
बस खुद की सीमा की
एक ईमानदारी
आत्मस्वीकारोक्ति भर है
जो देर सबेर सबको
समझ आनी ही है।

© डॉ. अजीत

मन के विज्ञापन

कुछ मन के विज्ञापन...
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तुम्हारा साथ
अब जीवन बीमा की तरह चाहिए था
जिंदगी के साथ भी
और जिंदगी के बाद भी।
***
चाहता हूँ
हमारे भविष्य को लेकर
थोड़ा बहुत डरती रहो तुम
क्योंकि
डर के आगे जीत है।
***
तुम्हारा अचानक आना
उदासी के पलों में भी
मुस्कुराना
बच्चों की तरह समझाना
खुशियों की होम डिलीवरी
इसी को कहते है शायद।
***
तमाम नाराज़गियों
गुस्ताखियों और
बिछड़ने के सच के बावजूद
गार्नियर की तरह
नही भूलती कहना
ख्याल रखना अपना।
***
हद दर्जे की
सांसारिक व्यस्तताओं के बीच
न जाने कब
समझ पाओगी
दिल के नेटवर्क की ये बात
दूरियों का मतलब फांसलें नही।
***
© डॉ. अजीत