त्रासदीपूर्ण जीवनशैली
अवसादो से भरी नियति
सुख के छींटे शायद ही पडे हो
कभी- कभी
और
दुख एक स्थाई भाव
इतने निराशावादी
प्रतिमानो के साथ
जीवन मे
आत्मविश्वासपूर्वक ‘सामान्य’
एवम लौकिक सम्भावनाए तलाशने
के तुम्हारे प्रयास पर
कोई भी सम्वेदनशील व्यक्ति
हतप्रभ हो सकता है
ठीक उसी तरह
जैसे मैने अपना बचाव किया था
दार्शनिकता एवम बौधिकता से पूर्ण
अभिव्यक्ति मे
तार्किकता तलाश कर
इस प्रकार के प्रयास
मेरे जैसे व्यक्ति के लिए
सदैव बौधिक हथकंडे रहे है
प्रभाव उत्पादन के लिए
लेकिन
यथार्थ की सीमाओ
से शंकित मन से स्वत:
तंत्र विकसित किया
स्वीकृति के साथ
अस्वीकृति के बोध का
प्रतिमान/दृष्टिकोण/अनुभव
और सम्भावनाओ के विकल्प
के रुप मे इतनी पारस्परिक भिन्नता
होने के बाद भी
तुम्हारा प्रखर आशावाद
मेरे लिए प्राय:बौधिक बैचेनी का
विषय रहा है
ऐसी बैचेनी जिसको कभी
अभिव्यक्ति नही मिली
घुटन/अवसाद/कुंठा का
संताप भोगते हुए
कभी-कभी लगा
कि
तुम्हारी समझ मे समग्रता का अभाव है
या व्यक्तिविश्लेषण का
अचानाक ख्याल आता है
संक्षिप्त विरोधाभास
आंशिक अपेक्षाबोध
और व्यापक सम्वेदना के धरातल पर
कुछ नये सम्बन्धो का
’अर्थ’ तलाशते
तुम्हारे परिपक्व प्रयास
कही प्रतिभासी
विरोधाभास से उपजी
महज एक बौधिक फसल
तो नही
जीवन के समानांतर यथार्थ/नियति
और असामान्यबोध
के बीच
तुम्हारी उपस्थिति उपलब्धि है
अथवा
एक बौधिक त्रासदी
जिसको भोगना
कभी सुखद लगता है
तो कभी
बडा असहनीय....।
डा.अजीत
बातें बहुत कहना चाहता हूं, कहता भी हूं, पर हमेशा अधूरी रह जाती हैं, सोचता हूं, कहूंगा...शेष फिर...
Tuesday, January 5, 2010
Monday, January 4, 2010
चिंतन
अक्सर
मित्र/परिचित
शुभचिंतक एवम हितचिंतक
एक तार्किक सवाल करते है
और क्या चल रहा है आजकल?
इस चलने का अभिप्राय
कुछ करने से होता है
पता नही उनका सवाल
गतिशीलता के मानक तय करता है
अथवा
जडता की गहराई की
सम्भावना तलाशता है
हो सकता उनकी जिज्ञासा
नियोजन से सम्बन्धित हो
लेकिन कुछ करना
और कुछ भी न करना
दोनो दर्शनो की
तात्विक समीक्षा का अधिकार
सदैव
इनके पास सुरक्षित रहता है
और
मेरी प्रतिक्रिया इनके बौधिक आग्रह,अपेक्षाओ
से विरोधाभासी रही है
मेरे चिंतन की दिशा
कुछ करने
और कुछ भी न करने के मध्य से
रेंगती हुई
क्या करु?
क्या किया जा सकता है
आदि की दिशा मे
बढती जाती है
प्राय:ऐसे सवाल
मानसिक खीझ का विषय
बनते है
और निजता का हनन का बोध
अलग से
लेकिन
कुछ भी अप्रत्याशित करना
उपलब्धि एवम सम्बन्धता के
संयुक्त मनोविज्ञान की उपज होती है.
जिससे अभिप्रेरणा प्राप्त
हमारे ‘आत्मीय’
अपने प्रश्नो के साथ
बहुत सारे करने के
विकल्प भी साधिकार
प्रस्तुत करते है
जिनकी व्यंजना
कभी परामर्श लगती है
तो कभी एक नसीहत भी
बडा सवाल यह पैदा होता है
कि समग्र व्यक्तित्व के मूल्यांकन
के मानक क्या कुछ करने
या कुछ विशेष करने से ही
तय होते है?
मानवीय अस्तित्व का
कोई महत्व नही
समग्र निजता का भी कोई अर्थ नही
कुछ भी न करने का दर्शन
कुछ करने से कही अर्थो मे
न केवल व्यापक है
बल्कि जटिल भी
जिसे अक्सर
मेरी अकर्मण्यता मानकर
विभिन्न विकल्पो के प्रस्ताव
प्रस्तुत किए जाते है
और मेरे लिए
ये शायद की कभी सम्भव हो
कि अस्तित्व/चिंतन/निजता/अभिप्ररेणा/महत्वकाक्षाओ
के नितांत ही
व्यक्तिगत स्रोत त्याग कर उनकी कुंठाओ/ महत्वकाक्षाओ
के बोझ को ढो संकू
लेकिन
रोचक बात यह है
कि
उनके प्रयासो की उर्जा
एवम बौधिक आग्रह को देखकर
कभी- कभी
मुझे भी लगने लगता है
कि
आखिर मै कर क्या रहा हू....?
डा.अजीत
मित्र/परिचित
शुभचिंतक एवम हितचिंतक
एक तार्किक सवाल करते है
और क्या चल रहा है आजकल?
इस चलने का अभिप्राय
कुछ करने से होता है
पता नही उनका सवाल
गतिशीलता के मानक तय करता है
अथवा
जडता की गहराई की
सम्भावना तलाशता है
हो सकता उनकी जिज्ञासा
नियोजन से सम्बन्धित हो
लेकिन कुछ करना
और कुछ भी न करना
दोनो दर्शनो की
तात्विक समीक्षा का अधिकार
सदैव
इनके पास सुरक्षित रहता है
और
मेरी प्रतिक्रिया इनके बौधिक आग्रह,अपेक्षाओ
से विरोधाभासी रही है
मेरे चिंतन की दिशा
कुछ करने
और कुछ भी न करने के मध्य से
रेंगती हुई
क्या करु?
क्या किया जा सकता है
आदि की दिशा मे
बढती जाती है
प्राय:ऐसे सवाल
मानसिक खीझ का विषय
बनते है
और निजता का हनन का बोध
अलग से
लेकिन
कुछ भी अप्रत्याशित करना
उपलब्धि एवम सम्बन्धता के
संयुक्त मनोविज्ञान की उपज होती है.
जिससे अभिप्रेरणा प्राप्त
हमारे ‘आत्मीय’
अपने प्रश्नो के साथ
बहुत सारे करने के
विकल्प भी साधिकार
प्रस्तुत करते है
जिनकी व्यंजना
कभी परामर्श लगती है
तो कभी एक नसीहत भी
बडा सवाल यह पैदा होता है
कि समग्र व्यक्तित्व के मूल्यांकन
के मानक क्या कुछ करने
या कुछ विशेष करने से ही
तय होते है?
मानवीय अस्तित्व का
कोई महत्व नही
समग्र निजता का भी कोई अर्थ नही
कुछ भी न करने का दर्शन
कुछ करने से कही अर्थो मे
न केवल व्यापक है
बल्कि जटिल भी
जिसे अक्सर
मेरी अकर्मण्यता मानकर
विभिन्न विकल्पो के प्रस्ताव
प्रस्तुत किए जाते है
और मेरे लिए
ये शायद की कभी सम्भव हो
कि अस्तित्व/चिंतन/निजता/अभिप्ररेणा/महत्वकाक्षाओ
के नितांत ही
व्यक्तिगत स्रोत त्याग कर उनकी कुंठाओ/ महत्वकाक्षाओ
के बोझ को ढो संकू
लेकिन
रोचक बात यह है
कि
उनके प्रयासो की उर्जा
एवम बौधिक आग्रह को देखकर
कभी- कभी
मुझे भी लगने लगता है
कि
आखिर मै कर क्या रहा हू....?
डा.अजीत
Saturday, January 2, 2010
बीजगणित
सन्दर्भ
प्रसंग
व्याख्या
तीनो के समन्वय
मे उर्जा का नही
सम्वेदना का कितना
व्यय हुआ
इसका विवरण
जीवन के बीजगणित मे
तलाशना चाहता हू
सम्बन्ध जीने से जीया जाता है
इससे कोई औपचारिक आपत्ति नही है
लेकिन यदि सम्बन्ध जीते- जीते यह अहसास होने लगे
कि
इस कौशल का प्रयोग
कभी भी अप्रत्याशित दिशा तय कर लेगा
स्वत:
तब
खिन्नता का बोध नही ‘बोझ’
कदमो मे लडखडाहट भर देता है
आवाज मे रिक्त कम्पन
सम्वेदना/अतीत/स्मृति के दर्शन से पोषित
सम्बन्धो की धरा
सदैव उर्वरा रहने का
स्वाभाविक अधिकार रखती है
लेकिन
पारस्परिक अनुभुतियो के
व्यापक संसार मे
वेदना का एक पक्षीय व्यापार
सम्बन्धो की समसामयिकता
पर प्रश्नचिन्ह लगाता
प्रतीत होता है
और
प्रासंगिकता पर
अप्रासंगिक होने का सतत भय
एक दिन स्थाई रुप से मौन कर देता है
समस्त अपेक्षाबोध को
जीवन की अस्थाई रिक्तता के बोध प्रणय से उपजे सम्बन्ध
बचपन की स्मृतियो की भांति
व्यस्क होने से पूर्व ही
अपना अर्थ खो देते है
अर्थ खोना उतना बडा खेद का विषय नही है
जितना इस अप्रमेय समीकरण मे
अपने व्यक्ति विश्लेषण की समीक्षा की
पुनर्समीक्षा की बात सोचना
क्योंकि अतीत के स्थाई भाव,प्ररेणा
को एक झटके से छोडकर
सहजभाव से जी पाना
मुश्किल नही
असम्भव है
किसी भी सम्वेदनशील व्यक्ति के लिए
मुझे ऐसा लगता है
अक्सर
पता नही क्यों...?
डा.अजीत
प्रसंग
व्याख्या
तीनो के समन्वय
मे उर्जा का नही
सम्वेदना का कितना
व्यय हुआ
इसका विवरण
जीवन के बीजगणित मे
तलाशना चाहता हू
सम्बन्ध जीने से जीया जाता है
इससे कोई औपचारिक आपत्ति नही है
लेकिन यदि सम्बन्ध जीते- जीते यह अहसास होने लगे
कि
इस कौशल का प्रयोग
कभी भी अप्रत्याशित दिशा तय कर लेगा
स्वत:
तब
खिन्नता का बोध नही ‘बोझ’
कदमो मे लडखडाहट भर देता है
आवाज मे रिक्त कम्पन
सम्वेदना/अतीत/स्मृति के दर्शन से पोषित
सम्बन्धो की धरा
सदैव उर्वरा रहने का
स्वाभाविक अधिकार रखती है
लेकिन
पारस्परिक अनुभुतियो के
व्यापक संसार मे
वेदना का एक पक्षीय व्यापार
सम्बन्धो की समसामयिकता
पर प्रश्नचिन्ह लगाता
प्रतीत होता है
और
प्रासंगिकता पर
अप्रासंगिक होने का सतत भय
एक दिन स्थाई रुप से मौन कर देता है
समस्त अपेक्षाबोध को
जीवन की अस्थाई रिक्तता के बोध प्रणय से उपजे सम्बन्ध
बचपन की स्मृतियो की भांति
व्यस्क होने से पूर्व ही
अपना अर्थ खो देते है
अर्थ खोना उतना बडा खेद का विषय नही है
जितना इस अप्रमेय समीकरण मे
अपने व्यक्ति विश्लेषण की समीक्षा की
पुनर्समीक्षा की बात सोचना
क्योंकि अतीत के स्थाई भाव,प्ररेणा
को एक झटके से छोडकर
सहजभाव से जी पाना
मुश्किल नही
असम्भव है
किसी भी सम्वेदनशील व्यक्ति के लिए
मुझे ऐसा लगता है
अक्सर
पता नही क्यों...?
डा.अजीत
Thursday, December 31, 2009
सलाह
“अक्ल ये कहती है सयानो से बनाए रखना
दिल ये कहता है, दीवानो से बनाए रखना
लोग टिकने नही देते कभी चोटी पर
जान पहचान ढलानो से बनाए रखना
जाने किस मोड पे मिट जाए निशा मंजिल के
राह के ठौर- ठिकानो से बनाए रखना
हादसे हौसले तोडेंगे सही है फिर भी
चन्द जीने के बहानो से बनाए रखना
शायरी ख्वाब दिखाएगी कई बार
मगर
दोस्ती गम के फसानो से बनाए रखना
आशिया दिल मे रहे आसमान आंखो मे
यू भी मुमकिन है उडानो से बनाए रखना
दिन को जो दिन रात को जो रात नही कहते है
फांसले उनके बयानो से बनाए रखना...। (संकलित)
मित्रो,
कुछ पंक्तिया अपने सोए हुए अहसास को कुरेद जाती है ऐसा मैने महसुस किया जब उपरोक्त पंक्तिया मैने कही पर पढी थी..। इसके रचयिता का नाम तो मुझे ज्ञात नही है लेकिन जो भी है बात बडे कांटे की कही है सो अब ये आपको सौप रहा हू..। अगर कोई बन्धु इसके रचयिता का नाम जानता हो तो मुझे भी बताने का कष्ट करे ताकि किसी महफिल मे इसको पढने से पहले उनको सादर आभार व्यक्त किया जा सके..।
डा.अजीत
दस्तावेज…
“पुराने पत्र
पुराने मित्र
और
पुरानी यादे
कभी पुरानी नही हो पाती है
इनमे हर बार एक खास नयापन होता है
अपनेपन की भीनी-भीनी सुगन्ध के साथ
कभी यू ही बिना किसी विशेष कारण की उदासी
और बिना वजह का हास्य- विनोद
इनके गम्भीर साक्षी होते है
ये पुराने पत्र
जिनमे घुली होती है
अपनेपन की मिठास
अधिकार के साथ शिकवे-शिकायत
और सबसे बडी बात
एक सहज स्वाभाविकता मन को मन से जोडने की
बिना किसी औपचारिक मानसिक भूमिका के
कभी पीडा तो कभी महत्वकाक्षाओ
के ये सांझे दस्तावेज
हमेशा विकट अवसाद के क्षणो मे
एक इंच मुस्कान लाने की स्थाई क्षमता रखते है
हम आज जब
दूनियादारी से पीडित होकर
अशांत/असहज जीने के आदी से हो गये है
तब इन पत्रो की विषय-विस्तु
समय के उतार चढाव को नकार कर
एक विचित्र गर्व से भर देती है अपने मित्र चयन पर
मन होता है नियति को धन्यवाद भेजने का...
और अतीत से जुडी हर यादे
अपने साथ दूर तक ले जाती है
जहा सिर्फ हम और हमारे अतीत की यादो का कारवा
उदासी की गर्द को उडाता हुआ
बेपरवाह निकल पडता है
अपनो के बीच से
अपनो तक
और आज जब बहुत से
पुराने मित्र अपरिहार्य कारणो से
लौकिक रुप से सम्पर्क मे नही है
तब ये पत्र/यादे ही है
कि उनके साथ न होने का अहसास
टीस की बजाए
बोझिल और औपचारिक दूनिया मे
बिना स्वार्थ के उर्जा देता है
और खिन्न चेहरे पर
एक इंच मुस्कान लाने का अवसर
और
शायद उन्हे भी...”
डा.अजीत
पुराने मित्र
और
पुरानी यादे
कभी पुरानी नही हो पाती है
इनमे हर बार एक खास नयापन होता है
अपनेपन की भीनी-भीनी सुगन्ध के साथ
कभी यू ही बिना किसी विशेष कारण की उदासी
और बिना वजह का हास्य- विनोद
इनके गम्भीर साक्षी होते है
ये पुराने पत्र
जिनमे घुली होती है
अपनेपन की मिठास
अधिकार के साथ शिकवे-शिकायत
और सबसे बडी बात
एक सहज स्वाभाविकता मन को मन से जोडने की
बिना किसी औपचारिक मानसिक भूमिका के
कभी पीडा तो कभी महत्वकाक्षाओ
के ये सांझे दस्तावेज
हमेशा विकट अवसाद के क्षणो मे
एक इंच मुस्कान लाने की स्थाई क्षमता रखते है
हम आज जब
दूनियादारी से पीडित होकर
अशांत/असहज जीने के आदी से हो गये है
तब इन पत्रो की विषय-विस्तु
समय के उतार चढाव को नकार कर
एक विचित्र गर्व से भर देती है अपने मित्र चयन पर
मन होता है नियति को धन्यवाद भेजने का...
और अतीत से जुडी हर यादे
अपने साथ दूर तक ले जाती है
जहा सिर्फ हम और हमारे अतीत की यादो का कारवा
उदासी की गर्द को उडाता हुआ
बेपरवाह निकल पडता है
अपनो के बीच से
अपनो तक
और आज जब बहुत से
पुराने मित्र अपरिहार्य कारणो से
लौकिक रुप से सम्पर्क मे नही है
तब ये पत्र/यादे ही है
कि उनके साथ न होने का अहसास
टीस की बजाए
बोझिल और औपचारिक दूनिया मे
बिना स्वार्थ के उर्जा देता है
और खिन्न चेहरे पर
एक इंच मुस्कान लाने का अवसर
और
शायद उन्हे भी...”
डा.अजीत
Tuesday, December 29, 2009
कतरने...
कतरने ...(खाली वक्त की नसीहते)
(एक)
उसने खत को जब- जब
जोडकर पढना चाहा
खुद को खुद से घटाना पडा.. ।
(दो)
अदबी जमात का सलीका भी खुब
उसी बात पे दाद मिले
जिस पर कभी एतराज था..।
(तीन)
बुलन्दी की नुमाईश मे मसरुफ रहा वो शख्स
जिसकी उडान मे हौसला भी अपना न था..।
(चार)
अपनी मरजी के सफर के लिए,ये एतिहात जरुरी है
मुकाम खुद से न छिपाया जाए
उदास रहबर अक्सर हौसला तोड देते है
इस बार एक कदम तन्हा ही उठाया जाए।
(पांच)
शिकारी जिसे समझ के परिन्दे ठहर गये थे
वो कमान का सौदागर निकला..।
(छह)
उसकी वादाखिलाफी पे ऐतराज नही
मलाल बस इस बात का रहा
वो खुद से मुकर गया..।
(सात)
लम्हा- लम्हा बिखरा हू, खुद का साथ निभाने मे
एक उम्र गुजर गयी ऐब को हुनर बनाने मे
वादा करके मुकरना कोई आसान नही
मगर वो हौसला कहा से लाउ
जो जरुरी है तेरा साथ निभाने मे..।
(आठ)
कुछ लोग जिन्दगी मे यू भी गमगीन बन गये
हुनर तो वक़्त पे काम न आ सका
ऐब तौहीन बन गये..।
(नौ)
उसके लहजे मे सियासी सोहबत की रवानी लगे
तन्ज कसके रन्ज करने की आदत पुरानी लगे
मेरी नजर मे जो है बेहद आम
दुनिया को वो शख्स खानदानी लगे..।
(दस)
शहर का होके तुमने पाया क्या खुब मकाम
कदमो मे थकान,कडवी जबान, अधुरी मुस्कान
और बस एक किराये का मकान....।
(ग्यारह)
सच कहने की आदत बुरी नही
ख्याल बस ये रखना
सलाह नसीहत न बन जाए..।
(बारह)
उसका वजूद जज्बात की अदाकारी मे खो गया
अफसोस, तालीम भी तजरबा न दे सकी
पहले किताबी बना
अब हिसाबी हो गया..।
(तेरह)
मुझसे अपना हिस्सा समेट ले
ऐसा न हो फिर बहुत देर हो जाए
मै फकीर हू बस इस लिहाज रख
क्या होगा अगर दुआ बेअसर हो जाए..।
(चौदह)
तेरी अदा सबको तेरा फन नजर आए
इसके लिए जरुरी है तुझे सलीक और तहजीब मे फर्क नजर आए..।
शेष फिर...
आपका अपना
डा.अजीत
© डा.अजीत
(एक)
उसने खत को जब- जब
जोडकर पढना चाहा
खुद को खुद से घटाना पडा.. ।
(दो)
अदबी जमात का सलीका भी खुब
उसी बात पे दाद मिले
जिस पर कभी एतराज था..।
(तीन)
बुलन्दी की नुमाईश मे मसरुफ रहा वो शख्स
जिसकी उडान मे हौसला भी अपना न था..।
(चार)
अपनी मरजी के सफर के लिए,ये एतिहात जरुरी है
मुकाम खुद से न छिपाया जाए
उदास रहबर अक्सर हौसला तोड देते है
इस बार एक कदम तन्हा ही उठाया जाए।
(पांच)
शिकारी जिसे समझ के परिन्दे ठहर गये थे
वो कमान का सौदागर निकला..।
(छह)
उसकी वादाखिलाफी पे ऐतराज नही
मलाल बस इस बात का रहा
वो खुद से मुकर गया..।
(सात)
लम्हा- लम्हा बिखरा हू, खुद का साथ निभाने मे
एक उम्र गुजर गयी ऐब को हुनर बनाने मे
वादा करके मुकरना कोई आसान नही
मगर वो हौसला कहा से लाउ
जो जरुरी है तेरा साथ निभाने मे..।
(आठ)
कुछ लोग जिन्दगी मे यू भी गमगीन बन गये
हुनर तो वक़्त पे काम न आ सका
ऐब तौहीन बन गये..।
(नौ)
उसके लहजे मे सियासी सोहबत की रवानी लगे
तन्ज कसके रन्ज करने की आदत पुरानी लगे
मेरी नजर मे जो है बेहद आम
दुनिया को वो शख्स खानदानी लगे..।
(दस)
शहर का होके तुमने पाया क्या खुब मकाम
कदमो मे थकान,कडवी जबान, अधुरी मुस्कान
और बस एक किराये का मकान....।
(ग्यारह)
सच कहने की आदत बुरी नही
ख्याल बस ये रखना
सलाह नसीहत न बन जाए..।
(बारह)
उसका वजूद जज्बात की अदाकारी मे खो गया
अफसोस, तालीम भी तजरबा न दे सकी
पहले किताबी बना
अब हिसाबी हो गया..।
(तेरह)
मुझसे अपना हिस्सा समेट ले
ऐसा न हो फिर बहुत देर हो जाए
मै फकीर हू बस इस लिहाज रख
क्या होगा अगर दुआ बेअसर हो जाए..।
(चौदह)
तेरी अदा सबको तेरा फन नजर आए
इसके लिए जरुरी है तुझे सलीक और तहजीब मे फर्क नजर आए..।
शेष फिर...
आपका अपना
डा.अजीत
© डा.अजीत
निर्वासन के दो साल
मित्रो !
आज लगभग दो साल का वर्चुअल निर्वासन झेलने के बाद एक बार फिर नेट की इस आभासी दुनिया मे लौट आया हू। एक शुरुवात जो लगभग दो साल पहले हुई थी जो अभी तक शैशवकाल मे सिसक रही थी अब उसके यौवन की तैयारी आरम्भ करने का विचार है। ब्लाग जगत मे अपने दो ब्लागो के माध्यमो से मैने आपसे एक आत्मीय सम्वाद आरम्भ किया था उसी कडी को दोबारा जोडने का प्रयास करुंगा। अभी ज्यादा नही लिखना चाहता हू क्योंकि संकल्प प्रकाशित करने से कमजोर पड जाते सो इस बार बिना लम्बी चौडी योजनाओ के सीधा सम्वाद होगा मन का मन से..।
एक आशा है कि आप का सहयोग,मार्गदर्शन और आर्शीवाद मेरे इस बाल प्रयास को मिलता रहेगा…
नेट की दुनिया मे अपना पता रहेगा-
www.shesh-fir.blogspot.com
www.drajeet.blogspot.com
शेष फिर...
डा.अजीत
आज लगभग दो साल का वर्चुअल निर्वासन झेलने के बाद एक बार फिर नेट की इस आभासी दुनिया मे लौट आया हू। एक शुरुवात जो लगभग दो साल पहले हुई थी जो अभी तक शैशवकाल मे सिसक रही थी अब उसके यौवन की तैयारी आरम्भ करने का विचार है। ब्लाग जगत मे अपने दो ब्लागो के माध्यमो से मैने आपसे एक आत्मीय सम्वाद आरम्भ किया था उसी कडी को दोबारा जोडने का प्रयास करुंगा। अभी ज्यादा नही लिखना चाहता हू क्योंकि संकल्प प्रकाशित करने से कमजोर पड जाते सो इस बार बिना लम्बी चौडी योजनाओ के सीधा सम्वाद होगा मन का मन से..।
एक आशा है कि आप का सहयोग,मार्गदर्शन और आर्शीवाद मेरे इस बाल प्रयास को मिलता रहेगा…
नेट की दुनिया मे अपना पता रहेगा-
www.shesh-fir.blogspot.com
www.drajeet.blogspot.com
शेष फिर...
डा.अजीत
Tuesday, February 5, 2008
अपनत्व
अधिकार एवं अपनत्व
दोनों के मूल मे
होती है
एक अंतरंगता
मौन संवाद ही
काफ़ी होता है
परस्पर भाव
संप्रेषित करने के लिए
और यदि
कभी कुछ कहना हो
विशेष
शब्दों का आभाव
प्रतीत होता है
हमे
संबंधो की दिशा
होती है स्वत उन्मुक्त
बन्धन मे बांधना भी
चाहे तो
सम्भव नही होता है
आज अधिकार से
यह भूमिका लिखी है मैंने
मगर
अपनत्व
मुझे कायर बना देता है
अपने भाव भी
ठीक ढंग से संप्रेषित नही
कर पा रहा हूँ
संभवत
तुम असमंजस मे हो
कि
मैं क्या कहना चाहता हूँ
दरअसल
ये अपनत्व का भय
मुझे बना रहा हैं
अधिकार शून्य
क्योंकि
मैं जानता हूँ
कि
भावावेश मे
अधिकारवश कही गई
हरेक बात का
तुम आजीवन
पालन करोगी
जबकि
मैं
अपनत्व एवं अधिकार से
तुम्हे भावनाओ का
संवाहक मात्र
नही देखना चाहता हूँ
देखना चाहता हूँ
तुम्हे पार्थसारथी की
भूमिका मे
यह तभी सम्भव होगा
जब हम
परस्पर मुक्त हो
महसूस करे
जीवन समर
और
देखें मित्रता पर
'अनुभव' का असर ..."
डॉ.अजीत
दोनों के मूल मे
होती है
एक अंतरंगता
मौन संवाद ही
काफ़ी होता है
परस्पर भाव
संप्रेषित करने के लिए
और यदि
कभी कुछ कहना हो
विशेष
शब्दों का आभाव
प्रतीत होता है
हमे
संबंधो की दिशा
होती है स्वत उन्मुक्त
बन्धन मे बांधना भी
चाहे तो
सम्भव नही होता है
आज अधिकार से
यह भूमिका लिखी है मैंने
मगर
अपनत्व
मुझे कायर बना देता है
अपने भाव भी
ठीक ढंग से संप्रेषित नही
कर पा रहा हूँ
संभवत
तुम असमंजस मे हो
कि
मैं क्या कहना चाहता हूँ
दरअसल
ये अपनत्व का भय
मुझे बना रहा हैं
अधिकार शून्य
क्योंकि
मैं जानता हूँ
कि
भावावेश मे
अधिकारवश कही गई
हरेक बात का
तुम आजीवन
पालन करोगी
जबकि
मैं
अपनत्व एवं अधिकार से
तुम्हे भावनाओ का
संवाहक मात्र
नही देखना चाहता हूँ
देखना चाहता हूँ
तुम्हे पार्थसारथी की
भूमिका मे
यह तभी सम्भव होगा
जब हम
परस्पर मुक्त हो
महसूस करे
जीवन समर
और
देखें मित्रता पर
'अनुभव' का असर ..."
डॉ.अजीत
Tuesday, January 22, 2008
प्रश्नचिन्ह
"सम्बन्ध होने का अर्थ
यदि भ्रम प्रतीत हो
तो
तब अपने आत्मीय भाव
प्रमाणित करना
असंभव सा प्रतीत होता है
क्योंकि
यह ठीक वैसी बात है
जैसे निर्वात मे ध्वनी प्रसार खोजना
निर्वात यद्यपि अमूर्त वस्तु है
और संबंधो का आधार भावनाएं
परन्तु
भावना यदि
वेदना की संवाहक बन कर
नए अर्थ तलाशे
तो
यह एक पक्षीय
न्याय का गणित प्रतीत होता है
जिसके
अपराधी एवं न्याय दंड निर्धारक
हम स्वयं होते हैं
मुझे ज्ञात है
कि
तुम्हे मेरी उपदेशात्मक शेली
बिल्कुल पसंद नही है
परन्तु
यथार्थ और
समय प्रयोग का समन्वय
किसी नए उपजते अर्थ
का आधार नही हो सकता
शायद यही
वह महीन अंतर है
जिससे मैं
तुम्हारे हृदय से दूर
और मस्तिष्क के करीब हूँ
और मेरा यह पागलपन
कि
ज्ञात होकर भी
मैं मौन पथ अनुचर
कि भूमिका मे हूँ
क्या तुम्हे कभी
कोई संवेदना नही
झकझोरती
मेरी भूमिका के सन्दर्भ मे ?
यह तुम्हारे मानस
और मेरी सहृदयता
दोनों पर
एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है..!"
डॉ.अजीत
Thursday, January 17, 2008
पलायन
"तुम कितनी
अकेली हो गयी हो
मेरे पलायन के बाद
अब नही दिखती
वह तुम्हारी उन्मुक्त मुस्कान
पलकें भी बोझिल सी
प्रतीत होती है
शायद
कई रातों से
सोयी नही हो तुम
जीवन की
असीमित अवधारणाओं मे
शायद
यह अब तक का
सबसे बड़ा दुखद
आश्चर्य है
कि
तुम्हारा स्नेह
अभी भी पूर्ववत
बना हुआ है मुझ पर
ऐसा नही है
कि
मेरा पलायन
तुम्हे अप्रिय न लगा हो
अथवा
तुमने पहले ही
ऐसी अपेक्षा का मानस बना
लिया हो
मेरा पलायन
अचानक नही हुआ
यह तो थी
एक प्रक्रिया
जिसने बदल दिया
सब कुछ
और बदल दी
ऐसे मान्यताएं भी
जो स्थिर प्यार
कि प्रतीक थी
मैं जा रहा हूँ ,
बहुत दूर
तुम्हरी सरल
स्नेहिल दुनिया से
इतनी दूर कि
शायद ही कभी
मिलना हो
और तुम सजल नेत्रों से
मेरी विदाई को
सहज बनाने का
प्रयत्न कर रही हो
बोझिल आँखे
कितना झूठ बोलती है
कभी- कभी
तुम मौलिक नही
अभी निर्मित हँसी
हंस रही हो
पीड़ा को धकेल दिया है
नेपथ्य मे
ऐसा तुम
इसलिए कर रही हो
कि
मेरी खुशी तुम्हे
अधिक प्रिय है
यह तुम सोच रही हो
कभी-कभी
कितना ग़लत सोच
लेते है हम
अनुभव और दर्द
के दर्शन के समक्ष
सारे प्रयास
अभिनय प्रतीत होते है
मेरा पलायन
तुम्हारे अधिकार का अपवंचन है
और मेरी स्थिति
पुरूष और पुरुषार्थ पर
एक प्रश्नचिन्ह
एक ऐसा प्रश्नचिन्ह
जिसको
शायद ही कभी
किसी तर्क के द्वारा
समाप्त किया जा सके ...."
डॉ.अजीत
Thursday, January 10, 2008
यथार्थ
"शायद
तुम्हे याद हो
आज भी वह रात
जब हम हाथो मे
लिए बैठे थे हाथ
कर रहे थे
एक दुसरे की भावनाओ को
आत्मसात
मिलकर यथार्थ पर
भावुकता का लेप
लगा रहे थे
अनायास ही सारे
स्वप्न पूर्ण होते
नज़र आ रहे थे
साथ ही अलग-अलग
किस्म की प्रेम की
परिभाषाऐ भी बना रहे थे
परन्तु
कभी-कभी
अकारण ही
यथार्थ की
एक हलकी सी चोट
सब कुछ तोड़ देती है
तब
प्रतीत होता है
कि
हम कितने कल्पनाजीवी है
लगती है सारी बातें
खोखली
एकदम बकवास
सजल नेत्रों मे
तैरते हुए स्वप्न
उत्पन्न करते है
एक विचित्र सा
प्रश्नबोधि अहसास
जो प्रश्न पूछते है
हमसे करते हुए
एक अपराधी सा व्यवहार
कि
किस अधिकार से
यथार्थ से छुपा कर नज़र
किसी को लेकर
निकल पड़े थे प्रेम डगर
जब इतनी क्षमता नही
कि
किसी को कर सको
सस्नेह अंगीकार
तब क्यों ?
अंतहीन वेदना बांटने का
करते हो व्यापार
तब हम
निरुत्तर सहमे से
खामोश खड़े रह जाते है
और
अंत मे
स्वयं को ही अपराधी पाते है
सही ही तो है
कि
जो छोड़ कर अपना
सब कुछ
हमारे साथ जीने -मरने की
खाती है कसमे
विवशत:
उन्हें
हम क्या दे पाते हैं
बस ....
भीगी पलके....."
डॉ.अजीत
शिल्प
"हम शिल्पी बन
तराशते रहे
एक दूसरे को
अपनी आवश्यकतानुसार
भूलकर यह
कि
बाह्य आवरण तो
परिवर्तित हो सकता है
अभ्यंतर नही
क्योंकि,
यह मौलिक होता है
हमारे प्रयास
उत्तरोतर बढ़ते रहे
अपने हिसाब से
एक-दुसरे को ढालते रहे
मूर्तिवत
मगर उस क्षति का
कभी आभास नही हुआ
जो असंख्य टुकडों में
टूटकर बिखरती रही
परस्पर जिंदगियां
इसका निर्धारण तो
संभवत
निर्णायक भी न कर पाए
कि
हमारी शिल्पधर्मिता ने
सर्जन किया
अथवा
विखंडन
एक बात जो
उभर कर सामने आई
वह थी
जिसे समझ कर
अपनी कला
हम प्रयास कर रहे थे
ढालने का एक दुसरे को
वह कला नही
एक विकार था
आवश्यकता नही
प्रयोग था
एक ऐसा प्रयोग
जिसके परिणाम
हमे आजीवन बुत बनकर
देखने पड़ेंगे
होकर
संवेदनशून्य
भावशून्य....."
डॉ.अजीत
Sunday, January 6, 2008
परिणाम
" तुमसे परिचय
कोई नियोजित
प्रयास का हिस्सा नही था
तुम्हारे स्वाभाविक प्रश्न,
नजरिया
एवं वैचारिक परिपक्वता
स्वत: ही हिस्सा थी
एक विशेषता थी....
अनुभव रोचक रहा
इस अल्पयात्रा का
परन्तु
तुम्हारी परिभाषा को
संबोधन में बांधना
मेरे शब्द सामर्थ्य
से परे की बात है
यह सत्य है
कि
शायद
प्रथम और अन्तिम बार
मैं प्रभावित रहा
तुमसे ही नही
तुम्हारे जीवन के प्रति
प्रत्येक दार्शनिक नज़रिये से
एक बात थी
जो तुम्हे भिन्न करती थी
मेरे अन्य निकटस्थ लोगो से
तुम्हारा अपेक्षाबोध
स्नेह्बोध की अपेक्षा
आंशिक था
समर्पण की पंक्ति की
तुम हमेशा अग्रिम प्रहरी रही
और पहली बार देखा
किसी को
दीर्घता से लघुता की
ओर बढ़ते हुए
तुम शून्य की तरफ बढ़ रही थी
वह भी बगैर
किसी जिजीविषा के साथ
कभी-कभी सोचता हूँ
कि
तुम्हारा विशेष व्यक्तित्व
अनुभव का सारांश है
और संवेदनशीलता
एक वरदान
भयातुर होता हूँ
जब तुम बातें
करती हो उलझी -उलझी सी ....
शायद
उनमे छिपा अर्थ
समझने का सामाजिक साहस
मुझमे नही
संबोधन में अपनत्व
संबंधो में सम्मान
और भविष्य में जो सम्भव न हो सके
उसके करीब से
बड़ी सफाई से कैसे
गुजरा जाता है
ये तीन बातें तुम से सीख पाया हूँ
मुझसे क्या सीखा है
तुमने
ये तो तुम ही बेहतर
बता सकती हो
हाँ !
कभी-कभी अकेले में
ख़ुद अपने आप से
बातें करते वक्त
अधीर होकर , सजल नेत्रों से
कुछ अजीब सा बडबडाना
संभवत मुझ से परिचय का परिणाम है ...."
डॉ. अजीत
Saturday, January 5, 2008
प्रतिबिम्ब
" तुम नेत्र सजल
करती रही
हर बार मेरी विदाई पर
मैं चाह कर भी
सुखा गीलापन ला न सका
अव्यक्त भाव कभी समझा
न सका
शायद
मैं तुमसा दृढ नही था
इसलिए
डर से अपनी पीड़ा
बतला न सका
मुझे भय था कंही
मेरी अंतर्व्यथा
तुम्हे अपराधबोध से
न भर दे
जो विश्वास
मुझे पर प्रकट किया था तुमने
उसमे शंका न खड़ी कर दे
इस तरह
मैं जीता रहा एक
द्वंदात्मक जीवन
और
तुम तो पीड़ा की
मनोविज्ञानी बन बिखेरती रही
उत्साह पल-प्रतिपल
और आज जब,
तुम विदा हो रही हो
मेरे विकल जीवन से
शायद हमेशा के लिए
मैं इतना भयभीत हूँ
कि
नेत्रों में गर्म पानी भर तो आया
परन्तु
साहस मुझसे दूर
जा खड़ा हुआ है
और
आज फ़िर पूर्व कि भांति
भाव अव्यक्त हो गए हैं
और साथ ही
तुम्हारी प्ररेणा अप्रासंगिक ...
एवं
मेरा जीवन
मुझे से इतना ही दूर ...
जितनी कि तुम मुझसे
दूर खड़ी हो...."
डॉ.अजीत
नियति
"नियति के
विरुद्ध चलना
साहस का विषय था
ठीक तुम्हारी
परिस्थतिजन्य समस्याओ
की तरह
मैंने चाहा
परन्तु
समय ने नही..
इसलिए
शायद आज समानान्तर
चलते हुए
हम दो नदी के किनारों
की तरह सागर के
मुहाने पर पहुँच गए है..
तुम
समाहित होना चाहती हो
और मैं
संबोधित
तुम्हारी पीड़ा के प्रहरी के
नाम से
जड़ता और गति में
विशेष अर्थगत
अंतर प्रतीत नही होता है
हमारी नियति देख कर..
तुम गतिशील आज भी
मैं जड़ता में गतिशीलता
तलाश रहा हूँ
भाव भी संक्रमित से हो गए है
शायद,
परिभाषा बनाते-बनाते
हम अपना
स्वयं का अर्थ खो चुके है ..
तुम्हारी आशा
प्रहसन का विषय है
और मेरी
जिद
शायद मानस की
अपरिपक्वता का...."
डॉ. अजीत
Thursday, January 3, 2008
अपराधबोध
"नेह से नीर
तक का सफर
रोचक मगर
व्यथित डगर
अपेक्षा स्नेह की
मौन भाषा प्रेम की
समझे थे एक साथ हम
मैं संकोच में रहा
और तुम भी
तलाशती रही
अपने मूकप्रश्न
वो भी मेरी मौन आकृति में
जड़ता और गति की समझ समाप्त हो गई
तब जब साथ चले
एक नियत
समय पर
गति भी थी नियत
परन्तु,
मंजिले एकदम भिन्न
आभास भी न हुआ
कि
पदचाप की आहट भी
समानान्तर होती जा रही थी
और आज जब हम मिले है
इस अनपेक्षित अवसर पर
अब मुझे आभास हुआ है
कि
नेह से नीर तक के सफर में
तुम एक
धरातल पर
खड़ी निहारती रही हो
अबोधता के साथ
और मैं...
मैं क्या कहूँ
मुझे तो अहसास ही नही है
कि
तुमको इतनी दूरी
पर कैसे देखा पा रहा हूँ
शायद
तुम्हारा अपेक्षाबोध ही
मेरा अपराधबोध हैं..."
डॉ.अजीत
परिपक्वता
"अनायास ,
तुमसे परिचय हुआ
परिचय से
सम्बन्ध का अहसास हुआ,
और यही अहसास,
आज मेरे विकल मन में ,
कई भाव लिए खड़ा है
बड़ी विचित्र मुद्रा में
तुम्हारी वैचारिक परिपक्वता
मेरे लिए एक उपलब्धि है
परन्तु,
मैं इतना परिपक्व नही हूँ
कि
मित्रता के धरातल पर
खड़ा रह सकूं ठीक
तुम्हारी तरह
तुमने मुझे दिया है
संबल
एक आधार
और अधिकार
जिसके बल पर
कभी-कभी
अकारण ही डाँटता हूँ तुम्हे
व्यंग कि भाषा में
बातें करता हूँ..
और तुम सखा भाव से
मौन मुझे स्वीकार करती हो
कभी प्रतिवाद नही करती
प्रदर्शित करती हो
जैसे मैं मर्मज्ञ हूँ
और तुम अल्पज्ञ,
तुम्हारा
यह व्यवहार
मेरी समझ से परे है
एक बात तो तय है
कि
तुम असाधारण हो
और में साधारण से भी परे मेरे
प्रति तुम्हारे ये भाव
मुझे निर्बल बनाते हैं कई बार
और विशेषकर तब
जब तुम मेरी गलतियों पर
उन्मुक्त होकर मुस्कुराती हो......"
डॉ.अजीत
Wednesday, January 2, 2008
उन्मुक्तता
" तुम और तुम्हारी
उन्मुक्त हँसी,
कई बार मुझे प्रिय-अप्रिय
लगती है
क्योंकि
कभी-कभी
महसूस होता है
तुम्हारी उन्मुक्तता
एक दिन तुम्हारे
सरल व्यक्तित्व का
एक दोष न बन जाए
उन्मुक्तता से तुम्हारा
पक्ष रखने का तरीका
मुझे वाकई पसंद है
लेकिन
जब तुम भूल कर
अपनी परिपक्वता
जिद करती हो
एक बच्चे की तरह
तब
मुझे क्षणिक आवेश भी
आता है
लेकिन मेरा यह आक्रोश
उस समय
व्यर्थ महसूस होता है
जब तुम ,
मेरी गलतियों पर
परदा डाल रही होती हो
तर्क नही कुतर्को के साथ
हाँ ! वो बात अलग है
उस समय
तुम्हारी उन्मुक्तता
आवरण ओढ़ लेती है
अपनत्व का..."
डॉ. अजीत
अनभिज्ञ....
"मैं तलाशता रहा
तुम्हारे शब्दकोष में
अपने दो शब्द और तुम
मुझे न जाने क्या-क्या
उपहार में देती रही
सिवाय पीड़ा के
ऐसा भी नही है कि
मैं बाँट देता तुम्हरी
अनकही पीड़ा
मैं तो स्वयं बटा हुआ था
अपनत्व की आदत
कभी-कभी
परेशान करती है मुझे
इसलिए
तुम पर बडबड़ाता हूँ
अकारण ही कई बार
एक तुम हो कि
हमेशा गंभीरता से
सुनती हो..
सुनाती कुछ भी नही
मैं तलाशता रहा हूँ
अपने वे शब्द
सुन नही सकता ..
लेकिन,
कई बार गीली पलकों के
पीछे से झांकता
एक सम्पूर्ण व्यथा का
संसार जरुर
मेरी विवशता
तुम्हारी परिपक्वता
और...हमारी नियति
का मूक वर्त्तचित्र बनाता है
जो शायद
हम तथाकथित
बुधिजिवियो की समझ से परे हैं...."
डॉ.अजीत
Saturday, December 22, 2007
आपसे अपनी बात
जैसा की आप सब लोग जानते ही हैं की उत्तरप्रदेश का एक जनपद है मुज़फ्फरनगर ! खासियत भी आप जानते होंगे ही अपने देश के ही नही विदेश के भी विभिन्न मीडिया माध्यमो को आपराधिक समाचारों की सतत सप्लाई यंही से होती है...इसी मिटटी में मेरे जैसा एक भावुक और संवेदनशील जीव का जनम हुआ गाँव था हथछोया...संयोग से ऐसे परिवार मैं जनम हुआ जंहा कला, कल्पना और कविता को सम्मान की नजरो से नही देखा जाता धुर दबंग और जमीदार परिवार...लेकिन पता नही कंहा से इस कुलकलंक के मन में सम्वेदना, कविता और साहित्य का बीज रोपण हुआ और जिसकी आज एक अच्छी खासी फसल लह लहरा रही है ..... इस कला, कल्पना और कविता के चसके ने मुझे अपनी बिरादरी से निकाल कर एक नई दुनिया का हिस्सा बना दिया शायद यह नियति थी या प्रारब्ध अभी तक तय नही कर पाया ...वैसे तो दुनियादारी की भाषा मैं बोलू तो २५ साल की इस अल्पायु मैं मनोविज्ञान, हिन्दी और जनसंचार मैं स्नातकोत्तर उपाधि और मनोविज्ञान मैं पी-एच. डी की उपाधि प्राप्त करने के बाद अभी गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में मनोविज्ञान विभाग में बहैसियत प्रवक्ता कार्यरत हूँ..लिखना तो स्कूल के दिनों से ही शुरू कर दिया था लेकिन जो शुरुआत लेख एवं संपादक के नाम पत्र लिखने से हुई वह स्नातक होने तक कविता मैं बदल गयी.. अब थोड़ा बहुत लिख पढने के बाद जब कभी मन मन में बेचैनी होती है तो कुछ पंक्तिया लिख लेता हूँ ज्यादा कविता का तकनीकी पक्ष नही जानता बस यूं ही जो महसूस करता हूँ उस सम्वेदना, अनुभूति को कागज़ पर उडेल देता हूँ.. बस यही परिचय है अपना !
Thursday, December 20, 2007
मौन...
मौन...
मौन और सन्नाटे के बीच ,
ख़ुद से
संवाद स्थापित करना
किसी भी चिन्तनशील
व्यक्ति के लिए प्रिय-अप्रिय अनुभव
हो सकता है
परन्तु
यह मुझे अहसास होता है
कि मौन में निकले वक्तव्य
वास्तव में
एक श्रंखला बना कर
प्रश्नबोधि वातावरण बना देते हैं
स्वत:
और सन्नाटा तो मानो
प्रतीक्षारत रहता हैं
ऐसी मनस्थिति में
एक अजीब सा राग लिए,
जिसको परिभाषित
नही किया जा सकता,
हाँ ! चुभन से तीव्रता का
अंदाजा जरुर लगा सकते है
कभी-कभी
वैचारिक द्वंद में सर्जन-विखंडन
के सेतु बन जाते हैं
जिनके आर-पार बहती है
आशा कि सरिता
हम
निष्कर्ष पर पहुँचना नही चाहते,
बल्कि नेपथ्य में
धकलेना चाहते हैं
सायास
उन सभी संभावित प्रश्नों को,
जिनके कोई प्रमाणिक जवाब
शायद हमारे पास नही होता..
साहस/उत्साह/भ्रम
और यथार्थ
कि राहों पर
चलकर पहुँच जाते है
उस दिशा में
जहाँ विचार और शून्यता को
जोड़ने का यत्न चल
रहा होता है
मौन और सन्नाटे
की यह सांझी तस्वीर
कभी पीड़ित करती है
तो कभी अवसर देती है
आत्ममूल्यांकन का...
परन्तु इनकी जुगलबंदी
से उपजा संगीत
किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को
प्रेरित नही करता
कुछ सर्जन के लिए
ऐसा मैं सोचता हूँ अक्सर....."
डॉ अजीत
अदरवायिज़....
अदरवायिज़....
"एक पल का यह
ठहराव
कितना अप्रत्याशित रहा
सोचता हूँ कभी-कभी ,
तुम्हारे सन्दर्भ मे
मेरी स्वत: निर्मित होती धारणाऐ
वास्तव मे
कितनी सही थी,
यह यो ठीक-ठीक
तुम ही बता सकती हो
परन्तु,
तुम्हारी उन्मुक्तता में निहित
शिष्टता मेरे पूर्वाग्रहों को
तोड़ती रही पल-प्रतिपल,
कभी बिना लिप्त हुए
किसी का विश्लेषण करना
रोचक प्रतीत होता है ,
आज भी वह बहस
मेरी स्मर्तियों मे जीवित हैं
जब तुम्हें अपने तर्को के द्वारा ,
मुझे सीमित विश्वास का
व्यक्ति ठहराया था
तुम्हारी विजय पर
सहमति के स्वरों के बीच
तुम्हरा सरलता से
कहना कि-
प्लीज़ अदरवायिज़ मत लेना... !!
मुझे याद आता है
कभी-कभी अकेले में
साथ ही फ़ैल जाती है
चेहरे पर एक अबोध मुस्कान
अपनी सोच
और तुम्हारी अभिव्यक्ति के बारे मे...."
डॉ अजीत
Thursday, December 13, 2007
निर्वात...
निर्वात...
"कहने के लिए
कुछ शेष नहीं रहा
वैसे तो हमारे मध्य
लेकिन
एक बात कहना चाहता हूँ
यदि अन्यथा न लो तुम,
मेरा जीवन के प्रति
अतियथार्थवादी नजरिया
हो सकता है,
तुम्हे प्रिय- अप्रिय लगा हो,
लेकिन,
वास्तव में तुमसे
कुछ कह पाने का साहस
बड़ी मुश्किल से जुटा पाया हूँ
तुम्हारे स्नेह का विस्तार
किसी भी पात्र- अपात्र
व्यक्ति के लिए जीवनपर्यंत की उपलब्धि हो सकता है
परन्तु निर्वात मे
इसकी स्थापना की
तुम्हरी जिद
मेरे लिए सदेव यक्षप्रश्न रही है
अपनत्व/अधिकार की
भाषा मे कहू तो
तुम्हारी सोच संबंधो के
व्यापक अर्थ नहीं तलाश पाई,
और मैं
"अर्थ" को परिभाषित करने का
प्रयास करता रहा
तटस्थता के भाव 'अभाव' मे
अपने ओचित्य पर कई
बड़े सवाल खडे करते है
शायद इन सवालों से हम
युक्तिपुर्वक बचकर
अब नए अर्थ तलाश रहे है
नए संबंधो मे
वंही पुराने अर्थ..."
डॉ. अजीत
आप से पहली मुलाकात....
यूँ ही..
"कभी अचानक
यूँ ही मन में
बेतुका कौतुहल पैदा होता है
बात कुछ और हो
और अनायास सामने खडे हो जाते है
कुछ ऐसे अनजान चेहरे
जिन्हें हमने केवल देखा मात्र है
कही भीड़ में
वह भी क्षण भर के लिए,
बगैर किसी परिचय के
उनको जानने की हमारी जिज्ञासा
कभी तो इतनी प्रबल होती है
की
हम काल्पनिक संवाद
स्थापित करते है खुद से
संवाद में आत्मीयता के साथ होता है
अधिकार
बिना किसी बंधन के
कभी उनका चेहरा
ठीक से याद करने की कोशिश होती है
तो कभी उनसे जुड़ी
किसी वस्तु को देखते है हम अपनेपन से
ऐसा क्यों होता है
शायद ही किसी विज्ञान में
इसका कोई तार्किक उत्तर मौजूद हो
फिर कभी मुलाकात हो
इसकी शून्य सम्भावना के बावजूद भी,
हम स्वयं को उस 'आस'से
वंचित नहीं करना चाहते है
ऐसे अनजान चेहरों का अपना
एक व्यापक संसार हमारे
साथ जीता और मरता है
और,
एक बार की यह मुलाकात
यादगार बनी रहती है
जानते हुए यह की
अब उनसे मिलना कभी नहीं होगा
शायद कभी भी नहीं...."
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