Sunday, May 31, 2015

ब्रेक अप

ब्रेक अप : कुछ फुटकर नोट्स
----
ब्रेक अप
एक अंग्रेजी शब्द था
मगर इसके प्रभाव थे
विशुद्ध देशी किस्म के
यह जुड़कर टूटने की
बात करता था
शब्दकोश में देखा
इसके आगे पीछे कोई शब्द नही था
ये वहां उतना ही नितांत अकेला था
जितना अकेला
एक एसएमएस के बाद मैं हो गया था।
***
ब्रेक अप के बाद
शब्दों के षड्यंत्र
आकार लेना आरम्भ करते
प्रेम को निगल जाता सन्देह
स्मृतियों को चाट जाती युक्तियां
स्पर्शों को भूल जाती देह
अह्म होता शिखर पर
दिल अकेला हंसता
दिमाग की चालाकियों पर
यही हंसी दिख जाती कभी कभी
आंसूओं की शक्ल में।
***
ब्रेक अप के बाद
मैंने छोड़ दिया पृथ्वी ग्रह
मैं निकल आया प्लूटो की तरफ
मगर वहां के चरम एकांत में भी
ब्रेक अप की ध्वनि
मेरा दिशा भरम करती रही
दरअसल वो ध्वनि नही
एक किस्म का शोर था
शोर ब्रह्माण्ड के हर कोने तक
करता रहा मेरा पीछा
जबतक मैं बहरा न हो गया।
***
ब्रेक अप
सवाल की शक्ल में आया
जवाब की शक्ल में चला गया
सवाल-जवाब के मध्य
रूपांतरित होता हुआ रिश्ता
समुंद्र तल की ऊंचाई से कुछ मीटर
ऊपर का था
जब एक दिन पानी पर
तुम्हारा नाम लिखना चाहा
तब पता चला
कुछ सेंटीमीटर
तुम्हारा तल बदल चुका है
ब्रेक अप एक तरल चीज थी ठोस नही।
***
ब्रेक अप
आसान नही होता
कहना भी करना भी और जीना भी
ब्रेकअप उतना मुश्किल भी नही होता
जितना मैं सोचता था
इधर ब्रेक अप हुआ
उधर मेरी जगह ले ली
किशोर कुमार लता मंगेशकर ने।

© डॉ. अजीत

Saturday, May 30, 2015

तिराहा

पहली बार
तुम्हारे शहर के तिराहे से विदा हुआ
दोराहें और चौराहें से कितना अलग था
तिराहें से विदा होना
एक सड़क सीधी जा रही थी
शहर के आरपार
एक तुम्हारे घर की तरफ
मैं समकोण पर खड़ा
सोच रहा था किधर जाऊं
एक तरफ शहर था
एक तरफ तुम थी
और एक तरफ मैं
जिस तरफ मैं खड़ा था
वो दुनिया की सबसे निर्धन जगह थी
ये जाना तुम्हारे चले जाने के बाद।
***
तिराहें पर खड़ा होना
गुरुत्वाकर्षण खो देने जैसा था
टी पॉइंट से राईट हो रहे थे लोग
और मैं लेफ्ट की तरफ
तांक रहा था
मैंने लेफ्ट इसलिए चुना
तमाम अजनबीयत के बावजूद
लेफ्ट में पड़ा मेरा दिल
धड़क रहा था तुम्हें देखकर
उस वक्त मेरे जिन्दा होने की
यही एक मात्र पुष्टि थी।
***
तिराहे पर खड़े होकर
याद आ रहा था तुम्हारा गुस्सा
मैं गुस्से में था दुखी था अनमना था
नही जानता
गुस्से की आवाजाही में
मैं शहर के उस
सिविल इंजीनियर पर बेहद खफा था
जिसकी नगर योजना का
हिस्सा रहा था यह तिराहा।
***
देर तक खड़ा
यही सोचता रहा
आखिर जिंदगी में क्यों आतें हैं
दोराहें,तिराहें और चौराहें
जब अनमना हो
चुनना पड़ता है
एक रास्ता
दरअसल रास्तें हमें
कहीं नही ले जाते
रास्ते केवल छोड़ते है
दूसरे रास्तें के मुहानें पर
मंजिल इन्ही रास्तों के बीच फंसी
सबसे उदास जगह है।

© डॉ. अजीत

Wednesday, May 27, 2015

दूरी

मेरे तुम्हारे बीच में
महज फांसला नही है
कुछ ग्राम नम हवा भी है
हवा को विज्ञान कैसे तौलता है
नही जानता हूँ
मगर इतना जानता हूँ
हमारे बीच में
कुछ ऐसी महीन चीज़ जरूर है
जो हमें मिलनें नही देगी कभी।
***
देह का आकार
आकृति से बढ़कर नही होता
मन का कोई आकार ही नही होता
देह और मन के अलावा भी
कुछ अज्ञात है
जिसका अनावरण अभी शेष है
यही अज्ञात
हमें मिलनें नही देगा कभी।
***
क्यों न ऐसा करें
मिलाकर देखें
अपनी अपनी रेखाएं
ये समानांतर दिखती जरूर है
मगर है नही
शायद बन जाए कोई
मानचित्र
तुम खो जाओ इससे बेहतर है
इसकी मदद से
तुम्हारा निकल जाना।
***
तमाम किन्तु परन्तु के बावजूद
बहुत कुछ बच गया है
अनसुलझा
स्थगित करना ही पड़ेगा
मंजिल का कौतुहल
सफर आसान होता जाता है
और तुम मुश्किल।

© डॉ. अजीत

Tuesday, May 26, 2015

मार्ग

तुम्हें देख
भूल जाता हूँ
निष्फल प्रेम का अतीत
तुम्हारी छाया टांगती है रोज़
धरती के माथे पर
एक इश्तेहार
जिस पर लिखा होता है
प्रेम का अतीत वर्तमान भविष्य नही होता
प्रेम का होता है केवल इतिहास।
***
तुम्हारी हथेली पर
रख देता हूँ कम्पास
तुम देखती हो मेरी दिशा
और गलत अनुमान से
भटक जाती हो
जबकि मैं खड़ा होता हूँ
ठीक तुम्हारे सामनें।
***
मैं पूछता हूँ
तुम्हारा पता
और तुम हंस पड़ती हो
पोस्ट करता हूँ
सब खत इसी पते पर
इस उम्मीद पर
तुम तक जरूर पहूंचते होंगे
वो सब के सब।
***
दुनिया के अंतिम
तटबन्ध पर
मेरी चप्पल मिलेगी
इससे आत्महत्या का अनुमान मत लगाना
मैं अनुमान से नही
तुम्हें निष्कर्ष के किनारे
खड़ा मिलूँगा
यदि तुम वहां तक पहूंच पाई।

© डॉ. अजीत

दिशा

अब जब मुझमें
तुम्हारी दिलचस्पी
लगभग नही के बराबर बची है
ठीक इस वक्त
देना चाहता हूँ
तुम्हें एक मुट्ठी नमक
ताकि तुम समझ सको
खारेपन का मूल्य
प्यास की अनुपस्थिति में।
***
अब जब लगभग सब कुछ
निर्णय के मुहाने पर
खड़ा है
मांगना चाहता हूँ
तुमसें तुम्हारी खुशबू
ताकि महकती रहें
कुछ खट्टी मिट्टी यादें
तुम्हारी छाया में।
***
हमनें कभी नही मांगा
प्रेम में प्रतिदान
न मांगने का एक अर्थ
यह भी निकाला जा सकता है
अंदर से खाली नही थे हम
प्रेम कहां बसता फिर?।
***
चारों दिशाओं के अलावा
धरती की होती है अपनी एक दिशा
उसी का भरम ले जाता है
हमें उस तरफ
जहां से लौट नही पाते
मर कर भी हम।

© डॉ. अजीत 

Wednesday, May 20, 2015

फलादेश

चांद मुंह नही फेर सकता
तारें आंख नही बंद कर सकते
धरती को तकना
ज्ञात मजबूरी है
मनुष्य सो सकता है
देख सकता है स्वप्न
लिख सकता है कविताऐं
तमाम अन्धकार के बीच
चाँद तारें इस बात पर खुश है।
***
नदी को किनारों से फुरसत नही
उसकी गहराई का एकांत
उदास रहता है अक्सर
पत्थर बचातें है
उसके जीवन में हास्य
वेग की शक्ल में।
***
हवा मुक्त दिखती है
मगर होती नही है
उसकी दिशा तय करता है कोई और
हवा की बेबसी
पूछिए किसी हिलते हुए पत्ते से
वो टूटकर बताना चाहता है सबकुछ
यदि आपको फुरसत हो तो।
***
ग्रहों नक्षत्रों के प्रभाव में मध्य
पृथ्वी होती है नितांत अकेली
झेलती है सबका सकार नकार
कोई ज्योतिषी नही बताता
उसका प्रभाव
उसी पर जीवित
मनुष्यों के जीवन पर
उसकी गोद में संकलित है
उसके समस्त अप्रकाशित फलादेश।

© डॉ. अजीत

Saturday, May 16, 2015

गणित

कुछ दशमलव
प्रेम मांगा तुमसे
तुमने याचक कहा मुझे

कुछ सेंटीमीटर
दूरी थी तुमसे
नही मिली तुम आजतक

कुछ शून्य
नही दिए तुमनें उधार
दहाई बननें के लिए

इसलिए मैनें
बिना योग के
घटा लिया खुद को खुद से
और अनुत्तीर्ण हम हो गए
सम्बंधों के गणित में
बिना किसी परीक्षा के।

© डॉ.अजीत

Friday, May 15, 2015

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

Wednesday, May 13, 2015

सच

उत्तरोत्तर होता जाऊँगा मैं 
बेहद सतही और सस्ता
नही नाप सकेंगी 
तुम्हारे मन की आँखें भी 
मेरी चालाकियां
प्रेम और छल को मिला 
झूठ बोलूँगा मैं 
पूरे आत्मविश्वास के साथ
किन्तु परंतु के बीच रच दूंगा
एक महाकाव्य 
जहां ये तय करना मुश्किल होगा
ये स्तुति है या आलोचना 
खुद को खारिज करता हुआ
निकल जाऊँगा उस दिशा में 
जिस तरफ तुम्हारी पीठ है 
कवि होने का अर्थ हमेशा
सम्वेदनशील होना नही होता है
कवि को समझनें के लिए बचा कर रखों
थोड़ा सा सन्देह 
थोड़ा सा प्रेम
और कुछ सवाल हमेशा
कवि और कविता का अंतर 
एक अनिवार्य सच है 
भावुकता से इतर 
शब्द और अस्तित्व के  बीच
फांस सा फंसा हुआ सच।
© डॉ. अजीत

Monday, May 4, 2015

पहाड़

पहाड़ पर आकर लगता है
सब सुखद
शायद इसलिए
पीछे छोड़ आतें है हम
अपेक्षाओं का संसार
सागर का तट
नदी का उदगम्
झरनें का निर्वाण स्थल
घनें जंगल
खत्म होते रास्तें
टूटी हुई पगडंडिया
बताते है हमें
लघु और दीर्घ की पीड़ाएं
पहाड़ का मतलब
महज ऊंचाई नही
पहाड़ का मतलब है
खुद के अंदर देख पाना
ऊंचाई
गहराई
और समतल
पहाड़ इसलिए दूर रहतें है हमसें
ताकि उनके साथ
खुद के करीब जा सकें हम।

© डॉ.अजीत

Sunday, May 3, 2015

अति

सबसे ज्यादा डर
अपने गांव/शहर के लोगो से लगता है
सबसे ज्यादा शंकालु
मेरे मुहल्ले के लोग है
सबसे ज्यादा बैचेन
मेरी जाति के लोग है
सबसे ज्यादा असुरक्षित
मेरे धर्म के जानकर लोग है
सबसे ज्यादा मुझे अन्यथा
मेरे करीबी दोस्त लेतें है
सबसे ज्यादा व्यंग्यबाण
मुझे उनके लगे जो जानते है मुझे
लगभग डेढ़ दशक से
सबसे ज्यादा अनजाना
मेरा खुद का पड़ौसी है
रिश्तेंदारों की तो बात ही छोड़िए
अपने आसपास पसरी
इतनी अति के बीच
लिखना है मुझे प्रेम
बताना है अपना स्थाई दुःख
कहनी है अपनी तमाम कमजोरियां
हमेशा उतना आसान नही होता
जितना आसान दिखता है जीवन
इस एक जीवन में
यदि ये सब मैं कर पाया तो
उनके भरोसे पर कर सकूंगा
जो उपरोक्त में से एक भी नही है।

© डॉ. अजीत

Saturday, May 2, 2015

मन

सबसे पहलें मेरे अंदर का
बच्चा मरा
फिर आदमी
फिर इंसान
और अब देह
मेरी मौत बिलकुल संदिग्ध नही है
यह उतनी ही स्वाभाविक है
जितनी तुम्हारें सपनें की मौत है
मन की मौत नही होती
आत्मा को अमर नही कह सकता
क्योंकि आत्मा देखी नही कभी
मगर
मन आज भी जानता हूँ
कई जन्मों पुराना है मेरा
वही विश्वासी मन
वहीं आहत मन
आधा और अधूरा मन।

© डॉ.अजीत

Friday, April 24, 2015

गंभीर

अचानक हो जाना
किसी का गंभीर
जीवन से
खो जाना कौतुहल का
परिपक्वता की निशानी
नही होता है हर बार
सम्भव है खो गई हो उसकी
दराज़ की चाबी
घिसी हुई चप्पल
या कोई पुरानी शर्ट
गम्भीरता डराती भी है कई बार
जैसे इसका सहारा लेकर
कोई करेगा अपनी अंतिम घोषणा
और बदल लेगा मार्ग
हर बार गंभीर होने का अर्थ
समझदार होना नही होता है
गंभीरता में आदमी भूल सकता है
बढ़े हुए बाल नाखून और दाढ़ी
भूल सकता है
प्रेम और प्रेम के वादें
बड़ी सहजता के साथ
कभी कभी हंसते हंसते अचानक से
बिना निमंत्रण के आई गम्भीरता
बताती है कोई चीज जरूर है
जिसे लगातार आपत्ति होती है
हमारी उन्मुक्त हंसी पर
इसलिए गम्भीरता लगनें लगती है
आपत्ति से मिलती जुलती कोई चीज़
ये खुद से आपत्ति है या दूसरे से
इसका अंदाज़ा
गम्भीरता से लगाया जा सकता तो
कुछ लोग
पहले से अधिक या कम
गम्भीर होते आज।

© डॉ. अजीत

Thursday, April 23, 2015

स्वप्न

स्वप्न में भूल जाता हूँ
कवि होना
मनुष्य होना
भाई बेटा पति पिता होना
स्वप्न में भूल जाता हूँ
अक्षर ज्ञान
लिपि भाषा और बोली
स्वप्न में भूल जाता हूँ
धरती का भूगोल
गुरुत्वाकर्षण का केंद्र
मौसम दिन और रात
यहां तक स्वप्न में भूल जाता हूँ खुद की
आयु लिंग धर्म और जाति
स्वप्न में भूल जाता हूँ
दोस्तों के नाम और चेहरें
स्वप्न में भूल जाता हूँ
नदियों के उदगम् स्थल
झरनों की ऊंचाई
झील का आकार
और समन्दर की गहराई
बमुश्किल पांच दस मिनट के स्वप्न में
भूल जाता हूँ सारी स्मृतियां
बस एक बात
आज तक नही भूला
स्वप्न में भी
तुमसे पहला और अंतिम
प्रेम किया है मैनें
ये बात होश और स्वप्न में
रहती है याद
एकदम बराबर
ये अलग बात कि
चेतना के मुहानें पर
आइस पाइस खेलती हुई
बदलती रहती हो
तुम अपना घर।

©डॉ. अजीत

Wednesday, April 22, 2015

दूरी

जिन दिनों तुमसे दूर था मैं
चाँद को बुला लेता था
अपनें सिरहानें
दिखाता था उसे उपग्रह से प्राप्त चित्र
बादलों के छलावे देख
खुलकर हंसता था चांद
उन दिनों
बरसात से मांगता था
थोड़ी सी चटनी उधार
ताकि जीने लायक खा सकूँ रोटी
जिन दिनों तुमसे दूर था
धरती पर पंजो के बल खड़े होकर
देखता था तुम्हारा आना
और धरती अपनी जीभ से
तलवें पर ऐसी गुदगुदी करती
उदासी में भी हंसते हुए
नाचने लगता था मैं
उन दिनों
आवारा खरपतवारों से थी दोस्ती
उनसे सीखता था बेरुखी में जीने की आदत
थोड़ी सी जिद थोड़ा सा जुनून
कल्पना के दीपक पर
निकालता था उम्मीद की स्याही
ताकि आंसूओं के बीच सलामत रहे रोशनी
उन दिनों
तालाब से मांगता था थोड़ा धीरज उधार
नदी में पैर से बनाता था
तुम्हारे घर का मानचित्र
ताकि बहती रहें तुमसें
मिलनें की संभावना
समन्दर की तरफ पीठ करके
फूंकता था सम्मोहन के सिद्ध मंत्र
ताकि वक्त भले ही लगे मगर
नदी की तरह एकदिन
तुम मिलनें आओं जरूर
जिन दिनों तुमसें दूर था मैं
उन दिनों
खुद के इतना नजदीक था कि
तुम्हें एक साथ करते हुए
देख सकता था
मुझसे नफरत और प्यार।


© डॉ.अजीत




Monday, April 20, 2015

जरूरतें

बेहद मामूली थी मेरी जरूरतें
एक अदद मुस्कान से
धुल जाते थे सारे रंज
जब तुम खुद को
करेक्ट करने की मुद्रा में पूछती
डबल एक्स एल नम्बर ही ना शर्ट का
लगता मेरे सुख दुःख का नम्बर
रख रही हो पर्स में
कभी तो ऐसा भी हुआ
तुमसे गलती से कॉल हो गई
और मिस्स कॉल से मुझे लगा
याद किया है तुमनें
तुम्हारे रहतें जरूरतें बेहद सिमट जाती थी
मैं खुश हो सकता था
जूतों में जूराब देखकर
या फिर बाथरूम में नया साबुन देखकर
तुम उस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत थी
इसलिए दुसरी जरूरतें लगभग समाप्त हो गई थी
बेख्याली का ऐसा दौर था
भूल जाता था बाइक में चाबी
जेब में कलम
दराज़ में बटुआ
जैसे तुम्हारी बातें करता हुआ
अभी अभी भूल गया हूँ
तुम अब नहीं हो
अब जरूरतें तंग करती है
खासकर तुम्हारी आदत
क्योंकि
आदतें वैसे भी
यूं ही नही जाती।
© डॉ. अजीत


Sunday, April 19, 2015

उनदिनों

जिन दिनों तुम्हारे प्रेम में था मैं
धरती का व्यास याद था मुंहज़ुबानी
बता सकता था पेड़ की पत्तों की संख्या
खींच सकता था
धरती सूरज चाँद के मध्य सीधी रेखा
ग्रह नक्षत्रों को कर सकता था स्तम्भित
नदी को भर सकता था ओक में
झरनें को उछाल सकता कुछ प्रकाश वर्ष ऊपर
समन्दर के तल पर रख सकता था कुछ बोरी सीमेंट
परवा हवा को खींच फूंक से बना सकता था पछुवा
जिन दिनों तुम्हारे प्रेम में था मै
उनदिनों,
तीन सौ पैसठ दशमलव दो चार दिन का था साल
साढ़े बाईस घंटे के होते थे दिन रात
इतवार आ जाता पौन घंटे पहले
शनिवार जाता था सवा घंटे विलम्ब से
ये जो समय आगे पीछे चल रहा था
इसकी एक वजह यह भी थी
अपनी घड़ी मिला ली थी मैंने
तुम्हारी मुस्कान से
जिन दिनों तुम्हारे प्रेम में था मैं
देख लेता था वाक्यों के मध्य फंसे अपनत्व को
जोड़ लेता शिकायतों की संधि
भेद कर पाता था संज्ञा और सर्वनाम में
लगा सकता था शंका पर पूर्णविराम
मिटा सकता था थूक से प्रश्नचिन्ह
कर सकता था तुम्हारी हंसी का अनुवाद
मध्यम नही उत्तम पुरुष था मैं
काल के हिसाब से
जिन दिनों तुम्हारे प्रेम में था मैं
उन दिनों मैं बस मैं नही था
कुछ और था
क्या था
ये तुमसें बेहतर कौन बता सकता है।

© डॉ. अजीत 

गजल

चेहरें पर आपको जो रौनक नजर आई है
थोड़ी नजरबंदी है थोड़ी हाथ की सफाई है

तन्हा इतना हूँ इस जिंदगी के सफर में
खुद को ही खुद की कहानी सुनाई है

कुछ अदीब इस बात पर मुझसे खफा है
बिना उस्ताद के मैंने कैसे गज़ल बनाई है

मिलते ही पूछते हो अपने मतलब की बात
दोस्त ये बता तालीम किस मदरसे से पाई है

ना काफ़िया ना रदीफ़ ना ख्याल का शऊर है
गजल कहता हूँ शेर मेरे सब के सब हरजाई है

© डॉ. अजीत 

Thursday, April 16, 2015

दुःख

दुःख का आयतन
मांपने के लिए
सुख का वर्गमूल निकालना पड़ता है
फिर जो बचता है शेष
उसे हम नियति कह सकते है
कहनें को तो
सुख को दुःख और
दुःख को सुख भी कहतें है लोग।
***
दुःख और सुख
एक साथ उच्चारित करनें से
कुछ दशमलव कम हो जाता है दुःख
ये गणित का नही
जीवन और उम्मीद का सूत्र है।
***
दो तिहाई दुःख में
एक तिहाई सुख जोड़ो
जिंदगी ने एक सवाल दिया
हल करनें के लिए
आज तक
मेरी स्लेट कोरी है।
***
दुःख का गणित
सुख के मनोविज्ञान को नही समझता
दुःख दरअसल एक दर्शन है
और सुख एक विषय
दुःख और सुख
साथ-साथ नही
आगे पीछे पढ़ाते है अपना पाठ।
***
दुःख विषम होता है
और सुख सम
दोनों के भिन्न आपसे में
नही जोड़े जा सकते
किसी भी समीकरण में
दुःख इसलिए भी होता है
सुख से अधिक जटिल।
***
दुःख की प्रमेय
सिद्ध करनें के लिए
सुख के सूत्र काम नही आते
दुःख हर बार गढ़ता है
नई प्रमेय
नए सूत्र
इसलिए भी दुःख का गणित
नही हो पाता कभी प्रकाशित।
***
दुःख का भूगोल
और सुख का अर्थशास्त्र
यह देखनें में मदद करता है
मनुष्य किस अक्षांश पर स्थित है
और उसकी सकल खुशी दर क्या है
इन्हीं के सहारे ईश्वर
हंस सकता है
यदा-कदा।

© डॉ. अजीत

नदी

नदी
कहती है पहाड़ से
कभी मिलनें आओं
और पहाड़ रो पड़ता है
नदी समझती है बोझ का दर्द
इसलिए फिर नही कहती कुछ
केवल समन्दर जानता है
नदी के आंसूओं का खारापन
क्योंकि
उसके लिए वो बदनाम है
नदी कृतज्ञ है
अंतिम आश्रय के लिए
पहाड़ शर्मिंदा है
प्रथम उच्चाटन के लिए
समन्दर शापित है
चुप रहनें के लिए
नदी पहाड़ समन्दर
एक दुसरे की कभी शिकायत नही करतें
बस देखतें हैं चुपचाप
मजबूरियों का पहाड़ होना
आंसूओं का नदी होना
धैर्य का समन्दर होना।

© डॉ.अजीत

फोन

फोन (मोबाइल)

---
जागता है चौबीसों घंटे
रखता है हिसाब
तारीफ, बुराई
और हिचकियों का।
***
मेरे जाने के बाद
मेरा सच जानने वाला
एकमात्र गवाह
यही बचेगा
जिसकी गवाही कोई नही लेगा।
***
पहचानता है
मेरी स्पर्शों को
पुरानी प्रेमिका की तरह
आंख का पानी
जब लगता है ऊंगलियों पर
ये आदेश मानने से कर देता है इंकार
विज्ञान इसके सेंसर मे दोष बताता है
जबकि सच है
मेरी तरह अतिसंवेदनशील है यह भी।
***
यह महज एक फोन नही है
एक खिडकी है
हमारे बीच
उधर बालों में कंघी होती है
इधर खुशबू आती है
क्लिनिक प्लस की।
***
कभी नही करता शिकायत
बेट्री लो, वाईब्रेशन मोड या म्यूट की
दिन में न जाने कितनी बार
छोड देता हूँ अकेला
अपना इतना है
होता है क्या तो
हाथ में दोस्त की तरह
या फिर रहता है दिल से चिपका
बच्चें की तरह।
***
फिलहाल
फेसबुक,व्हाट्सएप्प, एसएमएस
इसके दिल की तीन प्रमुख धमनियां है
जब आता है किसी का फोन
ये दिमाग से सोचता है
और काट देता है
इंटरनेट का कनेक्शन
देखना चाहता है हमेशा
मुझे एकतरफा
किसी शुभचिंतक की तरह।
***
उदासी और संघर्ष के पलों में
एक आश्वस्ति है इसका होना
लिखना,लिखकर मिटाना
खुद ही खुद को समझाना
देखता है चुपचाप
मेरी कमजोरी जानते हुए भी
उस पर कभी कोई बात नही करेगा
ऐसा तो कोई दोस्त भी नही है मेरा।
***
मुझे लगता है
इसका एकमात्र ऐतराज़
पासवर्ड लगाने से हो सकता है
शायद समझा लेता होगा खुद को
इसी में हम दोनों की भलाई है
नही चाहता मैं भी
मेरे अलावा कोई इसकी तलाशी लें
और करें मुझसें
बेतुके सवाल-जवाब
फिर लाख पासवर्ड लगा हो
इससे कुछ छिपा थोडे ही है मेरा।

© डॉ.अजीत

Monday, April 13, 2015

अनुपस्थिति

तुम्हारी अनुपस्थिति में यह जाना
दो जमा दो चार नही होता हर बार
तुम्हारी अनुपस्थिति में देख पाया
सपनें की यथार्थ के दर पर आत्महत्या
तुम्हारी अनुपस्थिति में समझा
भावुकता और सम्वेदनशीलता में फर्क
तुम्हारी अनुपस्थिति में उलट गई थी
काल गणना
दिन और रात थे छब्बीस घण्टें के
ये दो अतिरिक्त घंटे कहां से लाता था
तुम्हें समझनें के लिए
नही जानता हूँ
दरअसल तुम्हारी अनुपस्थिति
इतनी घनीभूत रूप से मनोवैज्ञानिक किस्म की थी कि
मैं घटना वस्तु समय सबमें तुम्हें तलाशता था
और तुम्हारी अनुपस्थिति
मुझे खारिज करती जाती
तुम्हारी अनुपस्थिति मुझे चाट रही थी घुन की तरह
और मैं अपनी तयशुदा हार
स्थगित करनें में असमर्थ था
तुम्हारी अनुपस्थिति ने चिपका दिए थे कुछ सवाल
मेरी नाक,माथें और पीठ पर
कुछ को मैं पढ़ता था
कुछ को दोस्त पढ़कर सुनाते थे
तुम्हारी अनुपस्थिति में
भूल गया था अपनी तमाम वाग्मिता
सन्देह होता था खुद के स्पर्शों पर
तुम्हारी अनुपस्थिति
ठीक उतना अकेला कर रही थी मुझे
जितना अकेला जन्म के वक्त होता है
मुस्कानों के बीच विस्मय से भरा
एक नवजात शिशु
तुम्हारी अनुपस्थिति मुझ पर इसलिए भी
इतनी हावी थी
क्योंकि पहली बार
तुम्हारी अनुपस्थिति में
तुम उतनी उपस्थित नही थी
जितना उपस्थित था मैं।

© डॉ. अजीत

Saturday, April 11, 2015

धूमकेतु

सुबह
उठता हूं
मगर जागता नही हूं

दोपहर
करवट बदलता हूं
मगर सोता नही हूं

शाम
टहलता हूं
मगर
चलता नही हूं

रात
आधा सोता हूं
ज्यादा खोता हूं
चुप होकर रोता हूं

...एक ख्वाब

रोज अधूरा रह जाता है
पलकों पर कुछ ग्राम बोझ बढ जाता है
बंद आंखों में बारिशें होती है
मुस्कानों के पीछे झांकता है
थोडा दीवानापन
थोडा पागलपन

सुबह शाम रात और दिन के बीच
ठीक उतने ही फांसले नजर आते है
जितने दो नक्षत्रों के मध्य होते है
देह,चित्त और चेतना के ब्रह्मांड का
धूमकेतु बन जीता हूं
सम्बंधों के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त
एक खगोलीय जिन्दगी।

© डॉ.अजीत