Sunday, September 21, 2014

मुमुक्षु

मेरी गति से तुम डर गई
जबकि मै तो हांफता हुआ
पहूँचा था तुम तक
मेरे कदमों में लडखडाहट थी
तुम रेगिस्तान की मृग मरीचिका
के माफिक दिखी
और मैंने दौड़ना शुरू कर दिया
भूल कर यह कि
डर एक मनोवैज्ञानिक सच है
अनुभवों का
आँखे और मन दोनों
मिलकर जितना देख पाती है
उससे कई गुना होता है अनदेखा
तुम्हारे चेहरा का कौतुहल
डर में तब्दील होता देखा
तब यह जाना
विश्वास भी एक बलात कर्म है
जिसमें सहमति शायद ही कभी बन पाती है
आषाढ़ के आवारा बादल सा
बरस कर बह जाऊँगा जल्द ही
सौंप दूंगा तुम्हे
तुम्हारे हिस्से का एकांत
डरो मत !
मै मुमुक्षु हूँ
छलिया नही।

© डॉ.अजीत

*मुमुक्षु= मोक्ष का अभिलाषी

Saturday, September 20, 2014

गजल

अपने वजूद में सिमटने लगा हूँ मै
कई कई हिस्सों में बंटने लगा हूँ मै

तुम मेरी फ़िक्र न किया करो दोस्त
फिर से वादों से मुकरने लगा हूँ मै

हिज्र के सफर पर जाने वाला हूँ
यादों से तेरी लिपटने लगा हूँ मै

हकीकत इतनी कड़वी क्यों है
डर कर सच निगलने लगा हूँ मै

तबीयत नासाज़ है जिगर खराब
संग तेरे पीने को मचलनें लगा हूँ मै
© डॉ. अजीत

Friday, September 19, 2014

खूबसूरती

ख़ूबसूरती आँखों में
बसती है
मगर यह व्याप्त रहती है
जगह-जगह
किसी एक को कभी नही
कहा जा सकता
सबसे खूबसूरत
कई प्रेमी बोलते है
यह कोरा झूठ
नेत्र सम्पर्क के आत्मविश्वास के साथ
ख़ूबसूरती तरल होती है
यदि ईमानदारी से देखा जाए
भिन्न भिन्न परिस्थितयों में
ख़ूबसूरती बदल जाती है
जो व्यक्ति खूबसूरत दिखता है
एक ख़ास समय में
हो सकता है कुछ समय बाद
वो लगने लगे बेहद सामान्य
यह सामान्य लगना
हमारे मन की एक खूबसूरत चालाकी है
जिसमें आँखों की मदद लेता है वो
यदा-कदा
एक साथ कई खूबसूरत चेहरे देखने पर
हम कन्फ्यूज्ड नही होते
बल्कि सबमें महीन फर्क
करना जानते है
खूबसूरती मन और समय सापेक्ष होती है
इसलिए ख़ूबसूरती की तारीफ़
सावधानी से करनी चाहिए
खूबसूरत व्यक्ति को ठीक ठीक
पता होता है अपनी ख़ूबसूरती का
वो हंसता है या फिर आत्म मुग्ध होता है
ख़ूबसूरती की तारीफ़ सुनकर
तन और मन की ख़ूबसूरती  पर
सहमति नही बन सकती कि
कौन पहले आती है या
चल सकती है दोनों साथ साथ
ख़ूबसूरती की समझ की वजह से
कुछ आत्मविश्वास से भरे रहतें है
तो कुछ ढोंते है उम्र भर हीनता की ग्रन्थि
खूबसूरती भेद करती है
और करना सिखाती है
इसलिए यह
बेहद बदसूरत भी दिखती है
कभी-कभी।

© डॉ. अजीत

Thursday, September 18, 2014

हवा

हवा पेड़ के सारे पत्ते नही हिलाती
वो टोकती है सूखे पत्तों को
थोड़ी इनकार के बाद वो
चल पड़ते है धरती से मिलने
हवा का प्रलोभन एक सम्मोहन है
वो रचती है हरे पत्तो की मदद से संगीत
उनकी फडफडाहट सूखे पत्तो को
उकसाने का प्रायोजन मात्र होता है
बेचारी कमजोर शाखाएं
चाहकर भी नही रोक पाती
अपने कमजोर पुत्रों को
स्पंदन के झटके हवा लगाती
पत्तो के कान में गुदगुदी करती
फिर सबसे कमजोर पत्ते
खुद को अलग कर नाचते हुए
जमीन की तरफ बढ़ते
थोड़े बेहोश थोड़े बेफिक्र
उनकी कलाबाजी पर हरे पत्ते
झूठे गीत गाते या फिर
उनकी भावुक मूर्खता पर
तालियां बजाते
ये जो हवा की सरसराहट से
पत्तो का हिलना हम देखतें है
वो हवा के षड्यंत्र और
हरे पत्तो की मूक सहमति का
विजयनाद होता है
सूखे पत्ते कभी नही जान पाते
ये सब
क्योंकि उनका
सम्मोहन तब तक रहता है
जब तक पत्ते गीली जमीन में न धंस जाएं
और पेड़
वो अक्सर हवा से रहता है नाराज़
हवा सुहावनी होने के बाद भी
भंग करती है उसका एकांत
सुहानी हवा का यह एक क्रूर पक्ष है
जिसे जानने के लिए
पेड़ होना पड़ता है
सूखे पत्ते जेब में रख
सोना पड़ता है भूखे पेट
तब नींद में खुलता है यह सब भेद
इनदिनों हवा अच्छी नही लगती
जिसकी वजह मौसम नही
हवा की ये चालाकियां है।
© डॉ.अजीत 

Wednesday, September 17, 2014

खफा

यादें बड़ी सजा होती है
भूलना भी दवा होती है

हमें आजमाना छोडिए
बेमतलब भी वफा होती है

इश्क मर्ज ही ऐसा है
दर्द खुद दुआ होती है

सपनें बेचकर अपने
रोशन शमां होती है

अंदाजे गलत ही लगते है
किस्मत जब खफा होती है
© डॉ.अजीत

Tuesday, September 16, 2014

इज़ाजत

जो हो इजाजत...
----------

जो हो इज़ाजत तो
कुछ देर सुबकता रहूँ
तेरी गोद में
शिकायत करते
बच्चे की तरह।

-------------
जो हो इज़ाजत
सपनों को तकसीम करूं
तमन्नाओं को जमा- नफ़ी करूं
और हासिल आए
सिफर ।
---------------
जो हो इज़ाजत तो
तेरी कान की बालियों
की घंटी बजा
कान में फूंक दूं
महामृत्युंजय मंत्र।
------------------
जो हो इज़ाजत
तेरे हाथ पर अपना हाथ
रख दूं पल दो पल
ताकि रेखाएं
अपने रास्ते मिला
बना सके कोई मानचित्र।
-------------------
जो हो इज़ाजत
पूछूं तेरा पता
अधूरे तसव्वुर और
अपनी चाहतों के
खत रवाना करूं
बैरंग।
-----------------
जो हो इज़ाजत
तेरी आँखों से
गुफ्तगू करूं
पलकों की खिड़कियाँ हो
काजल के रास्ते हो
और
सपनों की चादर।
-----------------
जो हो इज़ाजत
तेरी मुस्कान
उधार लूं
हंसी बाँट दूं
आंसू सोख लूं
उदासी ओढ़ लूं
कभी-कभी।

© डॉ.अजीत

सात बातें

तुम्हारी सात बातें
-----------------

तुम और तुम्हारी बातें
समझने की नही
जीने की चीज़ है
जबकि
मै हमेशा करता हूँ
ठीक इसके उलटा।
*******
तुम्हारी बातों में
सिलवट देखता हूँ जब
तुम मुस्कुरा पड़ती हो
बेपरवाह
आँखे झूठ बोलना
कब सीख पाएंगी
इसकी परवाह करो।
********
कभी कभी तुम
चुप हो जाती हो
कम बोलने के बाद
यह चुप्पी
सबसे ज्यादा डराती है
मुझे।
************
तुम्हारे खतों की स्याही
बता देती है कि
तुमने बोल-बोल कर
लिखें है
ये खत।
*************
लब और
ज़बान के बीच
अटके शब्दों का
शब्दकोश तैयार करना
कभी फुरसत मिले तो
किसी के तो
काम आएगा
कभी।
**********
तुम्हारी बातें
सिर्फ तुम्हारी बातें है
उनमे दुनिया का हिस्सा नही
यह सबसे अच्छी बात है
इन बातों की
जो तुम्हें नही पता।
***********
बातें कितना बड़ा
सहारा बन जाती है
काम करती है
दवा के माफिक
जब सिर्फ और सिर्फ
तुम्हारी बातें
सोचता हूँ
अवसाद/खुशी के पलों में।

© अजीत

Friday, September 12, 2014

ढलान

मत समझिए  आसमान पर हूँ
दोस्तों इन दिनों ढलान पर हूँ

ना जाने किस की जान लूँगा
फिर से वक्त की कमान पर हूँ

तुम क्या परख सकोगे मुझे
जन्म से ही इम्तिहान पर हूँ

शोहरतें न रास आई फकीर को
जिन्दा मुफलिसी के गुमान पर हूँ

सफर में मुलाक़ात की उम्मीद नही
मंजिल की आख़िरी थकान पर हूँ

© अजीत



गजल

खुद को यूं भी आजमाना चाहिए
बेवजह भी जीना आना चाहिए

दुश्मनों का जिक्र नही करता अब
दोस्तों को भी  भूल जाना चाहिए

कातिल मेरे ने जुल्म क़ुबूल किया
गवाह को अब मुकर जाना चाहिए

नाराजगी में भी दुआ भेज दी उसने
मर्ज़ तुम्हारा  ठीक हो जाना चाहिए

मयकदे में सहारा देने लगे है लोग
महफिल से अब  उठ जाना चाहिए

© अजीत

Thursday, September 11, 2014

गजल

किसी को और सताना नही चाहता
खुद बारें में कुछ बताना नही चाहता

खुश रहना अच्छी आदत बताते है
खुश रहें कैसे  कोई ये नही बताता

अहसानों का जिक्र करते है सब
गैरतमंद यूं भी तलब नही जताता

दुआओं में असर  नही रहा अब
फकीर अलख जगाने नही जाता

हंसते-हंसते आँख भर आए मेरी
कोई अब ऐसा किस्सा नही सुनाता

© अजीत

Wednesday, September 10, 2014

निशब्द

जब समाप्त होने को था प्रेम का आरक्षण
तब तुम वर्गीकृत हुए वंचितो में
जब लड़ाई बाहर से ज्यादा  अंदर की थी
तब तुमने सोचा लड़ने के बारे में
जब भाषा जूझ रही थी अपनी पहचान के लिए
तब तुमने अपनी बोली में लिखा प्रेम पत्र
जब रोने में हास्य तलाशा जा रहा था
तब निकले तुम्हारे आंसू
जब प्रेमी का भावुक होना अनिवार्य नहीं था
तब तुम अभिमान में रहे भावुकता के
जब धरती पर लेटा चाँद  आसमान को चिढ़ा रहा था
तब तुम तारों की भाषा सीख रहे थे
जब पहाड़ ऊकड़ू बैठा मन्त्र फूंक रहा था
तब तुम नदियों का मिलन देख रहे थे
तुम समय से आगे थे या पीछे
यह बता पाना मुश्किल है
क्योंकि आज भी
प्रेम तुम्हे चौंकता नही है
अवसाद रुलाता नही है
धोखा समझाता नही है
तुम आज भी उतने ही आत्मविश्वास से
लिख सकते हो
प्रेम कवितायेँ
नदियों के गीत
दरख्तो के उलाहने
साँझ की उदासी
भेज सकते हो एक  गुमसुम मैत्री निवेदन
तुमने रोने और हंसने के मध्य का
एक भाव विकसित कर लिया है
जिसकी कोई भाव-भंगिमा नही है
इसलिए लोग हमेशा
इसी अचरज में रहते है कि
तुम खुश हो या दुखी
इस अचरज पर कभी
तुम्हे कुछ कहते लिखते नही देखा
बस देखा है हमेशा
समय के आर-पार
या फिर आगे-पीछे
टहलते हुए
कभी मौन तो कभी निशब्द.

© अजीत

Tuesday, September 9, 2014

जन्मदिन

जन्म दिन पर...

बत्तीस पार: मै सवार
---------

एक यात्रा शुरू होती है
दूसरी खत्म
सफर में रहना
मनुष्य होने का दुःख है
जिस सुख समझा जा सकता है।

********
त्वचा और कोशिका की आयु से
उम्र का सही अंदाजा लग सकता है
ऐसा विज्ञान कहता है
उम्र का अंदाजा प्रयोगशाला से नही
एक छोटी सी बात से लग जाता है
अगर आप समझना चाहें तो।
**********
उम्र का बढ़ना
अनुभव का बढ़ना नही होता
अनुभव बढ़ाने के लिए
उम्र को घटाना पड़ता है
खुद से।
**********
तीस और चालीस के मध्य
झूलता हूँ ऐसे
जैसे झूलते है
सूरज चाँद के मध्य
अनगिनत तारें।
*********
जन्म का कोई एक दिन
कैसे हो सकता है
जन्म भी मृत्यु जितना
अनिश्चित होता है
विचित्र संयोगो से भरा।
********
जन्म पर उल्लास
मृत्यु पर अवसाद
मनुष्य को बहाने चाहिए
मनुष्य बनें रहने के।
**********
यदि उम्र का निर्धारण
जन्म से नही यात्रा से होता
फिर उम्र न पूछी जाती
हर कोई दिखता
अपनी भौतिक उम्र से
छोटा-बड़ा।
**********
हम उम्र कोई नही होता
लोग या तो बड़े होते है
या फिर छोटे
दोस्ती हम उम्र दिखने का
सबसे बड़ा भ्रम है।
**********
जन्म को देखा नही जाता आते हुए
मृत्यु को देख सकते है
इसलिए
मृत्यु खूबसूरत
हो सकती है।
***********
जन्मदिन पर जुड़ जाते है
शुभकामनाओं के बादल
बरस जाते तो
भीग सकता था
मै दिगम्बर।

© अजीत

Monday, September 8, 2014

गुफा

तुम्हारे एकाधिकार
के आयत में
एक भी समकोण
मेरा नही है
तुम्हारे वृत्त की त्रिज्या
मेरे व्यास से बड़ी है
हमारे सम्बन्धों का वर्गमूल
सदा विषम ही आता है
तुम्हारे समानांतर रेखा खीचने के बाद भी
तुम छोटी नही पड़ती
मन की ज्यामिति
इतने अक्षांशों में बटी है कि
तुम्हारी समीकरण सुलझाते समय
हर बार बीजगणित सा सपाट होना पड़ता है
नही चाहा था कभी तुम्हें
गणित के उप विषयों सा पढ़ना
देखा था हमेशा
तुम्हारी आँखों में सवेरा
मुस्कान में रोशनी
हंसी में नदी
उदासी में पहाड़
सवालों में झरनें
इस जंगल को गणित में तब्दील होते देखना
सदी का सबसे बड़ा सदमा है
गणित और जंगल साथ नही चल सकते
एक निश्चित है
दूसरा परिवर्तनशील
इसलिए लौट रहा हूँ
उस गुफा में
जहाँ न विज्ञान जाता है
न आध्यात्म
और न तुम्हारे कोरे अनुमान
चढ़ रहा हूँ उलटे कदमों से
तुम्हें देखते हुए
यह दिशा अनुमान की
कोई गणितीय कमजोरी नही है
बल्कि यह तुम्हें देखते हुए
भूलने का एक सिद्ध प्रयास है।

© अजीत

Saturday, September 6, 2014

मिलाप

उन लोगो के फोन नम्बर नही है पास
जिनसे तलब की हद तक
बात करने की इच्छा होती है
उन लोगो के पते नही है पास
जिन्हें चिट्ठी लिखने का होता है
लगभग रोज मन
उन लोगो से मिलने की नही है कोई आस
जिनसे मिलना
सांसो जितना जरूरी लगता है
ऐसे लोगो की एक छोटी सी
फेहरिस्त है अपने पास
जिसमें कच्ची पेंसिल से
नाम लिखता-मिटाता रहता हूँ
जो प्राप्य नही है
उसकी आस एक झूठा
छल है खुद से
अपमान है उन लोगो का
जिनसे रोज होती है बात
जिन्हें लिखता रहा हूँ खत
जिनसे होती रही है मुलाक़ात
मगर फिर भी
इस छल और अपमान के बीच
बुनता रहा हूँ
कुछ वाहियात कल्पनाएँ
बांटता रहा हूँ आश्वस्ति के कोरे झूठ
और अधूरे निमन्त्रण पत्र
जीता रहा हूँ खुद के अंदर
दस-बीस आदमी
दरअसल बात यह है
हर अजनबी से मुलाक़ात के बाद
रूचि के केंद्र बदल जाते है
इसलिए मेल मिलाप से बचता हुआ
यूं ही लोगो की जोड़-तोड़ गुणा-भाग में
रिश्तें को जीने की आदत सी हो गई है
किसी से भी मिलना
सबसे पहले
उसे खो देने का उपक्रम लगता है
इसलिए जिनसे मिलता हूँ
उनसे मिलना नही चाहता
जिनसे मिलना चाहता हूँ
उनसे खुद नही मिलता
समय और परिस्थिति दो बढ़िया बहाने है
जिनके सहारे जीवन को
छद्म अभिमान के साथ काटा जा सकता है
किसी से मिलने और न मिलने की वजह
लगभग समान होती है
यकीनन।

© अजीत


Friday, September 5, 2014

गजल

किस्सें गमों के हम किस को सुनाते
दोस्त उदासी को अच्छी नही बताते

हर वक्त हंसते रहना मुश्किल बहुत है
लबों के जख्म तुम्हें नजर नही आते

एक मुद्दत से खुद से खफा हूँ दोस्त
छोटी सी बात समझ क्यों नही जाते

हैरत में हूँ अब तलक उम्मीदजदां हो
औरो की तरह  बदल क्यों नही जाते

अरसे बाद मिलने जब आ ही गए हो
कुछ रोज इधर ठहर क्यों नही जाते

© अजीत 

Monday, September 1, 2014

गजल

मुस्कान पर रोज गजल होती है
बेरुखी पर आँख सजल होती है

कुछ गलतियाँ  भी हुई हमसें
माफी की रोज पहल होती है

चाहतों का सूद बढ़ता जाता है
तमन्नाएं यूं भी असल होती है

तेरी साफगोई से ऐतराज़ इतना है
परदादारी इश्क का शगल होती है

तुझे कौन खरीद सकता है भला
बिकती है वही जो नकल होती है

© अजीत



समय

वक्त पर भारी कुछ दिमागी फितूर
------

चौबीस घंटे में
सबसे मुश्किल वक्त होता है
शाम का
इधर सूरज डूबता है
उधर मै लेटता हूँ
खुद की कब्र में
सूरज को नही पता
रोज मुझे मारता है
रोज जिन्दा करता है
सूरज से मै इसलिए भी
खफा नही हो सकता
शाम उसका नही
समय का दोष है
शाम की रूमानियत का एक पहलू यह भी है
जान लीजिए आप।

**************
दिन और रात
जैसे
दो शख्स है मेरे अंदर
एक साधु
एक सांसारिक
इन दोनों के बीच
मेरी साधना
इन्सान बने रहने की है
इसे कम बड़ी साधना न समझें
शायद ही मृत्यु तक
मै सिद्ध हो पाऊं।

*************
सुबह देर से बिस्तर से
उठना अवसाद की एक
निशानी है
ऐसे दुनिया के तमाम
मनोवैज्ञानिक कहते है
मैं कहता हूँ
यह एक गुप्त तैयारी भर है
कुछ सम्वेदनशील लोगो की
जिन्हें  रोज लड़ना होता है
एक युद्ध
अंदर -बाहर से।
**************

दिन में सो सकते है
अति सुखी या अति दुखी जीव
इनके मध्य के
लिखते है
दोपहर में कविता
जिसे पढ़ शाम
अक्सर उदास
हो जाया करती है।
*************
समय मनुष्य का बनाया
एक हसीन धोखा है
यह अच्छा या बुरा नही होता
यह क्रुर भी नही होता
समय होता भी है
यह कहना अभी संदिग्ध होगा
दरअसल
दिन रात सुबह दोपहर  शाम इन सबकी
वैज्ञानिक वजह है
परन्तु समय को न देख पाने की वजह
वैज्ञानिक नही
मन की है
आध्यात्मिक या मनोवैज्ञानिक तो
बिलकुल नही।
************
समय बदलने की सांत्वना
मनुष्य की लोकप्रिय युक्ति है
शुभचिंतक बनने की
भला वक्त भी कभी
मनुष्य जैसे मामूली जीव के लिए
बदलता है
हम जरुर बदल जाते है
समय के हिसाब से
मनुष्य को मजबूर या विजेता देखना
समय का पुराना शौक रहा है।
***********
समय उन षड्यंत्रो का
हिस्सा बना दिया जाता है
जिसे रचते है नियति और प्रारब्ध मिलकर
समय को खुद पता नही होता है कि
उसका प्रयोग कर लिया गया है
वो तो बेचारा काल गणना के अहंकार में
खुद को हमेशा शिखर पर
देखने का आदी होता है
इसलिए नही कहना चाहिए
अपना समय खराब है।

© अजीत

Sunday, August 31, 2014

सात सपनें

सात सपनें: खुली नींद के

---------

तुम एक ख़्वाब हो
तो मै क्या हूँ
अलसाई नींद।
*******
मै समन्दर
तेरे इन्तजार में खारा रहा
तुम मुझ तक आते आते सूख गई
मीठी नदी।
*********
तुम्हारी परछाई
तुमसे बड़ी है
और मै छाया में खड़ा
तुम्हें देखता हूँ।
***********
तुम्हारी आँखों का रास्ता
कितना फिसलन भरा है
बात बिगड़े
तो बिगड़ती ही चली जाती है।
************
तुमने जब से मन ही मन में
मुस्कुराने का हुनर सीख लिया
मै हंसता हूँ अकेले में।
*********
बातचीत में कई  बार
तुमने मुझे पागल कहा
तब से
पागलपन अच्छा लगता है
समझदारी के बीच।

***********
तुम्हारी पलकें
चश्में के बोझ में थक गई है
कुछ दिन
उधार ही सही
मेरी आँखों से दुनिया देखो।

© अजीत


गजल

मिलते ही कई शर्त लगा देता हूँ
यूं खुद को भूलने की दवा देता हूँ

डाकिया भी खत तेरे कैसे लाता
हमेशा गलत घर का पता देता हूँ

मौत किस्तों में दर पर दस्तक दे
दवा में थोड़ा जहर मिला देता हूँ

इतनी ही नेकी कमा पाया बस
रोतें दिलों को थोड़ा हंसा देता हूँ

यकीन करें न करें उसकी मरजी
पी कर दिल की बातें बता देता हूँ

चाहे रिश्तें हो या फिर आमदनी
हासिल करके सब गवां देता हूँ

गुस्ताखियाँ बर्दाश्त यूं भी करते है
फख्र करने की एक वजह देता हूँ

© अजीत

Saturday, August 30, 2014

अदाकारी

इश्क की पहरेदारी हमसे न होगी
मुहब्बत में अदाकरी तुमसे न होगी

ये ताल्लुक है कि बोझ है वफा का
हर वक्त ये तरफदारी हमसे न होगी

हंस सकता हूँ खुद की कमजोरी पर
देख लो ये कलाकारी तुमसे न होगी

गुजारिश पर लिखना छोड़ दिया हमनें
दरबार की ये फनकारी हमसे न होगी

इश्क में अक्ल बहुत लगाते हो तुम
मेरी रूह की सवारी तुमसे न होगी


© अजीत





Thursday, August 28, 2014

दर्द राग

कदम जब खुद का बोझ ढ़ोते हुए
थक जाते है
शिराएं जब कराहती है
करती है चस-चस
तब उपजता है दर्द का अनुभूत राग
धमनियां ढपली बन थाप देने लगती है
त्वचा के रोमछिद्रों से
रिसता है दर्द
बाहर की हवा
अंदर की स्वरलहरियों को गोद उठा
उड़ा जाती है उस देश
जहां दर्द के संगीत घराने  बसते है
दर्द तन का हो या मन का
उसमें कूटबद्ध होता है
एक विचित्र संगीत
इसके आलाप
आरोह-अवरोह के सहारे नही चलते
बल्कि उनका अपना एक शापित नियम है
दिल पर चोट दो
तन को छोड़ दो
जख्मों के तार कसों
और फिर सुनों मौन का नाद
हंसना रोना गाना और बजाना
एक ही सिक्के के चार पहलू है
ये सिक्का जिन्दगी हमें
खोटे सिक्के की शक्ल में देती है उधार
जिसे न कभी चला पाते
और न फैंक पाते है
दर्द के सुगम संगीत के प्रसारण के लिए
कुछ दारुबाज दोस्तों का
तानपुरा उधार मांग
मंच पर चढ़ जाता हूँ
लड़खड़ाता हुआ
अपने गमों को भूली दुनिया
खुशी तलाशने के चक्कर में
मुझे फनकार समझ बैठती है
इसका अपना एक अलग दर्द है।

© अजीत


Wednesday, August 27, 2014

कमजोरी

कमजोर आदमी ही लिख सकता
कमजोर कविता
जी सकता है कमजोर पलों को
पूरी शिद्दत के साथ
इसलिए खुद को
एक कमजोर कवि कहे जाने पर
कोई ऐतराज़ नही है मुझे
हाँ ! कुछ मित्रों को मेरे कवि होने पर
जरुर हो सकता है ऐतराज़
कमजोरी मेरे लिए कभी कमजोरी नही रही
बल्कि ताकत के छद्म अभिमान से
कहीं बढ़कर थी मेरी कमजोरी
कमजोरी ने हमेशा हौसला दिया
अपनी सीमाएं बताने का
कमजोरी ने ताकत दी
माफी मांगने की
अपनी कमजोरी पर खुलकर बात करना
हमेशा खोया आत्मविश्वास अर्जित करने का
तरीका रहा है मेरा
मेरी कमजोरी आत्म आलोचना की
अवैध सन्तान नही है बल्कि
ताकतवर या समझदार न बनने की अनिच्छा भर है
अपनी कमजोरियों को दूर करके मै
सभ्य और ताकतवर नही बनना चाहता हूँ
बल्कि हर कमजोर आदमी का हाथ थाम
उसे चूमना चाहता हूँ
हर रोते हुए शख्स के गले मिल
रोना चाहता हूँ
त्याग कर पुरुषोचित अभिमान
हाशिए पर जीते मनुष्य के दुखों पर
सुबकना चाहता हूँ उसके साथ
आज भी कमजोरियों पर पार पाए शख्स
समझदार भले ही लगें मगर
अपने नही लगते है
अपनेपन को बचाए रखने के लिए
बचा कर रखना चाहता हूँ अपनी कमजोरी
इस दौर में जहां रोज़ हमें समझदार दिखना पड़ता है
अपनी कमजोरियों के साथ
निपट बुद्धू ही ठीक हूँ मै
संसार में यह संतुलन जरूरी है
वरना समझदार और ताकतवर लोगो से
दुनिया बहुत यांत्रिक और नीरस लगने लगेगी
चूंकि संयोग से मै भी एक मनुष्य हूँ इसलिए
जितनी जिम्मेदारी ताकतवर लोगो की
इस सृष्टि को बचाने की है
उतनी ही मेरी भी है
मेरा दायित्व बोध यही कहता है
भले ही मै एक कमजोर इंसान हूँ ।

© अजीत

Tuesday, August 26, 2014

दोस्त

लाइक कमेन्ट शेयर
ये तीन अधखुले दरवाजे थे
जहां से तुम्हारी दुनिया शुरू होती थी
और शायद बंद भी
लिखे हुए के बीच बहुत सा
बिना लिखा हुआ भी था
जिसे हद दर्जे का दुस्साहस भी
स्टेट्स न बना पाया
म्यूचुअल दोस्त दरअसल
म्यूट थे उनका होना संख्याबल से अधिक
कुछ न था
टाइमलाइन उत्तरी अक्षांश पर
बहती शुष्क नदी थी
जिसमें जीवन सदैव संदिग्ध और गुह्य रहा था
तुम्हारे साथ कुछ रिश्ते
इस तरह से टैग हुए कि
उन्हें अनटैग करने की कमांड
विकसित न हो सकी
उनका ऐसे बेतरतीब टंगे रहना
इसलिए भी ज्यादती भरा था
क्योंकि
तुम्हारी कोई दिलचस्पी अपडेट रहने में नही थी
तुम दुनिया से उकता कर
यहाँ आई थी
मगर यहाँ भी वक्त के मारें, खुद से भागते
रिक्त लोगो की पूरी जमात थी
तुम्हारा इनबॉक्स इस बात का
सच्चा गवाह हो सकता है कि
प्यार की अभिलाषा में
दोस्ती ही हथियार बनती है
तुम्हारे द्वारा पोस्ट की गई हर स्माइली का
एक दार्शनिक अर्थ था
जिसको समझने के अकाउंट
डिएक्टिवेट करना पड़ता था
लाइक,कमेन्ट,शेयर,टैग और फॉलो
की भीड़ में तुम्हें तलाशने के लिए
यथार्थ का चश्मा लगा विदूषक
बनना एक अनिवार्य शर्त थी
तब शायद तुम्हारी हंसी फूटती
जो जम गई थी ग्लेशियर सी
यहाँ फेसबुक को अवसाद की ईएमआई
पर एक्सेस करने की सुविधा  थी
यह बात तुम्हें भी ज्ञात न होगी
कुछ प्रोफाइल और पेज़ के
इस अज्ञात दर्शन में तुम्हारा मिलना
किसी तिलिस्म से कम न था
तुम्हारी दुनिया की पड़ताल करते हुए
पाताल से ब्रह्मांड तक की यात्रा की जा सकती थी
बदलती प्रोफाइल तस्वीरों
और नूतन स्टेट्स के मध्य
तुम्हारी एक समानांतर दुनिया थी
जहां तुम कभी खुद पर हंसती थी
कभी फेसबुकिया मित्रों पर
तुम्हें समझना आसान था
मगर जटिलता के आकर्षण ने
तुम्हारे विश्लेषण में लगा दिया
अब तुम्हें न समझा जाता है
और न जीया ही जाता है
ठीक इस फेसबुक की तरह।

© अजीत



Monday, August 25, 2014

दस: और बस !

दस: .....और बस !
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बीमार तन
भटकता मन
तुम्हें शिद्दत से याद करता है
तुम मतलबी ठीक कहती हो
मुझे।
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मेरे तुम्हारे बीच में
संदेह का जंगल है
विश्वास की नदी है
नगें पाँव आ सको तो
आ जाओ।
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तुम्हें सोचते अक्सर
ये ख्याल आता है
जब मिलना ही था
तो इतनी देर से
क्यों मिली
शायद अधूरेपन की
कोई सिद्ध प्रमेय हो तुम।

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तुम हंसती हो तो
तारे सूरज से बगावत कर बैठते है
तुम्हे हंसते हुए देखना
दिन में तारे देखने
जैसा है।
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मेरे माथे की रेखाएं
तुम्हारी हथेली तक फ़ैली है
गौर से देखना कभी
ये कुछ आड़ी तिरछी पगडंडियाँ है
कमबख्त ! इनमें से
एक भी तो तेरे घर तक नही जाती।

***********
मेरे तुम्हारे नाम में
कोई दशमलव
क्यों नही आता
इसी बहाने
पूरे हो सकते थे हम।
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कल चाँद उदास था
वजह पूछी तो कहने लगा
इन दिनों तुम
आईना देखने लगी हो
बहुत
मै हंस पड़ा
अब चाँद मुझसे भी नाराज़ है।
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कल तुम्हारे
तकिए ने शिकायत की
वो सूखा है कई दिनों से
झूठा ही सही
याद करके रो लिया करों
कभी-कभी।
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तुम्हारी लिखावट
तुम्हारे स्पर्शो जितनी
साफ़ और घनी है
तुम्हारे खत
इसलिए नही जला पाया
आज तक।
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तुम्हारे आंसू
मीठे है
आचमन के जल से
तुम्हारी प्रार्थना काफी है
यकीन करने के लिए
कि ईश्वर है
यह बात एक नास्तिक कह रहा है।

© अजीत

Sunday, August 24, 2014

सात इतवार: कुछ यादें कुछ बातें



जैसे थका हारा परिंदा लौट आता है
लौट आऊंगा मै भी
एक दिन
इंतजार मत करना।

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सपनों के पीछे भागने से
बेहतर है तुम्हे देखना
तुम्हें देखते हुए ख्याल आता है
बेहतर जिन्दगी का।

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तुम्हारी गोद
ब्रह्मांड के हाशिए पर थी
इसलिए वक्त लगा
अंतिम सांस उसमे लेते हुए।

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तुम्हारे स्पर्श
इतने कलात्मक थे कि
मेरी पीठ आज तक
रंगी हुई है/टंगी हुई है
रंगशाला में।

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तुम्हारी चुप्पी
मेरे मौन से गहरी थी
तुम सिद्ध हो गई
और मै गृहस्थ।
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दस साल का फांसला
दूर करता है तुम्हें
अक्ल, उम्र और सड़क
कभी कितनी लम्बी हो जाती है
और हम छोटे।
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तुम्हारा काजल
बूढ़ी गुफा है
मुस्कुराती हो तो
अंदर रोशनी आती है
मै देखता हूँ अंदर खुद को
नंगे पाँव।
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© अजीत