Sunday, January 11, 2015

याद

एक मफलर
तुम्हारी याद का
गले से लिपटा पड़ा है
इस सर्दी में जब कान
होते जाते है लाल
उसी की मद्धम आंच से
बचाता हूँ खुद को
कुछ बैरंग खत मेरी जेब में है
डाकिए ने लाल कलम से
लिखा है उन पर
'लेने से इनकार किया'
इसी इनकार में
तलाशता हूँ
अपनी गुस्ताखियों की वाजिब वजहें
घटती बढ़ती धड़कनों पर
लगा देता हूँ कान
ताकि सुन सकूं
तुम्हारे नाम का संधि विच्छेद
तुम्हारे नाम पर कुछ
जबरदस्ती की दिलासाएं है
मेरे पास
इस भरी सर्दी में
जलाकर उनका अलाव
सेंकता हूँ खुद का वजूद
अब जब तुम
कहीं भी नही हो
तुम्हें बांधें रखता हूँ
मन की गिरह से
रिसते हुए तुम खत्म हुई
और पता भी नही चला
अगर पता चल भी जाता
तब भी कहां रोक पाता तुम्हें
रोकने के जिस अधिकार की जरूरत थी
वो बेरोजगारी में भी न कमा पाया
फिलहाल तो
तुम्हारी यादों की पक्की
नौकरी पर हूँ मै
लापरवाही दबें पांव आती है
और ले जाती है
सबसे कीमती समान
बिना बताए
ये पहली और आख़िरी बात
होश में समझ पाया।
© डॉ. अजीत

Saturday, January 10, 2015

पांच बातें

कहनी है पांच बातें...
-----
बचना था उसके अंदर
आधा अधूरा
इसलिए
बो दिए कुछ ख़्वाब
उसके सिरहाने
भोर के।
***
कहना था पूर्ण विराम
अंत से पहले
इसलिए
बदल दिया
सम्बन्धों का व्याकरण
आरम्भ से पहले।
***
बहना था नदी की तरह
चुपचाप
इसलिए छोड़ दिए
किनारें
मात्र एक आलिंगन के बाद।
***
रहना था कुकरमुत्ते सा
अज्ञात
इसलिए
चुन ली निष्प्रयोज्य जमीन
और अरुचि की नमी
सफेद जंगल
उतना नैसर्गिक नही था
जितना दिखता था।
***
सहना था
एकपक्षीय रिश्तों का भार
इसलिए
झुका दिए
अह्म के कंधे
चेतना की पीठ
उसकी शर्तों पर।
***
© डॉ. अजीत

प्रेम

दस बातें प्रेम की...
----

प्रेम को
अस्पष्ट लिखनें का
प्रेम से मुक्त लोगो को
प्रेम की माया में खींचनें का
अभियोग लगा था उस पर
प्रेम की तमाम सजा उसके लिए
निर्धारित हुई
जिसे प्रेम कभी नसीब नही हुआ।
****
प्रेम पर व्याख्या
शब्दों का अपव्यय था
अनुभूति मौन थी
उसके व्याख्यान
सम्वेदना से अधिक
बुद्धि के विमर्श थे
जिनकी दस्तक
दिल पर होती थी सीधे।
***
प्रेम जब
पवित्र अहसासों की गोद से उतर
उम्र के यहां मजदूरी करने लगा
तब उसके प्रेम को
वयस्क मानने से ऐतराज़ था
बाल श्रम सा अवैध
रहा उसका प्रेम
बिना किसी पुर्नवास के।
***
प्रेम की टीकाएं
इतनी व्यक्तिगत किस्म की थी कि
उनमें रूचि
भाषाई चमत्कार से आगे न बढ़ पाई
प्रेम का व्यक्तिगत होना
प्रेम का अकेला होना भी था।
***
प्रेम को देखने समझने का
सबका अपना चश्मा था
जहां प्रेम था
वहां नजर नही आता था
और जहां नही था
वहां अक्सर खोजकर बताया जाता था
प्रेम।
***
प्रेम में होने एक अर्थ
एकाधिकार और बन्धन से भी
जुड़ा था
इसलिए प्रेम अक्सर
ऊब की वजह भी बनता था
प्रेम का यह सबसे
मजबूत और कमजोर पक्ष था।
***
प्रेम में शायद का जुड़ना
एक ज्ञात भरम था
क्योंकि
क्या तो प्रेम होता है
या नही होता
शायद प्रेम का स्याद् था
जिसकी साधना कठिन थी
हमेशा।
***
प्रेम का पता तब चलता
जब ये संक्रमित कर चुका होता
दिल और दिमाग
आदि व्याधि था प्रेम
जिसका उपचार
विज्ञान की किसी विधा में
नही था उपलब्ध।
***
प्रेम बार बार हो सकता था
अंतिम प्रेम
पहले प्रेम से
मात्र इतना भिन्न था
वो देख सकता था
अपनी कमजोरियां।
***
प्रेम स्थिर होने पर
सड़ सकता था
गतिशील होने पर
सम्मान खो सकता था
यात्रा प्रेम की नियति थी
और अधूरापन
प्रेम का प्रारब्ध।
***
©डॉ. अजीत

सपनें

सपनें कम से कम 
मनोरंजन की श्रेणी में 
नही रखे जा सकते 
मनोविज्ञान भले ही 
उन्हें कहे 
अतृप्त कामना
या वर्जनाओं के आकर्षण की
अभियक्ति 
सपनें दिखाते है 
डर असुरक्षा और इनके इर्द गिर्द लिपटी
महत्वकांक्षा 
मगर सारे सपनें केवल 
इन्ही के नही होते 
कुछ सपनें आतें है बेवजह 
अमूर्त और शायद ज्यादा गहरे 
स्मृति तक नही सम्भाल पाती 
उनके छायाचित्र 
इन सपनों को नही आता
दिन और रात में भेद करना
उम्र की कोई रियायत 
उनके पास नही होती 
वो दिखा सकते 
कुछ भी 
अप्रत्याशित 
शायद वो बताना चाहते है 
सपनें सावधानी से देखों 
बंद आँख का सपना 
भले ही गल्प निकल जाए 
खुली आँख का सपना
हो जाता है सच एकदिन 
बिना हमें बताए 
सपनों का सच सपनें बताते है 
इसलिए 
न यकीन बचता है 
न स्मृति 
शेष बचता है अफ़सोस 
और सपनें न सम्भाल पाने का कौशल
वो भी किसी 
अधूरे सपनें की शक्ल में।
© डॉ. अजीत 






Wednesday, January 7, 2015

नजरअंदाज़

जीवन के अमूर्त
स्थापत्य में छूट जाती है
अनायास ही
बेहद मामूली चीज़े
जैसे सुंदरतम रचना में छूट जाता है
एक छोटा सा भाव
नजरअंदाज़ करने की कला
बन सकती है जीवन का बड़ा सूत्र
बशर्ते
छूटी हुई चीज़ो के प्रति
समानुभूति हो
यात्रा के अनावरण में
छिपी होती है तैयारी
आकर्षण अज्ञात से बड़ा
ज्ञात का हो सकता है
देखते हुए मन का एकांत
निर्वात को सूंघ लेना
बड़ी बात हो सकती है मगर
उतनी भी बड़ी नही कि
खुद को सिद्ध मान लिया जाए
त्रुटि का होना एक संकेत है
या फिर अस्तित्व का अह्म पर वार
जिसे देखने के लिए
लौटना पड़ता है
आरम्भिक बिंदू पर
एक छोटी सी तैयारी के साथ
दरअसल
छूटना या छोड़ देना
दो अलग चीजे है
जिनका भेद तब समझ आता है
जब इनका हिस्सा बनते है हम
विभाजित होनें का दुःख
अकेला होने से छोटा होता है
तभी
भीड़ का एकांत
मन के निर्वात को धकेल देता है
गलतियों के जंगल में
वहां से बेहताशा दौड़ते हुए
खुद तक लौटते है हम
थकावट ऐसी छोटी मोटी गलतियों को
नजरअदाज़ कर भी दें
हम नही कर पाते
खुद को नजरअंदाज़ कभी।

© डॉ. अजीत 

आदत

सबसे पहले कमेंट
गैरहाजिर हुए
फिर लाइक
शेयर के लायक
अवसर तो पहले से ही कम थे
टैग किया हो कभी
ऐसा ध्यान नही आता
फेसबुक के लाल ग्लोब से
इस तरह तुम्हारे खत गायब हुए
जैसे दूर समन्दर का कोई निर्जन टापू
डूब जाता है धीरे-धीरे
इनबॉक्स में तल्खियों के जंगल में
तलाशता हूँ
चंद नरम लहज़े
मरहम के माफ़िक
उनका लेप काम आता है
एकांत की टीस में
कुछ शिकायतों के हरे शैवाल
ठंडक देते है अपनेपन की
उन तस्वीरों नज़्मो और कविताओं
से तुम्हारी पहली लाइक रंग
धीरे धीरे उड़ रहा है
जो कभी बढ़िया होने का
दावा किया करती थी
कमेंट में स्माईली और शब्दों की दूरी
निरन्तर बढ़ती जाती है
उनको पढ़ने के लिए
लगाना पड़ता है चश्मा
कई दफा
तुम्हारे जुड़ने जुड़कर साथ चलने
और अब तटस्थ रहने की
इस त्रियामी यात्रा को
खुली आँख देख नही पाता हूँ
बंद आँखों से बुदबुदाता हूँ
फेस और बुक दोनों पर
तुम्हारा कोई जवाब लिखा नही मिलता
उदासी और खीझ के पलों में
सोचता हूँ अकाउंट डिएक्टिवेट करने के बारें में
तभी फेसबुक
दिखा देती है अपनी यांत्रिक चालाकी
मिस्स करने वालों में
तुम्हारा नाम सबसे पहले देखकर
मिलती है झूठी खुशी
और लौट आता हूँ
इस आभासी दुनिया के
सुलझे-उलझे यथार्थ में
जब दस्तक लॉग इन और लॉग आउट के
मध्य से खिसक कर
बैठ जाती है ऊकडू
दिल और दिमाग के बीच
तब लगता है
फेसबुक हो सकती है जानलेवा
किसी प्रेमिका की तरह
मगर मात्र लगने से
नही बदलती आदत
जो शायद तुम्हारी वजह से
अब लत के जैसी बनती जा रही है
धीरे-धीरे
तुम्हें खबर हो या ना हो।

©डॉ. अजीत



Tuesday, January 6, 2015

विदा

अब जब सबकुछ
समाप्त होने को था
हमारे मध्य
एक अपेक्षाओं का टापू
ऐसा भी था
जिसकी बंजर धरती पर
कुछ बीज बिखरे पड़े थे
उम्मीद के
शायद कभी किसी
बेमौसमी बारिश में
कुछ आवारा ख्यालों के खाद से
उनमें अंकुरण हो भी सकता था
संभावना एक छल भी था
और बल भी
हम दोनों की अरुचि के
अवैध पुत्र थे ये बीज
परन्तु उनकी
गुणवत्ता विदा से ज्यादा
खूबसूरत थी
विदा अलविदा न बनें
यह सोचकर
एक मुट्ठी बीज हमनें
अपनी जेब में रख लिए
बिना एक दूसरे को बताए
एक दूसरे की शक्ल न देखनें के
पर्याप्त कारणों के बीच
एकमात्र यही कारण
शेष बचा था
जिसे सम्बन्ध की
अधिकतम उपलब्धि समझ
विदा की शाम पर
मुस्कुराया जा सकता था
कुछ मुस्कानों का सच
बेहद जटिल होता है
विदा और अलविदा के
बीच पसरी मुस्कान
रहस्यमयी नही
उदास होती है
एक दुसरे की आँखों में
यही पढ़ पाएं हम
अंतिम बार।

© डॉ. अजीत



Sunday, January 4, 2015

घटना बढ़ना

ऐतराज़ बढ़ने लगे है
खुदी से लड़ने लगे है

डरो मत गुफ्तगु से
हम सिमटने लगे है

दोस्तों के बीच हमारे
इश्तेहार बंटने लगे है

बदल गए तेवर तेरे
हम अब घटने लगे है

सफाई तौहीन है अब
यकीं में मरने लगे है
© डॉ. अजीत

Saturday, January 3, 2015

सच

विस्तार और सिमटने के
मुहाने पर हुई मुलाक़ात
असमंजस के विज्ञापन
प्रकाशित कर
भरम का व्यापार करती है
बढ़ते कदमों की परछाईयां
निशान नही छोड़ती
विस्तार अभिलाषा का दास है
सिमटना कमजोरी का प्रतीक
जीवन की गति
भरम के सहारे बढ़ सकती है
परन्तु टिकती यथार्थ के बल पर है
देह और चेतना के जुड़ाव
सम्वेदना का सहारा लेते है
और सम्वेदना एक अज्ञात प्यास से
जो तृप्ति से बढ़ती जाती है
तमाम ज्ञात प्रश्नों के उत्तर
उस अज्ञात से मिलते है
जिसे अनुभव कहा जाता है
संदिग्ध जीवन के सूत्र सिखाते है
भेद-विभेद
ऐसी मुलाकातों की स्मृतियां
उम्र में बड़ी मगर शक्ल में छोटी
नजर आती है
खुद का सच
जीवन के सच से
हमेशा बड़ा होता है।

© डॉ. अजीत

Friday, January 2, 2015

बदलाव

'तुम्हारे साथ-तुम्हारे बिना'
-----
तुम्हारे साथ
सीख पाया
खुद का
बेहतर अनुवाद।
***
तुम्हारे साथ
विदा कर पाया
मन की असुरक्षाएं
अतृप्त कामनाएं
और अधूरे स्वप्न।
***
तुम्हारे साथ
जी पाया
लम्हा-लम्हा
जिंदगी
उम्र छोटी शक्ल बड़ी
होती रही अनुमानों में।

***
तुम्हारे साथ
कह पाया
मन की बात
बिना परवाह किए
सीख पाया फर्क करना
बेपरवाही और लापरवाही में।
***
तुम्हारे साथ
बह पाया
नदी की तरह
छोड़ समन्दर होने का
अभिमान।
***
तुम्हारे बिना
खो दिया
अनुमान
वक्त के बदलनें का।
***
तुम्हारे बिना
पा लिया
शब्दों के ब्रह्म को
बिना किसी वरदान के।
***
तुम्हारे बिना
महसूस किया
धड़कनों में बंटवारा
आती-जाती रही वो
बिना बोलचाल के।
***
तुम्हारे बिना
देख लिया
यातनाओं का समर
अपनत्व के भेद से
मिली सशर्त मुक्ति।
***
तुम्हारे बिना
भूल गया
समय का बोध
पीठ पर बांधी
ब्रह्मांड की घड़ी
कलाई पर वक्त की हथकड़ी।

© डॉ. अजीत

Thursday, January 1, 2015

सात मील

सात मील जिंदगी...
------
भूख का रिश्ता
जिस्म या रूह से ज्यादा
जरूरत से जुड़ा था
जब से जरूरत रूपांतरित हुई
भूख समाप्त हो गई
इसका एक मतलब
यह भी निकाला जा सकता है
बीमार या भरा हुआ नही था
भूख के लिए समय नही था उसके पास।
***
स्पर्शों में
नयापन बचा रहे
इसके लिए जरूरी थी
एक दूरी
त्वचा की स्मृति धोने को
आचमन का जल पर्याप्त था
उसके लिए।
***
देह के भूगोल ने
दिए कुछ रिक्त स्थान
मन के आवेगों ने
विकल्प
दर्शन की चैतन्यता ने दी दृष्टि
मन के मनोविज्ञान ने दिए जवाब
कुछ उत्तर संदिग्ध कुछ स्पष्ट थे
प्रायः कृपांक से उत्तीर्ण हुआ
उसका अस्तित्व।
***
कुछ प्रश्नों के जवाब नही थे
कुछ के उत्तर अधूरे थे
और कुछ प्रश्न ही गलत थे
ऐसी परीक्षा में हुआ
उसका मूल्यांकन
एक कदम आगे बढ़ने की कीमत
खुद को गलत उसको सही
साबित करके चुकानी थी उसे।
***
शब्द एक मीमांसा है
शब्द एक विलास नही
शब्द जब खेलते है हमसे
सुलझा देते है मन के भरम
जब हम खेलते है शब्दों से
उलझा देते है मन व्यकारण
दीक्षांत पर
यही मिला था उसे गुरुमंत्र।
***
प्रेम प्रतिक्रिया की उपज नही थी
प्रेम आंतरिक निर्वात का दस्तावेज़ भी नही था
प्रेम स्व निर्वासन पर आश्रय निवेदन भी नही था
प्रेम आग्रह अपेक्षा से भी मुक्त था
इतने नकार के बीच
उसनें बचाए रखी
प्रेम की लौकिकता और पवित्रता
अलौकिक प्रेम काल्पनिक सच है
ये बात ठीक से पता थी उसे।
***
परिभाषाएं असंगत थी
अवधारणाएं महीन
सम्बन्धों का समाजशास्त्र आता था
मन की देहरी पर व्याख्यान देने
अपनेपन को समझते हुए
रिश्तों का आकार नापता था दिमाग
आँखें दिल के साथ थी
और दिल था छल में निष्णात
सब कुछ इतना ही अमूर्त था
उन दोनों के बीच।

© डॉ. अजीत


Saturday, December 27, 2014

हर साल

बारहकड़ी...
------
जनवरी
कुहरे में लिपटी सुबह थी तुम
चाय की चुस्कियों में उड़ती भांप
नाक को नम करती थी
आँखें इन्ही बहानों से
सीख रही थी बोलचाल
मन की लिपि लिखने के अभ्यास
ठंड की स्लेट पर हुए
तुम्हारी ऊंगलियों पर
चॉक के निशाने मिलेंगे
हर साल।
***
फरवरी
चौदह थी शायद
जब तुमनें स्वीकार किया था
दोस्त से ज्यादा
प्रेमी से कम
कुछ हमारे मध्य होना
ये मध्य का रिश्ता
बुद्ध की याद दिलाता है
हर साल।
***
मार्च
हिंदी में बसंत था
मगर तुमसे उर्दू में
गुफ़्तगु करता था
लफ्ज़ लफ्ज़
प्यार की चाशनी में डूबा
ज़बान उसी मिठास से
करवट लेती है
हर साल।
***
अप्रैल
सुबह लहज़े में नरमी
दोपहर में तल्ख़ी
शाम को बेख्याली
रात में गुम हो जाना
इधर मौसम ने करवट ली
उधर तुम्हारे मन ने
सम्बन्धों का संधिकाल था
जिसका महीना बदल जाता है
हर साल।
***
मई
देह की गंध
मन के झरनें पर
पानी पीने आती थी ओक से
तुम्हारी नजदीकी
तपते माथे पर
खुशबू का तिलक लगती है
बिना स्पर्श किए
तुम्हारे गुम हुए रुमाल से
अब भी माथा साफ़ करता हूँ
हर साल।
***
जून
इधर ख़्वाबों की लू चलती तो
उधर बिना पूछे
तुम्हारा ग्रीन दुपट्टा लपेट लेता
मस्तक पर
खुद को यूं बांधना
मौसम से ज्यादा
दिल की जरूरत थी
डिटर्जेंट की खुशबू को
तुम्हारी खुशबू से अलग कर पाता था
हर साल।
***
जुलाई
वो पहली बारिश थी
जिसमें तन के साथ
भीग रहा था मन
भीगने के सुख में
सबसे बड़ा दुःख यह था
नही देख पाएं
एक दुसरे के आंसू
फिर यूं हुआ
आंसू सूखते गए
हर साल।
***
अगस्त
थोड़ी व्यस्त
थोड़ी त्रस्त
थोड़ी मस्त थी तुम
मैने मांगी तुमसे
एक मुठ्ठी खुशी
तुमनें दे दी दो मुठ्ठी
तब से इस महीनें
लड़खड़ा जाता हूँ
हर साल।
***
सितम्बर
अफवाहों
गलतफहमियों
का दौर था
स्पष्टीकरण अधूरे थे
शंका सन्देह के बीच
अपनत्व भटक रहा था अकेला
तमाम गुस्ताखियों के बावजूद
अंत तक रिश्ता सम्भल गया
इस बात पर
ईश्वर को धन्यवाद
भेजता हूँ
हर साल।
***
अक्टूबर
लगभग निर्वासित जीया
तुम्हारी दुनिया से
एक दुसरे में सांस लेती
जिंदगियों की नब्ज़ पढ़ने का हुनर
इस निर्वासन की अधिकतम
उपलब्धि थी
जिसकी शायद जरूरत न पड़े
हर साल।
***
नवम्बर
उम्र भर रहेगा याद
तुम्हें अंजुली भर देख पाया
तुम्हारी आँखों में
सपनें बो आया
मिली दी तुम्हारी रेखाओं से
खुद रेखा
मानकर यह
कल किसने देखा
यूं बेवजह भी याद आऊंगा तुम्हें
हर साल।
***
दिसम्बर
जैसे एक यात्रा का पूरा होना
तुम्हें पाकर खोना
खोकर पाना
खुद को खुद ही
समझाना
तुम्हें हमेशा आसपास पाना
वक्त का गुजरना
मगर
खुद का ठहरना
जैसे वक्त रहा था बीत
सघन होती गई प्रीत
साल का सदी होना
आता रहेगा याद
हर साल।

© डॉ. अजीत










Friday, December 26, 2014

दस्तक

जलाओं दिये नए मगर तेल पुराना हो
उम्मीद मत रखो रिश्ता गर निभाना हो

हंसकर बताना किस्से अपने बर्बादी के
तरीका यही है गम अपना गर छुपाना हो

वो बुलाता है महफ़िल में तुमको अक्सर
तन्हा चले जाना गर रुसवा हो जाना हो

कुछ नई गजल बचाकर रखना जरूर
लोग बहरे हो जाते है शेर गर पुराना हो

आसानी से हासिल नही होता वो सबको
दस्तक देते रहना गर उसको अपनाना हो

© डॉ. अजीत

Thursday, December 25, 2014

डर

अक्सर मुझे डराता बहुत है
वो शख्स मुस्कुराता बहुत है

किस्से सुनकर हैरत में हूँ
बताता कम छिपाता बहुत है

बुरे वक्त पर काम आता है
कमी एक है जताता बहुत है

जख्म खाना शौक है मेरा
वो मुझे समझाता बहुत है

निशां उसके मिटते नही है
आदतन वो मिटाता बहुत है

© डॉ. अजीत

Wednesday, December 24, 2014

ख़्वाब

कुछ ख़्वाब केवल 
आँखें देखती है 
उन्हें देखने की इजाज़त 
दिल और दिमाग नही देते 
ऐसी बाग़ी आँखों से 
नींद विरोध में विदा हो जाती है 
ऐसे ख़्वाब बहुत जल्द 
नींद की जरूरत से बाहर निकल आते है 
वो हमारी चेतना का हिस्सा बन
खुली आँखों हमें दिखते है 
दिल अपनी कमजोरी दिखाता नही
दिमाग को जताता है अक्सर
और दिमाग की होती है एक ही जिद
वो देखना चाहता हमें हर हालत में 
विजयी और सफल 
दिल धड़कनों की आवाज़ सुनता है 
सुनकर डरता है 
वो भांप लेता है 
मन के राग के आलाप 
जो बज रहे होते है 
बिना लय सुर ताल के 
इन ख़्वाबों को देखते हुए 
न रूह थकती है और न आँख 
दोनों ही करती है इन्तजार
एक ऐसे ख़्वाब के सच होने का 
यही इन्तजार बनता है जीने की वजह 
मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में ऐसे ख़्वाब 
ईश्वर के नियोजित षडयन्त्र का हिस्सा होते है 
क्योंकि 
ऐसे ख़्वाब कभी पूरे नही होते 
बस उनका अधूरापन 
उन्हें न कभी बूढ़ा नही होने देता
और न मरने देता है।

© डॉ. अजीत

मुड़ना

कई बार
लौट कर शुरू करना चाहतें है
वहीं से
जहां से मिले थे
और चले थे साथ
अतीत की यात्रा
एक तरफा होती है
वहां केवल जा सकते है
आने के दरवाजे बंद कर देती है
सुखद स्मृतियां
वर्तमान की खीझ
अतीत पर नही लाद सकते
इसलिए भविष्य से डर जाते है
अचानक
फिर भटकते है
भूत वर्तमान और भविष्य के जंगल में
बेहद अकेले
अतीत मासूम
वर्तमान षडयंत्रकारी
और भविष्य उलझा हुआ लगता है तब
कभी खुद को प्रश्न उत्तर से छलते तो
कभी समझदार होने का अभिनय करते
अतीत सदैव आकर्षित करता है
वर्तमान की कीमत पर
भविष्य को नेपथ्य में धकेल
जीना चाहते है वे कुछ पल
जब सब कुछ कितना
साफ़ सहज और सरल था
यात्रा का मध्यांतर
उलझने पर
आरम्भ के चंद कदम याद आतें है अक्सर
चलते चलते पीछे मुड़कर देखना
शायद आदत या आस नही
एक किस्म की मजबूरी होती है।

© डॉ. अजीत

Monday, December 22, 2014

उसका कहना

उसका कहना मेरा बहना...
----
अक्सर उसने
बिछड़ते वक्त कहा
ख्याल रखिए अपना
मगर
कैसे रखा जाता है
ख्याल खुद का
यह नही बताया
शायद ज्यादा समझदार
समझती रही मुझको।
***
एक दिन उसनें कहा
तुम बुद्धु हो निरे
मैंने कहा
मै तो खुद बुद्ध समझता हूँ
फिर वो हंसती रही और बोली
अब पक्का यकीन हो गया है।
***
अक्सर वो कहती
डोंट ट्राई टू बी ओवरस्मार्ट
और मै कहता
कभी ऐसा बनने की जरूरत
महसूस नही हुई तुम्हारे साथ
वो खुश हो कहती
होगी भी क्यों
हम दोनों ही बेहद स्मार्ट है।
***
एक दिन वो जिद करके बोली
मेड फॉर ईच अदर का अर्थ समझाओं
मैंने कहा जिस दिन
कुछ समझाने की जिद न रहे
उस दिन खुद समझ जाओगी
इसका अर्थ
पहली बार
मेरे जवाब से संतुष्ट थी वो।
***
अक्सर वो कहती
तुम इतने आउटडेटड क्यों हो
मै चुप रह जाता
समझ भरे लहजे में वो कहती
चलो जो भी हो
बेहद अच्छे हो तुम
ऐसे ही रहना।
***
कई बार वो बातों में
अपनी शर्ते लगाती
और कहती
यूं है तो ठीक है
तब मै उसकी बात मान लेता
अगले ही दिन वो कहती
कल मै गलत थी
फिर भी तुमनें क्यों मानी
मेरी बात
मै मुस्कुरा भर देता
वो समझ जाती
रिश्तें की ख़ूबसूरती।
***
कभी कभी वो
बच्चों की तरह
अटक जाती एक ही बात पर
तब उसको समझाना पड़ता
बड़प्पन का दुःख
वो बचपन को जीते हुए
समझने का अच्छा अभिनय करती
मगर मै पकड़ लेता
उसका छूटा हुआ सुख।
***
अचानक उसनें एक दिन कहा
तुम बहुत समझदार हो
तुम्हारे काबिल नही हूँ मै
वो दिन मेरी समझ के लिहाज़ से
सबसे निर्धन दिन था।
***
एक दिन उसनें चिढ़ कर कहा
तुम बहुत इरिटेट करते हो कई दफा
मुझे थोड़ा बुरा भी लगा
वो मेरा मन पढ़ते हुए बोली
ज्यादा महान मत बनो
इरिटेट मै भी बहुत करती हूँ
चलों हिसाब बराबर हुआ
चाय पीतें हैं चलकर।
***
उसके अंदर बसते थे
कई किरदार
उसकी बातों में होती थी
किस्म किस्म की खुशबू
उसको समझना
खुद को समझने जैसा था
उसकी अनुपस्थिति में
उसको जान पाया
यह मेरे जीवन का
स्थाई खेद है।

© डॉ. अजीत 

गलतफहमियां

पांच गलतफहमियां...
------

पढ़ा है
इबोला जान लेकर रहता है
सम्भव है इसमें
वैज्ञानिक सच्चाई हो
अनुभव कहता है
अबोला जानलेवा होता है
मनोवैज्ञानिक सच है यह
भोगा है जिसे कई बार।
***
सुना है
वक्त हर जख्म भर देता है
मगर
कुछ जख्म बढ़ते वक्त के साथ
गहरे होते जाते है
वक्त उन्हें ताजा रखता है
मनुष्य को बैचैन देखना
वक्त का प्रिय शगल है।
***
देखा है
वक्त और इंसान को
बदलते हुए
बदलाव एक प्रक्रिया है
जिसकी गति संदिग्ध होती है
परन्तु
परिणाम निश्चित।
***
जाना है
तुम्हें अपना हिस्सा
इसलिए
तुम्हारा अधूरापन
मेरे एकांत का
छोटा भाई है
जो साथ लड़ते लड़ते
प्रेम करना सीखते है
अक्सर।
***
माना है
खुद को कमतर
तुम को बेहतर
इसलिए
दोष दिया/माफ़ किया
खुद को खुद ही
बिना तुम्हें बताए।
***
© डॉ. अजीत 

Friday, December 19, 2014

ईएमआई

अंतिम आठ ईएमआई...
-----

मेरे हिस्से का खर्च लौटाकर
तुम तटस्थ होना चाहती हो
भूल जाती हो
तुमसें कारोबार का नही
दिल का रिश्ता था
सच में लौटाना चाहती हो कुछ
तो लौटा दो साथ बिताएं लम्हें
शायद हो जाए फिर
हिसाब किताब बराबर।
***
तुम्हारा
पलायन अनापेक्षित था
ठीक जैसे
तुम्हारा मिलना भी
तुमनें हर बार चुनी सुविधा
मेरे माथे पर
असुविधा का विज्ञापन छपा था।
***
सिमटना और बिखरना
तुम्हारी एक फूंक पर
निर्भर था
शाम होने से पहलें
तुमनें शमां बुझा दी
अंधेरा हम दोनों के बीच
हिस्सों में पसर गया था।
***
हम खर्च होते रहे
शब्दों के जरिए
मौन रहकर
बचायी जा सकती थी
रिश्तों की जमा पूंजी।
***
तुमनें पढ़ा था
सम्बन्धों का भूगोल
अर्थशास्त्र के साथ
मेरा विषय
मन का विज्ञान था
दर्शन के साथ
असंगत विषयों का विमर्श
निष्प्रोज्य हो जाता है अक्सर।
***
दोष तय करना
उपचारिक प्रयास था
दोनों ने तय किए
अपनें अपनें हिस्सें के
अपराध और सजा भी
ऐसे मुकदमें
विचाराधीन रखना भी
मुश्किल था दोनों के लिए।
***
अच्छी बात यह थी
उम्मीद बाँझ नही हुई थी
वक्त के यहां गिरवी रख बैचेनियां
दोनों देखें गए थे
प्रार्थनारत
अपनें अपनें
निजी मंदिरों में।
***
चाहा था हंस पातें
अपनी भावुक मूर्खताओं पर
देख पातें विस्मय से
एक दुसरे की कमजोरियां
सम्बन्धों की प्रयोगशाला में
दो असफल वैज्ञानिक थे हम
स्नेह सम्बल के पुरूस्कार से वंचित।

© डॉ. अजीत

Thursday, December 18, 2014

शून्य सफर

शून्य से शून्य तक: दस सफर
----

एक विराट शून्य
तुम्हारी ऐडी बना गई
वापिस लौटते समय
तुम्हारे पदचिन्ह
मानचित्र थमा गए
निर्वासन के टापू का।
***
पीड़ाएं जो दी
शब्दों ने
भूल गया हूँ
नही भूल पाता
तुम्हारा लहज़ा।
***
तुम्हारी तटस्थता
एक युक्ति थी
मेरी निकटता
एक बिखरी हुई सच्चाई
तुम देख पाई
अपने हिस्से का सच
त्रासद बस यही था।
***
देह के गलियारें
स्पर्शों के मुहाने मिले
दो आईनें
नही देख पातें
आपसे में
एक दूसरे के चेहरें
आइनों और रिश्तों का सच
मिल जाता है कई बार।
***
सही या गलत
पाप या पुण्य
सच या झूठ
सबके अपनें अपनें
संस्करण
अपनें अपनें मुकदमें
कुछ असहमतियां
सम्प्रेषित नही हो पाती
शब्द भरम बन जाएं
ये ब्रह्म की चाल है।
***
मन का रास्ता
बुद्धि से छोटा था
और बुद्धि
भटकाव की शिकार
निर्णय सब के सब संदिग्ध
तुम्हारी आश्वस्ति
मेरी आसक्ति
डराती थी बस।
***
तुम्हारी हथेलियों पर
नही तलाश पाया
अपनत्व का नक्शा
बतौर यायावर
यह सबसे बड़ी
अज्ञात असफलता है।
***
तुम्हारी लौटती परछाई
देख रही थी
मेरी तरफ
पहली दफा देखा
पीठ पर उगती
आँखों को।
***
तुम्हारे उद्देश्य
स्पष्ट थें
और अभिव्यक्तियां अमूर्त
मेरे अनुमान गलत थे
और
कल्पनाएं सच।
***
तुम्हारे बाद
करना पड़ा खुद को खारिज़
सोचना पड़ा
अपनें निर्णयों पर
सुख हो या दुःख
अतीत को सम्पादित करना चाहते है
मजबूर मनुष्य
ईश्वर का कद बड़ा करता है
यही जाना तुम्हारे बाद।

© डॉ. अजीत

ताप प्रलाप

ताप के दस प्रलाप...
----

सारे चयन तुम्हारे थे
मिलना
नही मिलना
कभी-कभी मिलना
कभी नही मिलना
मै था
तुम्हारे मन के
अघोषित निर्वात का
ऐच्छिक स्थान पूरक
ये व्याकरण
समझ तो रहा हूँ
मगर स्वीकार नही पा रहा हूँ
अल्पबुद्धि के अल्पविराम
तलाशता हूँ
अपने एक तरफा
अपनेपन में।
***
सन्देह
ज्ञात उत्तर था
कल्पना
स्वयं एक प्रश्न
विवेचना
अर्जित ज्ञान की सीमा
अनुभव
धारणाओं के
बंधुआ मजदूर
और हम तुम
अज्ञानी
मानस वैज्ञानिक
सम्पादक अपनी अपनी
असुरक्षाओं के।
***
अभिलाषा की पूर्णता
अप्राप्यता की दासी लगी
और प्राप्यता
वर्जनाओं के द्वारपाल
इधर तुम कामनासिद्ध हुई
उधर तुम्हारे जीवन में
मै अप्रासंगिक
विकर्षण बना
बोध का अवैध पुत्र।
***
शब्दों का हिसाब
दिया जा सकता है
क्षणों को विस्मृत
किया जा सकता है
परन्तु
कुछ भाव जो केवल
तुम्हारे लिए जन्में थे
उनका स्थगन
किसी उच्च न्यायालय से
नही मिलता
उनकी इच्छामृत्यु की अर्जी
दाखिल करता हूँ
अज्ञात अदालत में
शायद अनुमति मिलें
और मृत्यु हो कम कष्टकर।
***
तुम्हारे आने ने
जितना सरल किया था
तुम्हारा जाना
उतना ही
जटिल कर गया है मुझे
अब शब्द बेफिक्र
बहते नही हवा से
सावधान हो
सड़ते जाते है
स्थिर जल से।
***
जानती हो
दुनिया में सबसे बड़ा
दुःख क्या है
बार बार खुद को
इस उम्मीद पर ठगना कि
दुनिया तुम्हें
ठीक से समझ रही है
दरअसल
दुःख मनुष्य की
भावुक मूर्खता का
ऐच्छिक चुनाव का प्रतिफल है।
***
खेद यह भी है
तुम ईश्वर के उस षडयन्त्र का
हिस्सा बनी
जिसमें वो
देखना चाहता है मुझे
हताश
दुःखी और
आत्महन्ता।
***
तुम्हारे अचेतन की
आदर्श कामना का
प्रतिबिम्ब
मुझे प्रकाशित करने की बजाए
क्षणिक आवेग का
हिस्सा बन
चल गया था अपनी चाल
मैं हंस रहा था दृष्ट भाव से
तुम रो रही थी
उसे पाप समझ।
***
निसन्देह
तुम्हारे प्रश्न
नैतिक थे
उनके उत्तर
दर्शन की शाखाओं से उड़
मनोविज्ञान की गोद में
लोरी सुन रहें थे
अपराधबोध में
तुमनें उनको जगाया
ये तुम्हारा अपराध है
इन्तजार करती
उनके नींद से जागने तक।
***
एक बूढ़ा स्वप्न देखता हूँ
जवानी के दिनों में
जब उम्र न बढ़ें और न घटे
इस अवस्था में
उस स्वप्न को
अतृप्त कामना नही कह सकता
क्योंकि उस स्वप्न में
तुम स्वीकारती हो
मुझमें बिना शर्त रूचि का होना
गौरतलब हो
मैं स्वप्न की बात कर रहा हूँ
यथार्थ की नही।

© डॉ. अजीत

Tuesday, December 16, 2014

ख़्वाब

यादों के बरक्स
महकतें है लम्हें
कुछ पुरकशिस
अहसास रिसते है
आहिस्ता आहिस्ता
स्पर्शों की महक
कपूर की डली बन
उड़ने लगती है
बहकती ही साँसे
नशे की तरह
देह की पीठ पर बैठ
मन करता है बातें
सिमटने लगता है वजूद
धड़कनो का बढ़ना
नब्ज़ का धीमा होना
तुम्हारी यादों के हवाले से
मन के नाद को सुनना
जहां तुम समाधिस्थ
उच्चारित करती हो
मेरा नाम
भोर के मंत्र की माफिक
काया के पुल पर
साँसों का विनिमय
कभी निशब्द
कभी बुदबुदाता
कभी मौन
तुम्हारी यादों के
बैरंग खत
लौट आते है
हर इतवार
जिन्हें चुपके चुपके
पढ़कर
कर देता हूँ
ख्वाबो के हवाले
ख़्वाब तुमसें मिलनें की
ब्रह्माण्ड की सबसे
सुरक्षित जगह है।

©डॉ.अजीत

वक्त के आरपार

वक्त के आर-पार...
-------

चौंबीस घंटे का
एक नियत चक्र
और रोज़ शाम
तुम्हारी याद की दस्तक
जैसे
हिस्सों में बंटना
किस्तों में कटना
तुमसे अधूरा ही मिलना होगा
इस जन्म में।
***
थोड़ी रात के ख़्वाबों की तसल्ली
थोड़ी सुबह की चाय
थोड़े दोपहर के काम
चार बजे तक खींच लाते है
शाम आती है
चाय पर तुम्हारा इंतजार करता हूँ
तुम्हारा न आना निश्चित है
मुझे जीवन में
अनिश्चितता से
इसलिए भी प्रेम है।
***
रात को सोने
सुबह को जागने
और दिन में भागने के बीच
तुमसे कब मुलाक़ात हो
सोचता रहा हूँ अक्सर
वक्त का बीतना
खुद के साथ
सबसे हसीन धोखा है।
***
दीवार पर टंगी घड़ी
डरा देती है कई बार
उसकी आवाज़ कहती है
तुम नही तुम नही तुम नही
एक घड़ी मन की दीवार पर टंगी है
जो कहती है तुम हो तुम हो तुम हो
मैं इन दोनों घड़ियों का
वक्त मिलाता रहता हूँ।
***
वक्त गुजरता नही
फिसलता भी
तुम्हारे साथ अक्सर
वक्त कम पड़ जाता है
और खुद के साथ
अक्सर ज्यादा
जैसे शाम होते होते ही होती है।
***
तुम्हारी कलाई पर बंधी घड़ी
मेरे घड़ी से आगे है
और मेरी घड़ी का दावा
आगे होने का है
समय के अपने
षडयन्त्र होते है
मनुष्य को अप्रासंगिक सिद्ध करने के।
***
तुम्हारी हंसी
सूरज पर उधारी चढ़ाती है
कायनात की रोशनी में
तुम्हारा भी हिस्सा है
मै सितारों से अवसाद मांगता हूँ
उनकी प्रकाश वर्ष में दूरी है
मगर वो जलते बुझते दिखते है
मेरी तुमसे दूरी ज्ञात है
मै न जलता हूँ
और न बुझता हूँ।
***
अच्छा वक्त या बुरा वक्त
होता भी है
समझ नही पाता हूँ
वक्त का होना प्रमाणिक लगता है
जब तुम साथ होती हो
तुम्हारे बिन
वक्त घड़ी में दौड़ता है
मगर नजरों में खो जाता है।
***
मौसम और वक्त को जोड़कर
अनुभूत करना मुश्किल लगता है
तुम्हारे सत्संग से
बिगड़ जाता है
मन का भूगोल
जलवायु को उलट देती हूँ तुम
दिसम्बर में तुम्हें याद करते हुए
मेरे माथे पर पसीना है।
***
वक्त बेहद चालाक है
ये बाँट देता है
खुशी गम रंज के घंटे
इनमें उलझाकर
तुमसे दूर करने के
तमाम जतन करता है
मै अगले दिन को उधार मांग
तुम्हें याद करता हूँ
मानों चाहे न मानों
इस मामलें में तुमसे
एकदिन बड़ा हूँ मैं।

© डॉ. अजीत

वापसी

लौट कर आना
एक उपक्रम है
जो नही लौटते
खो जाते है
दुनिया केवल
दिखते चेहरों का
हिसाब रखती है
खो जाने में और
मर जाने में कोई
बड़ा बुनियादी फर्क नही है
दोनों की ही स्मृतियों को
धीरे धीरे वक्त
चट जाता है
शेष बचती है
गुमशुदा लोगो की
फेहरिस्त वो भी
दीमक खाए मन के
नोटिस बोर्ड पर।

© डॉ. अजीत

वापसी

लौट कर आना
एक उपक्रम है
जो नही लौटते
खो जाते है
दुनिया केवल
दिखते चेहरों का
हिसाब रखती है
खो जाने में और
मर जाने में कोई
बड़ा बुनियादी फर्क नही है
दोनों की ही स्मृतियों को
धीरे धीरे वक्त
चट जाता है
शेष बचती है
गुमशुदा लोगो की
फेहरिस्त वो भी
दीमक खाए मन के
नोटिस बोर्ड पर।

© डॉ. अजीत