Monday, October 15, 2018

नाराजगी


एक दोस्त नाराज़ है
कुछ दोस्त नाराज़ है
सभी दोस्त नाराज़ है
कोई दोस्त नाराज़ नही है
ये किसी प्रतियोगी परीक्षा का
तर्क शक्ति के परीक्षण से जुड़ा प्रश्न नही है
बल्कि ये जीवन से जुड़ा एक अहम सवाल है

मैं इसे तर्क की नही
दिल की दृष्टि से देखने की करता हूँ कोशिश

नाराजगी जब आती है तर्क पर होकर सवार
तब दिल हो जाता है एकदम लाचार

नाराजगी एक घटना है
नाराजगी एक निर्णय है
नाराजगी एक पलायन है
नाराजगी एक मनोदशा है
या फिर
नाराजगी एक अस्थायी वस्तु है

दरअसल, नाराजगी कोई वस्तु नही है
इसलिए नाराजगी की वजह होती है थोड़ी तरल

जो बहती है बिना किसी ढ़लान के

नाराजगी से बने गलियारे
भीगते रहते है हर छ्टे छमाही
करके अच्छी-बुरी बातें याद

दोस्तों की बीच नाराजगी
कोई नई बात नही होती
मगर ये इतनी भी नई नही होती कि
जिसकी बिलकुल न आए याद

नाराजगी बने रहना प्रेम का प्रमाण है
और नारजगी का टिके रहना
कर देता है हर किस्म के प्रमाण को ध्वस्त
इसलिए हमेशा रहती है अज्ञात
नाराज दोस्त की नाराजगी की असल वजह.

© डॉ. अजित



Monday, October 8, 2018

खोना-पाना

उसने कहा
यदि तुम होते
तो होते एक बेहद खराब प्रेमी
मैंने हंसते हुए
ये तो अच्छा ही हुआ
मैं नही हूँ प्रेमी
उसने थोड़ा उदास होकर कहा
इतना भी अच्छा नही है
तुम दोस्त हो
बस इसलिए लगता है अच्छा।
**
मैंने पूछा
दोस्त और प्रेमी में
क्या फर्क होता है तुम्हारे हिसाब से
उसने कहा
हिसाब-किताब में कमजोर हूँ मैं
बस इतना पता है
अगर नही होता कोई फर्क
तो फिर ये सवाल न करते तुम।
**
चाय पीने के बाद
कप को धोते समय मैंने कहा
चाय पीने के बाद
कितने अकेले हो जाते है कप
उसने कहा
हां !अकेला होना
उस हर चीज की नियति है
जिसे ज्यादा करीब ले आते है हम।
**
अचानक उसने पूछा
तुमनें आज तक
अपनी सबसे प्रिय चीज क्या खोई है?
मैंने कहा
ठीक-ठीक बता नही सकता
क्योंकि खोने बाद पता चला मुझे
ये चीज प्रिय थी मुझे
और तुमनें?मैंने उसका सवाल दोहराया
शायद तुम
मगर ये बात पहले से पता थी मुझे
उसनें हंसते हुए जवाब दिया।

©डॉ. अजित

Sunday, October 7, 2018

घर तोड़ने वाली स्त्रियां

उन्हें घर तोड़ने वाली
स्त्रियां कहा जाता था लोक में
मगर वे थीं
वक्त से लड़ते किसी पुरुष की
सच्ची शुभचिंतक

वें बता सकती थी
उन्हें उनके घर का रास्ता
घोर अंधकार में भी
उनके पास होते थे
सटीक पूर्वानुमान
जैसे वो देखकर आयी हो
पुरुषों का भविष्य

वो प्रेम नही करती थी
प्रेम की बात जरूर करती
वो भी यदा-कदा
उनके लिए पुरुष था
समानुभूति का पात्र

अपने दुःखों का नही था
उनके पास कोई आकर्षक विज्ञापन
पुरुषों की कलाई पर बंधे कलावे का
सबसे कमजोर धागा बनना पसन्द था उन्हें
बशर्ते पुरुष पराजित कर दे
अपनी सभी अशुभताओं को एक साथ

वे दुनिया भर में छिटकी हुई थी
अल्पसंख्यक की तरह
मगर मनुष्य की लौकिक विजय में
हमेशा होता था उनका एक अंश हाथ

उन्हें नही किया जाता था
कभी याद कृतज्ञता के साथ
बल्कि छिपाई जाती थी
उनकी स्मृतियां
बोले जाते थे झूठ

उनका वजूद सम्प्रेषित करने में
असमर्थ था दुनिया का प्रत्येक
रचनात्मक पुरुष
वो थी इस कदर अमूर्त
नही बन सकता था
उनका जीवन में कोई स्थान

वो जीवन में होती थी उपस्थित
किसी ईश्वरीय हस्तक्षेप की तरह
वो जीवन से होती थी विलुप्त
किसी मैदानी नदी की तरह

जिन्हें समझा जाता था
घर तोड़ने का निमित्त
उन्हीं के कारण स्थगित होती थी
अनेक आत्महत्याएं
समाप्त होते थे अनेक निजी विवाद
एक गहरे बोध के साथ

वो टोक सकती थी
दोस्त की तरह
वो रोक सकती थी 
पहाड़ की तरह
हर गलत रास्ते की तरफ बढ़ा कदम

जिन्हें समझा जाता था
घर तोड़ने वाली स्त्रियां
बहुधा उन्हीं के कारण
जुड़ा रह सका घर

ये बात केवल जानता था घर
इसलिए
घर करता था उन्हें याद
दीवारों में बसी सीलन के साथ
और छोड़ आता था
बुनियाद तक

इसलिए नही मिलता
किसी भी घर में उनका कोई चित्र।

©डॉ. अजित








Wednesday, October 3, 2018

अज्ञातवास की कविताएँ


अज्ञातवास की कविताएँ
--
अज्ञातवास
पहली बार एक महाकाव्य में
प्रयुक्त हुआ
दूसरी बार इसे उधार माँगा प्रेम ने
तीसरी बार यह बना मेरा चुनाव
दोनों से अलग था अज्ञातवास
बताना है थोड़ा मुश्किल
लिखना है थोड़ा आसान
ज्ञात
वास
**
उसने पूछा
तुमने पूछा
मैंने खुद से पूछा
आखिर क्या है वो अज्ञात?
जो बसना चाहता है मेरे अन्दर
एकांत की चाह
क्यों होती है प्रकट
इसका सही-सही जवाब था मेरे पास
मगर कोई नही था सुनने वाला
अज्ञातवास के समय
अज्ञातवास प्रश्नों के जवाब का नही
जवाब के प्रश्नों को जानने का समय था मेरे लिए.
**
भाषा के शुचितावादी
चिढ़ गए थे उसी दिन
जब मैंने कहा
अज्ञातवास में जा रहा हूँ मैं
उन्हें लगा ये अक्षम्य अपराध
ठीक उसी दिन जाना
मैंने इस शब्द का
चमत्कारिक प्रभाव
**
अज्ञातवास का मतलब
सम्पर्क शून्यता नही था
अज्ञातवास का मतलब विकसित करना
अज्ञातवास का अपमान था
इसलिए सम्वाद ने तय की
अज्ञातवास में लम्बी दूरी तय
और लौटकर आया मुझ तक
गहरे अपनेपन के साथ.
**
शब्दों की ध्वनि पर
आचार्यों के है अनुभूत भाष्य
इसलिए अज्ञातवास ने मुझे डराया नही
बल्कि जगाया उस नींद से
जिसमें मैं सो रहा था मुद्दत से
और थकन बरकार रही हमेशा.

©डॉ. अजित


इन दिनों


इन दिनों
उससे बातचीत बंद है मेरी
इसलिए
मैं कह सकता हूँ
मनुष्य का मनुष्य पर भरोसा ही
बचा सकता है प्रेम

इन दिनों
उसे देखे
अरसा बीत गया है
इसलिए मैं देख सकता हूँ
मौसम के अवांछित षडयंत्र
जिसे कहा गया प्रकृति
वो है प्रकृति की मुंहबोली बहन
प्रकृति को जो चंद लोग जानते है
उनमे से एक हूँ मैं

इन दिनों
मैं उदास नही हूँ
इसका अर्थ यह कतई नही कि
मेरे जीवन में दुःख हो गए है अनुपस्थित
मैंने दरअसल उसके बिना
दुखों पर बात करना कर दिया है बंद
सुख नही मंडराते मेरे इर्द-गिर्द
उन्हें दुःख की उपेक्षा का दुःख है

इन दिनों
मैंने सीख लिया
सम्बन्धो का एक  नया व्याकरण
जिसमें कोई पुनरुक्ति दोष नही है
इसलिए मैनें बदल दिए
प्रश्न चिंह और पूर्ण विराम आपस में

यह लिपि केवल तुम पढ़ सकती थी
जो इसे पढ़ने का कर रहे  है प्रयास
उनके पास सूत्र नही कयास है
वो स्मृतियों के है गुलाम
इसलिए वो कभी नही कर पाएंगे भेद
प्रेम और प्रेम पत्र में  

इन दिनों
मेरे पास सलाह की अधिकता है
इसलिए नही कर पाता हूँ
उचित-अनुचित में भेद

इन दिनों
जब तुम नही हो
मैं लिख रहा हूँ
आधा सच आधा झूठ
कुछ भी पूरा लिखने के लिए
तुम्हारा होना था बेहद जरूरी
ताकि तुम कह सको
‘ये ठीक नही किया तुमने’

© डॉ. अजित




Saturday, May 26, 2018

विकल्प

मैं तुम्हारे गले लगना चाहता था
शायद थोड़ा हिचकियों के साथ सिसकना भी
बस ये बात कभी कह नही पाया
क्या ऐसा करने से
मैं साबित हो जाता
थोड़ा कमजोर थोड़ा अपरिपक्व?
नही पता तुम्हारा जवाब
मगर वो हिचकियाँ आज भी दर्ज है
तुम्हारी याद की शक्ल में

मैं थोड़ी देर के लिए
तुम्हारा हाथ अपने हाथों में लेकर
बैठना चाहता था एकांत में
मगर कभी बढ़ा नही पाया
खुद ही का हाथ
मुझे लगा ऐसा करने से
संप्रेषित हो सकता है
एक ऐसा अर्थ
जिसका फिलहाल कोई अर्थ नही
अर्थ अपना अनर्थकता पर
आज भी हंसता है मेरे एकांत में
और मैं बह जाता हूँ
किसी धार्मिक नदी के बहाव की तरह
जिसे बाद में समझा जाता है
मोक्ष के निमित्त आत्महत्या

मैंने कई बार देनी चाही तुम्हें आवाज़
मगर मेरे शब्द खो गए
कहीं बीच में
ये वही बीच था जहाँ मुझे तुमसे कहने था
आंखों में आंखें डालकर एकबार
हां ! तुम मेरी जरूरत हो
तुम हो एक न बदलने वाली आदत

ये कुछ अफसोस है मेरे पास
एकदम निपट बेकार
बेहतर होता है मैं कह देता या कर देता
जो भी कहा है उपरोक्त

उपरोक्त मेरे जीवन का खेद है
जिसके नीचे ग्लेशियर की शक्ल में
शांत पड़ा हूँ मैं
मेरा वेग है अज्ञात
मेरा जो भी है ज्ञात
उसमें असंख्य ऐसे ही
कर्म और वचन है
जो रह गए है निशक्त

मैं आज भी कहना चाहता हूँ तुमसे
मेरे जीवन में नही है
तुम्हारा कोई विकल्प
मगर नही कह सकूंगा
शायद इसी कारण
तुम्हारे जीवन में बन गए है
मेरे विकल्प।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 18, 2018

एकदिन


एकदिन बीत जाती है
सारी बातें
याद करने के लिए सोचना पड़ते है
चेहरें,प्रसंग और कुछ शिकवे-शिकायत 

प्यार दुबक जाता है
किसी निर्वासित कोने में

मैं आँख बंद करके सोचता हूँ
तुम्हारी बेहद मामूली बातें
और मुस्कुरा पड़ता हूँ
जैसे कोई ध्यानस्थ योगी
पा गया हो कैवल्य का मार्ग

इनदिनों जब
तुम नही हो
तो मैं भी नही हूँ कुछ-कुछ जगह

मैं जहां हूँ वहां नही आती तुम्हारी आवाज़
नही दिखती तुम्हारी शक्ल
इनदिनों मैं अतीत नही
भविष्य में भटकता हूँ
एकदम निर्जन अकेला

और
सोचता हूँ
तुम अगर साथ होती तो
कभी बीतता ही नही
हमारा सांझा अतीत.

©डॉ. अजित

Saturday, March 31, 2018

भोर का स्वप्न

अभी तुम्हारा ख्याल आया
और तुम आ गए
एक चिट्ठी की तरह

मैंने डाकिए से
किसी बुजुर्ग की तरह नही पूछा
तुम्हें आने में कितना वक्त लगा

मैंने तुम्हे चिट्ठी की तरह पढ़ा
बल्कि कम लिखे को अधिक पढ़ा

जब तुम आए
मैं गा रही थी एक लोकगीत
जिसमें याद किया जाता है
सबसे पहला प्रेमी

तुम देख
मुझे याद आया
मेरा सबसे पहला प्रेमी

जब तुम जाने लगे
हवा की तरह
मेरा जी हुआ बन जाऊं
एक चट्टान और बदल दूं
तुम्हारी दिशा

मगर मैं बन गई एक नदी
जिसमें बहा दी जाती है
पुरानी चिट्ठियां
और अर्घ्य दिया जाता है
अपने ज्ञात देवताओं को

तुम चिट्ठी की तरह आए
और पानी की तरह चले गए

मैं बस देखती रह गई
सतह की काई
और आकाश की ऊंचाई

मुझे तुम्हारे साथ उड़ना था
फिसलना भी था
मगर गिरना नही था

इसलिए
तुम्हें बन्द किया लिफाफे की तरह
चिपकाकर आँसुओं के गोंद से
और रख दिया तकिए के नीचे

ताकि नींद में तुम आओ
चिट्ठी की तरह नही
किसी भोर के उस सपनें की तरह

जो किसी को बताया न जा सके।

©डॉ. अजित

Friday, March 30, 2018

असुविधा

उसनें कहा
तुम्हें लोगों के प्रेम का
आदर करना नही आता
मैंने कहा
सही कहा मैं इसमें कमजोर हूँ थोड़ा
तुम्हारी एक और खराब आदत है
अपनी कमजोरियों का
औचित्य सिद्ध करना जानते हो
उसने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा
अब कोई अच्छी बात भी बताओ
मैंने कहा
तुम अधूरेपन में खुश रहना जानते हो
यह एक अच्छी आदत है।
**
तुम खुद को समझतें क्या हो?
क्या तुम्हारे बिना
दुनिया रुक जाएगी ?
एकदिन उसने बिगड़ते हुए कहा
मेरे बिना दुनिया तेजी से चलेगी
और मैं खुद को वही समझता हूँ
जो तुम समझती हो मुझे
मैंने हंसते हुए जवाब दिया
बनो मत ! तुम्हें जिंदगी का अनुवाद आता है
मेरा नही उसने लगभग चिढ़ते हुए कहा
उसके बाद मैं उसका मूल पाठ पढ़ता रहा देर तक
चुपचाप।
**
मैंने कोई शेर सुनाया उस दिन
उसनें कहा
शायर जो कहना चाहता था
वो कहने से चूक गया इस शेर में
मगर जो तुम कहना चाहते हो
वो मैं समझ गई हूं
मैंने फिर एक दूसरा शेर कहा
सुनकर उसने
इस बार तुम चूक गए हो
शायर अपनी बात कह गया
फिर मैंने कोई शेर नही कहा
बैठा रहा चुपचाप
थोड़ी देर बाद उसनें कहा
आज हम दोनों चूक गए है
अपनी-अपनी बात कहनें में।
**
कल उसका एक
एसएमएस मिला
जिसमें लिखा था
प्रेम एक सुविधा है
मगर तुमनें असुविधा चुनी है हमेशा
मैंने उसका कोई जवाब नही दिया
बस डिलीट नही किया वो एसएमएस
पता नही ये मेरे लिए
ये सुविधा थी या
असुविधा।

©डॉ. अजित

Wednesday, March 28, 2018

बातें

उसनें कहा
जब तुम शर्ट की आस्तीन
फोल्ड कर लेते हो
तब अच्छे लगते हो
मैंने पूछा क्यों?
तुम नजर आते हो आत्मविश्वासी
लगता है हर अड़चन के बाद भी
एकदिन पहुंच ही जाओगे मुझ तक
यह सुनकर मैं हंस पड़ा
और उसनें प्यार से
एक बार और फोल्ड कर दी
मेरी शर्ट की आस्तीन।
***
मैंने पूछा
तुम्हें मैं सबसे खराब कब लगता हूँ
उसने तुरन्त दिया जवाब
जब तुम
शर्ट इन करके उसे मेंटेन करने की
करते हो खराब कोशिश
मैंने पूछा क्यों इसमें क्या खराबी है?
उस वक्त तुम बेफिक्र नही दिखते
इससे बड़ी क्या खराबी होगी
किसी मुलाकात में।
**
उसने कहा
एक खराब आदत बताओं मेरी
मैंने कहा एक नही दो है
मुझे खोने से नही डरती
खुद को पाना नही चाहती
ये तो अच्छी आदत है
उसनें हँसते हुए कहा
मगर तुम्हें पता है
इसलिए मान लेती हूँ
इन्हें खराब।
**
मैंने पूछा
तुम्हारी खुशबू
तुम्हारे बिना भी रहती है आसपास
ये क्या जादू है?
उसनें कहा
ये जादू नही कोई
ये तैयारी है
मेरे बिना रहने की।

©डॉ. अजित

Thursday, March 22, 2018

प्रसंगवश


जब तुम हंसती हो
तब नदी को पहली दफा आता है
समन्दर पर प्यार
वो बादलों से लेती है काला टीका उधार
नदी नही बताती दूसरी नदी को तुम्हारा पता
इसलिए केवल एक नदी के पास है
तुम्हारी हंसी का सही-सही अनुवाद

जब तुम रोती हो अकेले
सबसे छिपकर
रात भूल जाती है अपना समय चक्र
जल्दी आने के लिए
वो भेजती है भोर के घर हरकारा
इसलिए रात के पास नही
भोर के पास है
तुम्हारें आंसूओं की प्रतिलिपि

जब तुम करती हो कोई समझौता
तब झरना उतर आता है
अपने तल पर
वो लगाता है धरती की पीठ पर
अपने हाथ से मरहम
देखता है वेग की हिंसा
मगर लौट जाता है
बिना किसी आश्वासन के  

जब तुम करती हो कोई जिद
तब आसमान तोलता है हवा को
और तय कर देता है उसका मार्ग
इस तरह से धरती का एक हिस्सा
सुलगता है और एक होता है ठंडा एकसाथ 

जब तुम होती हो नाराज़
तब जंगल की तरफ
भागने लगता है शहर
हड़ताल पर बैठ जाते है चौराहे
मनुष्य को पहली बार वास्तव में
महसूस होता है भीड़ का अकेलापन

जब तुम मुस्कुराती हो बिन बात
तब फसल खत्म करती है
अपने कटने का शोक
वो नाचती है अन्न के पहन नुपूर
इस तरह से बिखरती है
धरती पर पहली मांगलिकता

© डॉ. अजित





Wednesday, March 21, 2018

चाहत

मैं चाहता हूँ
तुम पढ़ों  यह बात
एकांत में
सीने से लगाकर

जैसे कोई पढ़ता है
पहले प्रेम का पहला खत
अपनी अधीरता के साथ

कि
प्रेम जब रीत जाता है
तब वो खाली जगह नही छोड़ता है
वो छोड़ता है
एक खाली आकाश

जिसमें उड़ते हुए
कोई तय नही कर पाता है कि
उसे उतरना कहाँ पर है?

मैं भी उड़ता हुआ निकल आया हूँ
इतनी दूर
धरती पर नही मिलेगी मेरी परछाई

मैं चाहता हूँ  जब तुम पढ़ों यह बात
थोड़ी देर के लिए खिड़की पर टिका दो
अपनी कोहनी
और मुस्कुराओ
देखते हुए आकाश

तुम ही न कहती थी
जब कोई धीरे-धीरे आँखों से होता है ओझल
उसकी तस्वीर खींच लेता है आसमान

बस इस तरह से
अंतिम बार तुम्हें नजर आना चाहता हूँ मैं.

©डॉ.अजित

अंतिम बात

एक बात कहनी थी तुमसे
पता नही तुम इस पर कैसे रियेक्ट करोगी
ये जो तुम हंसते हुए हिचकियों की शक्ल में
लेती हो छोटे-छोटे पॉज
ऐसा लगता है जैसे नदी की एक धारा ने
आगे बढ़ने से कर दिया हो इनकार
वो खेलने लगी हो किनारे के पत्थरों के साथ
आईस –पाईस

कभी-कभी तुम कुछ कहते हुए
जब रुक जाती हो अचानक
ऐसा लगता है जैसे कोई पहाड़ी चिड़िया
भटक गई हो घाटी में
हवा का इन्तजार जितना मुश्किल होता है उसके लिए
उतना ही मुश्किल होता है
मेरे लिए उस बात के पूरी होने का  इन्तजार

जब  तुम अपने कंगन को चढ़ा लेती हो आस्तीन तक
और अकेली पड़ जाती है तुम्हारी कलाई
उस वक्त मुझे याद आता है
वो मन्नत का कलेवा
सोचता हूँ कितना अच्छा होता
उसे बाँधा होता मैंने तुम्हारी कलाई पर
इस तरह से भी पूरी होती एक मन्नत

जब तुम कहती हो -सुनो !
मैं तब सुनता नही हूँ बस देखता हूँ सुनना
और इस तरह छूट जाती है
मेरे सपनों की कस्बे वाली आखिरी बस
फिर रात भर मैं भटकता हूँ
अनजान जगह पर दर ब दर
उसी सुबह मुझे आता है एक सपना
जिसमें तुम अपना कहना छोड़कर
सुन रही हो मेरी शिकायतें

तुम्हारे कान की तलहटी में
जब एक लट डाल देती है झूला
तब मुझे लगता है कि इस बार भी
देर से आया है बसंत
तुम संभालती हो खुद को
और बिगड़ता जाता हूँ मैं

तुम्हारे माथे की लकीरों में जब
रास्ता भटकता है ईश्वर
तब मुझे दिखाई देता है वो
किसी भी प्रार्थना से अधिक स्पष्ट
मैंने उसे रास्ता दिखाना चाहता हूँ
मगर ठीक उसी वक्त
आँखें खोल देती हो तुम
इस तरह ईश्वर मेरे जीवन से होता है ओझल

ये कुछ बातें है
जो तुम्हें कहना चाहता हूँ
क्यों कहना चाहता हूँ
जिस दिन इस बात का पता चलेगा
उस दिन कहूंगा जरुर

तुम सुनों या न सुनों तुम्हारी मर्जी.

© डॉ. अजित

Monday, March 19, 2018

बीते समय से संवाद


उसने निर्णय सुनाते हुए कहा
आज के बाद नही मिलूंगी तुमसे
ये एक वादा है खुद से
मैंने कहना चाहता था मगर क्यों?
लेकिन कहा नही
कुछ जवाबों के बदले
सवाल न करना भी
मैंने कभी सिखा था उसी से.
**
उसने कहा
तुम्हारा सच को स्वीकार करने का
हौसला थोड़ा कम है
मैंने कहना चाहता था
तुम इस बार सच कह रही हो
मगर कहा नही
क्योंकि मेरा सच कहने का
हौसला भी था थोड़ा कमजोर.
**
वो चली गई अपनी राह
एकदम चुपचाप
तभी मैंने जाना
किसी के जाने के बाद
उसके जाने के कारण तलाशना
उसके जाने का अनादर करना है.
**
जब भी आती थी उसकी याद
मैं सोच लेता था उसके व्यंग्य
जब वो भूलने को होती थी
मैं याद करने लगता था अपना प्रेम
जब न उसकी याद आती
न वो भूली जाती थी
तब समझता था मैं
अब मुझे याद कर रही है वो.
**
अब जब वो नही है
मैं नही दे सकता
किसी को दोष
समय को भी नही
क्योंकि
उसके जाने के बाद
समय से कोई संवाद नही है मेरा.

© डॉ. अजित

Sunday, March 18, 2018

तर्पण

मैं अपने लिखे हुए से घिर गया
मेरी धूप और छांव के
विकसित हो गए
बेहद विचित्र संस्करण

मुद्दत तक मुझे नही मिल पाया
बाहर का हवा पानी
अपने त्रिकोण में बैठा
मैं इस कदर मग्न था कि
भूल गया
सिमटती जाती है हर दिन
हर निजी धूप और छाँव

जब मैं अपने
लिखे हुए के नीचे दबकर मर गया
तब अक्षरों ने किया मेरा तर्पण
तभी मुझे पता चली यह बात

विस्मृति ही मोक्ष का पहला चरण है।

©डॉ. अजित

Sunday, March 11, 2018

अधूरा सच


मैं सत्य से अवगत हुआ
तो  मेरे भ्रम और बढ़ गए
मुझे लगा अभी बहुत कुछ अज्ञात है

उसको जानकार
पता चल सकता है
जीवन का अंतिम सत्य

इस जानने की प्रक्रिया में
सत्य की परिभाषाएं
कई बार बदली मेरे जीवन में
जानकारी लगने लगी सूचनाएं
धारणाएं लगने लगी पूर्वाग्रह

अज्ञानता कोई महिमामंडित करनी की चीज नही है
मगर ज्ञान और सत्य का नही तलाश पाया
कोई सकारात्मक सह सम्बन्ध

सबके थे अपने अपने सत्य
मैंने सदा देखा अपने सत्य को संदेह की दृष्टि से
इसलिए मैं जिस जिस से अवगत हुआ
उसको लेकर मन में बना रहा हमेशा एक संशय

मैं निष्कर्षों का विज्ञापन नही कर रहा हूँ
मगर जीवन के हर निष्कर्ष का था
सत्य से इतर एक मौलिक पाठ
जो न झूठ था और न था सच

मैं अपने अवगत होने को कर रहा हूँ खारिज
शायद यह अकेली बात है
जो खड़ी है सत्य के पक्ष में.

©डॉ. अजित



Tuesday, March 6, 2018

सलाह

उसने एक बार कहा था
हमेशा ऐसी जगह रहना
जिसके नजदीक
एक नदी बहती हो
मैंने पूछा क्यों
उसने हंसते हुए कहा
इसका जवाब
तुम्हें वो नदी देगी।
**
उसने एक बार कहा था
तुम अगर सीखना तो
करुणा और दया में भेद सीखना
मैंने पूछा क्यों
उसने मुस्कुराते हुए कहा
इसका जवाब
तुम्हारी आत्मा देगी।
**
उसने एक बार कहा था
आत्महत्या का जब भी विचार आए
खेलते हुए बच्चों का शोर सुनना
जीने की तमाम वजहें वहां मिलेंगी
मैंने पूछा अगर न सुन पाऊँ तो
फिर तुम सच में
जीने का हक खो चुके हो
उसने उदास होते हुए कहा था।
**
उसने एक बार कहा था
स्त्री से मत पूछना उसका सुख
और पुरुष से मत पूछना उसका दुःख
मैनें पूछा क्यों
उसने कहा
खुद से पूछना ईमानदारी से
तुम क्या सुनना चाहते हो?
**
उसने कहा था एक बार
जब तुम्हारे पास किसी को खोने के हो
बहाने हजार
और पाने का हो एक भी नही
तब करना एक काम
मैंने पूछा क्या?
तलाशना उस एक बहाने को
किसी को पाने के लिए नही
बल्कि अपने जीवन में
खोने को स्थगित करने के लिए।

©डॉ. अजित