Sunday, November 8, 2026

शोक

 मैं चाहता हूँ मेरे मौत पर 

शोक के लिए जगह न बचे

धूमिल होता जाऊं मैं 

सबकी स्मृतियों से 

किसी आधी रात के स्वप्न की तरह

मेरी मौत एक अति साधारण घटना हो 

जिस पर कहने के लिए 

शब्दों का अपव्यय न हो

भाव को एक दिन के लिए 

कैद न होना पड़े

मैं चाहता हूँ कि मेरी मौत पर 

सब कुछ हो बस अंग्रेजी वाला 'रिप' न हो 

क्योंकि मैंने जीते जी 

शान्ति में विश्राम की 

कोई चाह नही रखी

मरणोपरांत भी

मैं आवारा, गुमनाम और भटकना 

ज्यादा पसन्द करूँगा 

न कि रेस्ट इन पीस की 

शुभकामना के बोझ तले 

दबा पड़ा रहूँ 

आँच में तपता हुआ।


©डॉ. अजित