मैं चाहता हूँ मेरे मौत पर
शोक के लिए जगह न बचे
धूमिल होता जाऊं मैं
सबकी स्मृतियों से
किसी आधी रात के स्वप्न की तरह
मेरी मौत एक अति साधारण घटना हो
जिस पर कहने के लिए
शब्दों का अपव्यय न हो
भाव को एक दिन के लिए
कैद न होना पड़े
मैं चाहता हूँ कि मेरी मौत पर
सब कुछ हो बस अंग्रेजी वाला 'रिप' न हो
क्योंकि मैंने जीते जी
शान्ति में विश्राम की
कोई चाह नही रखी
मरणोपरांत भी
मैं आवारा, गुमनाम और भटकना
ज्यादा पसन्द करूँगा
न कि रेस्ट इन पीस की
शुभकामना के बोझ तले
दबा पड़ा रहूँ
आँच में तपता हुआ।
©डॉ. अजित
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