Saturday, February 27, 2016

औसत

कभी कभी उकता कर एक औसत आदमी
करता है कोशिश
एट पार जाने की
एक्सीलेंस उसे इस कदर डराती रहती है
नही सो पाता वो रात भर एक करवट
दरअसल औसत होना एक बड़ी असुविधा है
इस दौर में
तब तो और भी अधिक जब
क्या तो सब उच्च है
या फिर सब निम्न
कुछ औसत लोग इन दोनों के बीच
फंसे रहते है ताउम्र
उनके लिए नीचे और ऊपर जाने के
दोनों ही रास्ते होते है बन्द
इसलिए वो रेंगते रहते है
अपने ही वृत्त में एक नियत गति से
औसत लोग सबसे ज्यादा सन्देहास्पद समझे गए
इतिहास यही बताता है
औसत होना ठीक वैसा अपराध रहा है
जैसे मनुष्य होकर गरीब होना
औसत आदमी सबसे बड़ा खतरा है
क्योंकि उससे प्रभावित नही हुआ जा सकता
उसको छद्म मान लेना है सबसे आसान
औसत आदमी अक्सर कहता है एक बात
दरअसल बात यह नही थी
उसके औचित्य के सारे तर्क होते है अर्थहीन
वो जीता है एक आदमकद जिंदगी
इस भारहीन अर्थहीन पृथ्वी पर
औसत होना निर्वासित होना भी है
एक ऐसा निर्वासन
जिसकी कभी कोई राजाज्ञा जारी नही होती
मगर जिसे भोगना पड़ता है
अंतिम सांस तक।

© डॉ.अजित

Friday, February 26, 2016

पिता

कभी कभी खीझकर
पिताजी मुझे कहते थे
सियासती
खासकर जब मैं तटस्थ हो जाता
या फिर उनका पक्ष नही लेता था
उनके एकाधिकार को चुनौति देने वाली व्यूह रचना का
वो मुझे मानते थे सूत्रधार
उन्हें लगता मैं अपने भाईयों को संगठित कर
उनके विरोध की नीति का केंद्र हूँ
गर्मा गरम बातचीत में उन्हें लगता
मिलकर उनको घेर रहा हूँ
उनको जीवन और निर्णयों को अप्रासंगिक बताने के लिए
सबको करता हूँ दीक्षित
बावजूद ऐसे गुस्से भरे आरोपों के
एक मैं ही था
जिसकी बात मानते थे वो
क्यों, ये आजतक नही जान पाया
मैंने देखा उनको धीरे धीरे ढल जाना
बिना किसी मजबूरी के
तमाम असहमतियों के बावजूद
पिता बचे मेरे जीवन में बेहद आदर के साथ
कुछ क्षमा प्रार्थनाओं की शक्ल में
और मैं पता नही किस रूप में बचा
उनके चले जाने के बाद
तमाम सियासत के बावजूद मैं हार गया एक दिन
तमाम विरोध के बावजूद वो जीत गए उस दिन
हमेशा की तरह।

©डॉ.अजित

दूरी

दो शब्दों के मध्य होता है
जितना एकांत
ठीक उतना एकांत हो सकता है
दो लोगो के मध्य
वाक्यों और संवाद के मध्य
पसरा होता है अव्यक्त का निर्वात
बोली भाषा लिपि सबकी है अपनी सीमाएं
एक बात से दूसरी बात की दूरी बताने के लिए
कोई मानक तय नही हुआ अभी
कुछ अनुमान जरूर है
प्रेम भी एक ऐसा ही अनुमान है
जो लगभग समाप्त कर देता है
कहे और अनकहे का भेद
वो भी एक ख़ास अनुपात में।

© डॉ.अजित

Sunday, February 14, 2016

प्रेम

प्रेम एक त्रिकोण है
जिसके अंशो में होती है एक मानक त्रुटि
इसलिए कोई गणना नही होती पूर्णतः सटीक

प्रेम में गणित तलाशना
एक उपचारिक प्रयास है

ताकि सम विषम को स्वीकार कर
सीखा जाए समीकरण साधना

तो क्या प्रेम एक समीकरण है
नही प्रेम समीकरण नही
प्रेम ज्यामिति भी नही

प्रेम एक त्रिकोण है
जिसकी भुजाएं समान प्रतीत जरूर होती है
मगर होती नही है।

©डॉ.अजित

Tuesday, February 9, 2016

याद

स्त्री किसी को
किस तरह करती है याद
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे पतझड़ को याद करता है बसंत।
***
पुरुष किसी को
कैसे भूलता है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे सड़क को भुला देता है दोराहा।
***
स्त्री किसी को
कैसे भूलती है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे बूंदे भूल जाती है बादल को।
***
पुरुष किसी को
कैसे याद करता है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे नदी को याद करता है समन्दर।
***
स्त्री पुरुष
एक दुसरे को कैसे करते है याद
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे सफर को याद करता है बदन।
***
स्त्री पुरुष
एक दुसरे को कैसे भूलते है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे साल को भूल जातें है
दिन और महीने।
© डॉ.अजित

Wednesday, January 27, 2016

कमी

आधी अधूरी बातों की
एक छोटी सी फेहरिस्त है मेरे पास
इतनी छोटी कि
चाय खत्म करने से पहले
तुम पढ़ लोगी

आधे अधूरे अहसासों के
कुछ छोटे छोटे वजीफे है मेरे पास
इतने छोटे के
तुम्हारी आधी मुस्कान में
खर्च हो जाएंगे

कुछ आधे अधूरे खत है
कुछ के पते अधूरे है
कुछ के हाशिए पर
मैं उदास बैठा हूँ
तुम पढ़ोगी तो अच्छा नही लगेगा
इसलिए कभी पोस्ट नही किए

आधे अधूरे ख्यालों की एक शॉल है मेरे पास
सर्द यादों के मौसम में काम आती है जो
कतरा कतरा खुद को निचोड़ता हूँ
उदासी के लम्हों में
तुम्हारी हंसी को ओढ़ता हूँ

एक आधी अधूरी कहानी है मेरे पास
जिसकी शक्ल तुमसें मिलती है
सब कुछ आधा अधूरा ही है मेरे पास
इस बात का कोई अफ़सोस नही है

हां, अफ़सोस इस बात का है
ये अधूरापन अब आदत में शामिल हो गया है
अब कमी नही खलती तुम्हारी।

© डॉ.अजित

Tuesday, January 26, 2016

बतकही

एकदिन मैंने कहा
ऐसा तो नही हो सकता कि
मुझमें सबकुछ बढ़िया ही बढ़िया हो
निसन्देह बहुत कुछ खराब भी होगा
मुझमें सबसे खराब क्या है
सोचकर बताओं जरा
उसनें कहा इसमें सोचना कैसा
तुम्हारी खराबी तो हमेशा से पता है
मैंने कहा क्या है
तुमको सही वक्त पर सही बात कहना नही आता
हमेशा देर कर देते हो
कहने और सुननें में।
***
अचानक एकदिन
मैंने पूछा
सफर जरूरी होता है या मुसाफिर
उसने कहा ये कैसी पहेली
मैंने कहा बताओ तो सही
उसने कहा
दोनों से ज्यादा जरूरी होता है
रास्ता और मंजिल का इन्तजार
इन चारों में अब
खुद को तलाश रहा था मैं।
***
चाय पर बतियातें
एकदिन उसने कहा
चलो एक बात बताओं
हमारे बीच में कितना फांसला है
मैंने कहा
तय नही कर पा रहा हूँ
टेबल,सदी और ग्राम में
उसनें हंसते हुए कहा
कभी करना भी मत
फांसलों की दूरी तय करना
बेवजह थका देता है
और हासिल कुछ नही होता।
***
मैंने एकदिन पूछ लिया
हमारी नजदीकियां कितनी है
अच्छा उस दिन का बदला ले रहे हो
उसनें हंसते हुए कहा
फिर गम्भीर होकर बोली
उतनी जितनी
चाँद और चांदनी में
सूरज और रोशनी में
पानी और नदी में
धड़कन और जिंदगी में।
***
© डॉ.अजित

Monday, January 18, 2016

बातचीत

देह को होना होगा एक दिन
अनावृत्त
समस्त आवरणों से
जैसे मस्तूल से बंधी नाव
को होना होता है अलग
चलनें के लिए जल की तरलता पर
आलिंगन और स्पर्शों की प्रतिलिपियां
जमा करनी होगी
अपनत्व के संग्रहालय में
जब जिस्म का नही होगा कोई मनोविज्ञान
जब मन का नही होगा कोई दर्शन
तब मिलना होगा कुछ तरह कि
न रहें कुछ भी शेष
न विमर्श को न स्पर्श को
थोड़े से अधीर थोड़े से आश्वस्त होकर
मैं तुम्हारे माथे पर और
तुम मेरी पीठ पर लिखोगी
यही एक सयुंक्त बात
मुक्ति यदि कोई अंतिम चीज़ होती तो
इसे हासिल किया जा सकता था।

©डॉ.अजित

Saturday, January 16, 2016

उसकी बातें

लिखने को इतना कुछ था
आसपास
मगर उसने चुना केवल प्रेम
वो डाकिया था
जिसने चिट्ठियां बांटी सही पतों पर।
***
प्रेम ने बदल दी थी उसकी दुनिया
वो अब लिखता था
जेठ की दोपहर में
फागुन के गीत
मौसम ने दिया था उसको शाप
उदास रहने का।
***
उसके पास थे
सब किस्से उधार के
जिन्हें उसका समझा गया
और लगाए गए अनुमान
वो एक अच्छा किस्सागो था
और एक खराब प्रेमी
ये बात केवल उसका एकांत जानता था।
***
उसके पास
कुछ नही था जताने बताने और समझाने के लिए
उसकी स्मृतियां
अल्पकालीन निविदाओं पर आश्रित थी
वो अनुबंधित था
हस्तक्षेप न करने के लिए
इसलिए भी था
उसका हर वादा सरकारी।

© डॉ.अजित

बचना

कल कुछ लोग
इस बात पर हैरान होंगे कि
मैं एक कवि बन सकता था
मगर नही बन सका
मैं एक लोकप्रिय लेखक हो सकता था
मगर नही हो सका
मैं किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर से लेकर कुलपति तक बन सकता था
मगर नही बन सका
मैं एक अच्छा वक्ता बन सकता था
मगर नही बना
सड़क से लेकर संसद तक का सफर तय कर सकता था
मगर नही चला एक भी कोस
रसूखों के जरिए लोक सेवा आयोग से लेकर
अन्य उच्च आयोगों का सदस्य बन सकता था
मगर नही बन सका
कुछ लोग इस बात पर खीझ रहे होंगे
मुझे न खुद की
उपयोगिता का पता था
न अपने आसपास के सम्पर्को की
मनुष्य को उपयोग करने की दृष्टि से
मेरा नाम सबसे नीचे लिखा जाएगा
आत्ममुग्धता और प्रंशसा की खुराक पर जिन्दा रहने वाले मनुष्यों की एक कोटि
मुझे देख नृविज्ञानी तय करेंगे
जिसे पढ़ाया जाएगा एक खतरे के तौर पर
विभिन्न विश्वविद्यालयों में
लोगबाग नसीहत की शक्ल में सौपेंगे
मेरे किस्से अपने बच्चों और मित्रों को
और कहेंगे
हमेशा बचना ऐसे शख्स से
जो बहुत कुछ कर सकता हो
मगर कुछ नही कर पाया हो
ये बड़ी सच बात है
खुद को सही सलामत बचाए रखने के लिए
बहुत जरूरी होगा
मुझसे बचना
अगर कोई बच पाया तो।

© डॉ.अजित

Tuesday, January 12, 2016

यात्रा

तकरीबन
साल भर हमारी
बोलचाल बन्द रही
छ महीनें हमनें
एक दुसरे की शक्ल नही देखी
तीन महीनें
एक दुसरे से बेखबर रहें
और एक महीना
भूल जाने का नाटक किया
मगर
इस एक साल में एक भी पल ऐसा नही था
जब एक दूसरे को हमनें महूसस न किया हो
तब ये जाना
तमाम शिकायतों और नाराज़गियो के बावजूद
प्रेम मृत नही होता
हां प्रेम स्थगित जरूर हो जाता है
मानवीय कमजोरियों के समक्ष।
***
पिछले हफ्ते
तुम्हारा खत मिला
खत में जगह जगह तुम उदास बैठी मिली
मैने खत को जैसे ही
बायीं जेब रखा
तुम खिल उठी
दरअसल तुम दिल की धड़कनों को
करीब से सुनना चाहती थी
ये काम खत के जरिए
अंजाम दिया मैंने।
***
एकदिन तुमनें कहा
कल ऐसा नही रहेगा
बदल जाएगा सब
छूट जाएगा सब
मैं तुम्हारा हाथ पकड़ तुम्हें
कल की बजाए सीधा परसों में ले गया
जहां साथ चाय पी रहे थे हम
इस बात पर तुम हंस पड़ी
तुम्हारी हंसी में कल खो गया था
खुद ब खुद।
***
आज तुमनें
शिकायत करते हुए कहा
तुम्हारे तलबगार बहुत से लोग है
मैं कहीं नही हूँ
मैंने तुम्हारे कान में
लोग और तुम में फर्क करने का सूत्र बताया
तुम सच में खुश हुई
ये जानकर
मुझे भेद करना आता है
तुम चाहती थी
इतनी चालाकी हमेशा बची रहे मेरे अंदर।
***
अभी अभी तुम्हारा
एसएमएस मिला
'फॉरगेट एंड फोरगिव मी'
सोच रहा हूँ
इस बात पर
तुम्हें चाय पर बुलाऊँ
और फिर बताऊँ
ना मुझे अंग्रेजी आती
ना अनुवाद
और ना वो करना जो तुम कह रही हो।

© डॉ.अजित

Friday, January 8, 2016

चिट्ठी

आज एक चिट्ठी मुझे मिली
ये चिट्ठी तुम्हारे शहर ने लिखी है
शहर वैसे कभी किसी का नही होता
तुम वहां रहती थी
इसलिए मैंने शहर को तुम्हारा कहना शुरू कर दिया
शहर लिखता है
मेरे जाने के बाद उसके पास
उन गलियों ने उलाहनें भेंजे
जहां जहां से मैं अनमना होकर गुजरा था
शहर की धूल से रश्क करती है
शहर की सख्त जमीं
उसे लगता है धूल ने
कम से कम चूम तो लिया था मेरा माथा
मेरे जूतों के निशान
सड़को ने रख लिए है अपने घर
ताकि वो शिनाख्त करने के काम आ सके कभी
शिकायत तो उस चौराहे ने भी की है
जिसका एक रस्ता तुम्हारे घर की तरफ जाता था
मगर मैं उधर जाने की बात तो दूर देखने की भी
हिम्मत न कर सका
शहर कहता है मुझसे
सुनो ! जब जब तुम आए मुझे लगा
इस मतलबी दुनिया में
आज भी जिन्दा है विश्वास
बचा हुआ है बहुत कुछ
विकल्पों और षडयन्त्रों से इतर
मेरी आमद का कोई अर्थ विकसित नही कर पाया शहर
इस बात पर भी वो खुश था
वरना रोज़ भीड़ में देखता है वो
अपने अपने अजनबी
और बेहद औपचारिक किस्म के मेल मिलाप
इस चिट्ठी में तुम्हारा शहर
पेश आता है
एक दोस्त की तरह
जबकि मेरी कोई दुआ सलाम नही हुई थी उससे
उसकी स्मृतियों में
मेरी गंध बस गई है
वो सूँघता है अपना तकिया बिस्तर और कपड़े
ये बात उसी ने मुझे चिट्ठी के जरिए बताई
तुम्हारा शहर मुझे देखता है अपलक
थोड़े विस्मय से
हंसता है मेरे पागलपन पर अकेले में
इस बात का भी जिक्र मिलता है
चिट्ठी में
अंत में वो चाहता है
मेरी कुशल क्षेम
और पूछता है एक ही सवाल
आग्रह और जिज्ञासा के साथ
फिर कब आओगे?

© डॉ.अजित

Monday, January 4, 2016

सीख

कभी कभी मुझे
वो दिखाती आईना
हालांकि मेरा आईना उसकी आँखें थी
वो बोलती अधिकतम कड़वा
जितना बोल सकती थी
उडा देती मेरे अस्तित्व व्यक्तित्व और कृतित्व की धज्जियां
उसकी बातचीत की ध्वनियों में
एक ख़ास किस्म की खीझ होती
उसकी बातें इतनी अपमानजनक लगती कि
बह जाता था मेरा सारा आत्मगौरव
वो देखना चाहती थी
मुझे कुछ प्रतिशत प्रतिबद्ध
और थोड़ा नियोजन से भरा
उसका धैर्य उस वक्त काँप रहा होता
वो नही तय कर पाती
आखिर वजह क्या है
मेरे इतने अस्त व्यस्त होने की
मैं सुनता जाता
सब ताने उलाहनें
यहां तक मेरे अकर्मण्य होंने पर
उसकी खीझ पर भरी टीकाएँ
वो अपनी समस्त वाक् क्षमता से करती
मेरी जड़ता पर अधिकतम् प्रहार
ताकि स्थापित हो सकूं
मैं अपनी कक्षा में उपग्रह की भाँति
और दुनिया को बता सकूं
उसका ठीक ठीक हाल
जिसके लिए उसकी नजर में
सुपात्र था मैं
मैं उस वक्त कोई
प्रतिवाद न करता
स्वीकार करता अपनी कमजोरियां
हर छटे छमाही होता था यह उपक्रम
उसने इस तरह से टोकना न छोड़ा होता तो
आज कुछ और ही होता मैं
इस बात के लिए
एकदिन थैंक्स बोला मैंने
इस बात पर वो हंस पड़ी और बोली
जाओ कविताई करों
एटिकेट्स बाद में सीख लेना।

© डॉ.अजित

Wednesday, December 30, 2015

बात

एकदिन मैंने खुद के विकल्प के रूप में
सुझाए कुछ
कवि,लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम
बताई खुद की तमाम कमजोरियां
गिनाई उन नामों के साथ जुड़ी
साहित्यिक गुणवत्ताएं
और अभिमान के पल
स्वीकार किया खुद का उनसे प्रभावित होना
कहा उनका साथ तुम्हें और अधिक संवार सकता है
मेरे इर्द गिर्द है यथास्थिति का जंगल
अवसाद का पहाड़
और अनिच्छा की नदी
तुम्हारा उत्साह और धैर्य दे जाएगा जवाब
जब दस साल बाद भी यही बातें होंगी मेरी
खुद के ऐसे होने के कुछ गढ़े हुए औचित्य
भर देंगे तुम्हें अंदर की खीझ से
सम्भव है एकदिन तुम फट पड़ो
किसी ज्वालामुखी की तरह
इसलिए मुझसे बेहतर एक दुनिया
तुम्हारे इन्तजार में है
यह कहकर एक चाय की घूँट भरी मैंने
तुमनें ठीक उसी वक्त
अपना कप नीचे रखा और कहा
छोड़ना चाहते हो मुझे?
मैंने कहा वो बात नही है दरअसल
तुम समझ नही रही हो
कल्पना और यथार्थ का अंतर
मैं देख रहा हूँ भविष्य में
उसने तुरन्त चाय खत्म की
और निकल पड़ी
जाते हुए बस इतना कहा
ज्यादा बना मत करों
तुमसे मिलना मेरे लिए
नही है विकल्पों का रोजगार
ना ही है ये कोई सम्भावनाओं का षड्यंत्र
मेरे लिए क्या बेहतर है
ये मै बेहतर जानती हूँ
तुम अपनी सोचो
मित्र हो मित्र ही रहो
गाइड और फिलॉसफर मत बनों
उसके बाद
साथ चाय पीनी छूट गई
और सलाह देने की आदत भी।
© डॉ. अजित 

Monday, December 28, 2015

सफेद झूठ

लम्बे अरसे से
समन्वय और समझौते की धूरी पर
टँगा हुआ एक वृत्त था वो
जिसकी गति और नियति तय थी
उसकी चाल का आघूर्ण अज्ञात था
वो शापित था
अन्यथा लिए जाने के लिए
वो रोज़ चलता था
मगर पहूंचता कहीं नही था
उसके व्यास में एक लोच थी
इसलिए उसका ठीक ठीक मापन सम्भव नही था
उसके आंतरिक वलयों का एकांत
अप्रकाशित था
वो घूम रहा था
अपनी तयशुदा मौत के इंतजार में
उसका इंतज़ार अंतहीन था
उपेक्षा की हद तक वो खारिज़ था
वो यारों का यार था
हमेशा माफी मांगने को तत्पर
उसे यकीं नही था
खुद के सच होने का
वो झूठ था
सफेद झूठ
कुछ दाल में काला
या फिर आटे में नमक
यह तय करना मुश्किल था
उसके लिए
सबके लिए।

© डॉ. अजित 

एकदिन

एक दिन भूल जाऊँगा मैं
समस्त विद्याएं
नही भेद कर सकूंगा
विधाओं में
आदमी को परखना और समझना तो
खैर मुझे कभी नही आया
दुनिया की सबसे निष्प्रयोज्य वस्तु बन जाऊँगा एकदिन
आदमी से वस्तु बनना
कोई अच्छा या खराब अनुभव नही होगा
बस एक बेवजह का अनुभव जरूर होगा
तब मेरी बातों में न रस होगा और न व्यंग्य
अर्थ के दरवाजें कस लेंगे अपनी सांकल
अँधेरा सवार हो जाएगा रोशनी की पलकों पर
परिवेश मेरा आंकलन करेगा तब
कुछ किलो और ग्राम में
मेरा होगा एक निश्चित द्रव्यमान
मेरे शब्दों में नही बचेगी लेशमात्र भी गुणवत्ता
मेरे भाव हो जाएंगे बाँझ
मेरी आकृति हो जाएगी धूमिल
मेरा होना तब होगा
रूचि और कौतुहल से परे
मेरी स्मृतियां ऐन वक्त पर दे जाएगी धोखा
नही बता सकूंगा मैं सही दिन और साल
कहने के लिए मेरे पास नही बचेगा एक भी सम्बोधन
मेरी टिप्पणियों के अर्थ उड़ जाएंगे हवा में
धरती पहाड़ जंगल और नदी मान लेंगे
मेरा प्रवासी होना
नही सुनाएंगे मुझे वो कोई पीड़ा या गीत
अपनों और सपनों की भीड़ में
मैं भूल जाऊँगा खुद के स्पृश
देह और मन की उम्र पारे की तरह
लोक के तापमान से चढ़ती रहेगी ऊपर नीचे
ऐसे विकट समय में
क्या तुम कह सकोगी मुझे ठीक इतना ही अपना
जितना आज कहती हो
कभी खुलकर कभी छिपकर
ये कोई सवाल नही है तुमसे
ये एक जवाब है
जो हम दोनों जानते है मगर
ये दुनिया नही जानती
जो हंसती है
रोती है
कुढ़ती है
चिढ़ती है
हमें तुम्हें यूं साथ देखकर।

©डॉ.अजित 

Thursday, December 17, 2015

दो बात

पहाड़  से मिलनें के लिए
ग्लेशियर होना पड़ता है
तुम नदी थी
इसलिए समन्दर का पता पूछती रही।
***
धरती शिकायत करती
तो किससे करती
सब चाँद सूरज के गवाह थे
आसमान छुट्टी पर था
हवा ने अफवाह उड़ा दी
और यूं धरती हुई बेदखल।

© डॉ.अजित

Sunday, December 13, 2015

नोक झोंक

चंद नोक-झोंक
____________

मैंने कहा
साफ साफ कहा करो
क्या बात बुरी लगी है
दर्शन की भाषा मत बोला करो
साफ़ बोलने से मसले जल्दी हल होते है
उलझतें नही है
जवाब में भी एक शब्द नही बोली वो
मैंने कहा अब क्या हुआ
दर्शन की भाषा समझतें नही हो
मौन का अनुवाद भी भूल गए हो
तुम तो ऐसे न थे, अब क्या फायदा
अब मैं चुप था।
***
कुछ दिन बातचीत बंद के बाद
अचानक मैंने फोन किया
तुमनें रिसीव भी किया
मगर हमारी कोई बात नही हुई
हम दोनों बोलते जरूर रहे
अपने अपने फोन से
हमारी आवाजें रास्ता भटक कर
लौट आई हम तक
रिश्तों यह 'ईको'
जानलेवा था बेहद।
***
बाल ज्यादा छोटे क्यों करा लिए
वो वाली शर्ट क्यों नही पहनी
इतने चुप क्यों रहते हो
पेंट की जेब में हाथ डालकर मर चला करो
तुम्हारी ये कुछ छोटी छोटी शिकायतें थी
जिन्हें दूर न करने का खेद रहा है मुझे
मगर कहा कभी नही
अगर कभी कह देता तो
तुम छोड़ देती टोकना
जो कभी नही चाहता था मैं।
***
आख़िरी बार तुम इस बात पर
नाराज़ थी मुझसे
बेहद लापरवाह हूँ मैं
जीता हूँ केवल खुद के लिए
हो जाता हूँ कई बार बेहद कड़वा
मैंने तुम्हें मना नही पाया बावजूद इसके
लापरवाह नही असावधान था मैं
खुद के लिए नही तुम्हारे लिए जीता था मैं
कड़वा मेरा लहज़ा था दिल नही।

© डॉ. अजित 

Saturday, December 12, 2015

नामकरण

कुछ पेड़ इस बात पर मनुष्य से खफा है
मनुष्य ने खोज लिया है उनका वनस्पतिक नाम
विज्ञान की गोष्ठियों और शोध पत्रों में
इन्ही नाम से सम्बोधित करता है
वैज्ञानिक बना मनुष्य
पेड़ जब आपस में बातें करतें है
वो रुआंसे हो जाते है
अपने ये अजीब ओ गरीब नाम सुनकर
वो शिकायत करते है मनुष्य के बुद्धिमान होने की
जिस बात पर मनुष्य को सबसे ज्यादा गर्व है
पेड़ पौधों की दुनिया में उसका कोई मूल्य नही
वो चाहते है यदि पुकारना  जरूरी है तो
मनुष्य उन्हें पुकारे
उनके असली नाम से
जिसे जानता है बच्चा-बच्चा
वैज्ञानिक नामकरण से खफा पेड़ एकदिन
मनुष्य से बातचीत कर देगा बंद
वो दिन पृथ्वी का सबसे त्रासद दिन होगा।

© डॉ.अजित

Tuesday, December 8, 2015

स्त्री मन

एक स्त्री के मन को
जानने और समझनें के दावें
उतने ही खोखलें है
जितना जीवन वो जानने समझनें के है
स्त्री जीवन की तरह विश्लेषण की नही
जीने की विषय वस्तु है
वस्तु शब्द पर खुद मुझे ऐतराज़ है
मगर शब्दकोश भी बौना है
वो नही बता पाया
आज तक स्त्री की सम्पूर्णता पर एक
प्रमाणिक शब्द
अनुमानों और प्रतिमानों से
बचना चाहिए
जब बात एक स्त्री की हो
क्योंकि
स्त्री धारणाओं में नही जीती
समर्पण उसका स्थाई सुख भी है
और दुःख भी
स्त्री को समझना
दरअसल खुद को समझना है
अनुराग की देहरी पर बैठ
आलम्बन की चक्की पिसते हुए
उसके चेहरे पर जो थकान दिखती है
वो थकान नही है दरअसल
वो उसकी देह पर मन की छाया है
जिनका सौंदर्यबोध कमजोर है
वो नही देख पातें
ऐसी थकान की ख़ूबसूरती
स्त्री का मन
आलम्बन नही स्वतंत्रता चाहता है
न जाने किस उत्साह में जिसे
आश्रय की अभिलाषा समझ लिया जाता है
धरती की तरह
स्त्री जनना जानती है उम्मीदें
इसलिए उम्मीदों के लगातार टूटने पर भी
नही छोड़ती वो अपना एक धर्म
प्रासंगिकता की बहस में
वो निकल जाती है अकेली बहुत दूर
क्योंकि
जब तुम विश्लेषण में रहते हो व्यस्त
कर रहे होते हो अपेक्षाओं का आरोपण
तब एक स्त्री
बीन रही होती है अधूरी स्मृतियों की लकड़ियाँ
जला रही होती है खुद को
ताकि आंच ताप और रोशनी में
नजर आ सके सब कुछ साफ़ साफ़
स्त्री सम्भावना को मरने नही देती
एक यही बात
न उसे जीने देती और न मरने देती
जब कोई करता है स्त्री के अस्तित्व पर भाष्य
देता है मनमुताबिक़ सलाह
स्त्री हंस पड़ती है
उसे प्रशंसा समझ
मुग्ध होने की नही सोचने की जरूरत है
एक यही काम है
जो शायद कोई नही करता।
© डॉ. अजित

Monday, December 7, 2015

वक्त रहतें

यदि वक्त रहते
मांग ली जाती कुछ माफियां
तो थोड़ी बेहतर हो सकती थी
ये दुनिया
यदि वक्त रहते
कर दिया जाता इजहार तो
अपनेपन के वृत्त का होता एक सीमित विस्तार
यदि वक्त रहते
बता दी जाती अपनी सीमाएँ
तो इतनी नही होती शिकायतें
वक्त रहते बहुत कुछ
किया जा सकता था
जो नही किया गया
इसलिए अफ़सोस की बही पीठ पर लादें
घूम रहें है हम
दर ब दर।
© डॉ.अजित


सवाल

उस आदमी से पूछिए
खो जाने का अर्थ
जो भीड़ में नितांत अकेला हो
उसी से पूछा जा सकता है
एकांत शोर और कोलाहल का महीन अंतर
पूछने की और भी कई बातें है
मसलन
हर रास्ता एक  चौराहे पर आकर
क्यों हो जाता है भरम का शिकार
बढ़ता कदम क्या सच में आगे बढ़ता है
या दूसरा कदम पीछे खिंचता है बार बार
धरती अपना बोझ किसके यहां कराती है दर्ज
आसमान के झुकनें की अधिकतम सीमा क्या है
यदि वह देखें तुम्हारी तरफ तो
यह भी जरूर पूछना कि
कुछ बीज क्यों निकल जातें है बांझ
बारिश क्यों छोड़ जाती है
हर बार हिस्सों में नमी
हवा किसके कहने पर बदलती है रुख
इतने सवालों के बीच
वह तुम्हारे एक भी सवाल का जवाब देगा
इस पर मुझे सन्देह है
इसलिए नही पूछता मैं
कभी कोई सवाल
किसी से भी
मगर तुम जरूर पूछना
अपने पूरे आत्म विश्वास के साथ।

© डॉ.अजित

Sunday, December 6, 2015

चुप

उन दिनों जब बेवजह चुप थी तुम
मौन का भाष्य कर रहा था मैं
चुप की बोली का अनुवाद करने के लिए
बना रहा था एक स्वतन्त्र शब्दकोश
अनुमानों को परख रहा था
समय की प्रयोगशाला में
तुम्हें कहे शब्दों को कर रहा था संग्रहित
स्मृतियों के संग्रहालय में
मन से मन दूरी नापने के लिए
दिल की दहलीज़ और मन की मुंडेर पर
स्थापित की थी दो अलग अलग वेधशालाएं
तुम्हारी हंसी को सूखा रहा था पुराने चावल की तरह
ताकि उसकी खुशबू से महक सके मन का उदास कोना
तुम्हारी मुस्कान को नाप रहा था इंच और दशमलव में
ताकि वहां हिस्सों में खड़े अपने पागलपन को देख सकूं
अपने सायास अनायास अपराधों को कर रहा था सूचीबद्ध
ताकि खुद की सफाई में दे सकूं कुछ ठोस दलील
स्पर्शों की तह में देख रहा था अपनत्व की नमी
बचा रहा था उन्हें संदेह की सिलवट से
जिन दिनों तुम बेवजह चुप थी उनदिनों
ठहर गई थी दुनिया
बदल गए थे ग्रहों उपग्रहों के परिक्रमा के चक्र और पथ
सूरज की तरफ तुम्हारी पीठ थी
चाँद को हथेली ढ़क दिया था तुमने
तारें धरती पर लेट देख रहे थे तुम्हारा चेहरा
उनकी काना फूसी देख दुखी था आकाश
एक तुम्हारी चुप ने
नदियों के किनारे बदल दिए थे
पहाड़ कराह रहे थे सर्वाइकल के दर्द से
जंगल में लग गई थी निषेधाज्ञा
कोई पत्ता नही करता था अब उसकी चुगली
पेड़ झुक कर बैठ गए थे नमाज़ पढ़ने
तुम बेवजह चुप थी
और मैं वजह तलाश रहा था हर जगह
मेरी ये दशा देख हवा मुझसे कहती
चुप की वजह नही चुप तोड़ने की विधि तलाशों
ये चुप तुम पर ही नही
पूरी सृष्टि पर भारी है
हवा की सलाह पर थोड़ी देर के लिए
चुप हो जाता था मैं।

© डॉ. अजित

Thursday, December 3, 2015

बातचीत

'सवाल ओ' जवाब वाया बातचीत'
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एक दिन मैंने पूछा
तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा दुःख क्या है
उसने कहा ज्ञात या अज्ञात
मैंने कहा अज्ञात
तब थोड़ी अनमनी होकर उसने कहा
तुम्हें पाना क्यों नही चाहती मैं !
***
एकदिन मैंने पूछा
तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा सुख क्या है
उसने कहा प्रकट या अप्रकट
मैंने अप्रकट
तब मुस्कुराते हुए उसनें कहा
बिना ख़ास कोशिश के तुम अचानक मिल गए।
***
उसनें अचानक एकदिन पूछा
तुम जिंदगी से क्या चाहते हो
मैंने कहा कुछ ख़ास नही
ये अच्छी बात है क्योंकि
खुद को बेहद आम समझती हूँ मैं।
***
उसनें एकदिन कहा
अच्छा एक बात बताओं
मेरा तुम्हारे जीवन में विकल्प हूँ या संकल्प
मैंने कहा इस तरह सोचा नही कभी
इस पर खुश होते हुए उसनें कहा
सोचना भी मत कभी
दोनों इंसान को कमजोर करते है
तुम्हें कमजोर देखना
मैं कभी नही चाहती।

© डॉ.अजित

Sunday, November 29, 2015

सजा

अचानक से छूट गए हाथ
स्पर्शों को याद करते है मुद्दत तक
कोई वजह नही तलाश पातें
अपनत्व की नमी में आई कमी की
सम्बन्धों की जलवायु को दोष भी नही दे पातें
विदा से अलविदा की यात्रा को देखते हुए
वो शुष्क हो जाते है
उनकी गति का दोलन बदल जाता है
वो ओढ़ लेते है एक अजनबीपन
अनायास जब दिल पर रखें जातें है ऐसे हाथ
वो देते है हमारे खिलाफ गवाही
बतातें है हमारी एकतरफा ज्यादती
जिसकी बिनाह पर दिल सुनाता है सजा
यादों की उम्रकैद में
रहो ताउम्र आधे-अधूरे।

©डॉ. अजित