Wednesday, March 30, 2016

वापसी

सबसे आसान था
यह कह कर जाना कि
आता हूँ
प्रतिक्षा का उदास गीत
जिसने गाया और सुना हो अकेला
उस पर मुग्ध कौन होता है भला
जाने के बाद आने का उपक्रम
होता है बड़ा मायावी
कोई जितना जाता है
ठीक लौट नही पाता उतना।

©डॉ.अजित

पता

सबसे मुश्किल था
तुम्हारे जीवन में असुविधा की तरह
टंगा होना
मगर
अपने पाँव का काँटा
कभी नही निकाल पाते खुद
इसलिए पीठ कर ली तुम्हारी तरफ
तुम्हें भूल गया ऐसा कोई दावा नही मेरा
तुमनें मुझे याद रखा इसका भी नही पता
पता है तो बस एक बात
दूरियां उतनी ठीक होती है कि
इनकी आदत न पड़े
अगर एक बार पड़ जाती है तो फिर
कभी नही मिल पाते
दो बिछड़े हुए लोग।

©डॉ.अजित

Monday, March 28, 2016

वजह

तुम्हारी निकटता घने दरख्त के जैसी थी
कड़ी धूप में दो पल सुस्ता सकता था जहां
तुम्हारा गुस्सा आवारा बादल की तरह था
जो बरस पड़ता था कहीं भी कभी भी अचानक
तुम्हारा प्यार कैसा था नही जान पाया आजतक
बस ऐसा अनुमान है
तुम्हारा प्यार इकहरा नही था
वो कुछ कुछ हिस्सों में बेहद घना था
कुछ कुछ हिस्सों में बेहद तरल
कुछ आदतें जान पाया बस तुम्हारी
जैसे बहुत बोलकर खामोश हो जाना
नजदीक होकर अजनबी बन जाना
इन्ही आदतों के भरोसें
लांघता रहा उदासी का पहाड़
पीता रहा पीला बसन्त
जीता रहा हरी भरी पतझड़
तुम्हारे साथ कुछ बांटना नही पड़ता था
एक अजीब सी उम्मीद थी तुम
पुकार और इंतजार के मध्य किसी झील के जैसी
उम्मीदें झूठी हो सकती है
मगर तुम एक बेहद जीवंत सच की तरह थी
जिसकी आँखों में आँखें डाल
मैं नही कर सकता था आत्महत्या
जीने की इससे बड़ी वजह
और क्या हो सकती है भला।

© डॉ. अजित

रास्तें

रास्तों के हिस्से में कुछ नही आया
वो महज़ दृष्टा थे
रास्तों का दुःख इसलिए भी भारी था
धरती और आसमान के बीच वो महीनता से फंसे थे
हवा कुछ किस्से जानती थी
जो रास्तों ने उसे बताए थे
जिन रास्तों पर चलकर दो लोग जुदा हुए
उन रास्तों की आँखें हमेशा के लिए खुली रह गई
मिट्टी उनकी नींद की दुआ करती तो
बारिश बरस पड़ती
रास्तों की आँख का पानी आसमान के यहां गिरवी था
बादल मौसम की अवांछित सन्ताने थी
जो बारिश के जरिए बहती थी रास्तों के कोने से
सब कुछ इतना जीवन्त था कि
किसी के षड्यंत्र की बू आती थी
जो रास्तें कहीं नही पहूँचे
वो अंत में जंगल बन गए
इसी जंगल में भटकर एकदिन
बन जाना था उसे किसी का रास्ता
वो रास्ता बाहर जाता कि अंदर
नही बता सकता कोई।

©डॉ.अजित

Thursday, March 17, 2016

प्रेम तंत्र

प्रेम कभी कभी लगता है
एक सात्विक किस्म का मजाक
जो थोड़ी खिलखिलाहट के बाद
छोड़ जाता है बहुत कुछ
सोचनें के लिए।
***
प्रेम करता हुआ मनुष्य
कुछ मामलों में नही होता है
बिलकुल निरापद
गलत अनुमानों का थोड़ा बहुत दोष
उसमें रहता है जरूर
बाद में कही जाती है जो भावुक मूर्खताएं
वास्तव में वही होती है
प्रेम की सबसे पवित्र चीज़।
***
जो प्रेम नही करतें
वो प्रेम को देखतें है
प्रेम न करना और प्रेम को देखना
ठीक वैसा है
जैसा बादल देख कहना
लगता है आज होगी बारिश।

©डॉ.अजित 

Tuesday, March 15, 2016

हत्या

जब तुम्हारा साथ नही होता
दिल जबरदस्ती बहाने तलाश लेता है
दुखी होने के
मानों मेरे और दुःखो में बीच में तुम खड़ी हुई हो
जैसे ही तुम चित्र से हटती हो
कुछ ऐसे दुःख टूट पड़ते है मुझपर
जिनका मैंने कभी कुछ नही बिगाड़ा
कल की ही बात है
जब तुमनें संकेतों के जरिए बताया कि
अब मैं तुम्हारे आसपास नही हूँ
ठीक उसी वक्त मेरी स्लीपर टूट गई
मैं आधे रास्ते से लंगड़ाते हुए लौटा घर
जब तुम्हें कहा मेरे बिना जीना आ गया तुम्हें
ठीक उसी वक्त मेरी पलक मुड़ गई
झूठ नही कहूँगा बड़े जोर से रोना आया
मगर पलक सीधा करनें के चक्कर में भूल गया रोना
बाद में हंसता रहा पागलों की तरह
तुम्हारी ध्वनियों से एक चित्र बनाता हूँ
जो बह जाता है समय के साथ
बेवक्त पर आए दुखों से चाय पूछता हूँ
वो मांगते है शराब
मैं उन्हें पानी पिलाकर करता हूँ विदा
क्योंकि उनके तरीके से तुम्हें भूला नही जा सकता
सुखों के कुछ खोटे सिक्के
यादों की गुल्लक से निकालता हूँ
किसी नाराज़ बच्चें की तरह
और खरीद लेता हूँ एकांत का अँधेरा
मुझे डर है तुम्हारे जाने की खबर से
दुःख वहां भी मुझे ढूंढ ही लेंगे एकदिन
और कायदे ढूंढ भी लेना चाहिए
और कर देनी चाहिए मेरी हत्या इरादतन।

©डॉ.अजित

Monday, March 14, 2016

मध्य प्रेम

कोई भौतिकी का नियम नही बता सकता
दो लोगो के मध्य प्रेम समाप्त होने के बाद की गति
समय रच देता है एक विचित्र किस्म का भरम
जो होता है वो दिखता नही है
जो दिखता है वो घटित हो रहा होता है
अलग अलग अंतरालों में
अलग अलग आवृत्ति के साथ
प्रेम का समाप्त होना कोई रसायनिक घटना नही
इसलिए नही बन सकी कोई ऐसी परखनली
जिसमे जरिए नापी जा सके प्रेम की तरलता
जब दो लोगो के मध्य प्रेम होता है समाप्त
धरती होती है उस वक्त सबसे निराश
आसमान देखता है होकर एकटुक निरुपाय
जब दो लोगो के मध्य प्रेम होता है समाप्त
ठीक उसी वक्त समाप्त हो जाती है
हवाओं से बातचीत
नदियों से दोस्ती
और बारिशों से रंजिश
हैरत की बात ये भी होती है
धीरे धीरे उनवान चढ़ा प्रेम
किस तरह से अचानक
एक दिन एक पल में हो जाता है समाप्त
दो लोगो के मध्य समाप्त हुए प्रेम का अयस्क
गाहें बगाहें चुभता है नींद और ख़्वाबों में
आंसूओं में शामिल होता है इसका स्वाद
दो लोगो के मध्य समाप्त हुए प्रेम से अधिक
लावारिस कुछ नही होता दुनिया में
जो कभी दोनों का रहा होता है
फिर वो नही बचता किसी के लिए भी।

©डॉ.अजित

Wednesday, March 9, 2016

आग्रह

मैं विरोधाभासों
असंगतताओं और अमूर्त ख्यालों को
आड़े तिरछे खड़ा कर
कविता की छाँव में
दुनिया से भागकर
खुद से उकताकर
प्राश्रय लेता हूँ
मेरी पीठ पर आपकी बात छपी है
तो पढ़ लीजिए
आपकी बात में भी किसी और की बात
जरूर आश्रय लिए होगी
सारा खेल इन बातों का ही है
जिनके अर्थ और सन्दर्भ भिन्न है
मगर जख़्म और पीड़ाएं लगभग समान है
जितना नजर आता हूँ मैं
कविता की ओट में
उतना ही नही हूँ मैं
इसलिए मेरी कोई बात अंतिम सच नही है
कल मेरे बदलनें पर आप ये मत कहना
कवि झूठा था
या कविताएं गल्प थी सब
कवि और कविता के बीच में खड़ा हुआ मनुष्य
किन किन शर्तों और बहाने से
खुद को खड़ा रखता है
नही बता सकता ये बात
वो किसी कविता के जरिए
इसलिए उस पर सन्देह करना तो प्रेम भी करना
दोनों एकसाथ करने का आग्रह
दुनिया में एकमात्र
कवि ही कर सकता है।

©डॉ.अजित

Thursday, March 3, 2016

अनुमति

नदी किनारें खड़े है कुछ बुद्ध
नदी से रास्ता मांगते है
नदी से बिना आज्ञा पार करने की
हिंसा से बचना चाहते है वो
करुणा से करते है निवदेन
नदी चाहती है
बुद्ध वही ठहर जाएं
इसलिए वो आगे बढ़ जाती है
बुद्ध अब किससे मांगे अनुमति
बहते जल से या ठहरे पल से।

Wednesday, March 2, 2016

सवाल

उनसे पूछिए मन की तैयारियां
जिन पर हमेशा
मुस्कुराने का होता है दबाव
वो एकांत में उदास होते हुए भी
देख रहे होते है आसपास
कोई है तो नही
उनसे पूछिए हंसी का बोझ
हंसते हंसते जिनकी आँखें हो जाती है नम
अपने मुताबिक दुनिया देखने की लालसा में
हम रोज़ हत्या करते है
मामूली अहसासों की
जिन पर दुनिया भर को
खुश रखने का दबाव और जिम्मेदारी है
उनकी उदासी कितनी बैचेन है
कभी पूछिए
ये बात आपको ही पूछनी होगी
क्योंकि
आपकी वजह से उन्होंने खुद से
मुलाकातें बंद कर दी है।

©डॉ.अजित

Tuesday, March 1, 2016

ज्ञात

मेरे कांधे बोझ में नही
प्रेम में थोड़े से झुक गए थे
उनका अधिकतम विस्तार इतना था कि
तुम ओट ले सुस्ता सको आराम से
थोड़ी छाया तुम्हारी उधेड़बुन के लिए
हमेशा रहती थी वहां
मेरी पीठ पर जो मानचित्र खिंचा था तुमनें
उसके सहारे कोई कहीं नही पहूंचता था
वो भटकाव का रास्ता था
ऐसा भी नही था
मेरे सामने और पीछे
दो अलग अलग दुनिया थी
दोनों की नागरिकता की शर्ते अलग थी
इसलिए
मैं एक जगह उपस्थित रहता
तो दूसरी जगह निर्वासित
मेरी छाया में केवल तुम्हारी धूप आ सकती थी
त्रिकोण की शक्ल में
तुम्हारी आँखों पर कुछ सवाल लिखे थे
जिनके जवाब
मुझे बिना पढ़े देने थे
मैं इसलिए चुप था
तमाम अस्वीकृतियों के मध्य एक बिंदू ऐसा था
जहां दोनों का अस्तित्व
एक साथ चलकर समाप्त होता था
उसी को समझनें के लिए
हम साथ थे
प्रेम की लौकिक चालाकियों के साथ
और प्रेम छिप गया था हमारी परछाई में
प्रेम ने अकेला इसलिए छोड़ा हमें
वहां एक भरोसा था
बिना डूबे पार उतर जाने का
भरोसे का एक संस्करण तुमनें चुना एक मैंने
इतनी सांझी चालाकी दोनों की थी
गलत नहीं था कुछ इसमें
सही क्या था
यह पता चलना अभी बाकी है।

©डॉ.अजित


Sunday, February 28, 2016

याददाश्त

कभी याददाश्त बहुत अच्छी थी मेरी
घर का जरूरी सामान मुझसे रखवाया जाता
ताकि वक्त पड़ने पर मैं तुरन्त बता सकूँ
धीरे धीरे मैंने महसूस किया
यह कोई बढ़िया योग्यता नही
क्योंकि इसकी वजह से
तकलीफें बढ़ने लगी थी मेरी
अब मेरी याददाश्त बेहद कमजोर है
भूल जाता हूँ कि
सुबह का लौटा शाम को घर लौट आए तो
उसे भूला नही कहते
मैं कब से घर से निकला हूँ
मुझे याद नही आता
बहुत बार जोर देकर सोचा भी तो
इतना ही याद आया
निकलते वक्त भूल गया था मैं कि
शाम को घर लौटना है
धीरे धीरे भूल रहा हूँ मैं सबके
जन्मदिन,शादी की सालगिरह और नया साल
अब मेरे पास बस
इतनी याददाश्त बची है कि
खुद की कलाई पर बंधी घड़ी में
एक बार ठीक से टाइम देख सकता हूँ
समय कुछ कुछ अंतरालों में बैठा है
बनकर पहरेदार
मेरी स्मृतियों का हरा भरा जंगल
धीरे धीरे सूख रहा है
बावजूद इसके कि इसके बीचो बीच
एक मीठे पानी की नदी बहती है
एकदिन इस नदी के किनारे
पानी पीने को झुका मैं
तो खुद की शक्ल देख डर गया
पहचान नही पाया खुद को
उस दिन से ये बात समझ आ गई
याददाश्त अब नही बची मेरे पास
मेरा पास बची है
नदी जंगल पानी और रिश्तों की कुछ असंगत कहानियां
जिन्हें कविता की शक्ल में याद करके
खुद को याद करता हूँ मैं
सारी बातचीत में कितनी बार 'मैं' कहता हूँ
इतना भी नही रहता याद
मेरे हिसाब से यह एक मात्र
अच्छी बात है
जो याददाश्त की कमजोरी के कारण
घटित हो रही है मेरे साथ।


©डॉ.अजित

Saturday, February 27, 2016

औसत

कभी कभी उकता कर एक औसत आदमी
करता है कोशिश
एट पार जाने की
एक्सीलेंस उसे इस कदर डराती रहती है
नही सो पाता वो रात भर एक करवट
दरअसल औसत होना एक बड़ी असुविधा है
इस दौर में
तब तो और भी अधिक जब
क्या तो सब उच्च है
या फिर सब निम्न
कुछ औसत लोग इन दोनों के बीच
फंसे रहते है ताउम्र
उनके लिए नीचे और ऊपर जाने के
दोनों ही रास्ते होते है बन्द
इसलिए वो रेंगते रहते है
अपने ही वृत्त में एक नियत गति से
औसत लोग सबसे ज्यादा सन्देहास्पद समझे गए
इतिहास यही बताता है
औसत होना ठीक वैसा अपराध रहा है
जैसे मनुष्य होकर गरीब होना
औसत आदमी सबसे बड़ा खतरा है
क्योंकि उससे प्रभावित नही हुआ जा सकता
उसको छद्म मान लेना है सबसे आसान
औसत आदमी अक्सर कहता है एक बात
दरअसल बात यह नही थी
उसके औचित्य के सारे तर्क होते है अर्थहीन
वो जीता है एक आदमकद जिंदगी
इस भारहीन अर्थहीन पृथ्वी पर
औसत होना निर्वासित होना भी है
एक ऐसा निर्वासन
जिसकी कभी कोई राजाज्ञा जारी नही होती
मगर जिसे भोगना पड़ता है
अंतिम सांस तक।

© डॉ.अजित

Friday, February 26, 2016

पिता

कभी कभी खीझकर
पिताजी मुझे कहते थे
सियासती
खासकर जब मैं तटस्थ हो जाता
या फिर उनका पक्ष नही लेता था
उनके एकाधिकार को चुनौति देने वाली व्यूह रचना का
वो मुझे मानते थे सूत्रधार
उन्हें लगता मैं अपने भाईयों को संगठित कर
उनके विरोध की नीति का केंद्र हूँ
गर्मा गरम बातचीत में उन्हें लगता
मिलकर उनको घेर रहा हूँ
उनको जीवन और निर्णयों को अप्रासंगिक बताने के लिए
सबको करता हूँ दीक्षित
बावजूद ऐसे गुस्से भरे आरोपों के
एक मैं ही था
जिसकी बात मानते थे वो
क्यों, ये आजतक नही जान पाया
मैंने देखा उनको धीरे धीरे ढल जाना
बिना किसी मजबूरी के
तमाम असहमतियों के बावजूद
पिता बचे मेरे जीवन में बेहद आदर के साथ
कुछ क्षमा प्रार्थनाओं की शक्ल में
और मैं पता नही किस रूप में बचा
उनके चले जाने के बाद
तमाम सियासत के बावजूद मैं हार गया एक दिन
तमाम विरोध के बावजूद वो जीत गए उस दिन
हमेशा की तरह।

©डॉ.अजित

दूरी

दो शब्दों के मध्य होता है
जितना एकांत
ठीक उतना एकांत हो सकता है
दो लोगो के मध्य
वाक्यों और संवाद के मध्य
पसरा होता है अव्यक्त का निर्वात
बोली भाषा लिपि सबकी है अपनी सीमाएं
एक बात से दूसरी बात की दूरी बताने के लिए
कोई मानक तय नही हुआ अभी
कुछ अनुमान जरूर है
प्रेम भी एक ऐसा ही अनुमान है
जो लगभग समाप्त कर देता है
कहे और अनकहे का भेद
वो भी एक ख़ास अनुपात में।

© डॉ.अजित

Sunday, February 14, 2016

प्रेम

प्रेम एक त्रिकोण है
जिसके अंशो में होती है एक मानक त्रुटि
इसलिए कोई गणना नही होती पूर्णतः सटीक

प्रेम में गणित तलाशना
एक उपचारिक प्रयास है

ताकि सम विषम को स्वीकार कर
सीखा जाए समीकरण साधना

तो क्या प्रेम एक समीकरण है
नही प्रेम समीकरण नही
प्रेम ज्यामिति भी नही

प्रेम एक त्रिकोण है
जिसकी भुजाएं समान प्रतीत जरूर होती है
मगर होती नही है।

©डॉ.अजित

Tuesday, February 9, 2016

याद

स्त्री किसी को
किस तरह करती है याद
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे पतझड़ को याद करता है बसंत।
***
पुरुष किसी को
कैसे भूलता है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे सड़क को भुला देता है दोराहा।
***
स्त्री किसी को
कैसे भूलती है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे बूंदे भूल जाती है बादल को।
***
पुरुष किसी को
कैसे याद करता है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे नदी को याद करता है समन्दर।
***
स्त्री पुरुष
एक दुसरे को कैसे करते है याद
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे सफर को याद करता है बदन।
***
स्त्री पुरुष
एक दुसरे को कैसे भूलते है
कुछ कुछ वैसे ही
जैसे साल को भूल जातें है
दिन और महीने।
© डॉ.अजित

Wednesday, January 27, 2016

कमी

आधी अधूरी बातों की
एक छोटी सी फेहरिस्त है मेरे पास
इतनी छोटी कि
चाय खत्म करने से पहले
तुम पढ़ लोगी

आधे अधूरे अहसासों के
कुछ छोटे छोटे वजीफे है मेरे पास
इतने छोटे के
तुम्हारी आधी मुस्कान में
खर्च हो जाएंगे

कुछ आधे अधूरे खत है
कुछ के पते अधूरे है
कुछ के हाशिए पर
मैं उदास बैठा हूँ
तुम पढ़ोगी तो अच्छा नही लगेगा
इसलिए कभी पोस्ट नही किए

आधे अधूरे ख्यालों की एक शॉल है मेरे पास
सर्द यादों के मौसम में काम आती है जो
कतरा कतरा खुद को निचोड़ता हूँ
उदासी के लम्हों में
तुम्हारी हंसी को ओढ़ता हूँ

एक आधी अधूरी कहानी है मेरे पास
जिसकी शक्ल तुमसें मिलती है
सब कुछ आधा अधूरा ही है मेरे पास
इस बात का कोई अफ़सोस नही है

हां, अफ़सोस इस बात का है
ये अधूरापन अब आदत में शामिल हो गया है
अब कमी नही खलती तुम्हारी।

© डॉ.अजित

Tuesday, January 26, 2016

बतकही

एकदिन मैंने कहा
ऐसा तो नही हो सकता कि
मुझमें सबकुछ बढ़िया ही बढ़िया हो
निसन्देह बहुत कुछ खराब भी होगा
मुझमें सबसे खराब क्या है
सोचकर बताओं जरा
उसनें कहा इसमें सोचना कैसा
तुम्हारी खराबी तो हमेशा से पता है
मैंने कहा क्या है
तुमको सही वक्त पर सही बात कहना नही आता
हमेशा देर कर देते हो
कहने और सुननें में।
***
अचानक एकदिन
मैंने पूछा
सफर जरूरी होता है या मुसाफिर
उसने कहा ये कैसी पहेली
मैंने कहा बताओ तो सही
उसने कहा
दोनों से ज्यादा जरूरी होता है
रास्ता और मंजिल का इन्तजार
इन चारों में अब
खुद को तलाश रहा था मैं।
***
चाय पर बतियातें
एकदिन उसने कहा
चलो एक बात बताओं
हमारे बीच में कितना फांसला है
मैंने कहा
तय नही कर पा रहा हूँ
टेबल,सदी और ग्राम में
उसनें हंसते हुए कहा
कभी करना भी मत
फांसलों की दूरी तय करना
बेवजह थका देता है
और हासिल कुछ नही होता।
***
मैंने एकदिन पूछ लिया
हमारी नजदीकियां कितनी है
अच्छा उस दिन का बदला ले रहे हो
उसनें हंसते हुए कहा
फिर गम्भीर होकर बोली
उतनी जितनी
चाँद और चांदनी में
सूरज और रोशनी में
पानी और नदी में
धड़कन और जिंदगी में।
***
© डॉ.अजित

Monday, January 18, 2016

बातचीत

देह को होना होगा एक दिन
अनावृत्त
समस्त आवरणों से
जैसे मस्तूल से बंधी नाव
को होना होता है अलग
चलनें के लिए जल की तरलता पर
आलिंगन और स्पर्शों की प्रतिलिपियां
जमा करनी होगी
अपनत्व के संग्रहालय में
जब जिस्म का नही होगा कोई मनोविज्ञान
जब मन का नही होगा कोई दर्शन
तब मिलना होगा कुछ तरह कि
न रहें कुछ भी शेष
न विमर्श को न स्पर्श को
थोड़े से अधीर थोड़े से आश्वस्त होकर
मैं तुम्हारे माथे पर और
तुम मेरी पीठ पर लिखोगी
यही एक सयुंक्त बात
मुक्ति यदि कोई अंतिम चीज़ होती तो
इसे हासिल किया जा सकता था।

©डॉ.अजित

Saturday, January 16, 2016

उसकी बातें

लिखने को इतना कुछ था
आसपास
मगर उसने चुना केवल प्रेम
वो डाकिया था
जिसने चिट्ठियां बांटी सही पतों पर।
***
प्रेम ने बदल दी थी उसकी दुनिया
वो अब लिखता था
जेठ की दोपहर में
फागुन के गीत
मौसम ने दिया था उसको शाप
उदास रहने का।
***
उसके पास थे
सब किस्से उधार के
जिन्हें उसका समझा गया
और लगाए गए अनुमान
वो एक अच्छा किस्सागो था
और एक खराब प्रेमी
ये बात केवल उसका एकांत जानता था।
***
उसके पास
कुछ नही था जताने बताने और समझाने के लिए
उसकी स्मृतियां
अल्पकालीन निविदाओं पर आश्रित थी
वो अनुबंधित था
हस्तक्षेप न करने के लिए
इसलिए भी था
उसका हर वादा सरकारी।

© डॉ.अजित

बचना

कल कुछ लोग
इस बात पर हैरान होंगे कि
मैं एक कवि बन सकता था
मगर नही बन सका
मैं एक लोकप्रिय लेखक हो सकता था
मगर नही हो सका
मैं किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर से लेकर कुलपति तक बन सकता था
मगर नही बन सका
मैं एक अच्छा वक्ता बन सकता था
मगर नही बना
सड़क से लेकर संसद तक का सफर तय कर सकता था
मगर नही चला एक भी कोस
रसूखों के जरिए लोक सेवा आयोग से लेकर
अन्य उच्च आयोगों का सदस्य बन सकता था
मगर नही बन सका
कुछ लोग इस बात पर खीझ रहे होंगे
मुझे न खुद की
उपयोगिता का पता था
न अपने आसपास के सम्पर्को की
मनुष्य को उपयोग करने की दृष्टि से
मेरा नाम सबसे नीचे लिखा जाएगा
आत्ममुग्धता और प्रंशसा की खुराक पर जिन्दा रहने वाले मनुष्यों की एक कोटि
मुझे देख नृविज्ञानी तय करेंगे
जिसे पढ़ाया जाएगा एक खतरे के तौर पर
विभिन्न विश्वविद्यालयों में
लोगबाग नसीहत की शक्ल में सौपेंगे
मेरे किस्से अपने बच्चों और मित्रों को
और कहेंगे
हमेशा बचना ऐसे शख्स से
जो बहुत कुछ कर सकता हो
मगर कुछ नही कर पाया हो
ये बड़ी सच बात है
खुद को सही सलामत बचाए रखने के लिए
बहुत जरूरी होगा
मुझसे बचना
अगर कोई बच पाया तो।

© डॉ.अजित

Tuesday, January 12, 2016

यात्रा

तकरीबन
साल भर हमारी
बोलचाल बन्द रही
छ महीनें हमनें
एक दुसरे की शक्ल नही देखी
तीन महीनें
एक दुसरे से बेखबर रहें
और एक महीना
भूल जाने का नाटक किया
मगर
इस एक साल में एक भी पल ऐसा नही था
जब एक दूसरे को हमनें महूसस न किया हो
तब ये जाना
तमाम शिकायतों और नाराज़गियो के बावजूद
प्रेम मृत नही होता
हां प्रेम स्थगित जरूर हो जाता है
मानवीय कमजोरियों के समक्ष।
***
पिछले हफ्ते
तुम्हारा खत मिला
खत में जगह जगह तुम उदास बैठी मिली
मैने खत को जैसे ही
बायीं जेब रखा
तुम खिल उठी
दरअसल तुम दिल की धड़कनों को
करीब से सुनना चाहती थी
ये काम खत के जरिए
अंजाम दिया मैंने।
***
एकदिन तुमनें कहा
कल ऐसा नही रहेगा
बदल जाएगा सब
छूट जाएगा सब
मैं तुम्हारा हाथ पकड़ तुम्हें
कल की बजाए सीधा परसों में ले गया
जहां साथ चाय पी रहे थे हम
इस बात पर तुम हंस पड़ी
तुम्हारी हंसी में कल खो गया था
खुद ब खुद।
***
आज तुमनें
शिकायत करते हुए कहा
तुम्हारे तलबगार बहुत से लोग है
मैं कहीं नही हूँ
मैंने तुम्हारे कान में
लोग और तुम में फर्क करने का सूत्र बताया
तुम सच में खुश हुई
ये जानकर
मुझे भेद करना आता है
तुम चाहती थी
इतनी चालाकी हमेशा बची रहे मेरे अंदर।
***
अभी अभी तुम्हारा
एसएमएस मिला
'फॉरगेट एंड फोरगिव मी'
सोच रहा हूँ
इस बात पर
तुम्हें चाय पर बुलाऊँ
और फिर बताऊँ
ना मुझे अंग्रेजी आती
ना अनुवाद
और ना वो करना जो तुम कह रही हो।

© डॉ.अजित

Friday, January 8, 2016

चिट्ठी

आज एक चिट्ठी मुझे मिली
ये चिट्ठी तुम्हारे शहर ने लिखी है
शहर वैसे कभी किसी का नही होता
तुम वहां रहती थी
इसलिए मैंने शहर को तुम्हारा कहना शुरू कर दिया
शहर लिखता है
मेरे जाने के बाद उसके पास
उन गलियों ने उलाहनें भेंजे
जहां जहां से मैं अनमना होकर गुजरा था
शहर की धूल से रश्क करती है
शहर की सख्त जमीं
उसे लगता है धूल ने
कम से कम चूम तो लिया था मेरा माथा
मेरे जूतों के निशान
सड़को ने रख लिए है अपने घर
ताकि वो शिनाख्त करने के काम आ सके कभी
शिकायत तो उस चौराहे ने भी की है
जिसका एक रस्ता तुम्हारे घर की तरफ जाता था
मगर मैं उधर जाने की बात तो दूर देखने की भी
हिम्मत न कर सका
शहर कहता है मुझसे
सुनो ! जब जब तुम आए मुझे लगा
इस मतलबी दुनिया में
आज भी जिन्दा है विश्वास
बचा हुआ है बहुत कुछ
विकल्पों और षडयन्त्रों से इतर
मेरी आमद का कोई अर्थ विकसित नही कर पाया शहर
इस बात पर भी वो खुश था
वरना रोज़ भीड़ में देखता है वो
अपने अपने अजनबी
और बेहद औपचारिक किस्म के मेल मिलाप
इस चिट्ठी में तुम्हारा शहर
पेश आता है
एक दोस्त की तरह
जबकि मेरी कोई दुआ सलाम नही हुई थी उससे
उसकी स्मृतियों में
मेरी गंध बस गई है
वो सूँघता है अपना तकिया बिस्तर और कपड़े
ये बात उसी ने मुझे चिट्ठी के जरिए बताई
तुम्हारा शहर मुझे देखता है अपलक
थोड़े विस्मय से
हंसता है मेरे पागलपन पर अकेले में
इस बात का भी जिक्र मिलता है
चिट्ठी में
अंत में वो चाहता है
मेरी कुशल क्षेम
और पूछता है एक ही सवाल
आग्रह और जिज्ञासा के साथ
फिर कब आओगे?

© डॉ.अजित

Monday, January 4, 2016

सीख

कभी कभी मुझे
वो दिखाती आईना
हालांकि मेरा आईना उसकी आँखें थी
वो बोलती अधिकतम कड़वा
जितना बोल सकती थी
उडा देती मेरे अस्तित्व व्यक्तित्व और कृतित्व की धज्जियां
उसकी बातचीत की ध्वनियों में
एक ख़ास किस्म की खीझ होती
उसकी बातें इतनी अपमानजनक लगती कि
बह जाता था मेरा सारा आत्मगौरव
वो देखना चाहती थी
मुझे कुछ प्रतिशत प्रतिबद्ध
और थोड़ा नियोजन से भरा
उसका धैर्य उस वक्त काँप रहा होता
वो नही तय कर पाती
आखिर वजह क्या है
मेरे इतने अस्त व्यस्त होने की
मैं सुनता जाता
सब ताने उलाहनें
यहां तक मेरे अकर्मण्य होंने पर
उसकी खीझ पर भरी टीकाएँ
वो अपनी समस्त वाक् क्षमता से करती
मेरी जड़ता पर अधिकतम् प्रहार
ताकि स्थापित हो सकूं
मैं अपनी कक्षा में उपग्रह की भाँति
और दुनिया को बता सकूं
उसका ठीक ठीक हाल
जिसके लिए उसकी नजर में
सुपात्र था मैं
मैं उस वक्त कोई
प्रतिवाद न करता
स्वीकार करता अपनी कमजोरियां
हर छटे छमाही होता था यह उपक्रम
उसने इस तरह से टोकना न छोड़ा होता तो
आज कुछ और ही होता मैं
इस बात के लिए
एकदिन थैंक्स बोला मैंने
इस बात पर वो हंस पड़ी और बोली
जाओ कविताई करों
एटिकेट्स बाद में सीख लेना।

© डॉ.अजित