Friday, July 31, 2015

बातें

मैंने एक दिन उससे कहा
यू डिजर्व बेस्ट
वो इस बिन मांगी सलाह पर हैरान थी
फिर दार्शनिक मुद्रा में बोली
बेटर या बेस्ट कुछ होता ही नही
फिर क्या होता
मैंने पूछा
उसने कहा जिंदगी का ज्यादा ग्रामर नही पढ़ा मैंने
बस इतना पता है
क्या तो कोई जिंदगी में कुछ होता है
या फिर कुछ होता ही नही
अब मैं चुप था।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
तुम्हारी आँखों में प्यार नही दिखा कभी
ये प्यार छिपाना कहां से सीखा
मैंने कहा तुम्हारी बातों से
फिर पूरे ढाई दिन उसनें बात नही की मुझसे
मेरी शुष्क आँखें इस प्यार को जरूर देख सकती थी
वो भी मीलों दूर।
***
कभी कभी हम एक दूसरे से
अजनबी की तरह पेश आतेे
हो जाते थे बेहद औपचारिक
दुआ सलाम तक हो जाती थी बंद
बस एक बात बचा लेती थी
रिश्तों की ख़ूबसूरती
तमाम अरुचियों असहमतियों के बावजूद
कभी भी अविश्वास नही था हमारे बीच।
***
एकदिन उसनें पूछा
एक आसान सवाल का जवाब दो
प्यार जिंदगी है या
जिंदगी प्यार है
मैं जवाब सोच ही रहा था
अचानक वो खिलखिलाकर हंस पड़ी
इतना सोचने वालों के लिए
न प्यार है न जिंदगी है
फिर क्या है मैंने नाराज़ होते हुए कहा
सोचकर बताऊंगी
यह कहकर वो फिर हंस पड़ी।
***
© डॉ.अजित

Monday, July 27, 2015

दरख़्त

कुछ दरख्तों के साए में
छांव के साथ
नमी भी मिलती है
छनकर आती धूप का
बढ़ा होता है तापमान
कुछ घनें दरख्त
इतनें खामोश किस्म के होते है
उन्हें नही बोल पातें हम
सुप्रभात या शुभ रात्रि
इन दरख्तों की पत्तियां होती है
बेहद अनुशासित
वो हवा को भी घूमा कर बना देती
थोड़ी भारी हवा
इन दरख्तों को छूने का साहस
बमुश्किल जुट पाता हैं
ये खड़े है बरसों से एक जगह
यह देखकर बस एक आश्वस्ति मिलती है
जिसके सहारें
इन दरख्तों को हम घोषित करते है
अपना सबसे परिपक्व और समझदार मित्र
आश्वस्ति जड़ता का चयन करती है
और गम्भीरता रहस्य का
दरख्तों के बीच जीतें आदमी
कभी कभी दरख्त लगने लगते है
और कभी कभी दरख्त आदमी
ये दरख्त हमारे साथ रहते हुए भी
हमसे इतने ही अजनबी है
जितने इनके साथ रहते हुए
हम इनसे
इसलिए कहना पड़ता है
साथ का मतलब
हमेशा साथी नही होता।

© डॉ. अजित

Friday, July 24, 2015

विदा

हमेशा विदा को
अलविदा से बचाता रहा
दरअसल
अलविदा एक बढ़िया सुविधा है
एक युक्तियुक्त पलायन
विदा एक जिम्मेदारी है
एक कल्पना है
एक बेहतर कल की
विदा बचाती है उम्मीद
लौट आने की
बिना किसी अपराधबोध के
अलविदा कहना मुश्किल जरूर होता है
मगर विदा को देखना
उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है
मैनें जीवन में अक्सर चुनी थी विदा
जो दुर्भाग्य से बन गई अलविदा
उदासी की कुछ पुख्ता वजहों में से एक है
विदा का अलविदा में बदल जाना।

© डॉ.अजित 

Wednesday, July 22, 2015

गुफ़्तगु

अभी तो रूह ने करवट ली थी
पलको से अहसासों की गर्द छटी थी
बेफिक्र आफ्ता साँसों ने इल्तज़ा की थी
कुछ गिरह खुल भी न पाई
एक सुरमई शाम
ख्वाब की दहलीज़ पर बैठी सिसकती है
शक ओ शुबहो में खर्च होती
जिंदगी को थोडा संवर जाने दो
बेसाख्ता लम्हों को बिखर जाने दो
रोज़ उलझते हुए दयारो में
जब तुमसे मुलाक़ात होती है
लफ्ज़ अहसास की चादर से छिटक जाते है
जैसे रात के अँधेरे में कुछ आवारा ख्याल
अपनी धुन में निकल जाते है
मैं लम्हा लम्हा सिरे जोड़ता हूँ
तुम्हे तुम्हारे अंदर तलाशता हुआ
आवाज़ देता हूँ मगर तब तक
वक्त की गर्दिशे ख्याल को जब्त कर जाती है
सुबह ओस की पहली बूँद सी बातें बिखर जाती है दुनियादारी की चौखट पर उदासी के दिए जलते है
कुछ अहसासों को महफूज़ कर लेता हूँ कि
किसी दिन बात से बात निकले
तो वो बात कह सकूं
हां ! मुझे शिद्दत से तुम्हारा इन्तजार रहता है
हो किसी शाम तुम्हारा साथ
और बुनते रहे कुछ आवारा ख्याल
मंजिल से बड़े हो जाए कुछ रास्ते
फिर पुरकशिस लम्हों का लोबान जला
फूंक दू कुछ दुआ तुम्हारे हक में
कैद कर कुछ लम्हों को अक्सों की शक्ल में
एक बोसा लूँ उन आवारा ख्यालो का
जो रोज़ अपने सिराहने बो सो जाती हो तुम
बातें मेरी समझनें जरूरत कब जानाँ
बातों से मेरी रफू करना अपनी तन्हाई को
पैबन्द लगाना कुछ अनकहे ख्यालों का
तुम्हारे लिए नींद को गिरवी रख
चन्द ख्याल उधार लाया हूँ
धड़कनों के बीच अटक गई है
कुछ बातें उनको सुनोंगी तो पाओगी
दिल से रूह के दरम्यां कुछ लम्हें घरोंदे बनाते है
कुछ बेअदब से ख्याल
कुछ आवारा सी रोशनी
मेरी रूह को रोशन करती है
एक तुम्हारा तस्सवुर काफी है
मुझे फिलहाल उधार की जिंदगी के लिए।

© डॉ. अजित

अंतिम

अंतिम पगडंडी
ठीक उसी रास्ते पर खत्म होती है
जहां दोराहा चौराहें से मिलता है
अंतिम कदम उतना ही भारी होता है
जितना पहला दुस्साहस
अंतिम बात कभी अंतिम नही रह पाती
वो छोड़ देती है हमेशा सम्भावना
एक नई बात की
अंतिम जो भी दिखता है
वो दरअसल अंतिम नही होता
वो होता है प्रथम का विलोम
ठीक निकट का विरोधाभास
सत्य का ऐच्छिक संस्करण
अंतिम अकेलेपन को समझते हुए
हुआ जा सकता है सिद्ध
जीवन और मृत्यु के बीच फंसी
हर बात अंतिम नही होती
ठीक जैसे
अंतिम नही होता इच्छा का मर जाना
अंतिम होना एक किस्म की सांत्वना है
यात्रा की समाप्ति या शुरुवात नही
यात्रा का मध्यांतर है अंतिम होना।

© डॉ. अजित

Tuesday, July 7, 2015

धरती

धरती घूम रही है
अपनी एक थिर गति से
कायदे से
इसे रुक जाना चाहिए
कुछ पल के लिए
ताकि जड़ हुए मनुष्य
छिटक कर जा पड़े मीलों दूर
मनुष्यता को बचाने का
कम से कम एक प्रयास
धरती को करना चाहिए जरूर।
***
देखना एक दिन ऐसा होगा
धरती बंद कर लेगी अपनी आँखें
फिर फर्क करना मुश्किल हो जाएगा
दिन और रात का
उस दिन
आसमान कोई सलाह नही देगा
वो देखेगा
मनुष्य को भरम के चलते
गिरते-सम्भलतें हुए
धरती आसमान के बीच उस दिन
सबसे अकेला होगा मनुष्य।
***
धरती की शिकायत
बस इतनी सी है
मनुष्य उसे अपनी सम्पत्ति समझता है
जबकि
वो खुद ब्रह्माण्ड के निर्वासन पर है
जिस दिन पूरा होगा उसका अज्ञातवास
मनुष्य सबसे अप्रासंगिक चीज़ होगा
धरती के लिए।
***
धरती गोल है
यह एकमात्र वैज्ञानिक सत्य नही है
धरती के गोल होनें के मिले है
ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण भी
तभी तो
मनुष्य जहां से चलता है
एक दिन लौट आता है उसी जगह
कभी हारकर कभी जीतकर
धरती जरुर गोल है
मगर मनुष्य का कोई एक आकार नही है
यह बात सिद्ध होनी बाकि है अभी
किसी वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक शोध में।

© डॉ. अजित 

Saturday, July 4, 2015

ज्योतिष

मैंने कहा
जरा हाथ दिखाओं अपना
उसनें कहा
अपनी रेखाओं से
आधी सेंटीमीटर रेखाऐं घटा दो
दक्षिण के अंशों को
उत्तर से मिला दो
माथे से उतार कर देखों
मेरी अनामिका के निशान
अगर फिर भी न बांच सको भविष्य
तब दिखाऊंगी अपना हाथ
उसके बाद
हाथ देखना छोड़ दिया मैंने
उसका तो क्या खुद का भी।
***
मैंने पूछा
तुम्हारी राशि क्या
उसनें कहा
अनुमानों के विज्ञान में यकीन नही मेरा
और मेरे अनुमानों में
मैंने पूछा
तुम्हारे भी अनुमानों में नही
बस तुम में यकीन है मेरा।
***
आदतन एकदिन मैं
बांचने लगा उसका फलादेश
दशा महादशा प्रत्यंतर
सबकी गणना करता हुआ
कर रहा था आधी अधूरी भविष्यवाणियां
वो जोर से हंस पड़ी
मैंने कहा कुछ गलत कहा मैंने
उसनें कहा नही
प्रेम में तुम्हें अंधविश्वासी होता देखना
फिलहाल अच्छा लग रहा बस।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
ये शनि की साढ़े साती की तरह
प्रेम की साढ़े साती भी होती है क्या
मैंने हंसते हुए कहा
प्रेम का पहले ढैय्या चलता है
फिर साढ़े साती
उसनें कुछ गणना की
और कहा जल्द बिछड़ने वाले है हम
उसके इस फलादेश का उपचार नही मिला आजतक।

© डॉ. अजित



Saturday, June 27, 2015

सिद्ध

जिन दिनों मुझसे
बेहद नाराज़ थी तुम
उन दिनों
हवाओं से पूछता था मंत्र
नदियों से मांगता था रेत
जंगल से मांगता था समिधा
तुम्हारे डर से तीनों कर देते थे साफ़ मना
फिर थककर
बनाता था सपनों का हवन कुंड
वादों की सामग्री
और अपनत्व की समिधा
ब्रह्म महूर्त में रोज करता था यज्ञ
उन्ही दिनों मैनें कुछ नए मंत्र सीखें
प्रेम के तंत्र के
प्रत्येक स्वाहा में जलाता था खुद को
ताकि इस नाराज़गी का उच्चाटन कर सकूं
तुम्हारी नाराज़गी
खतम होते होते सिद्ध बन गया था मैं
फिर भी कहता हूँ
हो सके तो फिर कभी
नाराज़ मत होना
क्योंकि अब मैं भूल गया हूँ
सब मंत्र तंत्र
सिर्फ याद है
तुम्हारा नाराज़ होना
और खुद का मजबूर होना
और दोनों ही यादें अच्छी नही है
यकीनन।
©डॉ. अजित

Monday, June 15, 2015

स्मृतियाँ

काश स्मृतियों के पाँव नही
कान होते
उनको सुना पाता मैं
तुम्हारे साथ होने की खनक
वो यूं दबें पाँव न आती फिर
उठा लाता उन्हें गोद में
उनके कान को चूमता हुआ
जिस तरह आती है
बीतें पल की स्मृतियाँ
मुझे नही पसन्द
उनका इस तरह आना
चाहता हूँ वो जब भी आएं
कुछ इस तरह आएं
जैसे पानी पर आती है काई
उन पर फिसलकर
चोट नही लगें
बस लड़खड़ाऊ
और गिरनें से पहलें
थाम लो तुम मेरा हाथ।

© डॉ.अजित

Sunday, June 14, 2015

प्रेम का बचना

धरती की पीठ पर लिखा था प्रेम
नदियां छिपा रही थे प्रेम
झरनें मिटा रहें थे प्रेम
हवा उड़ा रही थी प्रेम
समन्दर डूबा रहे थे प्रेम
तमान कड़वी बातों
तमाम असहमतियों के बीच
इस ग्रह पर
बस हम तुम बचा रहे थे प्रेम
धरती से पूछा जब आकाश ने
किस तरह मिलनें आओगी तुम
उसनें हमारी तरफ इशारा करते हुए कहा
इनकी तरह
फिर अचानक बारिश हो गई
पता नही पानी की बूंदे थी या
आसमान के आंसू
उसके बाद
थोड़ा आसान हो गया था
हमारे लिए प्रेम को बचाना।

© डॉ.अजित

Friday, June 12, 2015

बोध


---
धूप चुनती है उसे
डाकिया
बारिश चुनती है उसे
कर संग्रह अमीन
हवा बना देती है उसे
चपरासी
ढ़ोता है वो वायदों की फ़ाइल
इस दर से उस दर
धरती चाहती है
जरीब से उस पर लिख दें
प्रेम के तीन शब्द
उसकी किस्मत में लिखा है
मात्र लेखपाल होना।
***
वो दिशा भूल गया है
उत्तर को पूरब बताता है
दक्षिण को पश्चिम
पूरब और पश्चिम में भेद नही कर पाता
उसके पास एक मानचित्र है
जिसे देखकर वो केवल हंसता है
कई भाषाविज्ञानी
उसकी हंसी को डिकोड करने में लगे है
वो यारों का यार है
कोई विक्षिप्त मनुष्य नही।
***
उसकी दफ्तर की
दराज़ में कुछ ख्वाहिशें दफन है
वहां कागज के पुलिंदों के बीच
अटका रह गया है एक खत
जिसकी स्याही सूख रही है
लफ्ज़ मिट रहे है
पते की जगह
तीन लाईन की सीढियां बन गई है
वो पिनकोड के जरिए
पहूंचना चाहता है उसके दर तक
इनदिनों वो खुद को भूल
याद करता रहता है उसका पिनकोड।
***
झरनें भेजतें है
वजीफे नदी के नाम
नदी लेंने से मना कर देती है
झरनें अपमानित नही
उपेक्षित महसूस करते है बस
नदी हंस पड़ती
झरनें गाने लगते है बोझ का गीत
समन्दर देखता है
नदी का मनुष्य
और झरनें का देवता होना।

© डॉ. अजित 

Saturday, June 6, 2015

खेत और कविता

तुम्हें अचानक से सामनें देख
ठीक उतनी खुशी होती है
जितनी धान की निकली बाली को
पहली बार देख कर होती है
मुरझानें के डर से
उसकी तरफ उंगली नही करता
और तुम्हारी तरफ नजर।
***
तुम्हारे अंदर
पड़ा रहना चाहता हूँ
अनुपचारित बीज की तरह
शायद कभी तुम्हारे एकांत की  नमी में
अकुंरित हो जाऊं
और छाया दे सकूं
तुम्हारे तपते मन को।
***
देह की मिट्टी पर
उगतें है कुछ खरपतवार
जिनकी कोमलता पर
मुग्ध हो
हम खो बैठतें
सम्बंधों की उत्पादकता।
***
बदलती जलवायु ने
बदल दिया है
फसलों के पकनें का समय
ठीक वैसे ही
जैसे तुम्हारी अनायास उदासीनता ने
बदल दिया है
खुश रहनें का वक्त।
***
खेत पर मेढ़ जाती है
जिस पर चलता हूँ
बड़ा सन्तुलन साध कर
वरना गिर सकता हूँ
लड़खड़ाकर
तुम्हारे घर सीधी सड़क जाती है
नही उठा पाता एक कदम
तमाम साधन संतुलन के बाद भी
यहां गिरनें का नही
पहूंचने का भय है।
***
जलस्तर देख
पौधा कर लेता है समझौता
सीमित कर लेता है जरूरतें
सहन कर लेता है ताप
समझता है धरती की मजबूरी
और खुद की सीमा
तुम उखाड़ देती हो मुझे
कांट-छाँट के नाम पर
मन की बालकनी से
अपनी कोमल ऊंगलियों से
बिना मुझे बताए।

© डॉ.अजित

Tuesday, June 2, 2015

खगोल

यदि तुम मोटिवेशन की तलाश में
मेरे नजदीक आए हो तो
मुझे खेद है
ये तुम्हें न मिलेगा
मेरे पास एक चुम्बकीय क्षेत्र है
जहां जुड़ सकतें हो
या फिर प्रतिरोध पैदा कर सकते हो
चयन नितांत ही तुम्हारा है
सोच लो।
***
बंद घड़ी दो वक्त
सही समय बताती है
यह एक कोरा बौद्धिक झूठ है
चौबीस घंटें में किसी रुकी हुई चीज़ को
दो बार देखकर
हम समय का सही होना तय कर सकते है
समय को सही गलत तय करना
समय का अपमान है
ये बात बंद घड़ी बताती है
बशर्ते वो सच में बंद हो
किसी अभाव में थमी न हो।
***
धरती की आँख पर
काजल लगाने के लिए
ऊकडू बैठा एकदिन
धरती ने आँखें बंद कर ली
उस दिन समझ आया
धरती संवरना नही
सोना चाहती है
मेरी अनामिका से लोरी सुनकर।
***
चांद का एक यही डर
सबसे बड़ा था
धरती को यदि दिख गया
दूसरा चाँद
उसका क्या होगा
धरती चाँद की नही
सूरज की तलाश में थी
एकमात्र इसी बात पर
बचा हुआ था
दोनों के मध्य खगोलीय प्रेम।

© डॉ. अजीत

Monday, June 1, 2015

सवाल

वो जब भी मिलती
सवालों के साथ मिलती
उसके लिए जिज्ञासा का विस्तार था
मेरा होना
उसकी बातों में होता
कुछ दशमलव कौतुहल
कुछ अक्षांश दूरी का पैमाना
और मेरे देशान्तर को परखनें की जिद
प्रश्न-प्रतिप्रश्न और सन्देह का एक ऐसा
त्रियामी मानचित्र बनाती कि
मैं भूल जाता अपनी दिशा
उसकी उपकल्पनाओं में
मेरा दर्शन भीड़ से अलग दिखनें का
एक वितंडा भर था
वो सिद्ध करना चाहती थी
मेरा बेहद मामूली होना
उसके खुद के बनाए हेत्वाभास
मुझे घेरते चक्रव्यूह की तरह
वो देखना चाहती थी मुझे
कर्ण की भाँति निशस्त्र
मेरा अस्तित्व जब एक चुनौति बन गया
तब उसनें निर्णय किया मुझसे प्रेम न करनें का
क्योंकि अपनी तमाम बुद्धिमानी के बीच
वो जान गई थी ये सच
यदि एकबार भी
मुझसे प्रेम किया उसनें
तो फिर उसके पास नही बचेगा
किसी के लिए भी लेशमात्र प्रेम
प्रेम के इस संस्करण को
सबसे बेहतर ढंग से
उसी के जरिए समझ पाया मैं।

© डॉ. अजीत


Sunday, May 31, 2015

ब्रेक अप

ब्रेक अप : कुछ फुटकर नोट्स
----
ब्रेक अप
एक अंग्रेजी शब्द था
मगर इसके प्रभाव थे
विशुद्ध देशी किस्म के
यह जुड़कर टूटने की
बात करता था
शब्दकोश में देखा
इसके आगे पीछे कोई शब्द नही था
ये वहां उतना ही नितांत अकेला था
जितना अकेला
एक एसएमएस के बाद मैं हो गया था।
***
ब्रेक अप के बाद
शब्दों के षड्यंत्र
आकार लेना आरम्भ करते
प्रेम को निगल जाता सन्देह
स्मृतियों को चाट जाती युक्तियां
स्पर्शों को भूल जाती देह
अह्म होता शिखर पर
दिल अकेला हंसता
दिमाग की चालाकियों पर
यही हंसी दिख जाती कभी कभी
आंसूओं की शक्ल में।
***
ब्रेक अप के बाद
मैंने छोड़ दिया पृथ्वी ग्रह
मैं निकल आया प्लूटो की तरफ
मगर वहां के चरम एकांत में भी
ब्रेक अप की ध्वनि
मेरा दिशा भरम करती रही
दरअसल वो ध्वनि नही
एक किस्म का शोर था
शोर ब्रह्माण्ड के हर कोने तक
करता रहा मेरा पीछा
जबतक मैं बहरा न हो गया।
***
ब्रेक अप
सवाल की शक्ल में आया
जवाब की शक्ल में चला गया
सवाल-जवाब के मध्य
रूपांतरित होता हुआ रिश्ता
समुंद्र तल की ऊंचाई से कुछ मीटर
ऊपर का था
जब एक दिन पानी पर
तुम्हारा नाम लिखना चाहा
तब पता चला
कुछ सेंटीमीटर
तुम्हारा तल बदल चुका है
ब्रेक अप एक तरल चीज थी ठोस नही।
***
ब्रेक अप
आसान नही होता
कहना भी करना भी और जीना भी
ब्रेकअप उतना मुश्किल भी नही होता
जितना मैं सोचता था
इधर ब्रेक अप हुआ
उधर मेरी जगह ले ली
किशोर कुमार लता मंगेशकर ने।

© डॉ. अजीत

Saturday, May 30, 2015

तिराहा

पहली बार
तुम्हारे शहर के तिराहे से विदा हुआ
दोराहें और चौराहें से कितना अलग था
तिराहें से विदा होना
एक सड़क सीधी जा रही थी
शहर के आरपार
एक तुम्हारे घर की तरफ
मैं समकोण पर खड़ा
सोच रहा था किधर जाऊं
एक तरफ शहर था
एक तरफ तुम थी
और एक तरफ मैं
जिस तरफ मैं खड़ा था
वो दुनिया की सबसे निर्धन जगह थी
ये जाना तुम्हारे चले जाने के बाद।
***
तिराहें पर खड़ा होना
गुरुत्वाकर्षण खो देने जैसा था
टी पॉइंट से राईट हो रहे थे लोग
और मैं लेफ्ट की तरफ
तांक रहा था
मैंने लेफ्ट इसलिए चुना
तमाम अजनबीयत के बावजूद
लेफ्ट में पड़ा मेरा दिल
धड़क रहा था तुम्हें देखकर
उस वक्त मेरे जिन्दा होने की
यही एक मात्र पुष्टि थी।
***
तिराहे पर खड़े होकर
याद आ रहा था तुम्हारा गुस्सा
मैं गुस्से में था दुखी था अनमना था
नही जानता
गुस्से की आवाजाही में
मैं शहर के उस
सिविल इंजीनियर पर बेहद खफा था
जिसकी नगर योजना का
हिस्सा रहा था यह तिराहा।
***
देर तक खड़ा
यही सोचता रहा
आखिर जिंदगी में क्यों आतें हैं
दोराहें,तिराहें और चौराहें
जब अनमना हो
चुनना पड़ता है
एक रास्ता
दरअसल रास्तें हमें
कहीं नही ले जाते
रास्ते केवल छोड़ते है
दूसरे रास्तें के मुहानें पर
मंजिल इन्ही रास्तों के बीच फंसी
सबसे उदास जगह है।

© डॉ. अजीत

Wednesday, May 27, 2015

दूरी

मेरे तुम्हारे बीच में
महज फांसला नही है
कुछ ग्राम नम हवा भी है
हवा को विज्ञान कैसे तौलता है
नही जानता हूँ
मगर इतना जानता हूँ
हमारे बीच में
कुछ ऐसी महीन चीज़ जरूर है
जो हमें मिलनें नही देगी कभी।
***
देह का आकार
आकृति से बढ़कर नही होता
मन का कोई आकार ही नही होता
देह और मन के अलावा भी
कुछ अज्ञात है
जिसका अनावरण अभी शेष है
यही अज्ञात
हमें मिलनें नही देगा कभी।
***
क्यों न ऐसा करें
मिलाकर देखें
अपनी अपनी रेखाएं
ये समानांतर दिखती जरूर है
मगर है नही
शायद बन जाए कोई
मानचित्र
तुम खो जाओ इससे बेहतर है
इसकी मदद से
तुम्हारा निकल जाना।
***
तमाम किन्तु परन्तु के बावजूद
बहुत कुछ बच गया है
अनसुलझा
स्थगित करना ही पड़ेगा
मंजिल का कौतुहल
सफर आसान होता जाता है
और तुम मुश्किल।

© डॉ. अजीत

Tuesday, May 26, 2015

मार्ग

तुम्हें देख
भूल जाता हूँ
निष्फल प्रेम का अतीत
तुम्हारी छाया टांगती है रोज़
धरती के माथे पर
एक इश्तेहार
जिस पर लिखा होता है
प्रेम का अतीत वर्तमान भविष्य नही होता
प्रेम का होता है केवल इतिहास।
***
तुम्हारी हथेली पर
रख देता हूँ कम्पास
तुम देखती हो मेरी दिशा
और गलत अनुमान से
भटक जाती हो
जबकि मैं खड़ा होता हूँ
ठीक तुम्हारे सामनें।
***
मैं पूछता हूँ
तुम्हारा पता
और तुम हंस पड़ती हो
पोस्ट करता हूँ
सब खत इसी पते पर
इस उम्मीद पर
तुम तक जरूर पहूंचते होंगे
वो सब के सब।
***
दुनिया के अंतिम
तटबन्ध पर
मेरी चप्पल मिलेगी
इससे आत्महत्या का अनुमान मत लगाना
मैं अनुमान से नही
तुम्हें निष्कर्ष के किनारे
खड़ा मिलूँगा
यदि तुम वहां तक पहूंच पाई।

© डॉ. अजीत

दिशा

अब जब मुझमें
तुम्हारी दिलचस्पी
लगभग नही के बराबर बची है
ठीक इस वक्त
देना चाहता हूँ
तुम्हें एक मुट्ठी नमक
ताकि तुम समझ सको
खारेपन का मूल्य
प्यास की अनुपस्थिति में।
***
अब जब लगभग सब कुछ
निर्णय के मुहाने पर
खड़ा है
मांगना चाहता हूँ
तुमसें तुम्हारी खुशबू
ताकि महकती रहें
कुछ खट्टी मिट्टी यादें
तुम्हारी छाया में।
***
हमनें कभी नही मांगा
प्रेम में प्रतिदान
न मांगने का एक अर्थ
यह भी निकाला जा सकता है
अंदर से खाली नही थे हम
प्रेम कहां बसता फिर?।
***
चारों दिशाओं के अलावा
धरती की होती है अपनी एक दिशा
उसी का भरम ले जाता है
हमें उस तरफ
जहां से लौट नही पाते
मर कर भी हम।

© डॉ. अजीत 

Wednesday, May 20, 2015

फलादेश

चांद मुंह नही फेर सकता
तारें आंख नही बंद कर सकते
धरती को तकना
ज्ञात मजबूरी है
मनुष्य सो सकता है
देख सकता है स्वप्न
लिख सकता है कविताऐं
तमाम अन्धकार के बीच
चाँद तारें इस बात पर खुश है।
***
नदी को किनारों से फुरसत नही
उसकी गहराई का एकांत
उदास रहता है अक्सर
पत्थर बचातें है
उसके जीवन में हास्य
वेग की शक्ल में।
***
हवा मुक्त दिखती है
मगर होती नही है
उसकी दिशा तय करता है कोई और
हवा की बेबसी
पूछिए किसी हिलते हुए पत्ते से
वो टूटकर बताना चाहता है सबकुछ
यदि आपको फुरसत हो तो।
***
ग्रहों नक्षत्रों के प्रभाव में मध्य
पृथ्वी होती है नितांत अकेली
झेलती है सबका सकार नकार
कोई ज्योतिषी नही बताता
उसका प्रभाव
उसी पर जीवित
मनुष्यों के जीवन पर
उसकी गोद में संकलित है
उसके समस्त अप्रकाशित फलादेश।

© डॉ. अजीत

Saturday, May 16, 2015

गणित

कुछ दशमलव
प्रेम मांगा तुमसे
तुमने याचक कहा मुझे

कुछ सेंटीमीटर
दूरी थी तुमसे
नही मिली तुम आजतक

कुछ शून्य
नही दिए तुमनें उधार
दहाई बननें के लिए

इसलिए मैनें
बिना योग के
घटा लिया खुद को खुद से
और अनुत्तीर्ण हम हो गए
सम्बंधों के गणित में
बिना किसी परीक्षा के।

© डॉ.अजीत

Friday, May 15, 2015

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

धरती

डूब रहा था
एक सूरज
एक चाँद
धरती के सामनें
धरती देख रही थी
उसका डूबना
तारों की छांव में
धरती चुप थी
धरती तटस्थ थी
धरती साक्षी थी
डूबनें की मजबूरी देखनें की
खुद धरती मजबूर नही थी
धरती बोझ का आंकलन कर रही थी
इसलिए
सूरज चाँद से ज्यादा
उसे खुद की फ़िक्र थी।

© डॉ.अजीत

Wednesday, May 13, 2015

सच

उत्तरोत्तर होता जाऊँगा मैं 
बेहद सतही और सस्ता
नही नाप सकेंगी 
तुम्हारे मन की आँखें भी 
मेरी चालाकियां
प्रेम और छल को मिला 
झूठ बोलूँगा मैं 
पूरे आत्मविश्वास के साथ
किन्तु परंतु के बीच रच दूंगा
एक महाकाव्य 
जहां ये तय करना मुश्किल होगा
ये स्तुति है या आलोचना 
खुद को खारिज करता हुआ
निकल जाऊँगा उस दिशा में 
जिस तरफ तुम्हारी पीठ है 
कवि होने का अर्थ हमेशा
सम्वेदनशील होना नही होता है
कवि को समझनें के लिए बचा कर रखों
थोड़ा सा सन्देह 
थोड़ा सा प्रेम
और कुछ सवाल हमेशा
कवि और कविता का अंतर 
एक अनिवार्य सच है 
भावुकता से इतर 
शब्द और अस्तित्व के  बीच
फांस सा फंसा हुआ सच।
© डॉ. अजीत