Wednesday, December 30, 2015

बात

एकदिन मैंने खुद के विकल्प के रूप में
सुझाए कुछ
कवि,लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम
बताई खुद की तमाम कमजोरियां
गिनाई उन नामों के साथ जुड़ी
साहित्यिक गुणवत्ताएं
और अभिमान के पल
स्वीकार किया खुद का उनसे प्रभावित होना
कहा उनका साथ तुम्हें और अधिक संवार सकता है
मेरे इर्द गिर्द है यथास्थिति का जंगल
अवसाद का पहाड़
और अनिच्छा की नदी
तुम्हारा उत्साह और धैर्य दे जाएगा जवाब
जब दस साल बाद भी यही बातें होंगी मेरी
खुद के ऐसे होने के कुछ गढ़े हुए औचित्य
भर देंगे तुम्हें अंदर की खीझ से
सम्भव है एकदिन तुम फट पड़ो
किसी ज्वालामुखी की तरह
इसलिए मुझसे बेहतर एक दुनिया
तुम्हारे इन्तजार में है
यह कहकर एक चाय की घूँट भरी मैंने
तुमनें ठीक उसी वक्त
अपना कप नीचे रखा और कहा
छोड़ना चाहते हो मुझे?
मैंने कहा वो बात नही है दरअसल
तुम समझ नही रही हो
कल्पना और यथार्थ का अंतर
मैं देख रहा हूँ भविष्य में
उसने तुरन्त चाय खत्म की
और निकल पड़ी
जाते हुए बस इतना कहा
ज्यादा बना मत करों
तुमसे मिलना मेरे लिए
नही है विकल्पों का रोजगार
ना ही है ये कोई सम्भावनाओं का षड्यंत्र
मेरे लिए क्या बेहतर है
ये मै बेहतर जानती हूँ
तुम अपनी सोचो
मित्र हो मित्र ही रहो
गाइड और फिलॉसफर मत बनों
उसके बाद
साथ चाय पीनी छूट गई
और सलाह देने की आदत भी।
© डॉ. अजित 

Monday, December 28, 2015

सफेद झूठ

लम्बे अरसे से
समन्वय और समझौते की धूरी पर
टँगा हुआ एक वृत्त था वो
जिसकी गति और नियति तय थी
उसकी चाल का आघूर्ण अज्ञात था
वो शापित था
अन्यथा लिए जाने के लिए
वो रोज़ चलता था
मगर पहूंचता कहीं नही था
उसके व्यास में एक लोच थी
इसलिए उसका ठीक ठीक मापन सम्भव नही था
उसके आंतरिक वलयों का एकांत
अप्रकाशित था
वो घूम रहा था
अपनी तयशुदा मौत के इंतजार में
उसका इंतज़ार अंतहीन था
उपेक्षा की हद तक वो खारिज़ था
वो यारों का यार था
हमेशा माफी मांगने को तत्पर
उसे यकीं नही था
खुद के सच होने का
वो झूठ था
सफेद झूठ
कुछ दाल में काला
या फिर आटे में नमक
यह तय करना मुश्किल था
उसके लिए
सबके लिए।

© डॉ. अजित 

एकदिन

एक दिन भूल जाऊँगा मैं
समस्त विद्याएं
नही भेद कर सकूंगा
विधाओं में
आदमी को परखना और समझना तो
खैर मुझे कभी नही आया
दुनिया की सबसे निष्प्रयोज्य वस्तु बन जाऊँगा एकदिन
आदमी से वस्तु बनना
कोई अच्छा या खराब अनुभव नही होगा
बस एक बेवजह का अनुभव जरूर होगा
तब मेरी बातों में न रस होगा और न व्यंग्य
अर्थ के दरवाजें कस लेंगे अपनी सांकल
अँधेरा सवार हो जाएगा रोशनी की पलकों पर
परिवेश मेरा आंकलन करेगा तब
कुछ किलो और ग्राम में
मेरा होगा एक निश्चित द्रव्यमान
मेरे शब्दों में नही बचेगी लेशमात्र भी गुणवत्ता
मेरे भाव हो जाएंगे बाँझ
मेरी आकृति हो जाएगी धूमिल
मेरा होना तब होगा
रूचि और कौतुहल से परे
मेरी स्मृतियां ऐन वक्त पर दे जाएगी धोखा
नही बता सकूंगा मैं सही दिन और साल
कहने के लिए मेरे पास नही बचेगा एक भी सम्बोधन
मेरी टिप्पणियों के अर्थ उड़ जाएंगे हवा में
धरती पहाड़ जंगल और नदी मान लेंगे
मेरा प्रवासी होना
नही सुनाएंगे मुझे वो कोई पीड़ा या गीत
अपनों और सपनों की भीड़ में
मैं भूल जाऊँगा खुद के स्पृश
देह और मन की उम्र पारे की तरह
लोक के तापमान से चढ़ती रहेगी ऊपर नीचे
ऐसे विकट समय में
क्या तुम कह सकोगी मुझे ठीक इतना ही अपना
जितना आज कहती हो
कभी खुलकर कभी छिपकर
ये कोई सवाल नही है तुमसे
ये एक जवाब है
जो हम दोनों जानते है मगर
ये दुनिया नही जानती
जो हंसती है
रोती है
कुढ़ती है
चिढ़ती है
हमें तुम्हें यूं साथ देखकर।

©डॉ.अजित 

Thursday, December 17, 2015

दो बात

पहाड़  से मिलनें के लिए
ग्लेशियर होना पड़ता है
तुम नदी थी
इसलिए समन्दर का पता पूछती रही।
***
धरती शिकायत करती
तो किससे करती
सब चाँद सूरज के गवाह थे
आसमान छुट्टी पर था
हवा ने अफवाह उड़ा दी
और यूं धरती हुई बेदखल।

© डॉ.अजित

Sunday, December 13, 2015

नोक झोंक

चंद नोक-झोंक
____________

मैंने कहा
साफ साफ कहा करो
क्या बात बुरी लगी है
दर्शन की भाषा मत बोला करो
साफ़ बोलने से मसले जल्दी हल होते है
उलझतें नही है
जवाब में भी एक शब्द नही बोली वो
मैंने कहा अब क्या हुआ
दर्शन की भाषा समझतें नही हो
मौन का अनुवाद भी भूल गए हो
तुम तो ऐसे न थे, अब क्या फायदा
अब मैं चुप था।
***
कुछ दिन बातचीत बंद के बाद
अचानक मैंने फोन किया
तुमनें रिसीव भी किया
मगर हमारी कोई बात नही हुई
हम दोनों बोलते जरूर रहे
अपने अपने फोन से
हमारी आवाजें रास्ता भटक कर
लौट आई हम तक
रिश्तों यह 'ईको'
जानलेवा था बेहद।
***
बाल ज्यादा छोटे क्यों करा लिए
वो वाली शर्ट क्यों नही पहनी
इतने चुप क्यों रहते हो
पेंट की जेब में हाथ डालकर मर चला करो
तुम्हारी ये कुछ छोटी छोटी शिकायतें थी
जिन्हें दूर न करने का खेद रहा है मुझे
मगर कहा कभी नही
अगर कभी कह देता तो
तुम छोड़ देती टोकना
जो कभी नही चाहता था मैं।
***
आख़िरी बार तुम इस बात पर
नाराज़ थी मुझसे
बेहद लापरवाह हूँ मैं
जीता हूँ केवल खुद के लिए
हो जाता हूँ कई बार बेहद कड़वा
मैंने तुम्हें मना नही पाया बावजूद इसके
लापरवाह नही असावधान था मैं
खुद के लिए नही तुम्हारे लिए जीता था मैं
कड़वा मेरा लहज़ा था दिल नही।

© डॉ. अजित 

Saturday, December 12, 2015

नामकरण

कुछ पेड़ इस बात पर मनुष्य से खफा है
मनुष्य ने खोज लिया है उनका वनस्पतिक नाम
विज्ञान की गोष्ठियों और शोध पत्रों में
इन्ही नाम से सम्बोधित करता है
वैज्ञानिक बना मनुष्य
पेड़ जब आपस में बातें करतें है
वो रुआंसे हो जाते है
अपने ये अजीब ओ गरीब नाम सुनकर
वो शिकायत करते है मनुष्य के बुद्धिमान होने की
जिस बात पर मनुष्य को सबसे ज्यादा गर्व है
पेड़ पौधों की दुनिया में उसका कोई मूल्य नही
वो चाहते है यदि पुकारना  जरूरी है तो
मनुष्य उन्हें पुकारे
उनके असली नाम से
जिसे जानता है बच्चा-बच्चा
वैज्ञानिक नामकरण से खफा पेड़ एकदिन
मनुष्य से बातचीत कर देगा बंद
वो दिन पृथ्वी का सबसे त्रासद दिन होगा।

© डॉ.अजित

Tuesday, December 8, 2015

स्त्री मन

एक स्त्री के मन को
जानने और समझनें के दावें
उतने ही खोखलें है
जितना जीवन वो जानने समझनें के है
स्त्री जीवन की तरह विश्लेषण की नही
जीने की विषय वस्तु है
वस्तु शब्द पर खुद मुझे ऐतराज़ है
मगर शब्दकोश भी बौना है
वो नही बता पाया
आज तक स्त्री की सम्पूर्णता पर एक
प्रमाणिक शब्द
अनुमानों और प्रतिमानों से
बचना चाहिए
जब बात एक स्त्री की हो
क्योंकि
स्त्री धारणाओं में नही जीती
समर्पण उसका स्थाई सुख भी है
और दुःख भी
स्त्री को समझना
दरअसल खुद को समझना है
अनुराग की देहरी पर बैठ
आलम्बन की चक्की पिसते हुए
उसके चेहरे पर जो थकान दिखती है
वो थकान नही है दरअसल
वो उसकी देह पर मन की छाया है
जिनका सौंदर्यबोध कमजोर है
वो नही देख पातें
ऐसी थकान की ख़ूबसूरती
स्त्री का मन
आलम्बन नही स्वतंत्रता चाहता है
न जाने किस उत्साह में जिसे
आश्रय की अभिलाषा समझ लिया जाता है
धरती की तरह
स्त्री जनना जानती है उम्मीदें
इसलिए उम्मीदों के लगातार टूटने पर भी
नही छोड़ती वो अपना एक धर्म
प्रासंगिकता की बहस में
वो निकल जाती है अकेली बहुत दूर
क्योंकि
जब तुम विश्लेषण में रहते हो व्यस्त
कर रहे होते हो अपेक्षाओं का आरोपण
तब एक स्त्री
बीन रही होती है अधूरी स्मृतियों की लकड़ियाँ
जला रही होती है खुद को
ताकि आंच ताप और रोशनी में
नजर आ सके सब कुछ साफ़ साफ़
स्त्री सम्भावना को मरने नही देती
एक यही बात
न उसे जीने देती और न मरने देती
जब कोई करता है स्त्री के अस्तित्व पर भाष्य
देता है मनमुताबिक़ सलाह
स्त्री हंस पड़ती है
उसे प्रशंसा समझ
मुग्ध होने की नही सोचने की जरूरत है
एक यही काम है
जो शायद कोई नही करता।
© डॉ. अजित

Monday, December 7, 2015

वक्त रहतें

यदि वक्त रहते
मांग ली जाती कुछ माफियां
तो थोड़ी बेहतर हो सकती थी
ये दुनिया
यदि वक्त रहते
कर दिया जाता इजहार तो
अपनेपन के वृत्त का होता एक सीमित विस्तार
यदि वक्त रहते
बता दी जाती अपनी सीमाएँ
तो इतनी नही होती शिकायतें
वक्त रहते बहुत कुछ
किया जा सकता था
जो नही किया गया
इसलिए अफ़सोस की बही पीठ पर लादें
घूम रहें है हम
दर ब दर।
© डॉ.अजित


सवाल

उस आदमी से पूछिए
खो जाने का अर्थ
जो भीड़ में नितांत अकेला हो
उसी से पूछा जा सकता है
एकांत शोर और कोलाहल का महीन अंतर
पूछने की और भी कई बातें है
मसलन
हर रास्ता एक  चौराहे पर आकर
क्यों हो जाता है भरम का शिकार
बढ़ता कदम क्या सच में आगे बढ़ता है
या दूसरा कदम पीछे खिंचता है बार बार
धरती अपना बोझ किसके यहां कराती है दर्ज
आसमान के झुकनें की अधिकतम सीमा क्या है
यदि वह देखें तुम्हारी तरफ तो
यह भी जरूर पूछना कि
कुछ बीज क्यों निकल जातें है बांझ
बारिश क्यों छोड़ जाती है
हर बार हिस्सों में नमी
हवा किसके कहने पर बदलती है रुख
इतने सवालों के बीच
वह तुम्हारे एक भी सवाल का जवाब देगा
इस पर मुझे सन्देह है
इसलिए नही पूछता मैं
कभी कोई सवाल
किसी से भी
मगर तुम जरूर पूछना
अपने पूरे आत्म विश्वास के साथ।

© डॉ.अजित

Sunday, December 6, 2015

चुप

उन दिनों जब बेवजह चुप थी तुम
मौन का भाष्य कर रहा था मैं
चुप की बोली का अनुवाद करने के लिए
बना रहा था एक स्वतन्त्र शब्दकोश
अनुमानों को परख रहा था
समय की प्रयोगशाला में
तुम्हें कहे शब्दों को कर रहा था संग्रहित
स्मृतियों के संग्रहालय में
मन से मन दूरी नापने के लिए
दिल की दहलीज़ और मन की मुंडेर पर
स्थापित की थी दो अलग अलग वेधशालाएं
तुम्हारी हंसी को सूखा रहा था पुराने चावल की तरह
ताकि उसकी खुशबू से महक सके मन का उदास कोना
तुम्हारी मुस्कान को नाप रहा था इंच और दशमलव में
ताकि वहां हिस्सों में खड़े अपने पागलपन को देख सकूं
अपने सायास अनायास अपराधों को कर रहा था सूचीबद्ध
ताकि खुद की सफाई में दे सकूं कुछ ठोस दलील
स्पर्शों की तह में देख रहा था अपनत्व की नमी
बचा रहा था उन्हें संदेह की सिलवट से
जिन दिनों तुम बेवजह चुप थी उनदिनों
ठहर गई थी दुनिया
बदल गए थे ग्रहों उपग्रहों के परिक्रमा के चक्र और पथ
सूरज की तरफ तुम्हारी पीठ थी
चाँद को हथेली ढ़क दिया था तुमने
तारें धरती पर लेट देख रहे थे तुम्हारा चेहरा
उनकी काना फूसी देख दुखी था आकाश
एक तुम्हारी चुप ने
नदियों के किनारे बदल दिए थे
पहाड़ कराह रहे थे सर्वाइकल के दर्द से
जंगल में लग गई थी निषेधाज्ञा
कोई पत्ता नही करता था अब उसकी चुगली
पेड़ झुक कर बैठ गए थे नमाज़ पढ़ने
तुम बेवजह चुप थी
और मैं वजह तलाश रहा था हर जगह
मेरी ये दशा देख हवा मुझसे कहती
चुप की वजह नही चुप तोड़ने की विधि तलाशों
ये चुप तुम पर ही नही
पूरी सृष्टि पर भारी है
हवा की सलाह पर थोड़ी देर के लिए
चुप हो जाता था मैं।

© डॉ. अजित

Thursday, December 3, 2015

बातचीत

'सवाल ओ' जवाब वाया बातचीत'
__________________________

एक दिन मैंने पूछा
तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा दुःख क्या है
उसने कहा ज्ञात या अज्ञात
मैंने कहा अज्ञात
तब थोड़ी अनमनी होकर उसने कहा
तुम्हें पाना क्यों नही चाहती मैं !
***
एकदिन मैंने पूछा
तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा सुख क्या है
उसने कहा प्रकट या अप्रकट
मैंने अप्रकट
तब मुस्कुराते हुए उसनें कहा
बिना ख़ास कोशिश के तुम अचानक मिल गए।
***
उसनें अचानक एकदिन पूछा
तुम जिंदगी से क्या चाहते हो
मैंने कहा कुछ ख़ास नही
ये अच्छी बात है क्योंकि
खुद को बेहद आम समझती हूँ मैं।
***
उसनें एकदिन कहा
अच्छा एक बात बताओं
मेरा तुम्हारे जीवन में विकल्प हूँ या संकल्प
मैंने कहा इस तरह सोचा नही कभी
इस पर खुश होते हुए उसनें कहा
सोचना भी मत कभी
दोनों इंसान को कमजोर करते है
तुम्हें कमजोर देखना
मैं कभी नही चाहती।

© डॉ.अजित

Sunday, November 29, 2015

सजा

अचानक से छूट गए हाथ
स्पर्शों को याद करते है मुद्दत तक
कोई वजह नही तलाश पातें
अपनत्व की नमी में आई कमी की
सम्बन्धों की जलवायु को दोष भी नही दे पातें
विदा से अलविदा की यात्रा को देखते हुए
वो शुष्क हो जाते है
उनकी गति का दोलन बदल जाता है
वो ओढ़ लेते है एक अजनबीपन
अनायास जब दिल पर रखें जातें है ऐसे हाथ
वो देते है हमारे खिलाफ गवाही
बतातें है हमारी एकतरफा ज्यादती
जिसकी बिनाह पर दिल सुनाता है सजा
यादों की उम्रकैद में
रहो ताउम्र आधे-अधूरे।

©डॉ. अजित

Monday, November 23, 2015

बगावत

कुछ अलहदा से ख़्वाब थे वो
रोशनी के छूटे हुए कतरों के चश्मदीद गवाह
उनके माथे स्याह ठंडे थे
उनके लबो पर आह की नम खुश्की थी
दरख्तों के साये में उन्हें पनाह नही मिली थी
वो धूप की गोद से जबरदस्ती उतार दिए गए थे
दरिया के पास उनकी शिकायतों के मुकदमें थे
मगर वो खामोश बह रहा था
बिना किसी सुनवाई के
कुछ परिंदे मुखबिर बन गए थे अचानक
सपनों की तलाशी ली जा रही थी
ख़्वाबों की सरहदों पर
लम्हों में पिरोयी धड़कने जब बगावत कर बैठी
तब पता चला ये सुबह से पहली रात है
जहां अंधेरा चरागों को सुस्ताने की
नसीहत देने आया है
दुआ में हाथ उठे मगर लब खामोश रहें
सिलसिलों ने करवट ली तो
तुम्हें बहुत दूर पाया
इतनी दूर जहां से
खुली आँख से तुम्हें देखा नही जा सकता था
आँख मूँद कर तुम्हें देखनें की कोशिश की तो
इन्हीं ख़्वाबों की भूलभुलैय्या में खो गया
तुम्हें देखनें का मिराज़
अब तक का सबसे हसीं सदमा था।

© डॉ. अजित

Sunday, November 22, 2015

खत

लिखता हूँ रोज़ चंद अफ़साने
हकीकत की शक्ल में

लड़ता हूँ रोज़ एक लड़ाई
जज्बात और अक्ल में

कुछ अहसासों को रखता हूँ गिरवी
उम्मीद को लेता हूँ उधार
बांट देता हूँ सपनों को पुरज़ा-पुरज़ा

आदतों में बस गई है एक नमी
तुम्हारे ख्याल की
कोई रोशनी नही पहुँचती वहां तक
फिर भी दिल के कुछ कोने रोशन है
तुम्हारी यादों से

सिमट गई है मेरी दुनिया
तुझ से तुझ तक
हैरतजदाँ हूँ थोड़ा और थोड़ा बेचैन भी

तुम हो भी
और हो भी नही।

© डॉ. अजित

Saturday, November 21, 2015

मजबूरी

ख्यालों से निकलना गैरजरूरी समझता है
इश्क सच्चा हो तो मजबूरी भी समझता है

तन्हाई में रोकर भी क्या हुआ तुम्हें हासिल
वो आज भी तुम्हें पत्थरदिल समझता है

दिलों में फ़कत कुछ लम्हों का फांसला था
कमबख्त वो इसे भी मेरी दूरी समझता है

चलों बिछड़ जाए उसी मोड़ से हम दोनों
रास्ता भी मुसाफिर की मजबूरी समझता है
©डॉ.अजित

Thursday, November 19, 2015

आलाप

चंद कहा-सुनी
----
बेवजह एक दिन भड़कते हुए
उसनें कहा
तुम्हारे भाव बढ़ गए है आजकल
ठीक से जवाब भी नही देते
बात क्या है?
मैंने कहा
सच कह रही हो
आजकल इतने भाव बढ़ा रहा हूँ खुदके कि
तुम्हारे सिवाय कोई और खरीद न सके मुझे
फिर ठीक है,ये कहकर वो हंस पड़ी।
***
मैं उसदिन परेशान था किसी बात पर
और वो छेड़े जा रही थी मुझे
मेरी कथित प्रेमिकाओं के नाम पर
मैंने कहां हां ! मेरी कई प्रेमिकाएँ है
अब खुश हो
इस बात पर वो खुश नही थी पहली दफा
वो चाहती थी
मैं करूँ उसके सारे आरोप खारिज।
****
चाय पीते समय
मेरी गति अधिक थी
इस बात पर उसको रहता था
हमेशा ऐतराज़
झल्ला कर कहती वो
किस जल्दी में रहती हो
कौन सी ट्रेन छूट रही है तुम्हारी
मैं कहता चाय पीना और तुमसें बातें करना
एक साथ नही हो पाता मुझसे
वो हंस पड़ती और कहती
हो जाने दो फिर चाय ठंडी
कोई बात नही दूसरी मंगा लेंगे।
***
अचानक एकदिन
उसने बातचीत बन्द कर दी
मैंने वजह नही जाननी चाही
मुझे गैर जरूरी लगा ऐसा पूछना
उसका एसएमएस मिला एकदिन
इसलिए नही चाहती थी
किसी बुद्धिजीवी से प्रेम करना
मैं शर्मिंदा था
अपने कथित ज्ञान पर।

©डॉ.अजित




Wednesday, November 18, 2015

खेद

कंघी में उलझे पड़े थे कुछ बाल
एकदम से उपेक्षित
जिन्हें खींच कर फेंका जाना तय था
घर के सबसे छोटे दर्पण ने
छोड़ दी थी जगह
वो हिलता डुलता दिखाता था चेहरा
अलंकारिक श्रृंगार के सब साधन
अपने अंतिम पड़ाव पर थे
नही बची थी उनके रखरखाव की कोई
स्त्रियोंचित्त इच्छा
जीवन में कोई ज्ञात दुःख नही था उसके
मगर फिर भी वो
बेपरवाही से खर्च कर रही थी
अपनी एक-एक प्रिय चीज़
वो काजल से खिंचती थी कर्क रेख
ताकि भेद कर सके लोक और खुद के समय में
उसकी त्वचा के स्पर्श ऊब ढ़ो रहे थे
वो भूल जाती थी अक्सर
हेयर पिन, सुई धागा बटन और बिजली का बिल
उसकी हड़बड़ाहट साफ़ झलकती थी
बर्तन मांझते समय
उसके पास दूध के उबाल जैसा विस्मय था
और नमक के जैसा प्रेम
वो प्रार्थना के पलों में दिखती थी
सबसे निर्मल
मौन और चुप के मध्य उसने विकसित कर ली थी
अपनी एक विचित्र बोली
जिसका कोई शोर नही था
ना कोई उलाहना
वो थोड़ी व्यस्त थी
ज्यादा अस्त-व्यस्त
उसके समन्वय पर मुग्ध हुआ जा सकता था
जीवन के अमूर्त कौशल पर
वो बधाई की पात्र थी
उसकी मुस्कान में एक हलकी उदासी की दरार थी
जिसमें बहता था
समन्दर नदी की ओर
उसका हंसना
समय पर एक अहसान था
जिसके बोझ में वो घट रहा था रोज़ पल-पल
उसके पास न कोई सवाल था
न कोई जवाब
उसके पास कुछ अनुभव थे
जिनकी समीक्षा सम्भव न थी
उसे कहीं नही पहुंचना था
मगर वो रोज़ चल रही थी
एक नियत गति से
उसकी एकमात्र जवाबदेही खुद थी
इसलिए
उसकी वजह से कोई तकलीफ में नही था
वो खुद कहां थी
इसकी पड़ताल के लिए
अहम के गुरुत्वाकर्षण को तोड़
उपग्रह की भांति
पृथ्वी की कक्षा का
कम से कम एक चक्कर लगाना जरूरी था
वो अज्ञात थी
किसी मंत्र की तरह
वो ज्ञात थी किसी की शहर की तरह
ये सब बातें तब पता चली
जब वो उपस्थित थी
अपनी अनुपस्थिति के साथ
इस बात का किसी को खेद नही था
बस यह खेद की बात है।

©डॉ. अजित

Tuesday, November 17, 2015

प्रेम और दुःख

अज्ञेय कहते है दुःख व्यक्ति को मांझता है
केवल दुःख ही नही
प्रेम भी व्यक्ति को मांझता है
प्रेम करता हुआ व्यक्ति
देख सकता है चींटी के देह की पीड़ा
पहाड़ का बोझ
और तरल नदी का विवशता
प्रेम का दुःख
व्यक्ति को दोहरा मांझता है
वो देख सकता
अपने अंदर बैठी दो छाया एक साथ
प्रेम का सुख और प्रेम का दुःख
बाहर से भले ही अलग दिखे
अंदर से होते लगभग एक समान
दुःख की आंच में जब पिघल जाता है प्रेम
तब मन का एक हिस्सा जम जाता है
ग्लेशियर की तरह
शीत ताप के मध्य
स्मृतियों की जलवायु का सहारा ले
व्यक्ति तय करता है
अपने ग्रह पर अपनी स्थिति का ठीक ठीक आंकलन
किसी खगोलविज्ञानी की तरह
प्रेम में पड़ा व्यक्ति  एक साथ हो सकता है
विज्ञानवादी और भाग्यवादी
दुःख और सुख से इतर
प्रेम व्यक्ति का भर देता है आंतरिक निर्वात
बदल जाते है उसके गुरुत्वाकर्षण के केंद्र
प्रेम व्यक्ति को बदलता नही
बस रूपांतरित कर देता है जगह जगह से
इसलिए प्रेम का विस्मय हमेशा
व्यक्ति को बताता है
जीवन की अनिश्चिता के बारें में
दुःख की चमक भले ही स्थाई हो
मगर उस चमक को देखनें के लिए
प्रेम का दर्पण ही काम आता है
भले ही उस पर अवसाद की धूल चढ़ी हो
प्रेम किया हुआ व्यक्ति
हो पाता है एक सीमा तक ही क्रूर
खुद को समझनें और समझानें में
जितना मददगार प्रेम है
उतना कोई दूसरा मनोवैज्ञानिक परामर्शन
नही हो सकता है
प्रेम में जीता हुआ व्यक्ति हमेशा करता है
प्रेम में हारे हुए व्यक्ति का सम्मान
मनुष्य में बची रहे मनुष्यता
इसके लिए दुःख के अलावा
प्रेम एक अनिवार्य चीज है
जिसे जीना और बचाना दोनों जरूरी है।

© डॉ. अजित

प्रेम

अचानक उसनें कहा
प्रेम बड़ा है या जीवन ये बताओं
मैंने कहा
जीवन
इस पर नाराज़ हो वो बोली
फिर प्रेम क्या है तुम्हारे लिए
मैंने कहा जीवन
फिर बस वो मुस्कुरा कर रह गई।
***
चलतें चलतें उसने कहा एकदिन
तुम्हें सबसे प्यारा कौन है दुनिया में
मैंने कहा मैं खुद
बड़े आत्ममुग्ध हो
ये ठीक बात नही वो बोली
खुद से प्यार करना
तुम्हें प्यार करने की जरूरी योग्यता है
मैंने कहा
फिर वो हंस पड़ी बस
प्यार का ये सबसे संक्षिप्त व्याख्यान था
हमारे बीच।
***
फिर एक दिन उसनें
फोन पर पूछा
कहाँ रहते हो आजकल
कुछ खबर नही है
मैंने कहा इसी फोन की फोनबुक में
जिससे बात कर रही हो तुम
वो खिलखिलाकर हंस पड़ी इस बात पर
मिलतें भी रहा करो कभी कभी
क्योंकि
तुम्हारा नम्बर अक्सर
फोन से डिलीट करती रहती हूँ मैं।
***
मैंने कहा एकदिन
सवाल बहुत करती हो तुम
इतनी शंकाओं के मध्य
कितना बेचारा लगता है हमारा रिश्ता
उसनें कहा
समझा करो ये शंकाए नही है
बल्कि ये सब जवाब है
जो मुझे पता है
बस तुम्हारे मुंह से सुनना
अच्छा लगता है ये सब।

©डॉ.अजित

Friday, November 6, 2015

साधना

पराजित देवता के आशीर्वाद से
उसनें प्रेम किया
त्याज्य ऋषियों ने उसे दीक्षित किया
मंत्र को उसनें गीत की तरह पढ़ा
उसके यज्ञ की समिधा
जंगल की सबसे उपेक्षित वनस्पतियां थी
उसकी आहूतियां बिलकुल शास्त्रीय नही थी
उसके आह्वहान में थोड़ा रोष करुणा के साथ था
उसके विसर्जन के सूत्र अप्रकाशित थे
इतनी विषमताओं के बावजूद
वो आश्वस्त था
बहुत सी बातों को लेकर
यह बात अचरज भरी थी
उन लोगो के लिए
जो प्रेम और जीवन को
आदर्श स्थिति में जीने के आदी थे।

© डॉ.अजित


Thursday, November 5, 2015

निर्वात

शब्दों की आवृत्तियां
समय के सबसे छोटे हिस्से में
बदल रही थी
शब्दों को इतना
मजबूर कभी नही देखा था
इधर मैं कुछ कहता
उधर उसका अर्थ रूपांतरित हो जाता
तटस्थता का विस्मय
अर्थ का निर्वात नही भर पाता था
ध्वनियों में इतनी यात्राएं समानांतर जीवित थी कि
अक्सर
यह तय करना मुश्किल था
कौन किसके साथ था वहां।
© डॉ.अजित

Wednesday, October 21, 2015

फर्क

उसनें कहा
तुम खुश होना भूल गए हो
तुम्हारी ध्वनियां अनुशासित है बहुत
बेवजह की एक चीज है तुम्हारे पास
वो है उदासी
तुम प्रशंसा की खुराक पर जीवित हो
मगर उसका भी उपयोग नही जानते
विलम्ब और अनिच्छा से मध्य सो रहे हो
न जाने कब से
मैंने कहा सब का सब सच कहा तुमनें
फिर वो उखड़ गई
मेरे आत्म समपर्ण पर और बोली
सच कहूँ या झूठ
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है
मैंने कहा फर्क पड़े न पड़े
इस बहाने तुम्हारी अरुचि पढ़ लेता हूँ मैं
और खुश हो जाता हूँ
अपनें ऐसा होने पर
वैसे एक बात यह भी है
हम एक दुसरे को बदलनें के लिए नही
एक दुसरे के लिए जीने के लिए बनें हैं।

© डॉ. अजित 

Sunday, October 18, 2015

जोखिम

सन्नाटें के मध्य
चुपचाप पड़ी है कुछ ध्वनियां

एक रूमानी गीत के मध्य
उपस्थित है बेसबब बिछड़ने का सबब

रात और दिन
सुबह और शाम के मध्य
जिन्दा है समय का मिला-जुला प्रभाव

ऐसे में यह तय करना
सबसे मुश्किल था
कौन निकट है कौन दूर

फिर भी
मैं सतत् चलता रहा एक ही दिशा में अनवरत्

उम्मीद थी पहूंच जाऊँगा तुम तक एकदिन

उम्मीद को परखना
जीवन का सबसे बड़ा ज्ञात जोखिम था।

© डॉ.अजित

दफ्तरी प्रेम

किसी पुरानी फाइल में
बसी नमी सा था मेरा प्रेम
जिसकी गोद में
हाशिए पर दर्ज थी
टिप्पणियाँ संस्तुस्तियाँ अग्रसारण
और अस्वीकृतियाँ
मेरा अस्तित्व बचा था
एक अनुपयोगी दस्तावेज़ की शक्ल में
जिसे इन्तजार था
अवशिष्ट निस्तारण की एक
आधिकारिक निविदा का
मन के सरकारी दफ्तर में
एक निर्जन कोने में पड़े करना था
मुझे एक उपयुक्त समय का इन्तजार
ताकि अनिच्छाओं के टैग से निकाल
कर दिया जाए मुझे
आग और हवा के हवाले।
***
एक परिपक्व प्रेम सम्बन्ध में
मेरे हिस्से आई थी
कुछ सीएल कुछ ईएल
मैं जी रहा था प्रेम
पूर्व स्वीकृत डीएल की तरह
अवकाश के हिस्सों में
प्रेम का विस्तार उगा था
बेहद ऊबड़ खाबड़
वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर
अफ़सोस की शक्ल में
मेरी यादें काउंट हुई
उसके बाद से
मैं एम एल पर था
निरन्तर...!
***
क्यों न आपके खिलाफ
अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए की
तर्ज़ पर एकदिन मुझे मिला था नोटिस
क्यों न आपको विस्मृत कर
आगे बढ़ा जाए
मैं जवाब में व्याख्या पत्र बना ही रहा था कि
एकपक्षीय निर्णय लेते हुए
कर दिया गया मुझे बर्खास्त
खेद इस बात का है
इसके बाद किसी भी न्यायालय ने
नही की स्वीकार
मेरी दया याचिका।
***
मेरे उत्साह पर
रख दिया तुमनें एक दिन
अपने ज्ञान का पेपरवेट
मैं फड़फड़ा नही
बल्कि अस्त व्यस्त घूम रहा था
तुम्हारी दुनिया में
कागज़ की तरह दब गया मैं
तुम खुश थी
खुद के अनुशासन पर।
***
डस्टबिन के तल
पर विश्राम कर रही थी
मेरी मुलाकात की कुछ अर्जियां
खिन्नता से तुमनें
जैसे ही खाली करने का आदेश दिया
सेवक को
मैं समझ गया
असली निर्वाण का
समय आ गया है अब
उन अर्जियों को जला
ताप रहे थे दफ्तर के लोग
मैं धुआं बन उड़ रहा था
तुम्हारे रोशनदान की ओर
मोह की माया इसी को कहते शायद।

© डॉ.अजित

(प्रेम में दफ्तरी हो जाना)

Friday, October 16, 2015

आदमी

दिखनें में होता है
बेहद सामान्य
या फिर औसत से थोड़ा बेहतर
वाग्मिता में निपुण
और औचित्य सिद्ध में दीक्षित
अंदर से मरा हुआ आदमी
मौत एक ही बार नही आती
यह उपस्थित रहती है टुकड़ो में भी
अंदर से मरे हुए आदमी को
कुछ ही जिन्दा लोग पहचान पातें है
ये शिनाख्त करने का कौशल
लगभग जीवनपर्यन्त उपलब्धि जैसा है
और उनके जिन्दा होने का प्रमाण भी
अंदर से मरा हुआ आदमी
कम हंसता है
वो जानता है हंसी की कीमत
कम बोलता है
उसे होता है मृत्यु के सार्वजनिक होने का भय
वो तलाशता है एकांत
ताकि अंदर की मौत को बाहर विदा कर सके
मगर हर बार
मौत लौट कर आती है उस तक चुपचाप
अंदर से मरे हुए आदमी को
अनिच्छा से होता है प्रेम
वो करता जाता है विलम्बित
पंचांग के तमाम शुभ महूर्तों को
अंदर से मरा हुआ आदमी
जिन्दा लोगो के बीच सबसे खतरनाक जीव है
क्योंकि वो बार बार याद दिलाता है
जिन्दा और मरे हुए का फर्क
जिंदा रहने के लिए
इस फर्क को भूलना अनिवार्य योग्यता है
इसलिए अंदर से मरा हुआ आदमी
बाहर जिन्दा रहता है
ताकि जिंदा रहें बाहर के लोग।

© डॉ.अजित