Wednesday, October 29, 2014

मौत कविता की

कविता इतनी धीमी मौत
मर रही थी मेरे अंदर
कि मुझ तक उसकी
बमुश्किल खबर पहूँचती
उसका मरना उसी दिन तय हो गया था
जब मैने विषयों की संविदा का
विज्ञापन प्रकाशित किया था
उधार और मौत का सीधा रिश्ता है
दोनों अचानक से आते और डराते है
अपने डर से बचने के लिए
मेरे पास कविता की छोटी ढाल थी
जिस पर वक्त के कुछ ऐसे तीव्र वार हुए कि
एक तीर उसके आरपार होता
मेरी आंख से आ धंसा हो
मै एक आँख से लम्बे अरसे तक
कविता लिखता रहा
दरअसल वो कविता भी नही थी
वो कविताओं की शक्ल में
मेरी व्यक्तिगत बतकही थी
जिसमें सबको रस आना लाजमी था
कविता की धीमी मौत पर
मैंने शोक गीत नही
प्रेम के नोट्स लिखें
जिन्हें पढ़
आधे लोग हंसते
आधे रोतें
कुछ चुप हो जाते
कुछ पड़ताल में लग जाते
कविता की चुपचाप मौत की खबर पर
मेरी छद्म लोकप्रियता हमेशा हावी रही
इसलिए
अपने अंदर कविता की धीमी मौत का
मुझे भी जब पता चला
जब प्रशंसा की शराब से
मेरे कान लाल थे
और आत्ममुग्धता की ढेरी पर बैठा
मै कविता लिखने की सोच रहा था
और बस सोचता ही रह गया।

© डॉ.अजीत


Thursday, October 23, 2014

गजल

खुद से खफा हुए जाता हूँ
तुम पे फिदा हुए जाता हूँ

नजरें झुका कर उठाते हो
इल्म की किताब हुए जाता हूँ

बुलंदी से उतरना है जरुर
खुद में दफ़न हुए जाता हूँ

तन्हाई में जीना सीख लिया
खुद का कफन हुए जाता हूँ

दर्द अक्सर  बढ़ा ये सोचकर
बेगुनाह जलावतन हुए जाता हूँ

© डॉ.अजीत



Tuesday, October 21, 2014

गुनाह

खुद की गहराई से घबरा जाता हूँ
कभी हलकी बातें भी कर जाता हूँ

दवा का असर कम यूं भी होता है
उससे आधा मर्ज़ छिपा जाता हूँ

नजरों के धोखे ही खाएं अभी तक
आदतन चश्मा लगाकर सो जाता हूँ

ये रोज़ के तमाशे ये रोज़ का मज़मा
कभी  रंगे हाथ भी पकड़ा जाता हूँ

उनका शक का कारोबार यूं ही चले
दानिश्ता गुनाह करते चला जाता हूँ

© डॉ.अजीत

Sunday, October 19, 2014

कारोबार

ख़्वाब बेचकर
नींद खरीदी
नींद बेचकर
ख़्वाब
इस कारोबार में
मुद्रा की तरह
मेरा अवमूल्यन हुआ
मोल भाव के चक्कर में
ढेरों समझौते करने पड़े
यह वस्तु विनिमय सा
आसान न था
यह सेंसेक्स की तरह
अनिश्चित था
इक्विटी/कमोडिटी सा जोखिम भरा
जोखिम ही इसका
अधिकतम रोमांच था
नफा नुकसान का अनुमान
खुद नही लग पाता
इसके अर्थशास्त्र की यही
बड़ी कमजोरी है
और जो इसके जानकार है
वो दोस्त है कि दुश्मन
यह बता पाना जरा
मुश्किल है
दरअसल जब तक
रिश्तों की आढ़त पर
आप ख़्वाब नींद के इस कारोबार की
बारीकियां सीखते है
तब तक आप खुद को
भरे बाजार में अकेला खड़ा पाते है
जहां हर मोल भाव के बाद
एक ही बात लगती है
कहीं हमें
ठग तो नही लिया गया है !

© डॉ.अजीत

Saturday, October 18, 2014

तलाश

मिलना कभी किसी ऐसे शख्स से
न हो जिसके पास
मोबाइल
लैपटॉप
सेविंग अकाउंट
ए टी एम
डायरी
कलम
किताबें
गाड़ी-घोड़ा
मुक्त हो जो
योजनाओं से
कल्पनाओं से
अपेक्षाओं से
धारणाओं से
छोटा हो जिसका
अह्म
अध्ययन
और आधार
हो जिसके पास
एक जोड़ी घिसी हुई चप्पल
एक जोड़ी  गंठे हुए कपड़े की जुते
एक सूती तौलिया
दो जोड़ी कपड़े
एक उधड़ा हुआ थैला
मिल जाता हो जो
बाजार हाट नुक्कड़ गली में
बस ट्रेन में या पैदल चलते हुए
खोजना न पड़े जिसे
जंगल
गुफा
एकांत
या हिमालय में
जानता हो जो
अपना पूरा सच
उससे मिलकर मिल सकती है
सच्ची खुशी
सच्चा ज्ञान
स्पष्ट दृष्टि
स्थाई अभिप्ररेणा
हो सकता है बोध
खुद के लघु होने का
बेवजह उलझे होने का
तलाशिए अपने आस पास
हो सकता है
कोई बुद्ध
बेहद आम शक्ल में
खोजने जरूरी है
हाशिए पर जीते
ऐसे बुद्ध
प्रचार की भूख में
अहंकार की लौ में
अनुयायियों की भीड़ में
नही मिलते
ज्ञान दीक्षा या साधना के सूत्र
अक्सर मिलता है
भटकाव को विस्तार
ज्ञात का भ्रम
वाणी का अहंकार
मुक्ति से भी मुक्त होने के लिए
बेहद जरूरी हो जाता
ऐसे बुद्ध पुरुषों का सत्संग
इनका मिलना दुलर्भ है
असम्भव नही
एक बार तलाश कर तो देखिए
अपने आस पास।

© डॉ.अजीत

Tuesday, October 14, 2014

कुछ डायलॉग्स

तेरे-मेरे और हमारे डायलॉग्स...
******

उसने लगभग मुझ पर चीखते हुए कहा
यू आर गुड फॉर नथिंग !
मैंने गुड उसको वापिस किया
नथिंग अपनी जेब में डाला
और यू आर को
उड़ा दिया फूंक से
फॉर आजतक असमंजस में है !
-----------------
उसने एक दिन हँसते हुए कहा
आर यू क्रेजी
मैने आर और यू की सीढ़ी बनाई
और उतर गया खुद को जानने
क्रेजी की गुफा में !
-----------------
उसने एक दिन उदास होकर कहा
टाइम विल डिपार्ट अस वेरी सून
मैंने टाइम को मुट्ठी में बंद किया
विल को डिपार्ट किया
वेरी सून की तरफ पीठ की
अब मेरे तुम्हारे बीच में
अस मुस्कुरा रहा था धीरे-धीरे !
-------------------
उसनें एक दिन  लम्बी गहरी सांस ली
और कहा
सीरियस प्लीज़ !
मैंने सीरियस को छत पर टांग दिया
और प्लीज़ को गोद में उठाया
फिर तुम हंसती रही
सारा दिन !
-----------------------
उसने एक दिन कॉफ़ी पीते हुए कहा
डू यू लव मी
मैंने अपने कप में
डू यू की चमच्च से
लव की चीनी मिलाई
उस दिन पहली दफा तुम्हारी आँखों में
मी का अर्थ समझ पाया।
-------------------
उसने फिर एक दिन पूछा
हू आर यू
मैंने यू और आर का मास्क उतारा
फिर हू बहुत अकेला था
हमारे बीच।
--------------------
उसने आखिर एक दिन पूछ ही लिया
विल यू मैरी मी
मैंने बस इतना कहा उस दिन
गॉड नोज़ !
उसके बाद से हम दोनों
नास्तिक बन गए।

© डॉ. अजीत

डिस्क्लेमर: इस जातक की पढ़ाई प्राईमरी पाठशाला में हुई है सो अंग्रेजी के वाक्यों में त्रुटि होने की प्रबल सम्भावना है सो खुद ही करेक्ट करके पढ़ें । प्रेम के व्याकरण में जातक बेहद कमजोर है :)

सात बातें

बातें बहुत सी है फिलहाल केवल सात
-----------------------------

ये उन दिनों की बात है
जब
रास्तों की लम्बाई से ज्यादा
चौड़ाई नापी जाती थी
हम दोनों साथ चल नही
फिसल रहे थे।
********
ये उन दिनों की बात है
जब
चाँद रिश्तें में मामा नही
अपना यार लगता था।
*******
ये उन दिनों की बात है
जब
तुम्हारे ख़्वाब गिरवी रख
मिल जाती थी नींद उधार।
*******
ये उन दिनों की बात है
जब
तुम्हारे स्पर्शो की लिखावट
पढ़ता था
चाय की प्याली पर
हर रोज़ सुबह।
*********
ये उन दिनों की बात है
जब
तुम नदी सी बह रही थी
मै तालाब सा सूख रहा था
वक्त समन्दर सा ठहरा था
वो पानी की तासीर समझने के
दिन थे।
*********
ये उन दिनों की बात है
जब
खत भेजने के लिए नही
तुम्हें पढ़ने के लिए
लिखे जाते थे।
*******
ये उन दिनों की बात है
जब
हम अपनी समझदारी पर
हंस लिया करते थे
बेवकूफों की तरह
**********
"...अब उन दिनों की
चंद बातें बची है
याददाश्त में आधी अधूरी
मुलाकातें बची है
चंद रफू ख़्वाब है
थोड़ी अफ़सोस की गर्द है
उन दिनों की बातों ख्यालों जज्बातों का
बैरंग पार्सल भेज रहा हूँ तुम्हें
कविता की शक्ल में।"

© डॉ.अजीत

Monday, October 13, 2014

विदा

विदा के वक्त के भावुक वादें
गल जातें है वक्त के साथ
बचती है हासिल की गई समझदारी
कुछ शिकवें
चंद उल्हानें
विदा संधिकाल है उदासी का
एक यात्रा समाप्त दुसरी आरम्भ
हर शुरुआत एक अंत है
और हर अंत एक शुरुआत
इनके मध्यकाल में
पढ़ा जा सकता दर्शन,मनोविज्ञान या फिर
कविता
लिखे जा सकतें है व्यक्तिगत आलाप
कविता की शक्ल में
जीवन की धुरी पर घूमते अपनें
अक्षांश को देखने की जिद
सामाजिक बनाती है
जिसमें अपेक्षाओं की नमी में
उगते है कुछ रिश्तें
मिलने बिछड़ने के क्रम में
कथित रूप से जीना आ जाता है
अफ़सोस वो बेताल है जो लटका रहता
इस सीलन भरी दीवार पर
कुछ काश ! कुछ ग्लानि कुछ उपलब्धि की
की जुगलबंदी से
मांगते है उधार
थोड़ा सा साहस और थोड़ा सा दुस्साहस
और निकल पड़ते है
अवसाद के जंगल की तरफ
जूतों के फीते बांधते वक्त
याद आती है थोड़ी स्नेहिल छाँव
फिर देखते है कोरी धूप
और अनमने कोसते हुए दौड़ पड़ते है
उस गुफा की तरफ
जहां उपसंहार की रोशनी में
जिन्दगी मिलती है
आधी-अधूरी।
© डॉ. अजीत

Sunday, October 12, 2014

रफ्ता रफ्ता

रफ़्ता रफ़्ता
तुम्हारी समझाईश की चासनी में
अल्फाज़ कुछ तरह से लिपटे कि
उनका पेंचो खम जाता रहा
तुमसे हर मुलाक़ात के बाद
मै उधड़ता चला गया
और तुम बुनती चली गए
ख्वाबों के बिन नाप के स्वेटर
चाय की केतली को खोलते हुए
जमी बूंदों को देख
याद आ जाते थे तुम्हारें आंसू
फकीरों की जटा सा
उलझा हुआ था मै
तुम पानी सी तरल थी तब
बेवक्त पर यूं बेसबब मिलना
वक्त की साजिशों का हिस्सा लगता है कभी कभी
या फिर खुदा की कोई समझदारी
कतरा कतरा पिघलते हुए
रोज नई शक्ल इख्तियार कर लेता था वजूद
तुम्हारी जुस्तजु के खत
मुझ तक पहूंच जाते थे देर सबेर
तन्हाई का चिमटा बजाते
कई दफे तुम्हारे दर तक आया
मगर तुम उन दिनों
इबादत का हुनर सीख रही थी
तुम्हें तो इस बात का इल्म भी नही होगा कि
तुम्हारी साँसों की गिरह खोलता बांधता
मै गिनती भूल गया हूँ
मुमकिन है किसी मोड़ पर
तुमसे मुलाक़ात हो
मगर बात होगी इसकी उम्मीद कम है
दरअसल
तुम्हारी पीठ पर एक बरगद उग आया है
जिसकी छाँव मेरी खिड़की पर उतरती है
तुम्हारी यादों से झुलसते हुए
वहीं सुस्ता लेता हूँ अक्सर
हकीकत की सबसे स्याह बात यही है
इसने हमारी रोशनी बदल दी है
अब हम एक दुसरे की
फिक्रों बजाए जिक्रों में शामिल है
चलो फर्ज़ कर लेते है
इन बिखरे हुए रिश्तों के सहारे
जीना मुश्किल है
और इस मुश्किल दौर में
तुम्हे उलझा हुआ नही देखना चाहता
मेरी तरफ ताउम्र पीठ ही रखना
तुम्हारा चेहरा तुम्हारे अक्स में देखने का
मै हुनर रखता हूँ
बस दुआ करों
हम जब भी मिलें
रोशनी में मिलें
अंधेरों को बचा कर रखना पड़ेगा
तन्हाई में खुद से गुफ़्तगू के लिए
बेशक!

© डॉ.अजीत


Friday, October 10, 2014

यात्रा

मन की कहता चला गया
वक्त सा बहता चला गया

दुःख हर चौराहे पर मिले
बस मै सहता चला गया

खुदा की हसीं दुनिया में
बेवजह रहता चला गया

करी सब उसने मन की
मै बस कहता चला गया
© डॉ. अजीत

आइना

सबसे निराशा के पलों में
आत्महत्या जैसा कोई विचार नही आता
उत्सव कभी मन में कोई
उत्साह नही जगाता
अतीत की गति
और भविष्य का अनियोजन
वर्तमान को जीने की वजह देता है
परन्तु वर्तमान भी नीरवता से भरा है
भीड़ से दूरी है
एकांत से एकांत जरूरी है
सपनों से एक सुरक्षित दूरी है
जीवन के प्रश्न
समाधान नही प्रति प्रश्न तलाशते है
और प्रश्नों की भीड़ में
उत्तर अपनी प्रासंगिकता खोते जाते है
मन के वैज्ञानिकों के हिसाब से
यह चक्रीय अवसाद है
परिजन  इसे प्रमाद समझते है
और दोस्त पलायन
स्पष्टीकरण की प्रक्रिया
खुद को सही ठहराने की युक्ति है
और दुनिया में एक ही समय पर
दो लोग एक साथ सही सिद्ध नही हो सकते
इसलिए स्वीकार कर लेता हूँ
नसीहतों की रोटी
सलाह का पानी और
शुभचिंताओं का नमक
एक अरसे से इन्हीं पर जिन्दा हूँ
जिन्दा हूँ यह जानने के लिए एक सूत्र सबको ज्ञात है
वो यदा-कदा छेड़ देते है
दोस्ती दर्शन और मन की बातें
फिर उनका मनोरंजन
और मेरा विरेचन दोनों एक साथ चलता है
इसके सुर प्रवचन से सधे होते है
इसलिए कभी कभी भ्रम हो जाता है
ज्ञानी ध्यानी होने का
मुझे नही
मुझमे रूचि रख रहें लोगो को
दरअसल सच तो यह है
मेरी खुद में उतनी ही रूचि बची है
जितना दाल में नमक
मेरे इर्द गिर्द जो भीड़ जमा है
उन्हें मै आईना लगता हूँ कभी कभी
इसलिए
मेरी उपयोगिता में रोशनी की बड़ी भूमिका है
वो रोशनी खरीद लातें है
और मै साफ़ दिखने लगता हूँ ।
© डॉ.अजीत

Tuesday, October 7, 2014

मृत्यु

मृत्यु का चिन्तन
अवसाद के इतर
जीवन की कलात्मकता का
परिणाम भी हो सकता है
या फिर दर्शन पढ़ने की
एक जीवनपर्यन्त उपलब्धि
यात्रा की तैयारी का
जायज़ा लेने में हर्ज़ भी क्या है
सफर पर निकलने से पहले
आश्वस्ति समझदारी समझी जाती है
जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों से
गुजर कर बिना थके
तरोताज़ा मंजिल तक पहूंचना
ज्ञान ध्यान का लक्ष्य हो सकता है
मृत्यु का दर्शन
जीवन के सरस प्रवाह से थोड़ा जटिल है
यदि तैयारी न हो तो
यह लग सकता है थोड़ा अप्रिय भी
परन्तु
मृत्यु एक खूबसूरत मंजिल है
जिसकी कल्पना के
अपने छिपे हुए रोमांच है
मृत्यु असामान्य या संदिग्ध कभी नही होती
मृत्यु बस मृत्यु होती है
साँसों के थमने या हृदय के स्पंदन रुकने से इतर
मृत्यु वरण है नए जीवन का
स्थगन है काल चिन्तन का
देह को देह बाहर निकल कर देखना
कितना विचित्र अनुभव होता होगा
कुछ कुछ स्वप्न जैसा
मृत्यु आत्महत्या से नही मिलती
मृत्युंजय मंत्र बाधक है साधक नही
मृत्यु के लिए
जीवन को झोंकने के अलावा कोई
विकल्प नही है
इसलिए जीवन की तरह
मृत्यु विचित्र संयोगों का सहारे ले
धीरे से हमारे कान में बुदबुदाती है
चलो ! बहुत सो लिए
अब जागने का समय है
और दुनिया इसे दे देती है
चिरनिद्रा का नाम
है ना बड़ा विचित्र विरोधाभास
दरअसल
मृत्यु जीवन का दूसरा पक्ष है
उतना ही जीवंत
जिससे जानने के लिए
बस मरना पड़ता है।

© डॉ. अजीत

कोयला

देखो !
फ़िलहाल
ख्याल ख्वाब और हकीकत के
महीन रेशों में मत उलझों
लम्हा-लम्हा रिसती जिन्दगी पर
वफाओं के पैबंद लगाते -लगाते
उम्र कम पड़ जाएगी
इससे पहले शिकवों की सीलन
तुम्हारे काजल को फैला दें
कुछ पलों के लिए ही सही
बंद आँखों से जी लो अपना हिस्सा
अब तक किस्तों में जीती आई हो तुम
अपनी धडकन की लय और
साँसों के आरोह-अवरोह की
एकसाथ तुरपाई कर दों
फिर मन ही मन गुनगुनाते
अपनी बिखरी सरगम को साधो
इससे पहले वक्त की तल्खी और
हकीकत की धुंध
तुम्हारी रोशनी में धुंधलका भर दें
पढ़ो वें सारे खत आहिस्ता-आहिस्ता
जो आंसूओं की स्याही से तुमने
मन के पीले पन्नों पर लिखे थे
एक गहरी लम्बी सांस लो किसी योगी की तरह
और खींच लो सारा अवसाद अपने अंतर में
अवसाद की छाँव में
मुहब्बतों की दरी पर कुछ देर सुस्ता लो
रोजमर्रा की खुद से लड़ाई
तुम्हे वक्त से पहले बुझा रही है
जानता हूँ तुम्हारा बुझना
कोयले की तरह बुझना है
जो अपनेपन की जरा सी आंच और
जरा सी हवा से
फिर से सुलगकर जल उठेगा
अपनी तमाम नमी के बाद भी
इस सर्दी में तुम्हें
धूप की तरह खिड़की से उतरता देखना चाहता हूँ
बंद कमरें में अंगीठी सी
बहुत जल चुकी हो तुम।

© डॉ.अजीत

Monday, October 6, 2014

जरिया

सुनो !
तुम्हारी आँखों में जो यें
मायूसी के रतजगे है
इन्होने तुम्हारी खूबसूरती में
इजाफ़ा ही किया है
तुम्हारी मुस्कान में अब फैलाव भले ही कम हो
मगर गजब की गहराई दिखती है
जिसे किनारे खड़ा देखते हुए
हर बार उतरने का होता है मन
तुम्हारे मन की सिलवटों को नापतें हुए
अब हांफना नही पड़ता
तुम्हारी उलझी पलकों की ओट में
देखता हूँ रोजमर्रा का छद्म युद्ध
तुम्हारे लबों की खुश्की
खुरदरी नही छोटी छोटी शिकायतों के
रेगिस्तान है
जिसे एक फूंक से उड़ा सकती हो तुम
मुद्दत से आंसूओं से चेहरा
धोती रही हो तभी तो कहता हूँ
तुम्हारा ये नूर
बेशकीमती है
तुम्हारी कीमत तुम्हें छोड़ सबको पता है
तुम्हारी बेफिक्री की एक वजह यह भी है
तुम हमारी फ़िक्र में शामिल हो
जब भी हंसती हो
हवाओं में घुल जाते है नए राग
कुछ पुरानी खुशबू
अभी एक लड़खडाता हुआ झोंका इधर आया
और मिल गई तुम्हारी खबर
तुम्हारी खबर के लिए तुमसे मिलना या
बात करना जरूरी नही
बस निकलना पड़ता है घर की चारदीवारी से
तकना पड़ता है आसमान
चाँद सूरज हवा तारे नदी झरनें
और कुछ रास्ते
तुम्हारे सच्चे खबरी है
इन दिनों बस यही जरिया है
तुमसे गूफ़्तगू करने का
तुम्हारा हालचाल जानने का
यकीनन।
© डॉ.अजीत

Saturday, October 4, 2014

नामुकम्मल

कहकहों से ऊब रहा हूँ मै
सूरज थाअब डूब रहा हूँ मै

तवज्जो नसीब नही अब
कभी बहुत खूब रहा हूँ मै

बेवफा जो कहते है मुझे
उनका महबूब रहा हूँ मै

भूलना कोई उनसें सीखे
जिनका मंसूब रहा हूँ मै

© डॉ. अजीत

Thursday, October 2, 2014

वजूद

जुड़े की स्टिक/पिन न मिलने पर
तुम्हारी झुंझलाहट
ठीक वैसी थी
जैसे घर से निकलते वक्त
नई जुराब न मिलने पर
मेरी होती थी
फर्क बस इतना था
तुम खुद इधर उधर तलाश रही थी
और मेरे लिए तलाशने को
तुम और  बच्चों सहित
सारा घर लगा हुआ था
सफर के दौरान यही सोचता रहा
यह फर्क कितना गहराता चला जाता है
मेरी हर छोटी बड़ी चीज को सहेजने की
नैतिक जिम्मेदारी तुम्हारी थी
और मेरे पास तुम्हारे खोए पाए का
कोई हिसाब नही था
तुम्हारी हंसी भी वैसे ही खो गई थी
जैसे मेरा
रुमाल खो गया था किसी होटल में
खोने पाने का हिसाब देखा जाए तो
मेरा केवल कुछ सामान ही गुमशुदा है
तुम्हारा तो सारा वजूद ही लापाता हो गया है
तुम्हारा केंद्र एक व्यक्ति एक परिवार है
जिसके इर्द गिर्द घुमती हो तुम उपग्रह सी
देखता हूँ तुम्हें रोज
घर के सपनों की मरम्मत करते हुए
मेरी बेफिक्री तुम्हारी फ़िक्र की फसल है
जिसे मै काटता रहा हूँ बरसों से
कभी कभी मेरा अपराधबोध
इतना गहरा जाता है कि
सप्तपदी के वचन
ऋषियों का षड्यंत्र लगने लगता है
जिसके सहारे रचा जाता है
समर्पण का खेल
माफी मांगने से अगर तुम्हारा खोया
वजूद वापिस मिल पाता तो
मांगता मै सार्वजनिक माफी
मगर तुम्हें जो सिखाया गया है
मेरा ऐसा करने से
तुम्हारा अपराधबोध बढ़ेगा
तुम्हें संदेह होगा खुद के प्रेम पर
तुम्हें कैसे लौटाऊँ
तुम्हारा पूरा वजूद
सारे सफर यही सोचता रहा
अब मंजिल पर उतर रहा हूँ
उतना ही निशब्द
जितना तुम्हें देखता हूँ अक्सर।
© डॉ. अजीत

Tuesday, September 30, 2014

चुपचाप

चुपचाप चले जाना बेहतर है
शोर के बीच
जैसे
गुमनान जीना बेहतर है
भीड़ के बीच
बेहतर या कमतर की बहस पुरानी है
यह मध्यांतर का बढ़िया विषय है
इसे केंद्र भी समझा जा सकता है
बता कर जाना
कह कर आने की सम्भावना
जिन्दा रखता है
चुपचाप के पदचाप
आधे दिखते है
आधे उड़ जाते है वक्त की गर्द में
न जाने रोज़
कितने लोग चले जाते है
चुपचाप
समेटे कर अपने हिस्से का एकांत
चुपचाप दरअसल एक
तरीका भर है
मन की सीढ़ी से अपनी ही कैद में उतरने का
जहां हमारे सजायाफ्ता अहसास
रोज़ बाट जोहते है हमारी
एक दिन जाना होगा
उस चारदीवारी में
जिसका अभ्यास ध्यानी करते है
जिस दिन चला जाऊं
मै चुपचाप
समझ लेना मै
आधा मौन आधा निशब्द हो
उतर रहा हूँ
अपने अंतर की कैद में
फिर मै लौट कर आऊंगा
ऐसा मेरा इन्तजार मत करना
जीना तुम भी
चुपचाप
ठीक मेरी तरह
इसे  सलाह निवेदन अपेक्षा श्राप
कुछ भी समझ सकती हो
अपने विवेक से निर्णय करना
चुपचाप।
© डॉ. अजीत

Sunday, September 28, 2014

बहानें

सात: बहाने जीने के
--------
सपनें
रोज नही बदलते
कुछ कभी नही बदलतें
कुछ यदा-कदा बदलतें है
सपनों की फितरत
बदलना है
कभी हमें कभी खुद को।
--------
वादें
उम्र के बढ़ने पर
बहुत याद आतें है
जिनको पूरा कर सकते थे
मगर नही कर पाएं।
--------
यादों का
अपना
ब्लैक एंड वाइट
चश्मा होता है
जिनकी मदद से देख पाते है
बूढ़ा अतीत।
---------
खुशी
किस्तों में उधार मिलती है
खर्च होती है
एकमुश्त !
-----------
गम
एक बहाना है
खुद को नायक साबित करने का
रोजमर्रा की जंग की
एक सबसे बड़ी
जरूरत
-----------
नाराजगी
देर तक जिसके हिस्से में
रहती है
वो बन जाता है
लोक सिद्ध।
-----------
संघर्ष
कभी खुद से
कभी जग से
हिसाब नही होता
कभी बराबर।

© डॉ.अजीत

Saturday, September 27, 2014

अक्सर

गलतियाँ करके अक्सर भूला देता हूँ
थोडा सच ज्यादा झूठ मिला देता हूँ

गुनाह का बोझ ताउम्र उठाना है पड़ता
वफा के नाम पर  आँख झुका देता हूँ

तुम्हारी समझदारी कब मेरे काम आई
अपनी नादानी से ही काम चला लेता हूँ

उसकी चालाकियां मुहब्बतों का है सबब
गुस्ताखियों पर मै अक्सर मुस्कुरा देता हूँ

ऐब तमाशा बनें जब से  महफिल में
हुनर अपने सब के सब छिपा लेता हूँ

© डॉ. अजीत

Friday, September 26, 2014

उसकी दुनिया

उसकी दुनिया: जो मेरी दुनिया थी कभी
-----------

उसकी दुनिया का
एक छोटा सा हिस्सा था मै
हिस्सा था भी या नही
यह मेरे आकार जितना
संदिग्ध था हमेशा।
********
उसकी दुनिया
भूगोल की नही
अर्थशास्त्र की दुनिया थी
जहां मै
इतिहास सा विवादित था।
*******
उसकी दुनिया
खुशी का मांग पत्र थी
और मै
उदासी का चक्रवृद्धि ब्याज़।
*****
उसकी दुनिया
सपनों की आढ़त थी
जहां रोज तुलती थी
अपेक्षाओं की फसल
छमाही की उधार।
******
उसकी दुनिया में
बैचेनियों के रतजगे थे
करवटों के जंगल थे
वो नदी थी
बिना पत्थरों की।
*******
उसकी दुनिया
उसकी परिभाषाओं पर
टिकी थी
जिसमें सम्पादन की
गुंजाईश कम थी
वो बिना शर्त उल्टी घूमती थी
अपनी धुरी पर।
*******
उसकी दुनिया
सपने दिखाती थी
जिनका टूटना तय होता
फिर सपने देखने की लत लगती
उसकी दुनिया में।
*******
उसकी दुनिया
मेरी दुनिया से अलग थी
मेरी दुनिया इनकार करती
उससे मिलने से
उसकी दुनिया आवाज़ देती जब
खुद को रोक न पाता मै।
********
उसकी दुनिया में
एक चीज सम्मानीय थी
प्रेम
प्रेम के प्रपंचों से उसे घृणा थी
अव्यक्त प्रेम करना
उसी से सीखा मैंने।
*********
उसकी दुनिया
समय की सत्ता को अस्वीकार करती
भाग्य का उपहास करती
काल गणना को उलट देती
वहां जीवन का मतलब
जीना था
गणना नही।

© डॉ. अजीत


Wednesday, September 24, 2014

महफिल

लाख समझों संवरते जा रहे हो
नजरों से तुम उतरते जा रहे हो

बदलना  दुनिया की फितरत है
हैरत है तुम  बदलते जा रहे हो

दीवानगी में कमी कोई जरुर है
फकीरी में  सम्भलतें जा रहे हो

महफिल में आए थे पीने शराब
पानी खाली तुम पीते जा रहे हो

किरदार की ऊंचाई ले आई कहां
किस्सों से तुम निकलते जा रहे हो

© डॉ. अजीत

Tuesday, September 23, 2014

दुःख-सुख

दस दुःख दस सुख

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दुख तलाश लेता है
अपने जैसा दुख
जबकि सुख नही तलाश पाता
अपने जैसा सुख।
-----------

दुख हमेशा होता है अनकहा
कहे गए दुख
सुख के जुडवा बच्चें बन जाते है
अक्सर।
---------
दुख का भार हमेशा
रीढ नही झुकाता
जैसे सुख हमेशा
गर्दन ऊंची नही करता।
-----------
सुख की उम्मीद
दुख को सहने का हौसला है
बिना उम्मीद का दुख
सुख को चाट जाता है।
-----------
दुख सुख की पीठ पर लदकर आता है
मगर टहलता अकेला है
प्रेम के दमे मे रची छाती पर
ऊकडूं बैठकर
आंखों के तालाब मे हाथ धोता है
जिसके छींटे तपते बदन पर
भाप बन उडते रहते है।
----------------
तुम्हारा दुख
मेरे जैसा नही हो सकता
तुम्हारा सुख भी अलग होगा
मगर हमारे दुख की बातें
एक जैसी हो सकती है।
----------
दुख के आंसू
सुख के आंसू से ज्यादा तरल होते है
सुख के आंसू
भोगे हुए दुख
का ब्याज़ होते है।
-----------
आंसू दुख या सुख के नही होते
आंसू होते है
मन की थकावट
का पसीना।
----------------
उदासी का दुख
सुख की मुस्कान
से गहरा होता है
दुख सुख से
इकहरा होता है।
------------
माथे की दरारों में
दुख की सीलन पाई जाती है
और गालों पर
मुस्कान के डिम्पल।

© डॉ.अजीत

Sunday, September 21, 2014

किस्सा

उसकी बातों
किस्सों
और अनुभवों को
सबसे पहले गम्भीरता से न लेना
दोस्तों ने शुरू किया
फिर पत्नि ने
उसके बाद मां-बाप ने
और सबसे बाद उसके बच्चों ने
उसकी गालबजाई को गल्प माना
अपने दौर में वो
इस तरह से खारिज हुआ कि
उसे खुद से ही चार बार पूछना पड़ता
कुछ भी कहने से पहले
ऐसा नही उसकी बातों में
दार्शनिक या साहित्यिक
गुणवत्ता का अभाव था
उसकी बातों में भरपूर रस था
मगर वो समय से तादात्म्य न बना सका
वो क्या तो अतीत में जीता
या भविष्य का नियोजन प्रस्तुत करता
उसके वर्तमान का सबसे
स्याह पक्ष यही था
वो काल गणना में निरक्षर रह गया
उसके पास  समय के षड्यंत्रो के
कुछ चुस्त समाधान थे
मगर उन दिनों वो मौन में था
अन्यथा की एक सीमा से अधिक
अन्यथा लिया गया उसे
एक बुरे दौर में वो
स्पष्टीकरण  की प्रमेय सिद्ध करता पाया जाता
शराब पीने के उसके पास
अकाट्य दार्शनिक तर्क थे
उसने इतनी धीमी गति से सिमटना शुरू किया कि
नजरों से कब ओझल हुआ
किसी को पता न चला
कुछ तलबगार उसे तलाशते
उसके टीले तक पहूंचे
मगर वो नए और पुराने पते को मिला
एक ऐसा नया पता देता
जहां न कोई सवारी पहूँचती
और न खत
पिछले दिनों उसकी एक चिट्ठी मिली
जिस पर एक त्रिकोण बना था
और नीचे एक सपाट रेखा खींची थी
इसके अलवा खत कोरा था
तबसे उस बेफिक्र की
फ़िक्र बढ़ गई है
न जाने कहां और कैसा होगा
ये तो तय है
वो जहां भी होगा
ठीक वैसा ही होगा
जैसा कभी मिला था
पहले दिन।

© डॉ. अजीत

वो

उसकी बातों
किस्सों
और अनुभवों को
सबसे पहले गम्भीरता से न लेना
दोस्तों ने शुरू किया
फिर पत्नि ने
उसके बाद मां-बाप ने
और सबसे बाद उसके बच्चों ने
उसकी गालबजाई को गल्प माना
अपने दौर में वो
इस तरह से खारिज हुआ कि
उसे खुद से ही चार बार पूछना पड़ता
कुछ भी कहने से पहले
ऐसा नही उसकी बातों में
दार्शनिक या साहित्यिक
गुणवत्ता का अभाव था
उसकी बातों में भरपूर रस था
मगर वो समय से तादात्म्य न बना सकी
वो क्या तो अतीत में जीता
या भविष्य का नियोजन प्रस्तुत करता
उसके वर्तमान का सबसे
स्याह पक्ष यही था
वो काल गणना में निरक्षर रह गया
उसके पास  समय के षड्यंत्रो के
कुछ चुस्त समाधान थे
मगर उन दिनों वो मौन में था
अन्यथा की एक सीमा से अधिक
अन्यथा लिया गया उसे
एक बुरे दौर में वो
स्पष्टीकरण  की प्रमेय सिद्ध करता पाया जाता
शराब पीने के उसके पास
अकाट्य दार्शनिक तर्क थे
उसने इतनी धीमी गति से सिमटना शुरू किया कि
नजरों से कब ओझल हुआ
किसी को पता न चला
कुछ तलबगार उसे तलाशते
उसके टीले तक पहूंचे
मगर वो नए और पुराने पते को मिला
एक ऐसा नया पता देता
जहां न कोई सवारी पहूँचती
और न खत
पिछले दिनों उसकी एक चिट्ठी मिली
जिस पर एक त्रिकोण बना था
और नीचे एक सपाट रेखा खींची थी
इसके अलवा खत कोरा था
तबसे उस बेफिक्र की
फ़िक्र बढ़ गई
न जाने कहां और कैसा होगा
ये तो तय है
वो जहां भी होगा
ठीक वैसा ही होगा
जैसा कभी मिला था
पहले दिन।

© डॉ. अजीत

फेसबुक....एक लम्बी कविता



भले ही दिन भर आपको अद्यतन रखने का
त्वरित तकनीकी प्रपंच रचती हो
मगर सच तो यह भी उतना ही है
उखड़े मूड और बेवजह की उदासी में
कोई ख़ास काम की नही है
फेसबुक
इस आभासी दुनिया का
सबसे विचित्र सच यह है कि
यह आपके अकेलपन पर कब्जा करती है
मगर अकेला छोड़ देती है आपका एकांत
यहाँ कहने सुनने बतियाने गपियाने
के तमाम विकल्प होने में बाद भी
बहुत कुछ रह जाता है अनकहा
इस माध्यम के अपने अपराधबोध है
अपनी सीमाएं है
ब्लॉक/अनफ्रेंड होने के अपने डर है
जो पीछा करते है ख्वाबों तलक
यहाँ हरी बत्ती का जला होना
एक सतही आश्वस्ति भर है
जरूरी नही आपके दुखद/सुखद पलों में
ऑनलाइन मित्रों की हमेशा
दिलचस्पी बनी रहें
वो हो सकते है व्यस्त या फिर अनमने
अक्सर मैसेज़ सीन न होने पर
आप भर सकते है खीझ और हताशा से
यह सच है फेसबुक का होना
हमें जोड़े रखता है
थोड़े अपने थोड़े अजनबी मित्रों से
मगर यह नही जोड़ पाता
स्थाई स्मृति के वट वृक्षों से
जिसकी शाखाओं पर
हम मन के बारहमासी सावन में
झूला झूल सके सखा भाव से
भर सकें प्रेम की शर्त रहित पींग
लगभग साल भर में
करीबी चेहरें बदल जातें है
इसलिए ठीक ठीक कहा नही जा सकता
कौन मित्र है कौन अमित्र
यहाँ आपको ठीक वैसे ही भूला जा सकता है
जैसे कभी भूल जाते है लंच करना
या फिर जेब पर कलम लगाना
यदा-कदा
संदेह शंका अविश्वास की विचित्र
प्रयोगशाला दिखती है फेसबुक
कुछ सिद्धो का अनुमान है
मनुष्य को ध्यान मार्ग से भटकाने का यह एक
पश्चिम का तकनीकी षड्यंत्र है
जिन मित्रों ने अपने अकाउंट डीएक्टिवेट क़िए
उनके भजन भी कुछ इससे
मिलते- जुलते थे जाने से पहले
वो यहाँ रहते ब्रेक के महात्म्य पर
प्रवचन किया करते थे
पता नही बाद में खुश रहे होंगे या मौन
मनोवैज्ञानिक इसे जरूरी और गैर जरूरी
दोनों बताते हुए
गजब का भ्रम पैदा कर रहें है
फेसबुक पर सदैव उत्साही नजर आना
एक किस्म की वैचारिक प्रतिबद्धता है
जिससे मित्रगण ऊर्जा लें
करते है अपना अवसाद नियंत्रित
यहाँ मन से दिगम्बर दिखना
कयासों का बीज हो सकता है
या फिर संदेह की बेल
जो नही चढ़ पाती मित्रों की दीवार पर
दरअसल,
फेसबुक एक गुरुत्वाकर्षण मुक्त ग्रह है
जहां हम अपना अपना यान लेकर
पहूंच गए है बिना प्रशिक्षण के
अब उड़ना टकराना बिखरना
हमारा भविष्य हो सकता है
या फिर भूत वर्तमान और भविष्य से परे
कुछ अति उत्साही कुछ सामान्य कुछ निर्वासित
लोगो की बस्ती बनें फेसबुक
और भी व्यापक हो सकता है
यहाँ उपस्थित जनों का वर्गीकरण
फेसबुक के इस नए समाजशास्त्र में
कभी कभी मेरे जैसा भगौड़ा शख्स
विस्मय से भर सोचता है
आखिर क्या चीज़ है यह फेसबुक
विचित्र अकल्पनीय आभासी
मगर सत्य
कुछ कुछ शराब के लत के जैसी
जो मौका मिलते ही तलब की वजह तलाश
लेती है।

© डॉ. अजीत