Thursday, September 17, 2015

इन्तजार की ऊब

इन्तजार की ऊब में डूबे
किसी शख्स से मिलें कभी आप
उसकी घड़ी का समय
मिनट पहले बताती है
घंटे बाद में
इन्तजार की आश्वस्ति
खुद को समझाने की बढ़िया युक्ति है
जो अटकी रहती है
किसी के होने
और न होने के बीच
इन्तजार की ऊब से पुते चेहरे
खो देते है शिल्प की ख़ूबसूरती
व्यक्त अव्यक्त के समानांतर
वो जीते है कयासों से भरी दुनिया
कभी समय के सापेक्ष
कभी समय के निरपेक्ष।

© डॉ.अजित 

Tuesday, September 8, 2015

जन्मदिन पर

लौटा रहा हूँ
तमाम यादें किस्सें और बेवकूफियां
भेज रहा हूँ
खत लिबास और रोशनी
खरीद रहा हूँ एक मुठ्ठी एकांत
सौंप रहा हूँ
तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अवसाद
कह रहा हूँ
स्थगित धन्यवाद और विलम्बित क्षमायाचना
आरम्भ कर रहा हूँ
एक नया अंत
मध्यांतर की शक्ल में
दे रहा हूँ
अवांछित शुभकामनाएं
मांग रहा हूँ
राग में दबी पवित्र कामनाएँ  वापिस

मात्र इतना ही उल्लास हर्ष उत्सव और विज्ञापन
बचा है मेरे पास
आज खुद के जन्मदिन पर।

© डॉ. अजित

सम्वाद

एक बोझिल
बातचीत में
जितनी दफा
तुमनें लबों पर ज़बां फेरी
बस उतनी ही बार लगा

मेरी बातों में थी थोड़ी बहुत गुणवत्ता।
***
तुम्हारी अनुपस्थिति में
एक फूल खिला देखा
बस देख ही पाया
उसे छूने का साहस नही था मेरे पास
तुम्हारी अनुपस्थिति में।
***
अस्तित्व मेरे और
मेरी छाया के मध्य खड़ा था
निरुत्तर
प्रश्न एक तरफा थे
उत्तर का कोई मार्ग नही था

मैं हंस सकता था
बिना आँख के, थोड़ा प्रकाश थोड़ा अँधेरे में।
***
मैंने माफी मांगी
उसे विनम्रता में कमजोरी नजर आई
मैंने क्रोध किया
उसे इसमें भी मेरी कमजोरी नजर आई
मैं मुस्कुराया
उसे यह कूटनीतिक लगी
मैं हंसा
उसे यह नकली लगी
मैं जब चुप हो गया
उसे लगा मौन में हूँ मैं
किसी साधना के निमित्त।
© डॉ.अजित

Sunday, August 30, 2015

यार

इस कदर बीमार न थे हम
कभी यारों के यार थे हम

तंज लहजे में शामिल है अब
था इक वक्त गुलबहार थे हम

उसकी उदासी के लम्हों में
पतझड़ में भी बहार थे हम

सफर पर निकले जिस दिन
जल्दबाजी में तैयार थे हम

दुश्मन आज हुआ है जो
कल तक उसके यार थे हम

© डॉ. अजित



Tuesday, August 25, 2015

लोकप्रियता

फिर भी
जितनी लोकप्रियता होनी चाहिए थी
उतनी नही थी मेरे पास
यह मेरे जीवन का स्थाई खेद था

मेरे पास एक कच्चा शिल्प था
जो पढ़ने में आसान था
समझने में तो और भी आसान

मेरी बातें रोजमर्रा की बतकही थी
उनमें शास्त्रीयता का था नितांत ही अभाव
दर्शन की जटिलता नही थी उनमें
मन का बिखरा हुआ मनोविज्ञान कहता था मैं

अधूरापन स्थाई भाव था
जो आकर बैठ गया था
मेरी कलम की पीठ पर

कुछ दोस्तों का मत था
एक ख़ास जगह जाकर
थोड़ा अटक थोड़ा भटक गया हूँ मैं

पुनरावृत्ति की शिकार थी मेरी सम्वेदनाएं

मैं किस लिए कहां था
नही बता सकता था किसी साक्षात्कार में

अरुचि और एकालाप के मध्य खींच कर वृत्त
डमरू बजाता था मैं
मेरी कविता इतनी निजी किस्म की थी
कुछ ही लोग 'मैं' को तोड़ जी पाते थे उसका दशमांश

मैं लिख रहा था भूत
वर्तमान की शक्ल में
मैं जी रहा था भविष्य
अतीत की दहलीज़ में
मेरी कोशिसें थी बेहद अस्त व्यस्त और अनियोजित

शायद, तभी संदिग्ध थी मेरी लोकप्रियता।

© डॉ.अजित



Monday, August 24, 2015

मांग पत्र

हमनें बिछड़ते वक्त
कुछ भावुक वायदे किए थे

धुल गए वो धूप की बारिश में

अब वायदों के आकार बच गए है
जैसे चाय के कप की नीचे बच जाता है एक वृत्त
चाय के बाद जितना अप्रासंगिक हो चला है
अब बतकही से हरा भरा वक्त

हमनें बिछड़ते वक्त
कुछ स्पर्श दिए थे उधार

जिनके ब्याज़ से
आज तक चल रहा है
दाल रोटी नमक

मिलने बिछडनें के मांग पत्र
कोई मूल्य नही बचा है

पता नही है यह सम्बन्धों का
अर्थशास्त्र है या
मनोविज्ञान।

©डॉ.अजित 

Sunday, August 16, 2015

उसकी बातें

उसकी बातें: किसकी बातें
--------------------------

उस पर सबसे ज्यादा
कोफ़्त मुझे तब होती
जब वो किसी शब्द/बात का अर्थ मुझसे पूछती
फिर गूगल भी जब उसी से मिलता जुलता जवाब देता
तो बड़े उत्साह से मुझे वो बात बताती
उसका शोध
जब अविश्वास की उपकल्पना से गुजरता
तब निसंदेह स्माईली के मेरे जवाब के बावजूद
बहुत खराब लगता था मुझे।
***
उस पर सबसे
ज्यादा प्यार मुझे तब घुमड़ता
जब वो मेरे खराब मूड की परवाह किए बिना
आदतन पूछती
आज क्या खाया है लंच में
ब्रेकफास्ट किया की नही।
***
उस पर सबसे ज्यादा गुस्सा
तब आता था
जब उसनें सीख ली समझदारी
और छिपाने लगे अपने दुःख।
***
उस पर सबसे ज्यादा
विश्वास इसलिए भी था
वो खुद से ज्यादा
दुसरे के ठगे जाने की करती थी परवाह
हर बार, हमेशा।
***
उस पर सबसे
कम बातें हुई
और वो सबसे ज्यादा बचती रही
मेरे अंदर।

© डॉ.अजित


Thursday, August 13, 2015

सरनेम

जब मैं कहता हूँ
मैं भी लिखता हूँ कविताएँ
एक दिलचस्प बातचीत में भी
ख्यात कवि की
अरुचि चरम् पर पहूंच जाती है
कवि चाहता है
एकालाप
कभी उसके
कभी उसकी कविता के बारें में
सवाल यह भी बड़ा है
कविता मेरी या उसकी
कैसे हो सकती है
कविता तो बस कविता है
हाँ कुछ कविता
नाम के सहारे तैर जाती है
लूट लेती है समीक्षकों का मत
कुछ कविताएँ
भोगती है अपने हिस्से का निर्वासन
कविता का वर्णवाद
कम खतरनाक चीज़ नही है
कविता में आरक्षण जैसी सुविधा भी नही
फिर भी हाशिए के लोगो की
कच्चें कवियों की
कविता जिन्दा है
ठीक ठाक पढ़ी भी जा रही है
इस बात पर
थोड़ा खुश जरूर हुआ जा सकता है
मगर थोड़ा ही
क्योंकि आज भी ख्यात कवि की
कविता से ज्यादा कवि के सरनेम में
दिलचस्पी है।

© डॉ. अजित

Monday, August 3, 2015

अबोला


जिन दिनों तुमसे
बातचीत बंद थी बेवजह
उन दिनों
आसमान का रंग हो गया था सफेद
धरती हो गई थी काली
हवा का वजन कुछ ग्राम बढ़ गया था
नदी समुन्द्र तल से नीचे बह रही थी
पहाड़ अनमना हो बैठ गया था ऊकडू
जंगल हो गए थे समझदार
खरपतवार बन गए थे सलाहकार
झरने बंट गए थे हिस्सों में
पत्थरों के पास थे नसीहत के राजपत्र
उनदिनों
बादल हो गए थे चुपचाप
बूंदे बढ़ा रही थी ताप
रास्तों ने मिलकर तय कर लिए थे भरम
जिन दिनों तुमसे बातचीत बंद थी
उन दिनों
सपनों की फ़िल्म एक्स रे की माफिक
चांदनी में देखता तो
चाँद में साफ़ नजर आता था
बाल भर अविश्वास का फ्रेक्चर
तारें देते थे सांत्वना वक्त बदलनें की
उन्ही दिनों मैंने जाना
बातचीत कितनी जरूरी चीज़ थी
मेरे जीवन की
इसी बातचीत के सहारे
मैं धकेल सकता था दुःख को सैकड़ो मील दूर
स्थगित कर सकता था अवसाद का अध्यादेश
लड़ सकता था खुद से एक बेहतर युद्ध
मुक्त हो सकता था हार और जीत से
बता सकता था खुद की कमजोरियों का द्रव्यमान
उम्मीद को पी सकता था ओक भर
ताकि बचा रहे एक बेहतर कल
दरअसल
बातचीत का बेवजह बंद हो जाना
उतना अप्रत्याशित नही था
जितना अप्रत्याशित था
इस बात का इतना लम्बा खींच जाना।

©डॉ.अजित

एक दिन

उस दिन मैने दुनिया के
सबसे बड़े सर्च इंजन को
सबसे नकारा घोषित कर दिया
जिस दिन वो तुम्हें खोजनें में असफल रहा
ठीक उसी दिन मैंने
मोबाइल नेटवर्क को भी अपने जीवन में
सबसे अनुपयोगी वस्तु पाया
जब मेरे फोन में तुम्हारी खनकती आवाज़ ने
आने से इनकार कर दिया
इसी दिन मैंने
खुद को याददाश्त को खारिज किया
क्योंकि वो तुम्हारी अच्छाई
याद नही दिला पा रही थी
महज एक दिन में
फोन इंटनेट और याददाश्त
मेरे जीवन की सबसे
निष्प्रयोज्य चीज़ बन गई
इनदिनों जब तुम नही हो
मैं सोचता हूँ उस दिन के बारें में
जिस दिन के बाद
तुम, तुम न रही
और मैं भी शायद मैं नही रहा हूँ।

© डॉ. अजित 

ज्ञात अज्ञात

सम्बंधो के पुनर्पाठ में
बच जाते है कुछ विकल्प
जिसके भरोसे रच लेते है
एकांत का संसार
छूटे हुए सिरों की परवाह भी
छूट जाती है धीरे धीरे
जैसे नदी भूल जाती है
ठोस बर्फ से तरल पानी बनना
सम्बन्धों में तृप्ति सबसे बड़ी असुविधा है
ज्ञात सबसे बड़ी बाधा
सतत् बचना जरूरी होता है
कुछ अज्ञात कुछ अनकहा
तभी बच पाता है
समबन्धों का भूगोल
विश्वास के झरनें सूख जाते है जब
तब न पत्थर में शिल्प दिखता है
न गहराई की लिपि समझ आती है
सम्बन्ध एक ख़ास किस्म की जटिलता बुनतें है
हम सरलता से समझना भी चाहें तो भी
नही जान पाते अपनी चाह का मनोविज्ञान
सब कुछ ठीक होना
हमेशा सब कुछ ठीक होना नही होता है
कभी कभी विश्वास शंका और मान्यताओं के जंगल में
निपट अकेले पड़ जाते है सम्बन्ध
मनुष्य की सीमा कर देती है
उसको सबसे अकेला
एक अच्छी खासी भीड़ के बीच।

© डॉ.अजित

Friday, July 31, 2015

बातें

मैंने एक दिन उससे कहा
यू डिजर्व बेस्ट
वो इस बिन मांगी सलाह पर हैरान थी
फिर दार्शनिक मुद्रा में बोली
बेटर या बेस्ट कुछ होता ही नही
फिर क्या होता
मैंने पूछा
उसने कहा जिंदगी का ज्यादा ग्रामर नही पढ़ा मैंने
बस इतना पता है
क्या तो कोई जिंदगी में कुछ होता है
या फिर कुछ होता ही नही
अब मैं चुप था।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
तुम्हारी आँखों में प्यार नही दिखा कभी
ये प्यार छिपाना कहां से सीखा
मैंने कहा तुम्हारी बातों से
फिर पूरे ढाई दिन उसनें बात नही की मुझसे
मेरी शुष्क आँखें इस प्यार को जरूर देख सकती थी
वो भी मीलों दूर।
***
कभी कभी हम एक दूसरे से
अजनबी की तरह पेश आतेे
हो जाते थे बेहद औपचारिक
दुआ सलाम तक हो जाती थी बंद
बस एक बात बचा लेती थी
रिश्तों की ख़ूबसूरती
तमाम अरुचियों असहमतियों के बावजूद
कभी भी अविश्वास नही था हमारे बीच।
***
एकदिन उसनें पूछा
एक आसान सवाल का जवाब दो
प्यार जिंदगी है या
जिंदगी प्यार है
मैं जवाब सोच ही रहा था
अचानक वो खिलखिलाकर हंस पड़ी
इतना सोचने वालों के लिए
न प्यार है न जिंदगी है
फिर क्या है मैंने नाराज़ होते हुए कहा
सोचकर बताऊंगी
यह कहकर वो फिर हंस पड़ी।
***
© डॉ.अजित

Monday, July 27, 2015

दरख़्त

कुछ दरख्तों के साए में
छांव के साथ
नमी भी मिलती है
छनकर आती धूप का
बढ़ा होता है तापमान
कुछ घनें दरख्त
इतनें खामोश किस्म के होते है
उन्हें नही बोल पातें हम
सुप्रभात या शुभ रात्रि
इन दरख्तों की पत्तियां होती है
बेहद अनुशासित
वो हवा को भी घूमा कर बना देती
थोड़ी भारी हवा
इन दरख्तों को छूने का साहस
बमुश्किल जुट पाता हैं
ये खड़े है बरसों से एक जगह
यह देखकर बस एक आश्वस्ति मिलती है
जिसके सहारें
इन दरख्तों को हम घोषित करते है
अपना सबसे परिपक्व और समझदार मित्र
आश्वस्ति जड़ता का चयन करती है
और गम्भीरता रहस्य का
दरख्तों के बीच जीतें आदमी
कभी कभी दरख्त लगने लगते है
और कभी कभी दरख्त आदमी
ये दरख्त हमारे साथ रहते हुए भी
हमसे इतने ही अजनबी है
जितने इनके साथ रहते हुए
हम इनसे
इसलिए कहना पड़ता है
साथ का मतलब
हमेशा साथी नही होता।

© डॉ. अजित

Friday, July 24, 2015

विदा

हमेशा विदा को
अलविदा से बचाता रहा
दरअसल
अलविदा एक बढ़िया सुविधा है
एक युक्तियुक्त पलायन
विदा एक जिम्मेदारी है
एक कल्पना है
एक बेहतर कल की
विदा बचाती है उम्मीद
लौट आने की
बिना किसी अपराधबोध के
अलविदा कहना मुश्किल जरूर होता है
मगर विदा को देखना
उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है
मैनें जीवन में अक्सर चुनी थी विदा
जो दुर्भाग्य से बन गई अलविदा
उदासी की कुछ पुख्ता वजहों में से एक है
विदा का अलविदा में बदल जाना।

© डॉ.अजित 

Wednesday, July 22, 2015

गुफ़्तगु

अभी तो रूह ने करवट ली थी
पलको से अहसासों की गर्द छटी थी
बेफिक्र आफ्ता साँसों ने इल्तज़ा की थी
कुछ गिरह खुल भी न पाई
एक सुरमई शाम
ख्वाब की दहलीज़ पर बैठी सिसकती है
शक ओ शुबहो में खर्च होती
जिंदगी को थोडा संवर जाने दो
बेसाख्ता लम्हों को बिखर जाने दो
रोज़ उलझते हुए दयारो में
जब तुमसे मुलाक़ात होती है
लफ्ज़ अहसास की चादर से छिटक जाते है
जैसे रात के अँधेरे में कुछ आवारा ख्याल
अपनी धुन में निकल जाते है
मैं लम्हा लम्हा सिरे जोड़ता हूँ
तुम्हे तुम्हारे अंदर तलाशता हुआ
आवाज़ देता हूँ मगर तब तक
वक्त की गर्दिशे ख्याल को जब्त कर जाती है
सुबह ओस की पहली बूँद सी बातें बिखर जाती है दुनियादारी की चौखट पर उदासी के दिए जलते है
कुछ अहसासों को महफूज़ कर लेता हूँ कि
किसी दिन बात से बात निकले
तो वो बात कह सकूं
हां ! मुझे शिद्दत से तुम्हारा इन्तजार रहता है
हो किसी शाम तुम्हारा साथ
और बुनते रहे कुछ आवारा ख्याल
मंजिल से बड़े हो जाए कुछ रास्ते
फिर पुरकशिस लम्हों का लोबान जला
फूंक दू कुछ दुआ तुम्हारे हक में
कैद कर कुछ लम्हों को अक्सों की शक्ल में
एक बोसा लूँ उन आवारा ख्यालो का
जो रोज़ अपने सिराहने बो सो जाती हो तुम
बातें मेरी समझनें जरूरत कब जानाँ
बातों से मेरी रफू करना अपनी तन्हाई को
पैबन्द लगाना कुछ अनकहे ख्यालों का
तुम्हारे लिए नींद को गिरवी रख
चन्द ख्याल उधार लाया हूँ
धड़कनों के बीच अटक गई है
कुछ बातें उनको सुनोंगी तो पाओगी
दिल से रूह के दरम्यां कुछ लम्हें घरोंदे बनाते है
कुछ बेअदब से ख्याल
कुछ आवारा सी रोशनी
मेरी रूह को रोशन करती है
एक तुम्हारा तस्सवुर काफी है
मुझे फिलहाल उधार की जिंदगी के लिए।

© डॉ. अजित

अंतिम

अंतिम पगडंडी
ठीक उसी रास्ते पर खत्म होती है
जहां दोराहा चौराहें से मिलता है
अंतिम कदम उतना ही भारी होता है
जितना पहला दुस्साहस
अंतिम बात कभी अंतिम नही रह पाती
वो छोड़ देती है हमेशा सम्भावना
एक नई बात की
अंतिम जो भी दिखता है
वो दरअसल अंतिम नही होता
वो होता है प्रथम का विलोम
ठीक निकट का विरोधाभास
सत्य का ऐच्छिक संस्करण
अंतिम अकेलेपन को समझते हुए
हुआ जा सकता है सिद्ध
जीवन और मृत्यु के बीच फंसी
हर बात अंतिम नही होती
ठीक जैसे
अंतिम नही होता इच्छा का मर जाना
अंतिम होना एक किस्म की सांत्वना है
यात्रा की समाप्ति या शुरुवात नही
यात्रा का मध्यांतर है अंतिम होना।

© डॉ. अजित

Tuesday, July 7, 2015

धरती

धरती घूम रही है
अपनी एक थिर गति से
कायदे से
इसे रुक जाना चाहिए
कुछ पल के लिए
ताकि जड़ हुए मनुष्य
छिटक कर जा पड़े मीलों दूर
मनुष्यता को बचाने का
कम से कम एक प्रयास
धरती को करना चाहिए जरूर।
***
देखना एक दिन ऐसा होगा
धरती बंद कर लेगी अपनी आँखें
फिर फर्क करना मुश्किल हो जाएगा
दिन और रात का
उस दिन
आसमान कोई सलाह नही देगा
वो देखेगा
मनुष्य को भरम के चलते
गिरते-सम्भलतें हुए
धरती आसमान के बीच उस दिन
सबसे अकेला होगा मनुष्य।
***
धरती की शिकायत
बस इतनी सी है
मनुष्य उसे अपनी सम्पत्ति समझता है
जबकि
वो खुद ब्रह्माण्ड के निर्वासन पर है
जिस दिन पूरा होगा उसका अज्ञातवास
मनुष्य सबसे अप्रासंगिक चीज़ होगा
धरती के लिए।
***
धरती गोल है
यह एकमात्र वैज्ञानिक सत्य नही है
धरती के गोल होनें के मिले है
ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण भी
तभी तो
मनुष्य जहां से चलता है
एक दिन लौट आता है उसी जगह
कभी हारकर कभी जीतकर
धरती जरुर गोल है
मगर मनुष्य का कोई एक आकार नही है
यह बात सिद्ध होनी बाकि है अभी
किसी वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक शोध में।

© डॉ. अजित 

Saturday, July 4, 2015

ज्योतिष

मैंने कहा
जरा हाथ दिखाओं अपना
उसनें कहा
अपनी रेखाओं से
आधी सेंटीमीटर रेखाऐं घटा दो
दक्षिण के अंशों को
उत्तर से मिला दो
माथे से उतार कर देखों
मेरी अनामिका के निशान
अगर फिर भी न बांच सको भविष्य
तब दिखाऊंगी अपना हाथ
उसके बाद
हाथ देखना छोड़ दिया मैंने
उसका तो क्या खुद का भी।
***
मैंने पूछा
तुम्हारी राशि क्या
उसनें कहा
अनुमानों के विज्ञान में यकीन नही मेरा
और मेरे अनुमानों में
मैंने पूछा
तुम्हारे भी अनुमानों में नही
बस तुम में यकीन है मेरा।
***
आदतन एकदिन मैं
बांचने लगा उसका फलादेश
दशा महादशा प्रत्यंतर
सबकी गणना करता हुआ
कर रहा था आधी अधूरी भविष्यवाणियां
वो जोर से हंस पड़ी
मैंने कहा कुछ गलत कहा मैंने
उसनें कहा नही
प्रेम में तुम्हें अंधविश्वासी होता देखना
फिलहाल अच्छा लग रहा बस।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
ये शनि की साढ़े साती की तरह
प्रेम की साढ़े साती भी होती है क्या
मैंने हंसते हुए कहा
प्रेम का पहले ढैय्या चलता है
फिर साढ़े साती
उसनें कुछ गणना की
और कहा जल्द बिछड़ने वाले है हम
उसके इस फलादेश का उपचार नही मिला आजतक।

© डॉ. अजित



Saturday, June 27, 2015

सिद्ध

जिन दिनों मुझसे
बेहद नाराज़ थी तुम
उन दिनों
हवाओं से पूछता था मंत्र
नदियों से मांगता था रेत
जंगल से मांगता था समिधा
तुम्हारे डर से तीनों कर देते थे साफ़ मना
फिर थककर
बनाता था सपनों का हवन कुंड
वादों की सामग्री
और अपनत्व की समिधा
ब्रह्म महूर्त में रोज करता था यज्ञ
उन्ही दिनों मैनें कुछ नए मंत्र सीखें
प्रेम के तंत्र के
प्रत्येक स्वाहा में जलाता था खुद को
ताकि इस नाराज़गी का उच्चाटन कर सकूं
तुम्हारी नाराज़गी
खतम होते होते सिद्ध बन गया था मैं
फिर भी कहता हूँ
हो सके तो फिर कभी
नाराज़ मत होना
क्योंकि अब मैं भूल गया हूँ
सब मंत्र तंत्र
सिर्फ याद है
तुम्हारा नाराज़ होना
और खुद का मजबूर होना
और दोनों ही यादें अच्छी नही है
यकीनन।
©डॉ. अजित

Monday, June 15, 2015

स्मृतियाँ

काश स्मृतियों के पाँव नही
कान होते
उनको सुना पाता मैं
तुम्हारे साथ होने की खनक
वो यूं दबें पाँव न आती फिर
उठा लाता उन्हें गोद में
उनके कान को चूमता हुआ
जिस तरह आती है
बीतें पल की स्मृतियाँ
मुझे नही पसन्द
उनका इस तरह आना
चाहता हूँ वो जब भी आएं
कुछ इस तरह आएं
जैसे पानी पर आती है काई
उन पर फिसलकर
चोट नही लगें
बस लड़खड़ाऊ
और गिरनें से पहलें
थाम लो तुम मेरा हाथ।

© डॉ.अजित

Sunday, June 14, 2015

प्रेम का बचना

धरती की पीठ पर लिखा था प्रेम
नदियां छिपा रही थे प्रेम
झरनें मिटा रहें थे प्रेम
हवा उड़ा रही थी प्रेम
समन्दर डूबा रहे थे प्रेम
तमान कड़वी बातों
तमाम असहमतियों के बीच
इस ग्रह पर
बस हम तुम बचा रहे थे प्रेम
धरती से पूछा जब आकाश ने
किस तरह मिलनें आओगी तुम
उसनें हमारी तरफ इशारा करते हुए कहा
इनकी तरह
फिर अचानक बारिश हो गई
पता नही पानी की बूंदे थी या
आसमान के आंसू
उसके बाद
थोड़ा आसान हो गया था
हमारे लिए प्रेम को बचाना।

© डॉ.अजित

Friday, June 12, 2015

बोध


---
धूप चुनती है उसे
डाकिया
बारिश चुनती है उसे
कर संग्रह अमीन
हवा बना देती है उसे
चपरासी
ढ़ोता है वो वायदों की फ़ाइल
इस दर से उस दर
धरती चाहती है
जरीब से उस पर लिख दें
प्रेम के तीन शब्द
उसकी किस्मत में लिखा है
मात्र लेखपाल होना।
***
वो दिशा भूल गया है
उत्तर को पूरब बताता है
दक्षिण को पश्चिम
पूरब और पश्चिम में भेद नही कर पाता
उसके पास एक मानचित्र है
जिसे देखकर वो केवल हंसता है
कई भाषाविज्ञानी
उसकी हंसी को डिकोड करने में लगे है
वो यारों का यार है
कोई विक्षिप्त मनुष्य नही।
***
उसकी दफ्तर की
दराज़ में कुछ ख्वाहिशें दफन है
वहां कागज के पुलिंदों के बीच
अटका रह गया है एक खत
जिसकी स्याही सूख रही है
लफ्ज़ मिट रहे है
पते की जगह
तीन लाईन की सीढियां बन गई है
वो पिनकोड के जरिए
पहूंचना चाहता है उसके दर तक
इनदिनों वो खुद को भूल
याद करता रहता है उसका पिनकोड।
***
झरनें भेजतें है
वजीफे नदी के नाम
नदी लेंने से मना कर देती है
झरनें अपमानित नही
उपेक्षित महसूस करते है बस
नदी हंस पड़ती
झरनें गाने लगते है बोझ का गीत
समन्दर देखता है
नदी का मनुष्य
और झरनें का देवता होना।

© डॉ. अजित 

Saturday, June 6, 2015

खेत और कविता

तुम्हें अचानक से सामनें देख
ठीक उतनी खुशी होती है
जितनी धान की निकली बाली को
पहली बार देख कर होती है
मुरझानें के डर से
उसकी तरफ उंगली नही करता
और तुम्हारी तरफ नजर।
***
तुम्हारे अंदर
पड़ा रहना चाहता हूँ
अनुपचारित बीज की तरह
शायद कभी तुम्हारे एकांत की  नमी में
अकुंरित हो जाऊं
और छाया दे सकूं
तुम्हारे तपते मन को।
***
देह की मिट्टी पर
उगतें है कुछ खरपतवार
जिनकी कोमलता पर
मुग्ध हो
हम खो बैठतें
सम्बंधों की उत्पादकता।
***
बदलती जलवायु ने
बदल दिया है
फसलों के पकनें का समय
ठीक वैसे ही
जैसे तुम्हारी अनायास उदासीनता ने
बदल दिया है
खुश रहनें का वक्त।
***
खेत पर मेढ़ जाती है
जिस पर चलता हूँ
बड़ा सन्तुलन साध कर
वरना गिर सकता हूँ
लड़खड़ाकर
तुम्हारे घर सीधी सड़क जाती है
नही उठा पाता एक कदम
तमाम साधन संतुलन के बाद भी
यहां गिरनें का नही
पहूंचने का भय है।
***
जलस्तर देख
पौधा कर लेता है समझौता
सीमित कर लेता है जरूरतें
सहन कर लेता है ताप
समझता है धरती की मजबूरी
और खुद की सीमा
तुम उखाड़ देती हो मुझे
कांट-छाँट के नाम पर
मन की बालकनी से
अपनी कोमल ऊंगलियों से
बिना मुझे बताए।

© डॉ.अजित

Tuesday, June 2, 2015

खगोल

यदि तुम मोटिवेशन की तलाश में
मेरे नजदीक आए हो तो
मुझे खेद है
ये तुम्हें न मिलेगा
मेरे पास एक चुम्बकीय क्षेत्र है
जहां जुड़ सकतें हो
या फिर प्रतिरोध पैदा कर सकते हो
चयन नितांत ही तुम्हारा है
सोच लो।
***
बंद घड़ी दो वक्त
सही समय बताती है
यह एक कोरा बौद्धिक झूठ है
चौबीस घंटें में किसी रुकी हुई चीज़ को
दो बार देखकर
हम समय का सही होना तय कर सकते है
समय को सही गलत तय करना
समय का अपमान है
ये बात बंद घड़ी बताती है
बशर्ते वो सच में बंद हो
किसी अभाव में थमी न हो।
***
धरती की आँख पर
काजल लगाने के लिए
ऊकडू बैठा एकदिन
धरती ने आँखें बंद कर ली
उस दिन समझ आया
धरती संवरना नही
सोना चाहती है
मेरी अनामिका से लोरी सुनकर।
***
चांद का एक यही डर
सबसे बड़ा था
धरती को यदि दिख गया
दूसरा चाँद
उसका क्या होगा
धरती चाँद की नही
सूरज की तलाश में थी
एकमात्र इसी बात पर
बचा हुआ था
दोनों के मध्य खगोलीय प्रेम।

© डॉ. अजीत

Monday, June 1, 2015

सवाल

वो जब भी मिलती
सवालों के साथ मिलती
उसके लिए जिज्ञासा का विस्तार था
मेरा होना
उसकी बातों में होता
कुछ दशमलव कौतुहल
कुछ अक्षांश दूरी का पैमाना
और मेरे देशान्तर को परखनें की जिद
प्रश्न-प्रतिप्रश्न और सन्देह का एक ऐसा
त्रियामी मानचित्र बनाती कि
मैं भूल जाता अपनी दिशा
उसकी उपकल्पनाओं में
मेरा दर्शन भीड़ से अलग दिखनें का
एक वितंडा भर था
वो सिद्ध करना चाहती थी
मेरा बेहद मामूली होना
उसके खुद के बनाए हेत्वाभास
मुझे घेरते चक्रव्यूह की तरह
वो देखना चाहती थी मुझे
कर्ण की भाँति निशस्त्र
मेरा अस्तित्व जब एक चुनौति बन गया
तब उसनें निर्णय किया मुझसे प्रेम न करनें का
क्योंकि अपनी तमाम बुद्धिमानी के बीच
वो जान गई थी ये सच
यदि एकबार भी
मुझसे प्रेम किया उसनें
तो फिर उसके पास नही बचेगा
किसी के लिए भी लेशमात्र प्रेम
प्रेम के इस संस्करण को
सबसे बेहतर ढंग से
उसी के जरिए समझ पाया मैं।

© डॉ. अजीत