Wednesday, October 7, 2015

स्मृतियां

एक दिन केवल बच जाएंगे
स्मृतियों के भोजपत्र
जिन पर यंत्र की भाषा में लिखी होंगी
तुम्हारी हितकामनाएं
मैं भूल चूका हूँगा तब तक
उसकी प्राण प्रतिष्ठा के बीज मंत्र
उन्हें उड़ा देना होगा हवा में या फिर
बहा देना होगा बहते जल में
स्मृतियों की ऐसी गति देख
समय हंसेगा मुझ पर
और मैं खड़ा रहूंगा
थोड़ा निष्प्रभ थोड़ा अवाक्
मैं उस दिन की प्रतिक्षा में नही हूँ
इसलिए मुझमें उत्साह की मात्रा
कुछ प्रतिशत कम नजर आती है
स्मृतियों के औचित्य सिद्ध करने के
सूत्र नही मिलते किसी किताब में
ज्ञात अज्ञात के मध्य
ये रेंगती है अपने हिसाब से
स्मृतियों का उपयोग करना नही आता मुझे
इसलिए भी दुविधा में हूँ
तुम्हारे बिना
तुम्हारी स्मृतियों का क्या करूँगा मैं।

© डॉ. अजित

Monday, October 5, 2015

प्रेम का विमर्श

उसनें सच्चाई से कहा एक दिन
प्रेम नही करती तुमसे मैं
मैंने धन्यवाद कहा
प्रेम करने से बचता नही है
प्रेम को जीना पड़ता है
अपने अपने हिसाब से।
***
तुम भी मुझसे प्रेम नही करते
मेरे बारें ये उसकी आम राय थी
मैंने कहा हां नही करता तुमसे प्रेम
मैं वो हर काम करने से बचता हूँ
जिसमें मूलयांकन अनिवार्य हो
मैं जीता हूँ बस तुम्हें सोचते हुए
बिना शर्त बन्धन मुक्त।
***
प्रेम में उड़ान भूल जाते है पंछी
भटक जाते है वो नीड़ से
यह कहते हुए
तुम उपदेशक की भूमिका में थी
मैंने कहा
भटकना भी जरूरी होता है प्रेम में
बंधकर नही किया जाता कभी प्रेम
भटकन प्रेम का शाश्वत सच है।
***
प्रेम बंधन में बांधता है या मुक्त करता है
अचानक तुमनें ये दार्शनिक प्रश्न किया
प्रेम न बांधता है
न मुक्त ही करता है
प्रेम विस्तारित करता है
हमारे अस्तित्व का सच
सच प्रिय अप्रिय हो सकता है
फिर तुमनें प्रतिप्रश्न नही किया।

© डॉ. अजित

Tuesday, September 29, 2015

हमदर्द

मेरे हमदर्द होने का वो यूं पता देते थे
दर्द जहां था बस वहीं से दबा देते थे

जमानतें मांगता था वो दुनिया भर की
आदतन हम अपना शेर सुना देते थे

तड़फने का एक मंसब इतना हसीं था
रोते हुए भी बारहा हम मुस्कुरा देते थे

बिछड़ कर उनसे हुआ ये मालूम हमें
शिकारी भी कभी परिंदे उड़ा देते थे

रात का सफर एक मुसलसल किस्सा था
रोज़ सुबह ख़्वाबों की ख़ाक उड़ा देते थे

© डॉ.अजित

Sunday, September 27, 2015

सम्भालना मुझे...

संभालना मुझे उस नाजुक दौर में
जब भूल जाऊं मैं
धरती और आसमान का फर्क
बातें करूँ बहकी बहकी
हो सकता हूँ मैं बेहद सतही भी
जब कभी अनायास वाणी से
हिंसा पर उतर आऊं
होता जाऊं क्रूर और कड़वा
संभाल लेना मुझे
उस नाजुक दौर में
जब तुम्हें खोने के मेरे पास
हजार बहाने हो
और तुम्हें सम्भाल कर रखने का
कौशल हो गया हो समाप्त
अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद
मुझे आश्वस्ति है
तुम सम्भाल लोगी मुझे
उस नाजुक दौर में
ठीक अपनी तरह ।

© डॉ. अजित

प्रतिक्षा

तुम्हारी प्रतिक्षा में
मैंने मृत्यु स्थगित कर रखी है
शब्दों को अर्थ के घर
सुला आया हूँ
घर का सबसे उपेक्षित कोना
साफ किया है तुम्हारे लिए
नही चाहता जब तुम आओ
हवा को भी इसी खबर लगे
तुम्हारी प्रतिक्षा में
प्रार्थना को बांध दिया है
अनुराग की दहलीज़ पर
और खुद खड़ा हूँ
धरती से कुछ दशमलव ऊपर
तुम्हारी प्रतिक्षा में
व्याकुल या आतुर नही हूँ
बस मैं ठहर गया हूँ
समय के एक अधूरे समकोण पर
जब तुम आओगी
उस क्षण की कल्पना में
धकेल रहा हूँ अवसाद को सदियों पीछे
देख रहा हूँ एक युग आगे
भटक रहा हूँ आवारा दर ब दर
मेरे पास आश्वस्ति की बांसुरी है
जिस पर बजा रहा हूँ एक उदास धुन
यह सोचते हुए
एक बार रास्ता भूल भी गई तो भी
इस धुन के सहारे मुझे तक पहुँच जाओगी तुम
तुम्हारी प्रतिक्षा में
खुद को प्रतिक्षारत रख
मैं समय को साध रहा हूँ
ताकि तुमसे ठीक वैसा ही मिलूँ
जैसा कभी मिला था पहली बार।

© डॉ. अजित

Wednesday, September 23, 2015

नियति का राजपत्र

उन दिनों जब तुम मेरे लिए
खुद से खूबसूरत और मेरी हमउम्र
प्रेमिका तलाश रही थी
तुम्हें व्यस्त देख
मैं निकल आया था बहुत दूर
तुम्हारे उत्साह में कंकर मार
मन की तरल सतह पर
वलय नही बनाना चाहता था
इसलिए मैंने स्मृति में मार्ग को नही रखा
मैंने रास्ते में देखे कुछ बेजान पौधे
धूल के कुछ छोटे पहाड़
और एक आधी अधूरी पगडंडी
उन दिनों
तुम्हारे सुझाए विकल्पों पर
मैं केवल मुस्कुरा सकता था
मगर तुम मुझे प्रेम में
हंसते हुए देखने की जिद में थी
इसलिए भी मैं निकल आया था
चुपचाप
सम्भव है तुम्हें लगा हो यह पलायन
या फिर मेरी पुरुषोचित्त कायरता
अधूरी पगडंडी पर चलता हुआ
आ गया हूँ उस दिशा में
जहां से मेरी ध्वनि समाप्त होती है अब
तुम्हारे विकल्पों को अनाथ छोड़ने पर
मैं थोड़ा सा शर्मिंदा भी हूँ
दरअसल
तुम और तुम्हारे विकल्प के मध्य
चुनने की सुविधा तुमनें दी नही थी
और मैं खुद समय का एक विकल्प था
मेरा निकलना तय था
क्योंकि ठहरने का एक अर्थ
तुम्हें खोना था
नियति के राजपत्र पर
यह बात प्रकाशित की थी
मैंने,तुमनें और समय ने
एक साथ मिलकर
किसी षड्यंत्र की तरह।

© डॉ. अजित


Tuesday, September 22, 2015

उदास गीत

कुछ लोग मुझसे छूट रहें है
कुछ लोगो से मैं छूट रहा हूँ
ऐसा नही हमारी पकड़ ढ़ीली है
दरअसल
हमारे हथेलियों में सन्देह का पसीना है
जिसकी नमी से स्पर्श खिसक रहें इंच भर
धरती के गुरुत्वाकर्षण के उलट
बदल रहें है हमारे केंद्र
एक दिन वो भी आएगा
जब सूरज निकलेगा एकदम अकेला
योजनाओं का साक्षी नही बनना पड़ेगा उसे
चांदनी के पास नही होगा एक चुस्त तलबगार
धरती उस दिन होगी सबसे अकेली होगी
छूटे हुए लोगो के लिए
अनजानी हो जाएगी हर चीज
जिसमें मैं भी शामिल हूँ
मैं नदी झरनें और पहाड़ को
तब सुनाऊंगा एक उदास गीत
जिसके मुखड़े को सुन बारिश हो जाएगी
और भाप बन उड़ने लगेंगी यादें
स्मृतियों के जंगल से।

© डॉ. अजित

Thursday, September 17, 2015

इन्तजार की ऊब

इन्तजार की ऊब में डूबे
किसी शख्स से मिलें कभी आप
उसकी घड़ी का समय
मिनट पहले बताती है
घंटे बाद में
इन्तजार की आश्वस्ति
खुद को समझाने की बढ़िया युक्ति है
जो अटकी रहती है
किसी के होने
और न होने के बीच
इन्तजार की ऊब से पुते चेहरे
खो देते है शिल्प की ख़ूबसूरती
व्यक्त अव्यक्त के समानांतर
वो जीते है कयासों से भरी दुनिया
कभी समय के सापेक्ष
कभी समय के निरपेक्ष।

© डॉ.अजित 

Tuesday, September 8, 2015

जन्मदिन पर

लौटा रहा हूँ
तमाम यादें किस्सें और बेवकूफियां
भेज रहा हूँ
खत लिबास और रोशनी
खरीद रहा हूँ एक मुठ्ठी एकांत
सौंप रहा हूँ
तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अवसाद
कह रहा हूँ
स्थगित धन्यवाद और विलम्बित क्षमायाचना
आरम्भ कर रहा हूँ
एक नया अंत
मध्यांतर की शक्ल में
दे रहा हूँ
अवांछित शुभकामनाएं
मांग रहा हूँ
राग में दबी पवित्र कामनाएँ  वापिस

मात्र इतना ही उल्लास हर्ष उत्सव और विज्ञापन
बचा है मेरे पास
आज खुद के जन्मदिन पर।

© डॉ. अजित

सम्वाद

एक बोझिल
बातचीत में
जितनी दफा
तुमनें लबों पर ज़बां फेरी
बस उतनी ही बार लगा

मेरी बातों में थी थोड़ी बहुत गुणवत्ता।
***
तुम्हारी अनुपस्थिति में
एक फूल खिला देखा
बस देख ही पाया
उसे छूने का साहस नही था मेरे पास
तुम्हारी अनुपस्थिति में।
***
अस्तित्व मेरे और
मेरी छाया के मध्य खड़ा था
निरुत्तर
प्रश्न एक तरफा थे
उत्तर का कोई मार्ग नही था

मैं हंस सकता था
बिना आँख के, थोड़ा प्रकाश थोड़ा अँधेरे में।
***
मैंने माफी मांगी
उसे विनम्रता में कमजोरी नजर आई
मैंने क्रोध किया
उसे इसमें भी मेरी कमजोरी नजर आई
मैं मुस्कुराया
उसे यह कूटनीतिक लगी
मैं हंसा
उसे यह नकली लगी
मैं जब चुप हो गया
उसे लगा मौन में हूँ मैं
किसी साधना के निमित्त।
© डॉ.अजित

Sunday, August 30, 2015

यार

इस कदर बीमार न थे हम
कभी यारों के यार थे हम

तंज लहजे में शामिल है अब
था इक वक्त गुलबहार थे हम

उसकी उदासी के लम्हों में
पतझड़ में भी बहार थे हम

सफर पर निकले जिस दिन
जल्दबाजी में तैयार थे हम

दुश्मन आज हुआ है जो
कल तक उसके यार थे हम

© डॉ. अजित



Tuesday, August 25, 2015

लोकप्रियता

फिर भी
जितनी लोकप्रियता होनी चाहिए थी
उतनी नही थी मेरे पास
यह मेरे जीवन का स्थाई खेद था

मेरे पास एक कच्चा शिल्प था
जो पढ़ने में आसान था
समझने में तो और भी आसान

मेरी बातें रोजमर्रा की बतकही थी
उनमें शास्त्रीयता का था नितांत ही अभाव
दर्शन की जटिलता नही थी उनमें
मन का बिखरा हुआ मनोविज्ञान कहता था मैं

अधूरापन स्थाई भाव था
जो आकर बैठ गया था
मेरी कलम की पीठ पर

कुछ दोस्तों का मत था
एक ख़ास जगह जाकर
थोड़ा अटक थोड़ा भटक गया हूँ मैं

पुनरावृत्ति की शिकार थी मेरी सम्वेदनाएं

मैं किस लिए कहां था
नही बता सकता था किसी साक्षात्कार में

अरुचि और एकालाप के मध्य खींच कर वृत्त
डमरू बजाता था मैं
मेरी कविता इतनी निजी किस्म की थी
कुछ ही लोग 'मैं' को तोड़ जी पाते थे उसका दशमांश

मैं लिख रहा था भूत
वर्तमान की शक्ल में
मैं जी रहा था भविष्य
अतीत की दहलीज़ में
मेरी कोशिसें थी बेहद अस्त व्यस्त और अनियोजित

शायद, तभी संदिग्ध थी मेरी लोकप्रियता।

© डॉ.अजित



Monday, August 24, 2015

मांग पत्र

हमनें बिछड़ते वक्त
कुछ भावुक वायदे किए थे

धुल गए वो धूप की बारिश में

अब वायदों के आकार बच गए है
जैसे चाय के कप की नीचे बच जाता है एक वृत्त
चाय के बाद जितना अप्रासंगिक हो चला है
अब बतकही से हरा भरा वक्त

हमनें बिछड़ते वक्त
कुछ स्पर्श दिए थे उधार

जिनके ब्याज़ से
आज तक चल रहा है
दाल रोटी नमक

मिलने बिछडनें के मांग पत्र
कोई मूल्य नही बचा है

पता नही है यह सम्बन्धों का
अर्थशास्त्र है या
मनोविज्ञान।

©डॉ.अजित 

Sunday, August 16, 2015

उसकी बातें

उसकी बातें: किसकी बातें
--------------------------

उस पर सबसे ज्यादा
कोफ़्त मुझे तब होती
जब वो किसी शब्द/बात का अर्थ मुझसे पूछती
फिर गूगल भी जब उसी से मिलता जुलता जवाब देता
तो बड़े उत्साह से मुझे वो बात बताती
उसका शोध
जब अविश्वास की उपकल्पना से गुजरता
तब निसंदेह स्माईली के मेरे जवाब के बावजूद
बहुत खराब लगता था मुझे।
***
उस पर सबसे
ज्यादा प्यार मुझे तब घुमड़ता
जब वो मेरे खराब मूड की परवाह किए बिना
आदतन पूछती
आज क्या खाया है लंच में
ब्रेकफास्ट किया की नही।
***
उस पर सबसे ज्यादा गुस्सा
तब आता था
जब उसनें सीख ली समझदारी
और छिपाने लगे अपने दुःख।
***
उस पर सबसे ज्यादा
विश्वास इसलिए भी था
वो खुद से ज्यादा
दुसरे के ठगे जाने की करती थी परवाह
हर बार, हमेशा।
***
उस पर सबसे
कम बातें हुई
और वो सबसे ज्यादा बचती रही
मेरे अंदर।

© डॉ.अजित


Thursday, August 13, 2015

सरनेम

जब मैं कहता हूँ
मैं भी लिखता हूँ कविताएँ
एक दिलचस्प बातचीत में भी
ख्यात कवि की
अरुचि चरम् पर पहूंच जाती है
कवि चाहता है
एकालाप
कभी उसके
कभी उसकी कविता के बारें में
सवाल यह भी बड़ा है
कविता मेरी या उसकी
कैसे हो सकती है
कविता तो बस कविता है
हाँ कुछ कविता
नाम के सहारे तैर जाती है
लूट लेती है समीक्षकों का मत
कुछ कविताएँ
भोगती है अपने हिस्से का निर्वासन
कविता का वर्णवाद
कम खतरनाक चीज़ नही है
कविता में आरक्षण जैसी सुविधा भी नही
फिर भी हाशिए के लोगो की
कच्चें कवियों की
कविता जिन्दा है
ठीक ठाक पढ़ी भी जा रही है
इस बात पर
थोड़ा खुश जरूर हुआ जा सकता है
मगर थोड़ा ही
क्योंकि आज भी ख्यात कवि की
कविता से ज्यादा कवि के सरनेम में
दिलचस्पी है।

© डॉ. अजित

Monday, August 3, 2015

अबोला


जिन दिनों तुमसे
बातचीत बंद थी बेवजह
उन दिनों
आसमान का रंग हो गया था सफेद
धरती हो गई थी काली
हवा का वजन कुछ ग्राम बढ़ गया था
नदी समुन्द्र तल से नीचे बह रही थी
पहाड़ अनमना हो बैठ गया था ऊकडू
जंगल हो गए थे समझदार
खरपतवार बन गए थे सलाहकार
झरने बंट गए थे हिस्सों में
पत्थरों के पास थे नसीहत के राजपत्र
उनदिनों
बादल हो गए थे चुपचाप
बूंदे बढ़ा रही थी ताप
रास्तों ने मिलकर तय कर लिए थे भरम
जिन दिनों तुमसे बातचीत बंद थी
उन दिनों
सपनों की फ़िल्म एक्स रे की माफिक
चांदनी में देखता तो
चाँद में साफ़ नजर आता था
बाल भर अविश्वास का फ्रेक्चर
तारें देते थे सांत्वना वक्त बदलनें की
उन्ही दिनों मैंने जाना
बातचीत कितनी जरूरी चीज़ थी
मेरे जीवन की
इसी बातचीत के सहारे
मैं धकेल सकता था दुःख को सैकड़ो मील दूर
स्थगित कर सकता था अवसाद का अध्यादेश
लड़ सकता था खुद से एक बेहतर युद्ध
मुक्त हो सकता था हार और जीत से
बता सकता था खुद की कमजोरियों का द्रव्यमान
उम्मीद को पी सकता था ओक भर
ताकि बचा रहे एक बेहतर कल
दरअसल
बातचीत का बेवजह बंद हो जाना
उतना अप्रत्याशित नही था
जितना अप्रत्याशित था
इस बात का इतना लम्बा खींच जाना।

©डॉ.अजित

एक दिन

उस दिन मैने दुनिया के
सबसे बड़े सर्च इंजन को
सबसे नकारा घोषित कर दिया
जिस दिन वो तुम्हें खोजनें में असफल रहा
ठीक उसी दिन मैंने
मोबाइल नेटवर्क को भी अपने जीवन में
सबसे अनुपयोगी वस्तु पाया
जब मेरे फोन में तुम्हारी खनकती आवाज़ ने
आने से इनकार कर दिया
इसी दिन मैंने
खुद को याददाश्त को खारिज किया
क्योंकि वो तुम्हारी अच्छाई
याद नही दिला पा रही थी
महज एक दिन में
फोन इंटनेट और याददाश्त
मेरे जीवन की सबसे
निष्प्रयोज्य चीज़ बन गई
इनदिनों जब तुम नही हो
मैं सोचता हूँ उस दिन के बारें में
जिस दिन के बाद
तुम, तुम न रही
और मैं भी शायद मैं नही रहा हूँ।

© डॉ. अजित 

ज्ञात अज्ञात

सम्बंधो के पुनर्पाठ में
बच जाते है कुछ विकल्प
जिसके भरोसे रच लेते है
एकांत का संसार
छूटे हुए सिरों की परवाह भी
छूट जाती है धीरे धीरे
जैसे नदी भूल जाती है
ठोस बर्फ से तरल पानी बनना
सम्बन्धों में तृप्ति सबसे बड़ी असुविधा है
ज्ञात सबसे बड़ी बाधा
सतत् बचना जरूरी होता है
कुछ अज्ञात कुछ अनकहा
तभी बच पाता है
समबन्धों का भूगोल
विश्वास के झरनें सूख जाते है जब
तब न पत्थर में शिल्प दिखता है
न गहराई की लिपि समझ आती है
सम्बन्ध एक ख़ास किस्म की जटिलता बुनतें है
हम सरलता से समझना भी चाहें तो भी
नही जान पाते अपनी चाह का मनोविज्ञान
सब कुछ ठीक होना
हमेशा सब कुछ ठीक होना नही होता है
कभी कभी विश्वास शंका और मान्यताओं के जंगल में
निपट अकेले पड़ जाते है सम्बन्ध
मनुष्य की सीमा कर देती है
उसको सबसे अकेला
एक अच्छी खासी भीड़ के बीच।

© डॉ.अजित

Friday, July 31, 2015

बातें

मैंने एक दिन उससे कहा
यू डिजर्व बेस्ट
वो इस बिन मांगी सलाह पर हैरान थी
फिर दार्शनिक मुद्रा में बोली
बेटर या बेस्ट कुछ होता ही नही
फिर क्या होता
मैंने पूछा
उसने कहा जिंदगी का ज्यादा ग्रामर नही पढ़ा मैंने
बस इतना पता है
क्या तो कोई जिंदगी में कुछ होता है
या फिर कुछ होता ही नही
अब मैं चुप था।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
तुम्हारी आँखों में प्यार नही दिखा कभी
ये प्यार छिपाना कहां से सीखा
मैंने कहा तुम्हारी बातों से
फिर पूरे ढाई दिन उसनें बात नही की मुझसे
मेरी शुष्क आँखें इस प्यार को जरूर देख सकती थी
वो भी मीलों दूर।
***
कभी कभी हम एक दूसरे से
अजनबी की तरह पेश आतेे
हो जाते थे बेहद औपचारिक
दुआ सलाम तक हो जाती थी बंद
बस एक बात बचा लेती थी
रिश्तों की ख़ूबसूरती
तमाम अरुचियों असहमतियों के बावजूद
कभी भी अविश्वास नही था हमारे बीच।
***
एकदिन उसनें पूछा
एक आसान सवाल का जवाब दो
प्यार जिंदगी है या
जिंदगी प्यार है
मैं जवाब सोच ही रहा था
अचानक वो खिलखिलाकर हंस पड़ी
इतना सोचने वालों के लिए
न प्यार है न जिंदगी है
फिर क्या है मैंने नाराज़ होते हुए कहा
सोचकर बताऊंगी
यह कहकर वो फिर हंस पड़ी।
***
© डॉ.अजित

Monday, July 27, 2015

दरख़्त

कुछ दरख्तों के साए में
छांव के साथ
नमी भी मिलती है
छनकर आती धूप का
बढ़ा होता है तापमान
कुछ घनें दरख्त
इतनें खामोश किस्म के होते है
उन्हें नही बोल पातें हम
सुप्रभात या शुभ रात्रि
इन दरख्तों की पत्तियां होती है
बेहद अनुशासित
वो हवा को भी घूमा कर बना देती
थोड़ी भारी हवा
इन दरख्तों को छूने का साहस
बमुश्किल जुट पाता हैं
ये खड़े है बरसों से एक जगह
यह देखकर बस एक आश्वस्ति मिलती है
जिसके सहारें
इन दरख्तों को हम घोषित करते है
अपना सबसे परिपक्व और समझदार मित्र
आश्वस्ति जड़ता का चयन करती है
और गम्भीरता रहस्य का
दरख्तों के बीच जीतें आदमी
कभी कभी दरख्त लगने लगते है
और कभी कभी दरख्त आदमी
ये दरख्त हमारे साथ रहते हुए भी
हमसे इतने ही अजनबी है
जितने इनके साथ रहते हुए
हम इनसे
इसलिए कहना पड़ता है
साथ का मतलब
हमेशा साथी नही होता।

© डॉ. अजित

Friday, July 24, 2015

विदा

हमेशा विदा को
अलविदा से बचाता रहा
दरअसल
अलविदा एक बढ़िया सुविधा है
एक युक्तियुक्त पलायन
विदा एक जिम्मेदारी है
एक कल्पना है
एक बेहतर कल की
विदा बचाती है उम्मीद
लौट आने की
बिना किसी अपराधबोध के
अलविदा कहना मुश्किल जरूर होता है
मगर विदा को देखना
उससे भी ज्यादा मुश्किल काम है
मैनें जीवन में अक्सर चुनी थी विदा
जो दुर्भाग्य से बन गई अलविदा
उदासी की कुछ पुख्ता वजहों में से एक है
विदा का अलविदा में बदल जाना।

© डॉ.अजित 

Wednesday, July 22, 2015

गुफ़्तगु

अभी तो रूह ने करवट ली थी
पलको से अहसासों की गर्द छटी थी
बेफिक्र आफ्ता साँसों ने इल्तज़ा की थी
कुछ गिरह खुल भी न पाई
एक सुरमई शाम
ख्वाब की दहलीज़ पर बैठी सिसकती है
शक ओ शुबहो में खर्च होती
जिंदगी को थोडा संवर जाने दो
बेसाख्ता लम्हों को बिखर जाने दो
रोज़ उलझते हुए दयारो में
जब तुमसे मुलाक़ात होती है
लफ्ज़ अहसास की चादर से छिटक जाते है
जैसे रात के अँधेरे में कुछ आवारा ख्याल
अपनी धुन में निकल जाते है
मैं लम्हा लम्हा सिरे जोड़ता हूँ
तुम्हे तुम्हारे अंदर तलाशता हुआ
आवाज़ देता हूँ मगर तब तक
वक्त की गर्दिशे ख्याल को जब्त कर जाती है
सुबह ओस की पहली बूँद सी बातें बिखर जाती है दुनियादारी की चौखट पर उदासी के दिए जलते है
कुछ अहसासों को महफूज़ कर लेता हूँ कि
किसी दिन बात से बात निकले
तो वो बात कह सकूं
हां ! मुझे शिद्दत से तुम्हारा इन्तजार रहता है
हो किसी शाम तुम्हारा साथ
और बुनते रहे कुछ आवारा ख्याल
मंजिल से बड़े हो जाए कुछ रास्ते
फिर पुरकशिस लम्हों का लोबान जला
फूंक दू कुछ दुआ तुम्हारे हक में
कैद कर कुछ लम्हों को अक्सों की शक्ल में
एक बोसा लूँ उन आवारा ख्यालो का
जो रोज़ अपने सिराहने बो सो जाती हो तुम
बातें मेरी समझनें जरूरत कब जानाँ
बातों से मेरी रफू करना अपनी तन्हाई को
पैबन्द लगाना कुछ अनकहे ख्यालों का
तुम्हारे लिए नींद को गिरवी रख
चन्द ख्याल उधार लाया हूँ
धड़कनों के बीच अटक गई है
कुछ बातें उनको सुनोंगी तो पाओगी
दिल से रूह के दरम्यां कुछ लम्हें घरोंदे बनाते है
कुछ बेअदब से ख्याल
कुछ आवारा सी रोशनी
मेरी रूह को रोशन करती है
एक तुम्हारा तस्सवुर काफी है
मुझे फिलहाल उधार की जिंदगी के लिए।

© डॉ. अजित

अंतिम

अंतिम पगडंडी
ठीक उसी रास्ते पर खत्म होती है
जहां दोराहा चौराहें से मिलता है
अंतिम कदम उतना ही भारी होता है
जितना पहला दुस्साहस
अंतिम बात कभी अंतिम नही रह पाती
वो छोड़ देती है हमेशा सम्भावना
एक नई बात की
अंतिम जो भी दिखता है
वो दरअसल अंतिम नही होता
वो होता है प्रथम का विलोम
ठीक निकट का विरोधाभास
सत्य का ऐच्छिक संस्करण
अंतिम अकेलेपन को समझते हुए
हुआ जा सकता है सिद्ध
जीवन और मृत्यु के बीच फंसी
हर बात अंतिम नही होती
ठीक जैसे
अंतिम नही होता इच्छा का मर जाना
अंतिम होना एक किस्म की सांत्वना है
यात्रा की समाप्ति या शुरुवात नही
यात्रा का मध्यांतर है अंतिम होना।

© डॉ. अजित

Tuesday, July 7, 2015

धरती

धरती घूम रही है
अपनी एक थिर गति से
कायदे से
इसे रुक जाना चाहिए
कुछ पल के लिए
ताकि जड़ हुए मनुष्य
छिटक कर जा पड़े मीलों दूर
मनुष्यता को बचाने का
कम से कम एक प्रयास
धरती को करना चाहिए जरूर।
***
देखना एक दिन ऐसा होगा
धरती बंद कर लेगी अपनी आँखें
फिर फर्क करना मुश्किल हो जाएगा
दिन और रात का
उस दिन
आसमान कोई सलाह नही देगा
वो देखेगा
मनुष्य को भरम के चलते
गिरते-सम्भलतें हुए
धरती आसमान के बीच उस दिन
सबसे अकेला होगा मनुष्य।
***
धरती की शिकायत
बस इतनी सी है
मनुष्य उसे अपनी सम्पत्ति समझता है
जबकि
वो खुद ब्रह्माण्ड के निर्वासन पर है
जिस दिन पूरा होगा उसका अज्ञातवास
मनुष्य सबसे अप्रासंगिक चीज़ होगा
धरती के लिए।
***
धरती गोल है
यह एकमात्र वैज्ञानिक सत्य नही है
धरती के गोल होनें के मिले है
ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण भी
तभी तो
मनुष्य जहां से चलता है
एक दिन लौट आता है उसी जगह
कभी हारकर कभी जीतकर
धरती जरुर गोल है
मगर मनुष्य का कोई एक आकार नही है
यह बात सिद्ध होनी बाकि है अभी
किसी वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक शोध में।

© डॉ. अजित 

Saturday, July 4, 2015

ज्योतिष

मैंने कहा
जरा हाथ दिखाओं अपना
उसनें कहा
अपनी रेखाओं से
आधी सेंटीमीटर रेखाऐं घटा दो
दक्षिण के अंशों को
उत्तर से मिला दो
माथे से उतार कर देखों
मेरी अनामिका के निशान
अगर फिर भी न बांच सको भविष्य
तब दिखाऊंगी अपना हाथ
उसके बाद
हाथ देखना छोड़ दिया मैंने
उसका तो क्या खुद का भी।
***
मैंने पूछा
तुम्हारी राशि क्या
उसनें कहा
अनुमानों के विज्ञान में यकीन नही मेरा
और मेरे अनुमानों में
मैंने पूछा
तुम्हारे भी अनुमानों में नही
बस तुम में यकीन है मेरा।
***
आदतन एकदिन मैं
बांचने लगा उसका फलादेश
दशा महादशा प्रत्यंतर
सबकी गणना करता हुआ
कर रहा था आधी अधूरी भविष्यवाणियां
वो जोर से हंस पड़ी
मैंने कहा कुछ गलत कहा मैंने
उसनें कहा नही
प्रेम में तुम्हें अंधविश्वासी होता देखना
फिलहाल अच्छा लग रहा बस।
***
अचानक एकदिन उसनें पूछा
ये शनि की साढ़े साती की तरह
प्रेम की साढ़े साती भी होती है क्या
मैंने हंसते हुए कहा
प्रेम का पहले ढैय्या चलता है
फिर साढ़े साती
उसनें कुछ गणना की
और कहा जल्द बिछड़ने वाले है हम
उसके इस फलादेश का उपचार नही मिला आजतक।

© डॉ. अजित