Sunday, November 29, 2015

सजा

अचानक से छूट गए हाथ
स्पर्शों को याद करते है मुद्दत तक
कोई वजह नही तलाश पातें
अपनत्व की नमी में आई कमी की
सम्बन्धों की जलवायु को दोष भी नही दे पातें
विदा से अलविदा की यात्रा को देखते हुए
वो शुष्क हो जाते है
उनकी गति का दोलन बदल जाता है
वो ओढ़ लेते है एक अजनबीपन
अनायास जब दिल पर रखें जातें है ऐसे हाथ
वो देते है हमारे खिलाफ गवाही
बतातें है हमारी एकतरफा ज्यादती
जिसकी बिनाह पर दिल सुनाता है सजा
यादों की उम्रकैद में
रहो ताउम्र आधे-अधूरे।

©डॉ. अजित

Monday, November 23, 2015

बगावत

कुछ अलहदा से ख़्वाब थे वो
रोशनी के छूटे हुए कतरों के चश्मदीद गवाह
उनके माथे स्याह ठंडे थे
उनके लबो पर आह की नम खुश्की थी
दरख्तों के साये में उन्हें पनाह नही मिली थी
वो धूप की गोद से जबरदस्ती उतार दिए गए थे
दरिया के पास उनकी शिकायतों के मुकदमें थे
मगर वो खामोश बह रहा था
बिना किसी सुनवाई के
कुछ परिंदे मुखबिर बन गए थे अचानक
सपनों की तलाशी ली जा रही थी
ख़्वाबों की सरहदों पर
लम्हों में पिरोयी धड़कने जब बगावत कर बैठी
तब पता चला ये सुबह से पहली रात है
जहां अंधेरा चरागों को सुस्ताने की
नसीहत देने आया है
दुआ में हाथ उठे मगर लब खामोश रहें
सिलसिलों ने करवट ली तो
तुम्हें बहुत दूर पाया
इतनी दूर जहां से
खुली आँख से तुम्हें देखा नही जा सकता था
आँख मूँद कर तुम्हें देखनें की कोशिश की तो
इन्हीं ख़्वाबों की भूलभुलैय्या में खो गया
तुम्हें देखनें का मिराज़
अब तक का सबसे हसीं सदमा था।

© डॉ. अजित

Sunday, November 22, 2015

खत

लिखता हूँ रोज़ चंद अफ़साने
हकीकत की शक्ल में

लड़ता हूँ रोज़ एक लड़ाई
जज्बात और अक्ल में

कुछ अहसासों को रखता हूँ गिरवी
उम्मीद को लेता हूँ उधार
बांट देता हूँ सपनों को पुरज़ा-पुरज़ा

आदतों में बस गई है एक नमी
तुम्हारे ख्याल की
कोई रोशनी नही पहुँचती वहां तक
फिर भी दिल के कुछ कोने रोशन है
तुम्हारी यादों से

सिमट गई है मेरी दुनिया
तुझ से तुझ तक
हैरतजदाँ हूँ थोड़ा और थोड़ा बेचैन भी

तुम हो भी
और हो भी नही।

© डॉ. अजित

Saturday, November 21, 2015

मजबूरी

ख्यालों से निकलना गैरजरूरी समझता है
इश्क सच्चा हो तो मजबूरी भी समझता है

तन्हाई में रोकर भी क्या हुआ तुम्हें हासिल
वो आज भी तुम्हें पत्थरदिल समझता है

दिलों में फ़कत कुछ लम्हों का फांसला था
कमबख्त वो इसे भी मेरी दूरी समझता है

चलों बिछड़ जाए उसी मोड़ से हम दोनों
रास्ता भी मुसाफिर की मजबूरी समझता है
©डॉ.अजित

Thursday, November 19, 2015

आलाप

चंद कहा-सुनी
----
बेवजह एक दिन भड़कते हुए
उसनें कहा
तुम्हारे भाव बढ़ गए है आजकल
ठीक से जवाब भी नही देते
बात क्या है?
मैंने कहा
सच कह रही हो
आजकल इतने भाव बढ़ा रहा हूँ खुदके कि
तुम्हारे सिवाय कोई और खरीद न सके मुझे
फिर ठीक है,ये कहकर वो हंस पड़ी।
***
मैं उसदिन परेशान था किसी बात पर
और वो छेड़े जा रही थी मुझे
मेरी कथित प्रेमिकाओं के नाम पर
मैंने कहां हां ! मेरी कई प्रेमिकाएँ है
अब खुश हो
इस बात पर वो खुश नही थी पहली दफा
वो चाहती थी
मैं करूँ उसके सारे आरोप खारिज।
****
चाय पीते समय
मेरी गति अधिक थी
इस बात पर उसको रहता था
हमेशा ऐतराज़
झल्ला कर कहती वो
किस जल्दी में रहती हो
कौन सी ट्रेन छूट रही है तुम्हारी
मैं कहता चाय पीना और तुमसें बातें करना
एक साथ नही हो पाता मुझसे
वो हंस पड़ती और कहती
हो जाने दो फिर चाय ठंडी
कोई बात नही दूसरी मंगा लेंगे।
***
अचानक एकदिन
उसने बातचीत बन्द कर दी
मैंने वजह नही जाननी चाही
मुझे गैर जरूरी लगा ऐसा पूछना
उसका एसएमएस मिला एकदिन
इसलिए नही चाहती थी
किसी बुद्धिजीवी से प्रेम करना
मैं शर्मिंदा था
अपने कथित ज्ञान पर।

©डॉ.अजित




Wednesday, November 18, 2015

खेद

कंघी में उलझे पड़े थे कुछ बाल
एकदम से उपेक्षित
जिन्हें खींच कर फेंका जाना तय था
घर के सबसे छोटे दर्पण ने
छोड़ दी थी जगह
वो हिलता डुलता दिखाता था चेहरा
अलंकारिक श्रृंगार के सब साधन
अपने अंतिम पड़ाव पर थे
नही बची थी उनके रखरखाव की कोई
स्त्रियोंचित्त इच्छा
जीवन में कोई ज्ञात दुःख नही था उसके
मगर फिर भी वो
बेपरवाही से खर्च कर रही थी
अपनी एक-एक प्रिय चीज़
वो काजल से खिंचती थी कर्क रेख
ताकि भेद कर सके लोक और खुद के समय में
उसकी त्वचा के स्पर्श ऊब ढ़ो रहे थे
वो भूल जाती थी अक्सर
हेयर पिन, सुई धागा बटन और बिजली का बिल
उसकी हड़बड़ाहट साफ़ झलकती थी
बर्तन मांझते समय
उसके पास दूध के उबाल जैसा विस्मय था
और नमक के जैसा प्रेम
वो प्रार्थना के पलों में दिखती थी
सबसे निर्मल
मौन और चुप के मध्य उसने विकसित कर ली थी
अपनी एक विचित्र बोली
जिसका कोई शोर नही था
ना कोई उलाहना
वो थोड़ी व्यस्त थी
ज्यादा अस्त-व्यस्त
उसके समन्वय पर मुग्ध हुआ जा सकता था
जीवन के अमूर्त कौशल पर
वो बधाई की पात्र थी
उसकी मुस्कान में एक हलकी उदासी की दरार थी
जिसमें बहता था
समन्दर नदी की ओर
उसका हंसना
समय पर एक अहसान था
जिसके बोझ में वो घट रहा था रोज़ पल-पल
उसके पास न कोई सवाल था
न कोई जवाब
उसके पास कुछ अनुभव थे
जिनकी समीक्षा सम्भव न थी
उसे कहीं नही पहुंचना था
मगर वो रोज़ चल रही थी
एक नियत गति से
उसकी एकमात्र जवाबदेही खुद थी
इसलिए
उसकी वजह से कोई तकलीफ में नही था
वो खुद कहां थी
इसकी पड़ताल के लिए
अहम के गुरुत्वाकर्षण को तोड़
उपग्रह की भांति
पृथ्वी की कक्षा का
कम से कम एक चक्कर लगाना जरूरी था
वो अज्ञात थी
किसी मंत्र की तरह
वो ज्ञात थी किसी की शहर की तरह
ये सब बातें तब पता चली
जब वो उपस्थित थी
अपनी अनुपस्थिति के साथ
इस बात का किसी को खेद नही था
बस यह खेद की बात है।

©डॉ. अजित

Tuesday, November 17, 2015

प्रेम और दुःख

अज्ञेय कहते है दुःख व्यक्ति को मांझता है
केवल दुःख ही नही
प्रेम भी व्यक्ति को मांझता है
प्रेम करता हुआ व्यक्ति
देख सकता है चींटी के देह की पीड़ा
पहाड़ का बोझ
और तरल नदी का विवशता
प्रेम का दुःख
व्यक्ति को दोहरा मांझता है
वो देख सकता
अपने अंदर बैठी दो छाया एक साथ
प्रेम का सुख और प्रेम का दुःख
बाहर से भले ही अलग दिखे
अंदर से होते लगभग एक समान
दुःख की आंच में जब पिघल जाता है प्रेम
तब मन का एक हिस्सा जम जाता है
ग्लेशियर की तरह
शीत ताप के मध्य
स्मृतियों की जलवायु का सहारा ले
व्यक्ति तय करता है
अपने ग्रह पर अपनी स्थिति का ठीक ठीक आंकलन
किसी खगोलविज्ञानी की तरह
प्रेम में पड़ा व्यक्ति  एक साथ हो सकता है
विज्ञानवादी और भाग्यवादी
दुःख और सुख से इतर
प्रेम व्यक्ति का भर देता है आंतरिक निर्वात
बदल जाते है उसके गुरुत्वाकर्षण के केंद्र
प्रेम व्यक्ति को बदलता नही
बस रूपांतरित कर देता है जगह जगह से
इसलिए प्रेम का विस्मय हमेशा
व्यक्ति को बताता है
जीवन की अनिश्चिता के बारें में
दुःख की चमक भले ही स्थाई हो
मगर उस चमक को देखनें के लिए
प्रेम का दर्पण ही काम आता है
भले ही उस पर अवसाद की धूल चढ़ी हो
प्रेम किया हुआ व्यक्ति
हो पाता है एक सीमा तक ही क्रूर
खुद को समझनें और समझानें में
जितना मददगार प्रेम है
उतना कोई दूसरा मनोवैज्ञानिक परामर्शन
नही हो सकता है
प्रेम में जीता हुआ व्यक्ति हमेशा करता है
प्रेम में हारे हुए व्यक्ति का सम्मान
मनुष्य में बची रहे मनुष्यता
इसके लिए दुःख के अलावा
प्रेम एक अनिवार्य चीज है
जिसे जीना और बचाना दोनों जरूरी है।

© डॉ. अजित

प्रेम

अचानक उसनें कहा
प्रेम बड़ा है या जीवन ये बताओं
मैंने कहा
जीवन
इस पर नाराज़ हो वो बोली
फिर प्रेम क्या है तुम्हारे लिए
मैंने कहा जीवन
फिर बस वो मुस्कुरा कर रह गई।
***
चलतें चलतें उसने कहा एकदिन
तुम्हें सबसे प्यारा कौन है दुनिया में
मैंने कहा मैं खुद
बड़े आत्ममुग्ध हो
ये ठीक बात नही वो बोली
खुद से प्यार करना
तुम्हें प्यार करने की जरूरी योग्यता है
मैंने कहा
फिर वो हंस पड़ी बस
प्यार का ये सबसे संक्षिप्त व्याख्यान था
हमारे बीच।
***
फिर एक दिन उसनें
फोन पर पूछा
कहाँ रहते हो आजकल
कुछ खबर नही है
मैंने कहा इसी फोन की फोनबुक में
जिससे बात कर रही हो तुम
वो खिलखिलाकर हंस पड़ी इस बात पर
मिलतें भी रहा करो कभी कभी
क्योंकि
तुम्हारा नम्बर अक्सर
फोन से डिलीट करती रहती हूँ मैं।
***
मैंने कहा एकदिन
सवाल बहुत करती हो तुम
इतनी शंकाओं के मध्य
कितना बेचारा लगता है हमारा रिश्ता
उसनें कहा
समझा करो ये शंकाए नही है
बल्कि ये सब जवाब है
जो मुझे पता है
बस तुम्हारे मुंह से सुनना
अच्छा लगता है ये सब।

©डॉ.अजित

Friday, November 6, 2015

साधना

पराजित देवता के आशीर्वाद से
उसनें प्रेम किया
त्याज्य ऋषियों ने उसे दीक्षित किया
मंत्र को उसनें गीत की तरह पढ़ा
उसके यज्ञ की समिधा
जंगल की सबसे उपेक्षित वनस्पतियां थी
उसकी आहूतियां बिलकुल शास्त्रीय नही थी
उसके आह्वहान में थोड़ा रोष करुणा के साथ था
उसके विसर्जन के सूत्र अप्रकाशित थे
इतनी विषमताओं के बावजूद
वो आश्वस्त था
बहुत सी बातों को लेकर
यह बात अचरज भरी थी
उन लोगो के लिए
जो प्रेम और जीवन को
आदर्श स्थिति में जीने के आदी थे।

© डॉ.अजित


Thursday, November 5, 2015

निर्वात

शब्दों की आवृत्तियां
समय के सबसे छोटे हिस्से में
बदल रही थी
शब्दों को इतना
मजबूर कभी नही देखा था
इधर मैं कुछ कहता
उधर उसका अर्थ रूपांतरित हो जाता
तटस्थता का विस्मय
अर्थ का निर्वात नही भर पाता था
ध्वनियों में इतनी यात्राएं समानांतर जीवित थी कि
अक्सर
यह तय करना मुश्किल था
कौन किसके साथ था वहां।
© डॉ.अजित

Wednesday, October 21, 2015

फर्क

उसनें कहा
तुम खुश होना भूल गए हो
तुम्हारी ध्वनियां अनुशासित है बहुत
बेवजह की एक चीज है तुम्हारे पास
वो है उदासी
तुम प्रशंसा की खुराक पर जीवित हो
मगर उसका भी उपयोग नही जानते
विलम्ब और अनिच्छा से मध्य सो रहे हो
न जाने कब से
मैंने कहा सब का सब सच कहा तुमनें
फिर वो उखड़ गई
मेरे आत्म समपर्ण पर और बोली
सच कहूँ या झूठ
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है
मैंने कहा फर्क पड़े न पड़े
इस बहाने तुम्हारी अरुचि पढ़ लेता हूँ मैं
और खुश हो जाता हूँ
अपनें ऐसा होने पर
वैसे एक बात यह भी है
हम एक दुसरे को बदलनें के लिए नही
एक दुसरे के लिए जीने के लिए बनें हैं।

© डॉ. अजित 

Sunday, October 18, 2015

जोखिम

सन्नाटें के मध्य
चुपचाप पड़ी है कुछ ध्वनियां

एक रूमानी गीत के मध्य
उपस्थित है बेसबब बिछड़ने का सबब

रात और दिन
सुबह और शाम के मध्य
जिन्दा है समय का मिला-जुला प्रभाव

ऐसे में यह तय करना
सबसे मुश्किल था
कौन निकट है कौन दूर

फिर भी
मैं सतत् चलता रहा एक ही दिशा में अनवरत्

उम्मीद थी पहूंच जाऊँगा तुम तक एकदिन

उम्मीद को परखना
जीवन का सबसे बड़ा ज्ञात जोखिम था।

© डॉ.अजित

दफ्तरी प्रेम

किसी पुरानी फाइल में
बसी नमी सा था मेरा प्रेम
जिसकी गोद में
हाशिए पर दर्ज थी
टिप्पणियाँ संस्तुस्तियाँ अग्रसारण
और अस्वीकृतियाँ
मेरा अस्तित्व बचा था
एक अनुपयोगी दस्तावेज़ की शक्ल में
जिसे इन्तजार था
अवशिष्ट निस्तारण की एक
आधिकारिक निविदा का
मन के सरकारी दफ्तर में
एक निर्जन कोने में पड़े करना था
मुझे एक उपयुक्त समय का इन्तजार
ताकि अनिच्छाओं के टैग से निकाल
कर दिया जाए मुझे
आग और हवा के हवाले।
***
एक परिपक्व प्रेम सम्बन्ध में
मेरे हिस्से आई थी
कुछ सीएल कुछ ईएल
मैं जी रहा था प्रेम
पूर्व स्वीकृत डीएल की तरह
अवकाश के हिस्सों में
प्रेम का विस्तार उगा था
बेहद ऊबड़ खाबड़
वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर
अफ़सोस की शक्ल में
मेरी यादें काउंट हुई
उसके बाद से
मैं एम एल पर था
निरन्तर...!
***
क्यों न आपके खिलाफ
अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए की
तर्ज़ पर एकदिन मुझे मिला था नोटिस
क्यों न आपको विस्मृत कर
आगे बढ़ा जाए
मैं जवाब में व्याख्या पत्र बना ही रहा था कि
एकपक्षीय निर्णय लेते हुए
कर दिया गया मुझे बर्खास्त
खेद इस बात का है
इसके बाद किसी भी न्यायालय ने
नही की स्वीकार
मेरी दया याचिका।
***
मेरे उत्साह पर
रख दिया तुमनें एक दिन
अपने ज्ञान का पेपरवेट
मैं फड़फड़ा नही
बल्कि अस्त व्यस्त घूम रहा था
तुम्हारी दुनिया में
कागज़ की तरह दब गया मैं
तुम खुश थी
खुद के अनुशासन पर।
***
डस्टबिन के तल
पर विश्राम कर रही थी
मेरी मुलाकात की कुछ अर्जियां
खिन्नता से तुमनें
जैसे ही खाली करने का आदेश दिया
सेवक को
मैं समझ गया
असली निर्वाण का
समय आ गया है अब
उन अर्जियों को जला
ताप रहे थे दफ्तर के लोग
मैं धुआं बन उड़ रहा था
तुम्हारे रोशनदान की ओर
मोह की माया इसी को कहते शायद।

© डॉ.अजित

(प्रेम में दफ्तरी हो जाना)

Friday, October 16, 2015

आदमी

दिखनें में होता है
बेहद सामान्य
या फिर औसत से थोड़ा बेहतर
वाग्मिता में निपुण
और औचित्य सिद्ध में दीक्षित
अंदर से मरा हुआ आदमी
मौत एक ही बार नही आती
यह उपस्थित रहती है टुकड़ो में भी
अंदर से मरे हुए आदमी को
कुछ ही जिन्दा लोग पहचान पातें है
ये शिनाख्त करने का कौशल
लगभग जीवनपर्यन्त उपलब्धि जैसा है
और उनके जिन्दा होने का प्रमाण भी
अंदर से मरा हुआ आदमी
कम हंसता है
वो जानता है हंसी की कीमत
कम बोलता है
उसे होता है मृत्यु के सार्वजनिक होने का भय
वो तलाशता है एकांत
ताकि अंदर की मौत को बाहर विदा कर सके
मगर हर बार
मौत लौट कर आती है उस तक चुपचाप
अंदर से मरे हुए आदमी को
अनिच्छा से होता है प्रेम
वो करता जाता है विलम्बित
पंचांग के तमाम शुभ महूर्तों को
अंदर से मरा हुआ आदमी
जिन्दा लोगो के बीच सबसे खतरनाक जीव है
क्योंकि वो बार बार याद दिलाता है
जिन्दा और मरे हुए का फर्क
जिंदा रहने के लिए
इस फर्क को भूलना अनिवार्य योग्यता है
इसलिए अंदर से मरा हुआ आदमी
बाहर जिन्दा रहता है
ताकि जिंदा रहें बाहर के लोग।

© डॉ.अजित


Wednesday, October 14, 2015

एक डिप्रेश सी शाम में
याद आता है
सबसे उदास गीत
जिसके एक अन्तरे में
तुम्हारा जिक्र मिलता है
उसी जिक्र के सहारे
मैं लौट आता हूँ
खुद के गैर जरूरी
होने की वसीयत पर
अफ़सोस
वो अमल करने लायक
तभी होगी
जब रफ्ता रफ्ता खतम हो जाऊँगा मैं
जैसे खतम हो जाती
नए कलम में पुरानी स्याही।
©डॉ. अजित

Thursday, October 8, 2015

भविष्यवाणी

तुम्हारा विस्मय समझता हूँ
तुम्हें अचरज है
मेरे तुम पर अटक जाने पर
पात्र अपात्र की धूरी को भूल
तुम्हारे केंद्र की परिक्रमा करने पर
तुम थोड़ी सशंकित भी हो
मगर एक बात है
जो तुम भूल रही हो
मैं अपनी ही कक्षा के चक्कर लगा रहा हूँ
उपग्रह की भाँति
एक दिन नष्ट हो जाऊँगा
टकरा कर किसी धूमकेतु से
इसलिए आश्वस्त रहो
मुझसे कोई खतरा नही है तुम्हें
अवशेष तक को
तुम्हारी भूमि न मिलेगी
इसकी प्रत्याभूति देता हूँ मैं
मेरी भूमिका फिलहाल
अंतर्मन को कुछ छूटे चित्र भेजनें भर की है
ताकि मन के मौसम की जीते जी
कुछ सटीक भविष्यवाणी की जा सके
जिसे कुछ लोग
मेरी कविता भी समझतें है।
© डॉ.अजित 

Wednesday, October 7, 2015

स्मृतियां

एक दिन केवल बच जाएंगे
स्मृतियों के भोजपत्र
जिन पर यंत्र की भाषा में लिखी होंगी
तुम्हारी हितकामनाएं
मैं भूल चूका हूँगा तब तक
उसकी प्राण प्रतिष्ठा के बीज मंत्र
उन्हें उड़ा देना होगा हवा में या फिर
बहा देना होगा बहते जल में
स्मृतियों की ऐसी गति देख
समय हंसेगा मुझ पर
और मैं खड़ा रहूंगा
थोड़ा निष्प्रभ थोड़ा अवाक्
मैं उस दिन की प्रतिक्षा में नही हूँ
इसलिए मुझमें उत्साह की मात्रा
कुछ प्रतिशत कम नजर आती है
स्मृतियों के औचित्य सिद्ध करने के
सूत्र नही मिलते किसी किताब में
ज्ञात अज्ञात के मध्य
ये रेंगती है अपने हिसाब से
स्मृतियों का उपयोग करना नही आता मुझे
इसलिए भी दुविधा में हूँ
तुम्हारे बिना
तुम्हारी स्मृतियों का क्या करूँगा मैं।

© डॉ. अजित

Monday, October 5, 2015

प्रेम का विमर्श

उसनें सच्चाई से कहा एक दिन
प्रेम नही करती तुमसे मैं
मैंने धन्यवाद कहा
प्रेम करने से बचता नही है
प्रेम को जीना पड़ता है
अपने अपने हिसाब से।
***
तुम भी मुझसे प्रेम नही करते
मेरे बारें ये उसकी आम राय थी
मैंने कहा हां नही करता तुमसे प्रेम
मैं वो हर काम करने से बचता हूँ
जिसमें मूलयांकन अनिवार्य हो
मैं जीता हूँ बस तुम्हें सोचते हुए
बिना शर्त बन्धन मुक्त।
***
प्रेम में उड़ान भूल जाते है पंछी
भटक जाते है वो नीड़ से
यह कहते हुए
तुम उपदेशक की भूमिका में थी
मैंने कहा
भटकना भी जरूरी होता है प्रेम में
बंधकर नही किया जाता कभी प्रेम
भटकन प्रेम का शाश्वत सच है।
***
प्रेम बंधन में बांधता है या मुक्त करता है
अचानक तुमनें ये दार्शनिक प्रश्न किया
प्रेम न बांधता है
न मुक्त ही करता है
प्रेम विस्तारित करता है
हमारे अस्तित्व का सच
सच प्रिय अप्रिय हो सकता है
फिर तुमनें प्रतिप्रश्न नही किया।

© डॉ. अजित

Tuesday, September 29, 2015

हमदर्द

मेरे हमदर्द होने का वो यूं पता देते थे
दर्द जहां था बस वहीं से दबा देते थे

जमानतें मांगता था वो दुनिया भर की
आदतन हम अपना शेर सुना देते थे

तड़फने का एक मंसब इतना हसीं था
रोते हुए भी बारहा हम मुस्कुरा देते थे

बिछड़ कर उनसे हुआ ये मालूम हमें
शिकारी भी कभी परिंदे उड़ा देते थे

रात का सफर एक मुसलसल किस्सा था
रोज़ सुबह ख़्वाबों की ख़ाक उड़ा देते थे

© डॉ.अजित

Sunday, September 27, 2015

सम्भालना मुझे...

संभालना मुझे उस नाजुक दौर में
जब भूल जाऊं मैं
धरती और आसमान का फर्क
बातें करूँ बहकी बहकी
हो सकता हूँ मैं बेहद सतही भी
जब कभी अनायास वाणी से
हिंसा पर उतर आऊं
होता जाऊं क्रूर और कड़वा
संभाल लेना मुझे
उस नाजुक दौर में
जब तुम्हें खोने के मेरे पास
हजार बहाने हो
और तुम्हें सम्भाल कर रखने का
कौशल हो गया हो समाप्त
अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद
मुझे आश्वस्ति है
तुम सम्भाल लोगी मुझे
उस नाजुक दौर में
ठीक अपनी तरह ।

© डॉ. अजित

प्रतिक्षा

तुम्हारी प्रतिक्षा में
मैंने मृत्यु स्थगित कर रखी है
शब्दों को अर्थ के घर
सुला आया हूँ
घर का सबसे उपेक्षित कोना
साफ किया है तुम्हारे लिए
नही चाहता जब तुम आओ
हवा को भी इसी खबर लगे
तुम्हारी प्रतिक्षा में
प्रार्थना को बांध दिया है
अनुराग की दहलीज़ पर
और खुद खड़ा हूँ
धरती से कुछ दशमलव ऊपर
तुम्हारी प्रतिक्षा में
व्याकुल या आतुर नही हूँ
बस मैं ठहर गया हूँ
समय के एक अधूरे समकोण पर
जब तुम आओगी
उस क्षण की कल्पना में
धकेल रहा हूँ अवसाद को सदियों पीछे
देख रहा हूँ एक युग आगे
भटक रहा हूँ आवारा दर ब दर
मेरे पास आश्वस्ति की बांसुरी है
जिस पर बजा रहा हूँ एक उदास धुन
यह सोचते हुए
एक बार रास्ता भूल भी गई तो भी
इस धुन के सहारे मुझे तक पहुँच जाओगी तुम
तुम्हारी प्रतिक्षा में
खुद को प्रतिक्षारत रख
मैं समय को साध रहा हूँ
ताकि तुमसे ठीक वैसा ही मिलूँ
जैसा कभी मिला था पहली बार।

© डॉ. अजित

Wednesday, September 23, 2015

नियति का राजपत्र

उन दिनों जब तुम मेरे लिए
खुद से खूबसूरत और मेरी हमउम्र
प्रेमिका तलाश रही थी
तुम्हें व्यस्त देख
मैं निकल आया था बहुत दूर
तुम्हारे उत्साह में कंकर मार
मन की तरल सतह पर
वलय नही बनाना चाहता था
इसलिए मैंने स्मृति में मार्ग को नही रखा
मैंने रास्ते में देखे कुछ बेजान पौधे
धूल के कुछ छोटे पहाड़
और एक आधी अधूरी पगडंडी
उन दिनों
तुम्हारे सुझाए विकल्पों पर
मैं केवल मुस्कुरा सकता था
मगर तुम मुझे प्रेम में
हंसते हुए देखने की जिद में थी
इसलिए भी मैं निकल आया था
चुपचाप
सम्भव है तुम्हें लगा हो यह पलायन
या फिर मेरी पुरुषोचित्त कायरता
अधूरी पगडंडी पर चलता हुआ
आ गया हूँ उस दिशा में
जहां से मेरी ध्वनि समाप्त होती है अब
तुम्हारे विकल्पों को अनाथ छोड़ने पर
मैं थोड़ा सा शर्मिंदा भी हूँ
दरअसल
तुम और तुम्हारे विकल्प के मध्य
चुनने की सुविधा तुमनें दी नही थी
और मैं खुद समय का एक विकल्प था
मेरा निकलना तय था
क्योंकि ठहरने का एक अर्थ
तुम्हें खोना था
नियति के राजपत्र पर
यह बात प्रकाशित की थी
मैंने,तुमनें और समय ने
एक साथ मिलकर
किसी षड्यंत्र की तरह।

© डॉ. अजित


Tuesday, September 22, 2015

उदास गीत

कुछ लोग मुझसे छूट रहें है
कुछ लोगो से मैं छूट रहा हूँ
ऐसा नही हमारी पकड़ ढ़ीली है
दरअसल
हमारे हथेलियों में सन्देह का पसीना है
जिसकी नमी से स्पर्श खिसक रहें इंच भर
धरती के गुरुत्वाकर्षण के उलट
बदल रहें है हमारे केंद्र
एक दिन वो भी आएगा
जब सूरज निकलेगा एकदम अकेला
योजनाओं का साक्षी नही बनना पड़ेगा उसे
चांदनी के पास नही होगा एक चुस्त तलबगार
धरती उस दिन होगी सबसे अकेली होगी
छूटे हुए लोगो के लिए
अनजानी हो जाएगी हर चीज
जिसमें मैं भी शामिल हूँ
मैं नदी झरनें और पहाड़ को
तब सुनाऊंगा एक उदास गीत
जिसके मुखड़े को सुन बारिश हो जाएगी
और भाप बन उड़ने लगेंगी यादें
स्मृतियों के जंगल से।

© डॉ. अजित

Thursday, September 17, 2015

इन्तजार की ऊब

इन्तजार की ऊब में डूबे
किसी शख्स से मिलें कभी आप
उसकी घड़ी का समय
मिनट पहले बताती है
घंटे बाद में
इन्तजार की आश्वस्ति
खुद को समझाने की बढ़िया युक्ति है
जो अटकी रहती है
किसी के होने
और न होने के बीच
इन्तजार की ऊब से पुते चेहरे
खो देते है शिल्प की ख़ूबसूरती
व्यक्त अव्यक्त के समानांतर
वो जीते है कयासों से भरी दुनिया
कभी समय के सापेक्ष
कभी समय के निरपेक्ष।

© डॉ.अजित 

Tuesday, September 8, 2015

जन्मदिन पर

लौटा रहा हूँ
तमाम यादें किस्सें और बेवकूफियां
भेज रहा हूँ
खत लिबास और रोशनी
खरीद रहा हूँ एक मुठ्ठी एकांत
सौंप रहा हूँ
तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अवसाद
कह रहा हूँ
स्थगित धन्यवाद और विलम्बित क्षमायाचना
आरम्भ कर रहा हूँ
एक नया अंत
मध्यांतर की शक्ल में
दे रहा हूँ
अवांछित शुभकामनाएं
मांग रहा हूँ
राग में दबी पवित्र कामनाएँ  वापिस

मात्र इतना ही उल्लास हर्ष उत्सव और विज्ञापन
बचा है मेरे पास
आज खुद के जन्मदिन पर।

© डॉ. अजित