Saturday, February 18, 2017

आख़िरी कविता

मेरे शब्दकोश से क्षुब्ध होकर
अरुचि का शिकार हो जाएंगे
एकदिन लोग

पुनरुक्ति को देख वो समझ लेंगे
इसे मेरा स्थाई दोष
नही रहेगी मेरी बात में कोई नूतनता
हर दूसरे दिन खुद को खारिज़ करता जाऊँगा मैं

शब्दों से छनकर बह जाएगी सारी सम्वेदना
शिल्प के खण्डहर में अकेले होंगे अनुभव
तब कहने के लिए नही बचेगा
मेरे पास कुछ भी शेष
मौन रूपांतरित हो जाएगा निर्वात में

इतनी नीरवता में मेरा चेहरा देखकर
जिन्हें याद आएंगी कुछ मेरी पुरानी कविताएं
उनका प्रेम देख शायद रो पडूंगा मैं

कवि के तौर पर
यह मेरी आख़िरी अशाब्दिक कविता होगी।

©डॉ.अजित

Tuesday, February 14, 2017

संवाद

प्रेम में अपदस्थ प्रेमी
से जब पूछा मैंने
अपना अनुभव कहो
उसने कहा
मेरा कोई अनुभव अपना नही
प्रेम के बाद कुछ अपना बचता है भला?

मैं इस बात पर हंस पड़ा
उसने कहा तुम प्रेम के अध्येता हो
प्रेमी नही
मैंने कहा आपको कैसे पता
प्रेम में कोई दुसरे की बात पर हंसता है भला?

अब मै थोड़ा उदास हो चुप बैठ गया
अब तुम पात्रता अर्जित कर रहे हो
मुझे सुनने की
मगर मै जो कहूँगा वो मेरा होगा
यह संदिग्ध है
मेरे बारे में पूछना तो उससे पूछना
जिसे मै याद हूँ भूलकर भी

मैंने कहा आप क्या बता सकेंगे फिर?
मैं बता सकूंगा सिर्फ इतना
मैंने जीना चाहा तमाम अभाव और त्रासदी के बीच
मैंने पाना चाहा तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
मैंने बाँट दिया खुद को कतरा कतरा
मैंने खो दिया उसको लम्हा लम्हा
इस बात पर मुझे पुख़्ता यकीं है
वो साथ है भी और है भी नही।

©डॉ.अजित

Friday, February 10, 2017

देव

हो सके तो सम्बोधनों के
षडयंत्रो से बचना
पति को देव कहने से बचना

देव आदर्श भरी कल्पना है
मिथको से घिरी एक अपवंचना है
मनुष्य जब देवता बताया जाता है
फिर वो कर देता है इनकार
मनुष्य को मनुष्य मानने से
समझने लगता है खुद को चमत्कारी

प्रेम की चासनी में लिपटे
बहुत से चमत्कार तुम समझ न पाओगी
आत्म गौरव को देवत्व के समक्ष बंधक पाओगी
साथी के तौर पर कोशिश करना
तुम्हारा साथी मनुष्य रहे
और तुम्हारा साथ उसे बनाए
और एक बेहतर मनुष्य

यदि तुमनें एक बार उसे बना दिया देव
फिर वो भूल जाएगा कमजोरियों पर माफी माँगना
सीख लेगा वो अधिपत्य घोषित करना
एकदिन तुम्हें बता देगा तुम्हारी ही नजरों में
सबसे निष्प्रयोज्य
घोषित कर देगा अपनी कृपा का घोषणापत्र

मत मानना पुराणों के शब्द विलास
गढ़ना अपने सह अस्तित्व का शब्दकोश
समझना और बरतना बराबरी के सुख दुःख
मत कर देना खुद को प्रस्तुत
देवता के स्वघोषित साम्राज्य में दास की तरह

प्रेम में एक बार देव कहोगी
दुःख में भूल जाओगी असल के देवता को भी
दरअसल
देवता कोई नही होता है
असल के देवताओं के भी अनन्त किस्से है छल के

पति को देव बनाना
उस छल को निमंत्रित करना है
जिसकी शिकायत किसी से नही कर सकोगी
और यदि करोगी भी
सारी सलाह और समायोजन तुम्हारे हिस्से आएगी
दब जाओगी जिसके बोझ तले असमय

पति का एक नाम है
उसी नाम से पुकारना
देव कहने से बैचेन होगा असल का पति
खुश होगा देव बनने को बैचेन पति

बस यह सूत्र रखना याद
और तय करना प्रिय पति का संबोधन
बतौर माँ यही
आख़िरी सलाह है मेरी।

© डॉ.अजित

Monday, February 6, 2017

कमजोरी

मैंने कहा मेरी अंग्रेजी कमजोर है
ये बात मैंने कमजोरी से ज्यादा
ताकत के तौर पर इस्तेमाल की अक्सर
अंग्रेजी पढ़ते वक्त हिंदी में सोचता
तो गड़बड़ा जाते सारे टेन्स
इज एम आर वाज़ वर लगते मुझे दोस्त
उनके साथ आई एन जी जोड़
छुड़ा लेता था अक्सर अपना पिंड
यह मेरी अधिकतम अनुवाद क्षमता थी

एक्टिव वॉयस और पेसिव वॉयस का भेद
मुझे आजतक नही समझ पाया
मै क्रिया कर्ता कर्म तीनों को समझता रहा
मुद्दत तक एक ही कुनबे का

भाषा को लेकर हमेशा रहे मेरे देहाती संकोच
मैंने साइन बोर्ड पढ़कर याद रखे रास्ते
इस लिहाज से अंग्रेजी काम आई मेरी
कुलीन जगह पर अंग्रेजी बोलने के दबाव के बावजूद
मैंने हिंदी को चुना
चुना क्या दरअसल मैंने चुप रहने का नाटक किया
क्या तो प्राइस टैग पलटता रहा
या मेन्यू देखता रहा बिना किसी रूचि के
ऐसे मौकों पर दोस्तों ने बचाई जान
उनके सहारे मेरा सीना तना रहा
ये अलग बात है कभी वेटर तो कभी सेल्स पर्सन
भांप गया ऑड और एवन में मुझे बड़ी आसानी से

ये बातें मैं अतीत का हिस्सा बताकर नही परोस सकता
ना ही अपने किसी जूनून का विज्ञापन कर सकता
मै जीता रहा भाषाई अपमान के मध्य
अपनी स्वघोषित अनिच्छा का एक बड़ा साम्राज्य
मैंने लूटे अक्सर भदेस होने के लुत्फ़

यहां जितनी बातें की उनकी ध्वनि ऐसी रखी
जानबूझकर कि लगे सीख गया हूँ
ठीक ठाक अंग्रेजी अब
मगर सच तो ये है
आज भी मुझसे कोई पूछे
जूतों के फीते की स्पेलिंग
मै टाल जाऊँगा उसकी बात हंसते हुए

कुछ और भले ही न सीखा हो मैंने
मगर मैंने सीख लिया है
अज्ञानता को अरुचि के तौर पर विज्ञापित करना
अंग्रेजी की तो छोड़िए
इस बात के लिए मुझे हिंदी ने
माफ़ नही किया आज तक

मेरी वर्तनी में तमाम अशुद्धियां
हिंदी की उसी नाराज़गी का प्रमाण है
जिनसे बचता हुआ आजकल
मैं खिसियाते हुए ढूंढ रहा हूँ
एक बढ़िया प्रूफ रीडर
जो कम से कम मेरा दोस्त न हो।

©डॉ.अजित

Sunday, February 5, 2017

रिहाई

जाओ !
एक नफ़ासत से जुदा हो जाओ
तल्खियों को यतीम कर दो
हो सके तो इस विदाई को हसीन कर दो

मैंने चुन लिए चंद मासूम लहजे
मैं बुन रही हूँ ख्यालों की रेशमी डोर
मै कात रही हूँ यादों के चरखे पर
अच्छी बातों का सूत
जिनके भरोसे पोंछा जा सकेगा
आषाढ़ की भरी उमस में पसीना

नही मुझे कोई शिकायत नही तुमसे
ये कोई बड़प्पन नही
ना ये दिखावे की ख़ुशी की कोई नुमाईश है
दरअसल जब जाना ही तय हुआ है
मैं चाहती हूँ तुम जाओ
सावन के बादल की तरह
जनवरी की धूप की तरह
इतवार की छुट्टी की तरह

आओ ! तुम्हारे माथे पर
एक शुष्क बोसा चस्पा कर दूं
तुम्हें इतने नजदीक देख
अब साँसे तरल न रह सकेंगी
दरअसल ये महज एक बोसा नही
ये दो अलग टापूओं का नक्शा है
रिहाई और विदाई यहीं भटका करेगी
आज के बाद

जाओं !
अब कोई पुकार नही शामिल
तुम्हें मुड़ते हुए देखना चाहती हूँ
उस मोड़ से
जहां चौराहे छोड़ देते है रास्तों का साथ
मुसाफिर जहां असमंजस के साथ
बदल लेता है रास्ता
इस उम्मीद पर
वो पहुंच जाएगा एकदिन कहीं न कहीं

यही मैं चाहती हूँ
तुम पहुँच जाओं कहीं न कहीं
बस अब यहां नही।

© डॉ.अजित

Sunday, January 29, 2017

विकल्प

यात्रा का आरम्भ बिंदु
होता है बेहद कोमल निस्पृह और पवित्र
फिर विकल्प उपस्थित होते है आसपास
कौतुक की शक्ल में

यही से होता है आरम्भ चयन भेद विशेषण का
विकल्प एक सुविधा है
जिसकी असुविधा व्याप्त रहती है दूर तक

शब्द भाव संवेद जब होते है हस्तांतरित
संकल्प मुस्कुराता है विकल्प की चालाकी पर
विकल्प देता है हौसला हंसी के प्रतिउत्तर में

ये नही वो तो सही
बहुत है अभी चमन में दीदावर।

© डॉ. अजित

ग्लानि

कुछ दिनों से
उससे खिंचा खिंचा सा रहता हूँ
मेरे जवाबों मे तल्खियां रहती है
जानता हूँ सब बेवजह की है
मगर
उसको एक सिरे से खारिज़ करता चला जाता हूँ

किसी को खारिज़ करना सुखप्रद हो सकता है
मगर उसको खारिज़ करके
हमेशा गहरे पश्चाताप से गुजरता हूँ
हैरत इस बात की है
ये पश्चाताप मुझे बदलता नही है

मुझे कोई नाराजग़ी नही है
मैं खुद से भी खफा नही हूँ

दरअसल
क्यों कर रहा हूँ ये सब
मुझे खुद पता नही है

इसलिए लिख कर कम कर रहा हूँ
अपनी ग्लानि
ग्लानि केवल लिख रहा हूँ
महसूस करते समय बंद कर लेता हूँ दरवाजा

जहां मुझे कोई नही देख रहा
वहां तुम देख रही हो मुझे

मैं छिपने के लिए जगह तलाश रहा हूँ
यह कविता उसी जगह की तलाश के नाम
की गई एक ज्यादती है।

© डॉ.अजित

Thursday, December 29, 2016

शुभकामना

मत भेजना नए साल पर कोई शुभकामना
जिस साल में तुम न हो
वो नया कैसा हुआ भला

भले नए साल कई महीने बीतने पर
कर देना अचानक से विश
जैसे आईस-पाईस में बोल दिया हो ‘धप्पा’

मत भेजना कोई धुंध में लिपटी शुभकामना
फॉरवर्ड किए संदेशो से उकताया हुआ मेरा मन
नही पढ़ सकेगा तुम्हारा कोई मैसेज

और पढ़कर भी क्या करना है
जब फिलहाल शुभकामना के बदले
शुभकामना नही मेरे पास

इनदिनों मैं प्रार्थनाओं में व्यस्त हूँ
ईश्वर से मांग रहा हूँ रोज़ माफियाँ
न किए गए गुनाहों की भी
मुझे माफ़ी मिले न मिले कोई बात नही
मुझे कोई अफ़सोस न होगा इस पर  

मगर
नए साल पर तुम्हें देखना चाहता हूँ
बेवजह खुश

जब जब तुम किसी कारण से खुश हुई हो
उस ख़ुशी ने ली है हमेशा एक बड़ी कीमत
नये साल पर मत भेजना मुझे कोई शुभकामना
यदि हो सको हो
हो लेना बस एक बार बिना वजह खुश

ईयर न्यू हैप्पी
तभी सीधा पढ़ सकूंगा मैं.


डॉ. अजित 

रास्ता भूल

मैं कही खो गई हूँ शायद
शायद इसलिए कहा
क्योंकि
अब मै पता नही पूछ रही हूँ
पता पूछने वाला
जरूर एकदिन कहीं पहुँच ही जाता है
मुझे जहां या कहां जाना था
ये मैं ठीक से शायद बता भी दूं
मगर क्यों जाना था
ये बता पाना मुश्किल होगा मेरे लिए

अनुमानों के जरिए एक चित्र बनाती हूँ मै
चित्र में शायद जोड़ रही हूँ क्योंकि
रास्ता भूलने के कारण
चित्र की ध्वनि लग सकती है
कुछ कुछ मानचित्र जैसी

उस चित्र में मैं हूँ तुम हो
मगर कोई दृश्य नही है
मसलन इस चित्र की कोई मनोदशा नही है
ये रास्ता भूले किसी दूसरे मुसाफिर से नही मिलवाता
यदि ऐसा करता तो शायद
मैं हंसते हंसते रो पड़ती
मैं नाचते हुए उदास न होती

मैं रास्ता भूल गई हूँ
मैं कहीं खो गई हूँ
ये फ़िलहाल मुकम्मल बयान है मेरे लिए
जिसकी पुष्टि के लिए
कविता की शक्ल में जगह जगह
'शायद' टांक दिए है
किसी पार्टी वियर फॉर्मल शर्ट के एक्स्ट्रा बटन की तरह

मैं रास्ता भूल गई हूँ
इसलिए औपचारिक होकर मिटा रही हूँ
अपना थोड़ा भय
थोड़ा अपराधबोध

बुरा मत मानना यदि मै पूछूं कई बार
कैसे हो !
वैसे भी
जो रास्ता भूल जाए
उसकी बात का क्या बुरा मानना भला।

©डॉ.अजित

Wednesday, December 28, 2016

झूठ

झूठ सिर्फ मैं प्रेम में बोलूंगी
इतना भर झूठ कि
तुमसे नफरत और प्रेम
एक साथ किया मैंने
रख दूंगी
छटांक भर मुस्कान
गुमशुदा चेहरे पर
ताकि मुझे खुश देख
तुम महसूस कर सको
आसपास बिखरी छोटी छोटी खुशियां
प्रेम में इतना झूठ जरूर बोलूंगी
तुम्हें कितनी दफा
भूलने के लिए संकल्प
मगर नही भूल पाई कभी
प्रेम में झूठ बोलना जरूरी है मेरा
क्योंकि
प्रेम में बोला गया सच
एकदिन शापित होता है
झूठ बन जाने के लिए।

© डॉ.अजित

Tuesday, December 20, 2016

उम्मीद

कविताएं
जो सुनानी थी
खत जो दिखाने थे
फोटो जो साथ क्लिक करने थे
छूटे हुए सपनें जो गिनाने थे

जिंदगी के ऐतबार पर
किस्सों को बुनना था
कुछ बिखरे हुए हिस्सों को
हंसते हुए रोज़ चुनना था

काम सब के सब अधूरे रहे
कहे अनकहे ख्याल सब लौट आए
मुझ तक देर सबेर

तुम्हारा पता सही था
खत भी खुले थे
डाकिया भी भरोसे का था

बस तुम अनुपस्थिति थी चित्र से
तुम्हारी अनुपस्थिति की तह बना रख ली है
एक धुंधली सम्भावना की शक्ल में

उम्मीद मनुष्य को बार बार निराश होने के लिए
प्रशिक्षित करती है
मैं उम्मीद की शक्ल में देखता हूँ तुम्हें

निराशा इसलिए सबसे अधिक प्रिय है मुझे।

©डॉ.अजित

Sunday, December 18, 2016

तुम बिन

तुम मेरे जीवन में
पूर्ण विराम थे
आधे अधूरे वाक्य
और प्रश्नचिन्ह के बाद
अनिवार्य थी तुम्हारी उपस्थिति
तुम्हारा बिना अर्थ छूटे सब अधूरे
बिगड़ा जीवन का व्याकरण
अब कोई यह तय नही कर पाता
मुझे पढ़ते हुए
उसे कहाँ रुकना है।
*****
तुम मेरे जीवन में
अवसाद की तरह व्याप्त थे
तुम्हारे बिना लगता था खालीपन
तुम रह सकते थे
सुख और दुःख में एक साथ
तुम्हारे बिना
सुख और दुःख में मध्य अटक गया मै
इसलिए
नजर आता हूँ
हंसता-रोता हुआ एक साथ।
***
दो दिन से मुझे बुखार है
माथे पर रखा हाथ याद आता है मुझे
ताप जांचता हूँ गालों को छूकर
आँखों बंद करता हूँ तो
नजर आती हो तुम नसीहतों के साथ
बीमार हूँ मगर खुश  हूँ
ये खुशी
तुम्हारी बात न मानने की है।
***
उन दिनों और इन दिनों में
ये एक बुनियादी फर्क है
अब बुरा लग जाता है
बेहद मामूली बातों का
तुम्हारे बिना खुद को बचाना पड़ता है
दुनिया और उसकी धारणाओं से
तुम्हारे साथ लड़ना अनावश्यक लगता था
उन दिनों अनायास लापरवाह था
इन दिनों सायास सावधान हूँ मैं।

© डॉ.अजित 

Saturday, December 10, 2016

सर्दी की बातें

बहुत दिन बाद उसने पूछा
कैसे हो?
मेरे पास इस सवाल का
एक अस्त व्यस्त जवाब था
इसलिए मैंने कहा
बिलकुल ठीक
उसके बाद
बहुत दिनों तक हालचाल नही पूछा उसने
सम्भवतः वो समझ गई थी
बिलकुल ठीक के बाद
मुद्दत लगती है सब कुछ ठीक होने में।

***
परसों उसका फोन आया
जब तक फोन जेब से निकाला
फोन कट गया
इसका एक अर्थ यह लगाया मैंने
वो उसी क्षण चाहती थी मेरी आवाज़ सुनना
लेशमात्र का विलम्ब शंका पैदा कर गया होगा
जैसे ही कॉल बेक के लिए फोन किया टच
दूसरा फोन आ गया अचानक से
इस तरह टल गया मेरा भी वो क्षण
जब कुछ कहना था मुझे
प्रेम में टलना एक बड़ी दुर्घटना थी
ये बात केवल जानता था हमारा फोन।
***
उस दिन मैंने मजाक में कहा
प्लास्टिक मनी नही मेरे पास
वरना कॉफी पिलाता तुम्हें
उसने हंसते हुए कहा
अच्छा है नही है तुम्हारे पास
वरना कॉफी नही
शराब पिलाने के लिए कहती तुमसे
मैंने कहा यूं तो कैशलैस एक अच्छा अवसर हुआ
उसने उदास होते जवाब दिया
जब तुम होपलैस हो
फिर कोई अवसर अच्छा कैसे हो सकता है?
***
लास्ट दिसम्बर की बात है
एक धुंध भरी सुबह
उसने कहा
मौसम को चिढ़ा सकते हो तुम
मैंने कहा वो कैसे?
उसके बाद उसने मुझे गले लगा लिया
और हंसने लगी
उस हंसी के बाद
दिसम्बर उड़ गया धूप बनकर
पहली बार हंसी के बदले
मुझे सूझ रहा था
केवल मुस्कुराना।

© डॉ.अजित

Friday, December 9, 2016

माया

कॉपी पेस्ट
वहां की उत्कृष्ट रचनात्मकता थी
और शेयर करना अधिकतम कृतज्ञता
ब्लॉक करना दण्ड का अधिकतम रूप था
फ्रेंड बनाकर अन्फ्रेंड करना
तकनीकी का मानवोचित प्रयोग
फेक प्रोफाइल अय्यारी का स्कूल था
जिसमे दीक्षित होते दोनों
ब्लॉक करने वाले भी
ब्लॉक होने वाले भी
चित्रों की निजता बचाए रखने के लिए
एक मात्र उपाय ओनली मी था
जिसे करने वाला खुद पर गुस्सा होता था पहले
वायरल वीडियो और वायरल पोस्ट
दोनों बीमारी नही थी मगर बीमारी से कम भी न थी
लाइक और दिल में महज इतना फर्क था
दोनों को उलटा समझ लिया जाता था कभी कभी
इनबॉक्स मंत्राणाओं यातनाओं और परनिंदा के शिविर थे
जहां घायल योद्धा अचेत बड़बड़ाते रहते थे
यह पहली ऐसी आरोग्यशाला थी
जहां बीमार करते थे बीमार का इलाज़
वो पश्चिम के एक युवा का अंतरजाल पर षड्यंत्र था
जिसमें बुरी तरह फंस गए थे पूरब के लोग
दक्खिन के लोग हसंते थे
उत्तर के लोग रोते है ये सब देखकर
वो फेसबुक थी जिसका उच्चारण स्त्रीलिंग था
मगर जिस पर पसरा था टनों पुल्लिंग का अहंकार
पुराणों और सत्यनारायण की कथाओं से ऊबी औरतें देख रही थी वहां औसत मनुष्य का दैवीय खेल
उनका हंसना रोना महज दर्शकीय प्रतिक्रिया न थी
मंच का नाम जरूर था
मगर खेल जाते थे वहां रोज नाटक नेपथ्य में
सबके पास थे अपने अपने सच के अलौकिक संस्करण
वो मायावी दुनिया कतई नही थी
वहां के लोग मगर मायावी थे
इतने मायावी कि
ये पहचाना मुश्किल था
कौन सी प्रोफ़ाइल एक्टिवेट होकर भी
डिएक्टिवेट थी
और कौन सी डिएक्टिवेट होकर भी
एक्टिवेट।

© डॉ.अजित

Thursday, December 8, 2016

निकलना

हंसी तुमने देखी है हमारी
मगर हम रो कर निकले है

जितना हासिल किया तुमने
उतना हम खो कर निकले है

धूप में भी छांव मिल जाएगी
बीज एक हम बो कर निकले है

पहुँच ही जाएंगे खत सब पते पर
ख्याल  दिल भिगो कर निकले है

कोई रहता था हमेशा वहां
जहां से हम हो के निकले है

©डॉ.अजित

Tuesday, December 6, 2016

गजल

पहले कह देता था
अब कहता नही हूँ

मान लो आदमी हूँ
कोई खुदा  नही हूँ

बेखबर हूँ थोड़ा सा
तुझसे जुदा नही हूँ

रो नही सकता अभी
खुद पे फ़िदा नही हूँ

बिछड़ नही सकता
तुमसे मिला नही हूँ

थोड़ी सी पीने दो
अभी खुला नही हूँ

© डॉ.अजित

Monday, December 5, 2016

ईश्वर

कुछ सवालों के जवाब
इसी जन्म में पूछे जाने चाहिए ईश्वर से
नही कर देना चाहिए उसे दोषमुक्त
प्रारब्ध के नाम पर

क्यों मर जाता है वो पिता
जिसकी जरूरत सबसे अधिक उसके बच्चों को है?
क्यों पराजित होता जाता है
एक सीधा सच्चा इंसान हमेशा

रोटी पर पहला हक क्यों नही उसका
जिसका सबसे ज्यादा पसीना शामिल है उसमें
क्यों कुछ लोग तय कर देते है
भीड़ का भविष्य बिना उनकी रायशुमारी के

दुःखो से ऐतराज़ नही
मगर क्यों मिलते है ऐसे अकथनीय दुःख
जिनका कोई उपचार नही

कब तक ईश्वरीय सत्ता के भरोसे
अपने प्रश्न टालता रहेगा
एक मजबूर हैरान परेशान मनुष्य
कब तक धर्म और आध्यात्म के नाम पर
गलत ठहरा दिया जाएगा
उसके बेहद बुनियादी और जरूरी सवालों को

कैसा लगता होगा उस दयालु ईश्वर को
जब मनुष्य को देखता होगा बेबस और मजबूर
यदि वो न्याय कर रहा पूर्वजन्मों के कर्मो से

तो
इस जन्म में मैं खारिज़ करता हूँ
ईश्वर का दयालु होना

ईश्वर दयालु नही बेहद चालाक है
वो हमेशा छोड़ना चाहता
उसको पूजने के कारण
भले ही इसके बदले
घुटकर मर जाए
एक सीधा सच्चा आदमी बेवजह

ईश्वर पर सवाल खड़े करने के लिए
भले दण्डित किया जाए मुझे
मगर बतौर इंसान मुझे ईश्वर का चरित्र लगता है
हमेशा संदिग्ध
उसका न्याय का दर्शन नही आता समझ
खोखली लगती है आस्था की तकरीरे
कई बार ईश्वर लगता है
मनुष्य से ज्यादा मजबूर और असुरक्षा से घिरा

मनुष्य के कष्ट
उसके शाश्वत बने रहने का
एक मात्र उपाय है।

© डॉ.अजित

Sunday, November 27, 2016

घर

उस घर में रंग बिरंगे तकिए थे
परदों का था अपना वास्तु शास्त्र
खाने की मेज़ और पढ़ने की मेज़ पर
चीनी और कोरियाई खिलौने अलग-अलग थे

किताबें वहां ऐसी सजी थी
मानों मुद्दत से वे देख रही हो
मनुष्यों के बेवकूफियां

घर के तौलिए अनुशासन में गीले थे
कोई नही गिन सकता था उनकी सिलवटें
फ्रिज के नजदीक टंगा था
बी पॉजिटिव रहने का एक निस्तेज विचार
किसी महंगी पेंटिंग की शक्ल में

उस घर के बर्तन जरूरत से ज्यादा भारी थे
उनमें थी अजीब किस्म की भारी खनक
जिसे सुन भूख मर जाती थी आधी
पानी पीते हुए लगता था डर
पानी पीने आवाज़ बिगाड़ न दे घर की शान्ति

मेहमान उस घर का बहुप्रतिक्षित व्यक्ति जरूर था
मगर वो भेद नही कर पाता था
कौन असल में मालिक है और कौन मेहमान
वो कोशिश करता बैठे रहने की
बिना दायीं टांग को हिलाए

उस घर में दरअसल कई घर थे
मेहमान की शक्ल में
इसकी खबर असल घर को थी
मगर घर के मालिक को बिलकुल भी नही थी

वो हाईजीन जैसी
छोटी छोटी बातों से बहुत खुश था
उसकी खुशी झलकती थी बातों में

मैनें जब दुःख पर बातें करना चाही
उसने कहा कौन दुखी नही इस दुनिया में
जबकि मैं दुनिया की नही उसकी बात कर रहा था

उस घर में दुःख और सुख की नही
किसी तीसरी मनोदशा पर बात की जा सकती थी
तब मुझे वो घर लगा थोड़ा सा मायावी

डर के मारे नही जाता उस घर कभी
मगर वो घर अक्सर करता है मेरा पीछा
जबकि मेरे पास नही है कोई भी छिपी हुई बात
तीसरी मनोदशा पर।

© डॉ.अजित

Saturday, November 26, 2016

रूपांतरण

प्रेम ने मुझे
शालीनता सिखाई
खुद से बेहतर बात करना
प्रेम के कारण सीख पाया मैं

प्रेम ने मुझे आदर करना सिखाया
और बिना बात अड़ने की खराब आदत
प्रेम के कारण ही छोड़ पाया मै

प्रेम के कारण मै सीख पाया
हंसी और आंसू में बुनियादी भेद
वरना मुद्दत तक
हंसते हुए लोग मुझे लगते थे रोते हुए
और हंसी आती थी किसी के रोने पर

प्रेम मुझे बदलने नही आया था
प्रेम मुझे ये बताने आया था कि
मनुष्य अपने चयन से अकेला हो सकता है
या फिर कमजोरियों के कारण
वरना
ईश्वर ने नही बनाया मनुष्य को
मात्र खुद के लिए
उस पर हक होता है
किसी और का भी

कितनी अवधि के लिए?
ये बात नही बताई
किसी प्रेमी युगल ने मुझे
अनुभव के साक्षात्कार के बाद भी

शायद
यही बात बताने प्रेम आया था जीवन में
और बताकर चला गया
अपनी कूट भाषा में।

©डॉ.अजित

Monday, November 21, 2016

प्रार्थना

प्रेम को घुन की तरह
चाट रही थी
अति वैचारिकता
मुद्दें कुतर रहे थे
अंतरंग अव्यक्त प्रेम को

सबसे खराब था
असुविधाओं और असहमति के लिए
दुसरे को दोषी ठहराना
बावजूद इन सबके
वो सबसे ज्यादा खुद से खफा थे

बहस में दुबक गया था प्रेम
स्पष्ट बातें लगने लगी थी
ज्यादा कड़वी
कमजोर हो रहा था
प्रेम का आंतरिक लोकतंत्र

तर्कों से आहत थी सामूहिक सहनशीलता

ईश्वर को खारिज़ कर चुके थे
वो दोनों कब के
नही शेष था कोई प्रार्थना का विकल्प
चमत्कार मौजूद था
सबसे धूमिल आशा के रूप में

जो लिए जातें संकल्प
जो तोड़े जाते संकल्प

उनके लिए नही था कोई प्रार्थनारत
ईश्वर को छोड़कर।
© डॉ.अजित

Monday, November 14, 2016

प्रिय कवि

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
इतना प्रिय  कि
खुद चमत्कृत हो सकता था
तुम्हारी व्याख्या पर
देख सकता था
पानी पर तैरता पतझड़ का एक पत्ता
और तुम्हारी हंसी एक साथ

कभी मैं बहुत कुछ था तुम्हारा
कवि होना उसमें कोई अतिरिक्त योग्यता न थी
तुम तलाश लेती थी
उदासी में कविता
मौन में अनुभूति
और दूरी में आश्वस्ति

मुद्दत से तुमसे कोई संपर्क न होने के बावजूद
इतना दावा आज भी कर सकता हूँ
याद होगी तुम्हें
मेरी लिखावट
मेरी खुशबू
और मेरी मुस्कान
लगभग अपनी पहली शक्ल में

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
मेरी कविताओं की शक्ल में मौजूद है
ढ़ेर सी अधूरी कहानियां
और बेहद निजी बातचीत
उन दिनों
मैं कर जाता था पद्य में गद्य का अतिक्रमण
जिसके लिए कभी माफ नही किया
मुझे कविता के जानकारों ने

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
इसका यह अर्थ यह नही कि
आज तुम्हें अप्रिय हूँ मै
इसका अर्थ निकालना एक किस्म की ज्यादती है
खुद के साथ
और तुम्हारे साथ

कवि एकदिन पड़ ही जाता है बेहद अकेला
इतना अकेला कि
उसे याददाश्त पर जोर देकर याद करने पड़ते है
अपने चाहनेवाले

कविता तब बचाती है उसका एकांत
स्मृतियों की मदद से

वो हंस पड़ता है अकेला
वो रो पड़ता है भीड़ में
महज इतनी बात याद करके

कभी किसी का प्रिय कवि था वह।

© डॉ.अजित

Thursday, November 10, 2016

अपलक

तुम्हारी गर्दन पर
एक कम्पास रखा है
जिसे देखकर नही
सूंघकर होता है
दिशाबोध

तुम्हारी पलकों पर
कुछ रतजगे सुस्ता रहें है
जिनकी जम्हाई में हिसाब है
तुम्हारी करवटों का

तुम्हारे माथे पर लिखा है
एक पता
जिसकी लिपि को वर्गीकृत किया गया है
संरक्षण की श्रेणी में

तुम्हारे बालों में अटक गए
कुछ आवारा ख्याल के पुरजे
जिन्हें यादों की कंघी से निकालना असम्भव है

तुम्हारी पीठ पर
लिखे है अग्निहोत्र मंत्र
दीक्षित हो रहें है जिनसे
आश्रम से बहिष्कृत सन्यासी

तुम्हारी नाभि पर
प्रकाशित है आग्रह
धरती के बोझ को धारण करने का
और वलयों में कक्षा बन गई है
धरती के उपग्रहों की

तुम्हारे तलवों पर
बना है श्री यंत्र
बिना प्राण प्रतिष्ठा के भी
वो सदा बना रहेगा
चमत्कारिक

तुम्हारी हथेली पर
हृदय और मस्तिष्क रेखा के मध्य
आड़ा तिरछा फंस गया है मेरा नाम
भाग्य रेखा जिस पर मुस्कुराती है रोज़
तुम्हारे हथेलियों की नमी
अब ऊर्जा का अज्ञात स्रोत है

तुम्हारे कान
झुक गए अफवाहों और कयासों के बोझ से
कान की तलहटी में पड़े झूले
भूल गए है अपनी ध्वनियां
इसलिए भी अब दिगभ्रमित रहेगा बसन्त

मैं केवल तुम्हें देख रहा हूँ
जितना देख पा रहा हूँ
ये विवरण उसका दशमांश भी नही
जो नही देख पा रहा हूँ
उसके लिए कोई कौतुहल नही
मेरे पास

क्योंकि
तुम्हें यूं देखना एक आश्वस्ति है
कि तुम इस जन्म में
अभी खोई नही हुई मुझसे
इसलिए स्मृतियों को धोखा देकर
फ़िलहाल देख रहा हूँ तुम्हें
अपलक।

© डॉ. अजित

Friday, November 4, 2016

अयाचित

अयाचित प्रेम
कुछ इस तरह से हुआ अनुपस्थित
जैसे अचानक से बारिश
बरसते-बरसते निकल आई हो धूप

न जाने कब से कर रहा था तैयारी
चुपके से ओझल हो जाने की
और हुआ इस तरह से ओझल जैसे
हाथ हिलाते हिलाते हम
छोड़ आते है गहरे दोस्त की चौखट

ये कथन अधूरा है
संदेहास्पद है
और थोड़ा अविश्वसनीय भी कि
प्रेम हुआ जीवन से अनुपस्थित
इस पर सवाल किए जा सकते है
इस पर सलाह दी जा सकती है बिन मांगी
प्रेम को न समझने का इलज़ाम तो
वो भी लगा सकता है
जिसके पास नफरत के सिवाय कुछ न  हो

फिर भी सच तो यही है
कुछ इस तरह से हुआ प्रेम अनुपस्थित
जैसे एकदिन कोई भूल जाता है
खुद के जूते का नम्बर
जैसे कोई भूल जाता है
जेब में जरूरी कागज़ या फिर एक नोट

जब प्रेम हो रहा था अनुपस्थित
ठीक उसी वक्त
भूल गए सारी शिकायतें
सांझी अच्छी खराब आदतें
उसी वक्त यादों को छोड़ दिया
किसी पहाड़ी मोड़ की तरह

प्रेम का अनुपस्थित होना
बेहद सामान्य घटना नही थी
मगर उसे सामान्य मानने के अलावा
कोई दूसरा विकल्प भी नही था
असामान्य प्रेम का सामान्य ढंग से छूटना
कुछ कुछ वैसे था
जैसे सुबह सुबह छूट गई हो पहली बस
और अनमने मन से कोई हुआ हो सवार
किसी दूसरी सवारी में

इसके बाद वो जहां भी पहूँचेगा
निसन्देह थोड़ी देर से ही पहूँचेगा
उससे छूट जाएगी हर चीज़
एक छोटी सी मानक दूरी से
प्रेम का अनुपस्थित होना दरअसल
जीवन में विलम्ब का
स्थायी रूप से उपस्थिति होना भी था
और सबसे मुश्किल था
इस विलम्ब को आदत में ढाल लेना
और मुस्कुराते हुए
बात-बेबात माफी मांगना।

©डॉ. अजित

पता

जीसस के पैर में कांटा चुभ गया है
खून रिस रहा है
धरती पर लाल निशान बने है

जीसस के पदचिन्ह खून में दिख नही रहे है
दुनिया खून का पीछा करते हुए
स्वर्ग का पता नही जान पा रही है

जीसस पानी पर नही चलना चाहते
पानी उम्मीद की शक्ल में मौजूद है
अगर पानी लाल हो गया
पसीने से लथपथ लोगो को
नही नजर आएगा खुद का चेहरा

जीसस का खून बह रहा है
सलीब से मनुष्य ने हल बना लिया है
वो धरती को जोत रहा है
वो धरती को बंजर कर रहा है

जीसस रो नही सकते
उनके आंसू खून के स्रोत से जुड़े है
वो धरती पर घूम रहे है
उन्हें देख मनुष्य उपचार के बारे में नही
हथियार के बारे में सोचता है

जीसस उदास नही है
मनुष्य खुश नही है
खून अब तरल नही है

जीसस का पैर जब तक ठीक होगा
पूरी खत्म हो चुकी होगी लगभग
एक आहत सभ्यता।

©डॉ.अजित

Saturday, October 29, 2016

अमावस

प्रेम में अमावस
याद रहती हमेशा
दिल और दिया
जब जलता है एक साथ

रौशनी और अँधेरे
की दोस्ती नजर आती है

प्रेम चाँद को मानता है
भरोसेमंद
उसी के सहारे
लांघ जाता है बोझिल रातें
पूर्णिमा प्रेम की दिलासा है
और अमावस प्रेम की परीक्षा

कभी जलकर तो कभी मिलकर
प्रेम को बचाते है मनुष्य
प्रेम का बचना उत्सव है

प्रेम का मिटना एक घटना है
एक ऐसी घटना
जो ढूंढती है अमावस और पूर्णिमा के मध्य
एक सुरक्षित तिथि
ताकि बांच सके
सम्भावनाओं और षड्यंत्रों का पंचांग।

© डॉ.अजित