Saturday, May 26, 2018

विकल्प

मैं तुम्हारे गले लगना चाहता था
शायद थोड़ा हिचकियों के साथ सिसकना भी
बस ये बात कभी कह नही पाया
क्या ऐसा करने से
मैं साबित हो जाता
थोड़ा कमजोर थोड़ा अपरिपक्व?
नही पता तुम्हारा जवाब
मगर वो हिचकियाँ आज भी दर्ज है
तुम्हारी याद की शक्ल में

मैं थोड़ी देर के लिए
तुम्हारा हाथ अपने हाथों में लेकर
बैठना चाहता था एकांत में
मगर कभी बढ़ा नही पाया
खुद ही का हाथ
मुझे लगा ऐसा करने से
संप्रेषित हो सकता है
एक ऐसा अर्थ
जिसका फिलहाल कोई अर्थ नही
अर्थ अपना अनर्थकता पर
आज भी हंसता है मेरे एकांत में
और मैं बह जाता हूँ
किसी धार्मिक नदी के बहाव की तरह
जिसे बाद में समझा जाता है
मोक्ष के निमित्त आत्महत्या

मैंने कई बार देनी चाही तुम्हें आवाज़
मगर मेरे शब्द खो गए
कहीं बीच में
ये वही बीच था जहाँ मुझे तुमसे कहने था
आंखों में आंखें डालकर एकबार
हां ! तुम मेरी जरूरत हो
तुम हो एक न बदलने वाली आदत

ये कुछ अफसोस है मेरे पास
एकदम निपट बेकार
बेहतर होता है मैं कह देता या कर देता
जो भी कहा है उपरोक्त

उपरोक्त मेरे जीवन का खेद है
जिसके नीचे ग्लेशियर की शक्ल में
शांत पड़ा हूँ मैं
मेरा वेग है अज्ञात
मेरा जो भी है ज्ञात
उसमें असंख्य ऐसे ही
कर्म और वचन है
जो रह गए है निशक्त

मैं आज भी कहना चाहता हूँ तुमसे
मेरे जीवन में नही है
तुम्हारा कोई विकल्प
मगर नही कह सकूंगा
शायद इसी कारण
तुम्हारे जीवन में बन गए है
मेरे विकल्प।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 18, 2018

एकदिन


एकदिन बीत जाती है
सारी बातें
याद करने के लिए सोचना पड़ते है
चेहरें,प्रसंग और कुछ शिकवे-शिकायत 

प्यार दुबक जाता है
किसी निर्वासित कोने में

मैं आँख बंद करके सोचता हूँ
तुम्हारी बेहद मामूली बातें
और मुस्कुरा पड़ता हूँ
जैसे कोई ध्यानस्थ योगी
पा गया हो कैवल्य का मार्ग

इनदिनों जब
तुम नही हो
तो मैं भी नही हूँ कुछ-कुछ जगह

मैं जहां हूँ वहां नही आती तुम्हारी आवाज़
नही दिखती तुम्हारी शक्ल
इनदिनों मैं अतीत नही
भविष्य में भटकता हूँ
एकदम निर्जन अकेला

और
सोचता हूँ
तुम अगर साथ होती तो
कभी बीतता ही नही
हमारा सांझा अतीत.

©डॉ. अजित

Saturday, March 31, 2018

भोर का स्वप्न

अभी तुम्हारा ख्याल आया
और तुम आ गए
एक चिट्ठी की तरह

मैंने डाकिए से
किसी बुजुर्ग की तरह नही पूछा
तुम्हें आने में कितना वक्त लगा

मैंने तुम्हे चिट्ठी की तरह पढ़ा
बल्कि कम लिखे को अधिक पढ़ा

जब तुम आए
मैं गा रही थी एक लोकगीत
जिसमें याद किया जाता है
सबसे पहला प्रेमी

तुम देख
मुझे याद आया
मेरा सबसे पहला प्रेमी

जब तुम जाने लगे
हवा की तरह
मेरा जी हुआ बन जाऊं
एक चट्टान और बदल दूं
तुम्हारी दिशा

मगर मैं बन गई एक नदी
जिसमें बहा दी जाती है
पुरानी चिट्ठियां
और अर्घ्य दिया जाता है
अपने ज्ञात देवताओं को

तुम चिट्ठी की तरह आए
और पानी की तरह चले गए

मैं बस देखती रह गई
सतह की काई
और आकाश की ऊंचाई

मुझे तुम्हारे साथ उड़ना था
फिसलना भी था
मगर गिरना नही था

इसलिए
तुम्हें बन्द किया लिफाफे की तरह
चिपकाकर आँसुओं के गोंद से
और रख दिया तकिए के नीचे

ताकि नींद में तुम आओ
चिट्ठी की तरह नही
किसी भोर के उस सपनें की तरह

जो किसी को बताया न जा सके।

©डॉ. अजित

Friday, March 30, 2018

असुविधा

उसनें कहा
तुम्हें लोगों के प्रेम का
आदर करना नही आता
मैंने कहा
सही कहा मैं इसमें कमजोर हूँ थोड़ा
तुम्हारी एक और खराब आदत है
अपनी कमजोरियों का
औचित्य सिद्ध करना जानते हो
उसने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा
अब कोई अच्छी बात भी बताओ
मैंने कहा
तुम अधूरेपन में खुश रहना जानते हो
यह एक अच्छी आदत है।
**
तुम खुद को समझतें क्या हो?
क्या तुम्हारे बिना
दुनिया रुक जाएगी ?
एकदिन उसने बिगड़ते हुए कहा
मेरे बिना दुनिया तेजी से चलेगी
और मैं खुद को वही समझता हूँ
जो तुम समझती हो मुझे
मैंने हंसते हुए जवाब दिया
बनो मत ! तुम्हें जिंदगी का अनुवाद आता है
मेरा नही उसने लगभग चिढ़ते हुए कहा
उसके बाद मैं उसका मूल पाठ पढ़ता रहा देर तक
चुपचाप।
**
मैंने कोई शेर सुनाया उस दिन
उसनें कहा
शायर जो कहना चाहता था
वो कहने से चूक गया इस शेर में
मगर जो तुम कहना चाहते हो
वो मैं समझ गई हूं
मैंने फिर एक दूसरा शेर कहा
सुनकर उसने
इस बार तुम चूक गए हो
शायर अपनी बात कह गया
फिर मैंने कोई शेर नही कहा
बैठा रहा चुपचाप
थोड़ी देर बाद उसनें कहा
आज हम दोनों चूक गए है
अपनी-अपनी बात कहनें में।
**
कल उसका एक
एसएमएस मिला
जिसमें लिखा था
प्रेम एक सुविधा है
मगर तुमनें असुविधा चुनी है हमेशा
मैंने उसका कोई जवाब नही दिया
बस डिलीट नही किया वो एसएमएस
पता नही ये मेरे लिए
ये सुविधा थी या
असुविधा।

©डॉ. अजित

Wednesday, March 28, 2018

बातें

उसनें कहा
जब तुम शर्ट की आस्तीन
फोल्ड कर लेते हो
तब अच्छे लगते हो
मैंने पूछा क्यों?
तुम नजर आते हो आत्मविश्वासी
लगता है हर अड़चन के बाद भी
एकदिन पहुंच ही जाओगे मुझ तक
यह सुनकर मैं हंस पड़ा
और उसनें प्यार से
एक बार और फोल्ड कर दी
मेरी शर्ट की आस्तीन।
***
मैंने पूछा
तुम्हें मैं सबसे खराब कब लगता हूँ
उसने तुरन्त दिया जवाब
जब तुम
शर्ट इन करके उसे मेंटेन करने की
करते हो खराब कोशिश
मैंने पूछा क्यों इसमें क्या खराबी है?
उस वक्त तुम बेफिक्र नही दिखते
इससे बड़ी क्या खराबी होगी
किसी मुलाकात में।
**
उसने कहा
एक खराब आदत बताओं मेरी
मैंने कहा एक नही दो है
मुझे खोने से नही डरती
खुद को पाना नही चाहती
ये तो अच्छी आदत है
उसनें हँसते हुए कहा
मगर तुम्हें पता है
इसलिए मान लेती हूँ
इन्हें खराब।
**
मैंने पूछा
तुम्हारी खुशबू
तुम्हारे बिना भी रहती है आसपास
ये क्या जादू है?
उसनें कहा
ये जादू नही कोई
ये तैयारी है
मेरे बिना रहने की।

©डॉ. अजित

Thursday, March 22, 2018

प्रसंगवश


जब तुम हंसती हो
तब नदी को पहली दफा आता है
समन्दर पर प्यार
वो बादलों से लेती है काला टीका उधार
नदी नही बताती दूसरी नदी को तुम्हारा पता
इसलिए केवल एक नदी के पास है
तुम्हारी हंसी का सही-सही अनुवाद

जब तुम रोती हो अकेले
सबसे छिपकर
रात भूल जाती है अपना समय चक्र
जल्दी आने के लिए
वो भेजती है भोर के घर हरकारा
इसलिए रात के पास नही
भोर के पास है
तुम्हारें आंसूओं की प्रतिलिपि

जब तुम करती हो कोई समझौता
तब झरना उतर आता है
अपने तल पर
वो लगाता है धरती की पीठ पर
अपने हाथ से मरहम
देखता है वेग की हिंसा
मगर लौट जाता है
बिना किसी आश्वासन के  

जब तुम करती हो कोई जिद
तब आसमान तोलता है हवा को
और तय कर देता है उसका मार्ग
इस तरह से धरती का एक हिस्सा
सुलगता है और एक होता है ठंडा एकसाथ 

जब तुम होती हो नाराज़
तब जंगल की तरफ
भागने लगता है शहर
हड़ताल पर बैठ जाते है चौराहे
मनुष्य को पहली बार वास्तव में
महसूस होता है भीड़ का अकेलापन

जब तुम मुस्कुराती हो बिन बात
तब फसल खत्म करती है
अपने कटने का शोक
वो नाचती है अन्न के पहन नुपूर
इस तरह से बिखरती है
धरती पर पहली मांगलिकता

© डॉ. अजित





Wednesday, March 21, 2018

चाहत

मैं चाहता हूँ
तुम पढ़ों  यह बात
एकांत में
सीने से लगाकर

जैसे कोई पढ़ता है
पहले प्रेम का पहला खत
अपनी अधीरता के साथ

कि
प्रेम जब रीत जाता है
तब वो खाली जगह नही छोड़ता है
वो छोड़ता है
एक खाली आकाश

जिसमें उड़ते हुए
कोई तय नही कर पाता है कि
उसे उतरना कहाँ पर है?

मैं भी उड़ता हुआ निकल आया हूँ
इतनी दूर
धरती पर नही मिलेगी मेरी परछाई

मैं चाहता हूँ  जब तुम पढ़ों यह बात
थोड़ी देर के लिए खिड़की पर टिका दो
अपनी कोहनी
और मुस्कुराओ
देखते हुए आकाश

तुम ही न कहती थी
जब कोई धीरे-धीरे आँखों से होता है ओझल
उसकी तस्वीर खींच लेता है आसमान

बस इस तरह से
अंतिम बार तुम्हें नजर आना चाहता हूँ मैं.

©डॉ.अजित

अंतिम बात

एक बात कहनी थी तुमसे
पता नही तुम इस पर कैसे रियेक्ट करोगी
ये जो तुम हंसते हुए हिचकियों की शक्ल में
लेती हो छोटे-छोटे पॉज
ऐसा लगता है जैसे नदी की एक धारा ने
आगे बढ़ने से कर दिया हो इनकार
वो खेलने लगी हो किनारे के पत्थरों के साथ
आईस –पाईस

कभी-कभी तुम कुछ कहते हुए
जब रुक जाती हो अचानक
ऐसा लगता है जैसे कोई पहाड़ी चिड़िया
भटक गई हो घाटी में
हवा का इन्तजार जितना मुश्किल होता है उसके लिए
उतना ही मुश्किल होता है
मेरे लिए उस बात के पूरी होने का  इन्तजार

जब  तुम अपने कंगन को चढ़ा लेती हो आस्तीन तक
और अकेली पड़ जाती है तुम्हारी कलाई
उस वक्त मुझे याद आता है
वो मन्नत का कलेवा
सोचता हूँ कितना अच्छा होता
उसे बाँधा होता मैंने तुम्हारी कलाई पर
इस तरह से भी पूरी होती एक मन्नत

जब तुम कहती हो -सुनो !
मैं तब सुनता नही हूँ बस देखता हूँ सुनना
और इस तरह छूट जाती है
मेरे सपनों की कस्बे वाली आखिरी बस
फिर रात भर मैं भटकता हूँ
अनजान जगह पर दर ब दर
उसी सुबह मुझे आता है एक सपना
जिसमें तुम अपना कहना छोड़कर
सुन रही हो मेरी शिकायतें

तुम्हारे कान की तलहटी में
जब एक लट डाल देती है झूला
तब मुझे लगता है कि इस बार भी
देर से आया है बसंत
तुम संभालती हो खुद को
और बिगड़ता जाता हूँ मैं

तुम्हारे माथे की लकीरों में जब
रास्ता भटकता है ईश्वर
तब मुझे दिखाई देता है वो
किसी भी प्रार्थना से अधिक स्पष्ट
मैंने उसे रास्ता दिखाना चाहता हूँ
मगर ठीक उसी वक्त
आँखें खोल देती हो तुम
इस तरह ईश्वर मेरे जीवन से होता है ओझल

ये कुछ बातें है
जो तुम्हें कहना चाहता हूँ
क्यों कहना चाहता हूँ
जिस दिन इस बात का पता चलेगा
उस दिन कहूंगा जरुर

तुम सुनों या न सुनों तुम्हारी मर्जी.

© डॉ. अजित

Monday, March 19, 2018

बीते समय से संवाद


उसने निर्णय सुनाते हुए कहा
आज के बाद नही मिलूंगी तुमसे
ये एक वादा है खुद से
मैंने कहना चाहता था मगर क्यों?
लेकिन कहा नही
कुछ जवाबों के बदले
सवाल न करना भी
मैंने कभी सिखा था उसी से.
**
उसने कहा
तुम्हारा सच को स्वीकार करने का
हौसला थोड़ा कम है
मैंने कहना चाहता था
तुम इस बार सच कह रही हो
मगर कहा नही
क्योंकि मेरा सच कहने का
हौसला भी था थोड़ा कमजोर.
**
वो चली गई अपनी राह
एकदम चुपचाप
तभी मैंने जाना
किसी के जाने के बाद
उसके जाने के कारण तलाशना
उसके जाने का अनादर करना है.
**
जब भी आती थी उसकी याद
मैं सोच लेता था उसके व्यंग्य
जब वो भूलने को होती थी
मैं याद करने लगता था अपना प्रेम
जब न उसकी याद आती
न वो भूली जाती थी
तब समझता था मैं
अब मुझे याद कर रही है वो.
**
अब जब वो नही है
मैं नही दे सकता
किसी को दोष
समय को भी नही
क्योंकि
उसके जाने के बाद
समय से कोई संवाद नही है मेरा.

© डॉ. अजित

Sunday, March 18, 2018

तर्पण

मैं अपने लिखे हुए से घिर गया
मेरी धूप और छांव के
विकसित हो गए
बेहद विचित्र संस्करण

मुद्दत तक मुझे नही मिल पाया
बाहर का हवा पानी
अपने त्रिकोण में बैठा
मैं इस कदर मग्न था कि
भूल गया
सिमटती जाती है हर दिन
हर निजी धूप और छाँव

जब मैं अपने
लिखे हुए के नीचे दबकर मर गया
तब अक्षरों ने किया मेरा तर्पण
तभी मुझे पता चली यह बात

विस्मृति ही मोक्ष का पहला चरण है।

©डॉ. अजित

Sunday, March 11, 2018

अधूरा सच


मैं सत्य से अवगत हुआ
तो  मेरे भ्रम और बढ़ गए
मुझे लगा अभी बहुत कुछ अज्ञात है

उसको जानकार
पता चल सकता है
जीवन का अंतिम सत्य

इस जानने की प्रक्रिया में
सत्य की परिभाषाएं
कई बार बदली मेरे जीवन में
जानकारी लगने लगी सूचनाएं
धारणाएं लगने लगी पूर्वाग्रह

अज्ञानता कोई महिमामंडित करनी की चीज नही है
मगर ज्ञान और सत्य का नही तलाश पाया
कोई सकारात्मक सह सम्बन्ध

सबके थे अपने अपने सत्य
मैंने सदा देखा अपने सत्य को संदेह की दृष्टि से
इसलिए मैं जिस जिस से अवगत हुआ
उसको लेकर मन में बना रहा हमेशा एक संशय

मैं निष्कर्षों का विज्ञापन नही कर रहा हूँ
मगर जीवन के हर निष्कर्ष का था
सत्य से इतर एक मौलिक पाठ
जो न झूठ था और न था सच

मैं अपने अवगत होने को कर रहा हूँ खारिज
शायद यह अकेली बात है
जो खड़ी है सत्य के पक्ष में.

©डॉ. अजित



Tuesday, March 6, 2018

सलाह

उसने एक बार कहा था
हमेशा ऐसी जगह रहना
जिसके नजदीक
एक नदी बहती हो
मैंने पूछा क्यों
उसने हंसते हुए कहा
इसका जवाब
तुम्हें वो नदी देगी।
**
उसने एक बार कहा था
तुम अगर सीखना तो
करुणा और दया में भेद सीखना
मैंने पूछा क्यों
उसने मुस्कुराते हुए कहा
इसका जवाब
तुम्हारी आत्मा देगी।
**
उसने एक बार कहा था
आत्महत्या का जब भी विचार आए
खेलते हुए बच्चों का शोर सुनना
जीने की तमाम वजहें वहां मिलेंगी
मैंने पूछा अगर न सुन पाऊँ तो
फिर तुम सच में
जीने का हक खो चुके हो
उसने उदास होते हुए कहा था।
**
उसने एक बार कहा था
स्त्री से मत पूछना उसका सुख
और पुरुष से मत पूछना उसका दुःख
मैनें पूछा क्यों
उसने कहा
खुद से पूछना ईमानदारी से
तुम क्या सुनना चाहते हो?
**
उसने कहा था एक बार
जब तुम्हारे पास किसी को खोने के हो
बहाने हजार
और पाने का हो एक भी नही
तब करना एक काम
मैंने पूछा क्या?
तलाशना उस एक बहाने को
किसी को पाने के लिए नही
बल्कि अपने जीवन में
खोने को स्थगित करने के लिए।

©डॉ. अजित

माफी


हालांकि बतौर मनुष्य
ये जीवन बेहद छोटा और नाकाफी है
मगर फिर भी
जिनका भी हुआ है तिरस्कार
मैंने उन्हें लगे लगाना चाहता हूँ
एकबार

कद,रंग,भाषा ,लिंग के कारण
जिसने भी झेली हो जिल्लत
मैं उसके कान में कहना चाहता हूँ
दुनिया की सबसे खूबसूरत बात
मेरी रूचि उनकी मुस्कान में नही
उनकी थकान में है

मैं तोलना चाहता हूँ
उनके कन्धों पर टिका
लोक की अपेक्षा का बोझ
मैं सुनना चाहता हूँ
उनके एकांत की दहाड़

मैं संकलित करना चाहता हूँ
उनकी आत्मसांत्वनाएं
ताकि हारे हुए मनुष्य पढ़ सके उसे
किसी उपनिषद की तरह

जिन लोगों ने झेला है अपमान,भेद और उपेक्षा
उनके हाथों की रेखाएं बांचना चाहता हूँ एकबार
देखना चाहता हूँ
हाशिए पर खिसकी भाग्यरेखा को
किस तरह देखती है हृदय और मस्तिष्क रेखा

मुझे ठीक से पता है यह बात
ऐसे लोग नही है मेरी प्रतीक्षा में
वो आदी हो गए है प्रतीक्षामुक्त जीवन के

मैं मांगना चाहता हूँ माफी
पूरी मनुष्य जाति की तरफ से
भाषा की सायास/अनायास हिंसा के लिए

मुझे उम्मीद है
अंतत: दुनिया भर के अपमानित
और आहत हृदय कर देंगे
हमें माफ़

उम्मीदों की हत्या करके
उम्मीद रखने वाले समूह का
मैं अधिकृत प्रतिनिधि हूँ

इसलिए आखिर में बात कर दी है
खत्म माफी पर

जैसे दुनिया के हर अपराध का
सबसे सुविधाजनक समाधान हो
माफ़ी माँगना
और माफ़ कर देना.

© डॉ. अजित



Monday, February 19, 2018

विदा

उसकी नजरों में मेरी इज्जत बढ़ गई थी
यही कारण था कि
हमें लगता था कि
हम एक साथ नही रहने वाले है अब

विदा का समय
कभी दुबके पाँव नही आता
इसकी पदचाप सुनाई देती है
बहुत पहले से साफ-साफ

ये अलग बात है
उस वक्त हमारे कान लगे होती है
दिल के इर्द-गिर्द

जब हम अलग हो गए
मैं दोहराता रहा यह बात
एक दूसरे की नजरों में
इज्जत कम नही हुई हमारी

यही एक कारण था
अक्सर आता रहा याद हम दोनों को
एक दूसरे का साथ
तमाम अनिच्छाओं के बावजूद.

© डॉ. अजित

Sunday, February 11, 2018

एकबार

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं बांच सकूं
नदी की तलहटी से
लौटते हुए बंसत के खत

और सुना सकूं
हवा को धरती की धूल के
दो प्यार भरे गीत

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं स्वप्न को बचा सकूं
नींद के सघनतम आलोक और
भोर की भूल से

मुझे तुम्हारे गले लगना था एकबार
यह कथन कोई मलाल नही
फिर यह क्या है
तुम बेहतर समझती हो

नींद की बड़बड़ाहट की तरह
मैं दोहराना चाहता हूँ यह बार-बार
मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार।

©डॉ. अजित

गहरा एकांत

उसके जीवन में
मैं अपने जैसा
अकेला नही था
यह बात सालती थी बहुत

न जाने क्यों
मैं यह चाहता था
उसके परिचय के
आंतरिक वलय में
सबसे निकटतम
रहूँ मैं अकेला

उसे यह बात
कभी कह नही पाया
यह मेरे जीवन का स्थायी खेद है

उसके पास नही थे
मेरे लिए सम्वाद का कोई
संरक्षित संस्करण
मैं चाहता था
वो कुछ शब्द रखें बचाकर
केवल मेरे लिए

उन शब्दों को विषय प्यार हो
ऐसा भी कभी नही चाहा मैंने

ऐसा क्यों चाहता था मैं
नही पता मुझे
बस इतना जरूर पता है
उसे भीड़ से घिरा देखकर
महसूस होता था
जीवन का सबसे गहरा एकांत।

©डॉ. अजित

Thursday, February 8, 2018

बसंतराग

बसंतराग
__

बसंत का रंग ग्रे है
पीले रंग का बसंत
अब केवल कविताओं में मिलेगा
जो मन राग की चासनी में डूबे हैं  
वो दृष्टिबंधन के भी है शिकार
वो बता सकते है
हर रंग को पीला
बसंत का रंग ग्रे है
ये बात मुझे उसने बतायी
जिसने कभी रंगो का किया था नामकरण.
**
बसंत पतझड़ की भूमिका है
 कह सकते है बसंत को
पतझड़ का पूर्व पाठ भी
बसंत पतझड़ को नही करता याद
और पतझड़ कभी भूल नही पाता
बसंत.
**
तुमनें कहा
हम इस बसंत में बिछड़ रहे है
तो फिर किस बसंत में मिलेंगे हम
मैंने कहा
बसंत के बिछड़े मिला करते है
केवल पतझड़ में.
**
धरती नाचती है बसंत में
आसमान रोता है बसंत में
दो एक साथ जब
नाचते और रोते है
तब आता है
असली बसंत.
**
कोई देता है उदाहरण
सुनाता है यह गीत
‘मन रे तू काहे न धीर धरे’
मैं बुदबुदाता हूँ
आँखों में एक नमी के साथ
‘शायद आ गया है फिर से बसंत’ .

© डॉ.अजित


हँसना

जो हँसना भूल गए है
उन्हें होती है आपत्ति
हर उन्मुक्त हंसी से

जो पसन्द करते है
निस्तब्धता
उनके लिए हँसना है एक बाधा

हर काल में उन्मुक्त
हँसना माना गया
शिष्टाचार के विरुद्ध

मनुष्य क्या तो चुप था
या रो रहा था
दोनों से किसी ने नही पूछा कारण

मगर जो हँस रहा था उन्मुक्त
उसकी हँसी की, की गई
भांति-भांति की व्याख्याएं

हँसना अपराध नही मगर
अपराध से कम भी नही था
हँसने से हर उस शख्स को थी
एक गहरी आपत्ति

जो कहता था
अनुशासन मनुष्य को महान बनाता है

दरअसल
हर उन्मुक्त हँसी
मनुष्य की महानता में बाधा थी

इसलिए चुप्पी में
तलाशी गई सहमति
और हँसने में महाकाव्य के पात्र

मनुष्येतर लोगों के लिए
हँसना नही बना था
उनके लिए बना था
हँसने पर ऐतराज़ करना

इस बात पर भी
जोर से हँसा जा सकता है
मगर एकांत में।

©डॉ. अजित

Sunday, February 4, 2018

पिता: भाई और बहन

बेजी जैसन की किताब पप्पाको पढ़ते हुए-
--
पुत्र के लिए पिता
पुत्री के लिए पिता से भिन्न होता है
पुत्री पिता की व्याख्या कर सकती है
पुत्र केवल जानता है पिता का व्याकरण

दिवंगत पिता की स्मृतियाँ
दोनों के लिए होती है एकदम भिन्न
पुत्र याद करता है अपने अभाव
पुत्री करती है याद
पिता के समय की सम्पन्नता

पिता जब होते है
जीवन से अनुपस्थित
पुत्र और पुत्री दोनों
उसके बाद आते है
पिता की तरह पेश

इस तरह पिता बने रहते है
जीवन में सदा अबूझ

जब मेरे पिता नही रहे
मेरी बहन का मुझ पर
अविश्वास हो गया गहरा
उसने माना पिता की जगह
कोई नही ले सकता
और मैं तो बिलकुल भी नही

इस दौरान मैं देख पाया
बहन का पिता हो जाना

पुत्र के तौर पर मेरे पास है जो स्मृतियाँ
अवज्ञा उनकी केंद्रीय विषय वस्तु है
पुत्री के तौर पर जो मेरी बहन के पास है स्मृतियाँ
उसमें थोड़ा गुस्सा और अधिक प्यार है

पिता इसी तरह विभाजित है
हम भाई बहन के मध्य

पिता के जाने पर
मेरे अंदर का पिता
अब मेरा पिता बना बैठा है
जो रोज़ देखता है मेरी चाल-ढ़ाल
और होता है थोड़ा खिन्न

जब अपनी बहन से पूछा मैंने
तुम्हें किस तरह आतें है पिता याद
उसनें इस बात का नही दिया कोई जवाब
वो मेरे सामने नही करती कभी
पिता का कोई जिक्र

ये पिता की सबसे सघन याद थी
जो मैंने की महसूस
पिता के चले जाने के बाद.

© डॉ. अजित