Friday, March 17, 2017

अनजान

समन्दर से नदी पूछती है
तुम्हारे तल पर रहती है क्या
तुम्हारी प्रेमिका?

समन्दर कहता है
मैं सतह के अधीन हूँ
नही देख पाता
तल पर कौन रहता है

नदी विश्वास कर लेती है
इस बात पर
और देखना शुरू कर देती है अपना तल

नदी के किनारे पर कौन रहता है
नही जान पाती नदी फिर

नदी का किनारा
समन्दर को नही जानता
मगर फिर भी रहता नाराज़ उससे

समन्दर का तल नदी की प्रतिक्षा करता है
वो नही पहुँच पाती वहां तक

दोनों अपने अनुमानों के सहारे मिलते है
और खो जाते है एकदिन

जानकर अनजान रह जाना
इसी को कहा जा सकता शायद
समन्दर और नदी की ये बात
जो जानता है
वो नही बताता दोनों को
लापरवाही या चालाकी
इसी को कहा जा सकता है शायद।

©डॉ.अजित

Sunday, March 12, 2017

सच झूठ

उसने पूछा
एक सच्चे कम्युनिस्ट का नाम बताओ
एक सच्चे फेमिनिस्ट का नाम बताओ
मैंने कहा
एक सच्चे प्रेमी का नाम बताऊं?
उसने कहा
नही मुझे अपोरचुनिस्ट का नाम नही जानना
क्या प्रेमी अवसरवादी होता है
मैंने प्रतिवाद किया
अवसरवादी तो पूरा कह नही सकती मगर
प्रेमी सच्चा प्रतीतवादी होता है
वो वही सब प्रतीत करवा देता है
जो कभी न रहा हो।

***
क्या तुम फेमिनिस्ट हो
उसने पूछा एकदिन
नही मैं वाक्यों के मध्य अटका ट्विस्ट हूँ
तुम उपयोग कर सकती है
जिसे अपने हिसाब से।

***
तुम्हारी क्या आइडियोलॉजी है?
लेफ्ट,राइट,सेंटर या न्यूट्रल हो
मैं वृत्त की तरह गोल हूँ
जहां से चलोगी वही पर
लौट आओगी एकदिन तुम
तुम इतना सावधान क्यों हो?
नही मैं तो लापरवाह मानता हूँ खुद को
मानते हो मगर हो नही
तुम्हारे हिसाब से क्या हूँ मै?
हिसाब तो रखा नही कभी
मगर पुरूष होने के बावजूद मासूम हो
मासूमियत ही तुम्हारी आइडियोलॉजी है।
***

क्या सुन रही हो आजकल
मैने यूं ही पूछ लिया एकदिन
जगजीत सिंह को
मुझसे बिछड़कर खुश रहते हो मेरी तरह तुम भी झूठे हो...
बिछड़ कर कौन खुश रहता है,मैंने पूछा
वही जो कभी मिले नही हो
और जो मिले हो कभी?
वो झूठ बोलकर खुश रहते है
ख़ुशी यानि झूठ की मांग करती है
मैंने बात बदलते हुए कहा
ऐसा भी नही है, दरअसल
झूठ बोलना सच का हिस्सा होता है कभी कभी
अपना अपना सच
अक्सर अकेले में झूठ बोलता है।

©डॉ.अजित

उत्सव

तुम्हारे अंदर उत्सव को लेकर
कोई उल्लास,उत्साह नही देखा कभी
कितने बोर आदमी हो तुम
जीवन के हर उत्सव को खारिज़ करने के
दार्शनिक तर्क है तुम्हारे पास
दरअसल वो सब भोथरे पलायन है तुम्हारे
तुम खुद से भाग रहे हो
इसलिए चाहते हो एकांत
भीड़ शोर हंसी में तुम्हें खो जाने का भय है
पिछली मुलाक़ात पर
ये सब बातें उसने लगभग एक साथ कही
मैं एक एक का जवाब देना चाहता था
मगर वो इतने प्रवाह में थी उसे सुनना नही था
वो दिन उसके कहने का दिन था
और मेरे सुनने का
जब मैंने अपनी सफाई में कोई दलील न दी
उसे लगा मैं सहमत हूँ उसकी स्थापनाओं से
वो चाहती थी कि उसको गलत साबित करूँ
बहस में नही जीवन में
मैंने कहा मौलिकता की अपनी एक स्वतंत्र यात्रा है
कुछ भी होना या न होना क्षणिक नही
शायद हमारा खुद का चयन भी नही
मनुष्य का हस्तक्षेप एक भरम है
उसका संस्करण निर्धारित होता अप्रत्यक्ष से
बेहद अरुचि से उसने मेरी बातें सुनी और कहा
इतनी भारी भारी बातें मेरी समझ से परे है
शायद तुम जीना भूल गए हो
जीवन बिखरा होता है छोटी छोटी खुशियों में
जिसे खुद ही तलाशना होता है
उम्मीद है एकदिन तुम सीख लोगे तलाशना
बस मेरे खो जाने से पहले तलाश लेना
मैं चाहती हूँ तुम्हारे जीवन में बचा रहे उत्सव
हर हाल में
मेरे साथ भी,मेरे बाद भी।

©डॉ.अजित

Friday, March 3, 2017

खालीपन

मुद्दत तक इतना खाली रहा हूँ मै
यदि कहूँ आज बिजी हूँ थोड़ा
सुनने वाले को लगता है
ये नया झूठ है मेरा
और बेवजह का भाव खा रहा हूँ

मैं सदा उपलब्ध रहा हूँ
फोन पर
असल में
सपने में
चिट्ठी पत्री में

मेरी सदा उपलब्धता
एक क्षेपक की तरह उपस्थित रही जीवन में

इतना खाली और औसत जीवन था मेरा
मेरे पास कई-कई साल नए लतीफे न होते
इतना कम घटना प्रधान  जीवन था मेरा
कि मै इतना ही बता सकता था रोचकता से
फलां दिन इतनी देर से बस मिली थी मुझे

निठल्लेपन के बर्तन में पानी को
शराब समझ कर पीता रहा हूँ मै
मेरी बातों में जो लचक बची है
ये उन्ही दिनों की देन है

मेरे पास कोई किस्सा ऐसा नही
जिस पर किसी को रश्क हो सके
मेरे पास अधिकतम बातें
बेवकूफी भरे सपनें देखने की हो सकती है
सपनों का पीछा करना मुझे कभी नही आया
मैं बदलता रहा हूँ सपनें
देशकाल और परिस्थिति के हिसाब से
जिसके लिए
सपनो ने कभी माफ नही किया मुझे

फोन पर कुछ ही देर में
दो वाक्य जकड़ लेते है
मेरी ज़बान
और बताओ...
सब बढ़िया....
या फिर खिसियाकर हंसने लगता हूँ
ताकि हंसी के शोर बढ़ जाए बात आगे

मैने बनाया खुद को आग्रह के समक्ष कमज़ोर
मीलों की यात्राएं केवल मेल मिलाप के लिए
मतलब की बात पर सिल गए होंठ
मैसेज भेजकर मांगे पैसे उधार
और भी किस्म किस्म की मदद

दोस्तों में रहा चिट्ठीबाज़
जताई सारी नाराज़गियां
खतों के जरिए

दरअसल,
मैं उपलब्ध था
मैं उपस्थित था
मैं तत्पर था
मैं कतार में था
मैं विचार में था
मैं व्यवहार में था

इन सब का एक अर्थ यह भी था
मैं अपने खालीपन के साथ
अपने संपर्कों के प्यार में था

जिसे कुछ समझ पाएं
और कुछ नही
जो नही समझ पाएं
उनसे कोई शिकायत नही मुझे
उन्होंने मुझे चुना या मैंने उन्हें
इनसे ज्यादा जरूरी यह था
मुझे वक्त ने चुना था
सुनने के लिए

सुनाने के विषय सदा से कम रहे मेरे पास
इस बात का खेद है मुझे
मेरी अनुपस्थिति में
शायद ही किसी को याद आता हो
मेरा कोई किस्सा

मैं लोगो के जीवन में शामिल रहा
एक कविता तरह
इसलिए भी लोगो के जीवन में
कहानी की तरह याद नही
कविता की तरह विस्मृत रहा हूँ मै।

©डॉ.अजित

Thursday, March 2, 2017

दौर

ये एक ऐसा दौर है
जब आप दो जमा दो कहते हुए भी मारे जाएंगे
और दो जमा दो पांच कहते हुए भी
उल्लास के शोर में हिंसा छिपी है
और देशभक्ति अब बेहद लोकप्रिय चीज़ है
इतनी लोकप्रिय कि
आपके चुप्पी भरे डर को भी देश के खिलाफ
समझा जा सकता है

इस दौर में जो
लिख और बोल रहे है
उनके परिजन विश्व के सबसे अशान्त नागरिक है
वो चाहते है कि चुप रहना सीखना चाहिए
चाहिए में फिर भी एक आग्रह हो सकता है
मगर अब चुप रहना सीखना पड़ेगा
इस बात की ध्वनि आदेशात्मक है

पिछले दिनों में
बदल गए है बहुत से व्याकरण
असुविधा अब एक समिधा है
आप कितने ही नास्तिक क्यों न हो
आपका यज्ञ में शामिल होना अनिवार्य है

झूठ बोलने पर अब खेद का प्रावधान नही है
सच बोलने पर सजा तय है
भीड़ है जयकारा है और सब कुछ
सही होने की एक उपकल्पना है

जबकि
इस दौर में सब कुछ सही नही है
इसी दौर में
कवि को लहुलुहान कर देता डीटीसी का कंडक्टर
क्योंकि कवि को था
सार्वजनिक जगह पर मूतने पर ऐतराज़

दरअसल
ये हर ऐतराज़ पर मूतने का दौर है
जिसमे कमजोर आदमी का घायल होना लाज़मी है
देश के पुनर्निमाण में
वैसे ही कमजोर आदमी की जरूरत नही होती

इस दौर में देश मजबूत हो रहा है
और आदमी कमजोर
मगर हमें इस पर कोई खेद इसलिए नही है
हम उम्मीद से भरे लोग है
इतनी उम्मीद से भरे कि
मनुष्य को मनुष्य के खिलाफ संगठित करते समय
भूल जाते है हर किस्म का डर

इस दौर में घृणा प्रेम से बढ़कर स्वीकृत है
इतनी स्वीकृत कि
बसन्त में पतझड़ पर हम लिख सकते है कविताएं
विलाप में सुन सकते है तान
बलात्कार को सिद्ध कर सकते है प्रतिशोध का साधन

इन बातों में कोई नूतनता नही है
सब जानते है इन्हें
महसूसते सब है अपने आसपास
मगर कोई कहेगा नही
मैं कह रहा हूँ तो एक जोखिम को दे रहा हूँ निमंत्रण
मैं चाहता हूँ मेरे बाद
दस्तावेज़ में दर्ज हो ये दौर
जब आदमी को आदमी पर भरोसा कम है
आदमी का भरोसा चमत्कार का दास है अब

चमत्कार को नमस्कार करना
नही सीख पाया आजतक
तभी लिख कर ये सब
मिटा रहा हूँ अपना डर
दरअसल
ये भयभीत होने का दौर है
जिसके लिए लिखनी पड़ी है
मुझे इतनी लम्बी चौड़ी भूमिका।

©डॉ.अजित

निराश

प्रार्थनाओं से निराश व्यक्ति
जब करता है प्रेम
वो सबसे पहले खारिज़ करता है
प्रेम के दिव्य संस्करण को

ईश्वर या कोई भी ईश्वरीय चीज़
भरती है उसके अंदर एक गहरी खीझ
मनुष्य के शिल्प में नही देखना चाहता वो
चार ऐसे हाथ जो एक भी काम न आए बुरे वक्त पर

वो नही पड़ना चाहता
प्रेम के लौकिक और अलौकिक संस्करण में
वो महसूसता है कामनाओं का ताप
और विरह के जरिए मुक्ति एक साथ
वो तत्कालिकता का होता है ऐसे अभ्यस्त कि
नही बाँध पाता खुद को किसी चमत्कार की आशा में

निराश वैसे एक नकारात्मक शब्द समझा जाता है
मगर प्रार्थनाओं से निराश व्यक्ति
जब करता है प्रेम
वो मनुष्यता को देता है सबसे गहरी उम्मीद
इसी उम्मीद के सहारे
दिख और मिल जाते है ऐसे प्रेमी युगल

जिन्हें देख बरबस मुंह से निकल सकता है
'ईश्वर ने ऐसा कैसे होने दिया भला'

©डॉ.अजित

Monday, February 27, 2017

सपनें

इनदिनों मुझे उसकी कोई बात
अच्छी नही लगती
वो सलाह देती है तो
नसीहत जैसा महसूस होता है
वो उत्साह के साथ कुछ शेयर करती है तो
मैं अनमना होकर
चस्पा कर देता हूँ एक यांत्रिक स्माइल
फिल्मों,किताबों,यात्राओं को लेकर बोलता हूँ झूठ
बिलकुल निठल्ला हूँ
फिर भी अभिनय करता हूँ अति व्यस्त होने का

ये बात उसे भी ठीक ठीक पता है
अब पहले जैसा नही रहा हूँ मै
हैरत ये उसने ऐसा कभी कहा नही
वैसे जिस दिन वो कहेगी भी
उसका भी जवाब है मेरे पास

मैं दार्शनिक हो कहूँगा
आजकल खुद के साथ नही हूँ मैं
इस जवाब से उसे रत्ती भर फर्क न पड़ेगा
वो जानती है मेरी मासूमियत और चालाकी
वो जान लेगी मेरी तमाम अनिच्छाएं
उसका धैर्य किसी
विकल्पहीनता की उपज नही है
फिर भी वो कर सकती है मेरा
जन्म जन्मान्तर तक इंतजार

मैं उससे कह सकता हूँ
अपना सारा सच बे लाग लपेट के
वो इसे सुन सकती इसे एक घटना के तौर पर
वो मेरे बारे में कोई राय कायम नही करती
ये मेरे लिए अच्छी बात है

इनदिनों वो मुझे अनमना देख
गाहे बगाहे पूछ लेती है एक बात
सपनें आना अच्छी बात है या खराब
मैं कह देता हूँ
सपनें आना खराब है
और देखना अच्छी बात।

©डॉ. अजित

Saturday, February 18, 2017

आख़िरी कविता

मेरे शब्दकोश से क्षुब्ध होकर
अरुचि का शिकार हो जाएंगे
एकदिन लोग

पुनरुक्ति को देख वो समझ लेंगे
इसे मेरा स्थाई दोष
नही रहेगी मेरी बात में कोई नूतनता
हर दूसरे दिन खुद को खारिज़ करता जाऊँगा मैं

शब्दों से छनकर बह जाएगी सारी सम्वेदना
शिल्प के खण्डहर में अकेले होंगे अनुभव
तब कहने के लिए नही बचेगा
मेरे पास कुछ भी शेष
मौन रूपांतरित हो जाएगा निर्वात में

इतनी नीरवता में मेरा चेहरा देखकर
जिन्हें याद आएंगी कुछ मेरी पुरानी कविताएं
उनका प्रेम देख शायद रो पडूंगा मैं

कवि के तौर पर
यह मेरी आख़िरी अशाब्दिक कविता होगी।

©डॉ.अजित

Tuesday, February 14, 2017

संवाद

प्रेम में अपदस्थ प्रेमी
से जब पूछा मैंने
अपना अनुभव कहो
उसने कहा
मेरा कोई अनुभव अपना नही
प्रेम के बाद कुछ अपना बचता है भला?

मैं इस बात पर हंस पड़ा
उसने कहा तुम प्रेम के अध्येता हो
प्रेमी नही
मैंने कहा आपको कैसे पता
प्रेम में कोई दुसरे की बात पर हंसता है भला?

अब मै थोड़ा उदास हो चुप बैठ गया
अब तुम पात्रता अर्जित कर रहे हो
मुझे सुनने की
मगर मै जो कहूँगा वो मेरा होगा
यह संदिग्ध है
मेरे बारे में पूछना तो उससे पूछना
जिसे मै याद हूँ भूलकर भी

मैंने कहा आप क्या बता सकेंगे फिर?
मैं बता सकूंगा सिर्फ इतना
मैंने जीना चाहा तमाम अभाव और त्रासदी के बीच
मैंने पाना चाहा तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
मैंने बाँट दिया खुद को कतरा कतरा
मैंने खो दिया उसको लम्हा लम्हा
इस बात पर मुझे पुख़्ता यकीं है
वो साथ है भी और है भी नही।

©डॉ.अजित

Friday, February 10, 2017

देव

हो सके तो सम्बोधनों के
षडयंत्रो से बचना
पति को देव कहने से बचना

देव आदर्श भरी कल्पना है
मिथको से घिरी एक अपवंचना है
मनुष्य जब देवता बताया जाता है
फिर वो कर देता है इनकार
मनुष्य को मनुष्य मानने से
समझने लगता है खुद को चमत्कारी

प्रेम की चासनी में लिपटे
बहुत से चमत्कार तुम समझ न पाओगी
आत्म गौरव को देवत्व के समक्ष बंधक पाओगी
साथी के तौर पर कोशिश करना
तुम्हारा साथी मनुष्य रहे
और तुम्हारा साथ उसे बनाए
और एक बेहतर मनुष्य

यदि तुमनें एक बार उसे बना दिया देव
फिर वो भूल जाएगा कमजोरियों पर माफी माँगना
सीख लेगा वो अधिपत्य घोषित करना
एकदिन तुम्हें बता देगा तुम्हारी ही नजरों में
सबसे निष्प्रयोज्य
घोषित कर देगा अपनी कृपा का घोषणापत्र

मत मानना पुराणों के शब्द विलास
गढ़ना अपने सह अस्तित्व का शब्दकोश
समझना और बरतना बराबरी के सुख दुःख
मत कर देना खुद को प्रस्तुत
देवता के स्वघोषित साम्राज्य में दास की तरह

प्रेम में एक बार देव कहोगी
दुःख में भूल जाओगी असल के देवता को भी
दरअसल
देवता कोई नही होता है
असल के देवताओं के भी अनन्त किस्से है छल के

पति को देव बनाना
उस छल को निमंत्रित करना है
जिसकी शिकायत किसी से नही कर सकोगी
और यदि करोगी भी
सारी सलाह और समायोजन तुम्हारे हिस्से आएगी
दब जाओगी जिसके बोझ तले असमय

पति का एक नाम है
उसी नाम से पुकारना
देव कहने से बैचेन होगा असल का पति
खुश होगा देव बनने को बैचेन पति

बस यह सूत्र रखना याद
और तय करना प्रिय पति का संबोधन
बतौर माँ यही
आख़िरी सलाह है मेरी।

© डॉ.अजित

Monday, February 6, 2017

कमजोरी

मैंने कहा मेरी अंग्रेजी कमजोर है
ये बात मैंने कमजोरी से ज्यादा
ताकत के तौर पर इस्तेमाल की अक्सर
अंग्रेजी पढ़ते वक्त हिंदी में सोचता
तो गड़बड़ा जाते सारे टेन्स
इज एम आर वाज़ वर लगते मुझे दोस्त
उनके साथ आई एन जी जोड़
छुड़ा लेता था अक्सर अपना पिंड
यह मेरी अधिकतम अनुवाद क्षमता थी

एक्टिव वॉयस और पेसिव वॉयस का भेद
मुझे आजतक नही समझ पाया
मै क्रिया कर्ता कर्म तीनों को समझता रहा
मुद्दत तक एक ही कुनबे का

भाषा को लेकर हमेशा रहे मेरे देहाती संकोच
मैंने साइन बोर्ड पढ़कर याद रखे रास्ते
इस लिहाज से अंग्रेजी काम आई मेरी
कुलीन जगह पर अंग्रेजी बोलने के दबाव के बावजूद
मैंने हिंदी को चुना
चुना क्या दरअसल मैंने चुप रहने का नाटक किया
क्या तो प्राइस टैग पलटता रहा
या मेन्यू देखता रहा बिना किसी रूचि के
ऐसे मौकों पर दोस्तों ने बचाई जान
उनके सहारे मेरा सीना तना रहा
ये अलग बात है कभी वेटर तो कभी सेल्स पर्सन
भांप गया ऑड और एवन में मुझे बड़ी आसानी से

ये बातें मैं अतीत का हिस्सा बताकर नही परोस सकता
ना ही अपने किसी जूनून का विज्ञापन कर सकता
मै जीता रहा भाषाई अपमान के मध्य
अपनी स्वघोषित अनिच्छा का एक बड़ा साम्राज्य
मैंने लूटे अक्सर भदेस होने के लुत्फ़

यहां जितनी बातें की उनकी ध्वनि ऐसी रखी
जानबूझकर कि लगे सीख गया हूँ
ठीक ठाक अंग्रेजी अब
मगर सच तो ये है
आज भी मुझसे कोई पूछे
जूतों के फीते की स्पेलिंग
मै टाल जाऊँगा उसकी बात हंसते हुए

कुछ और भले ही न सीखा हो मैंने
मगर मैंने सीख लिया है
अज्ञानता को अरुचि के तौर पर विज्ञापित करना
अंग्रेजी की तो छोड़िए
इस बात के लिए मुझे हिंदी ने
माफ़ नही किया आज तक

मेरी वर्तनी में तमाम अशुद्धियां
हिंदी की उसी नाराज़गी का प्रमाण है
जिनसे बचता हुआ आजकल
मैं खिसियाते हुए ढूंढ रहा हूँ
एक बढ़िया प्रूफ रीडर
जो कम से कम मेरा दोस्त न हो।

©डॉ.अजित

Sunday, February 5, 2017

रिहाई

जाओ !
एक नफ़ासत से जुदा हो जाओ
तल्खियों को यतीम कर दो
हो सके तो इस विदाई को हसीन कर दो

मैंने चुन लिए चंद मासूम लहजे
मैं बुन रही हूँ ख्यालों की रेशमी डोर
मै कात रही हूँ यादों के चरखे पर
अच्छी बातों का सूत
जिनके भरोसे पोंछा जा सकेगा
आषाढ़ की भरी उमस में पसीना

नही मुझे कोई शिकायत नही तुमसे
ये कोई बड़प्पन नही
ना ये दिखावे की ख़ुशी की कोई नुमाईश है
दरअसल जब जाना ही तय हुआ है
मैं चाहती हूँ तुम जाओ
सावन के बादल की तरह
जनवरी की धूप की तरह
इतवार की छुट्टी की तरह

आओ ! तुम्हारे माथे पर
एक शुष्क बोसा चस्पा कर दूं
तुम्हें इतने नजदीक देख
अब साँसे तरल न रह सकेंगी
दरअसल ये महज एक बोसा नही
ये दो अलग टापूओं का नक्शा है
रिहाई और विदाई यहीं भटका करेगी
आज के बाद

जाओं !
अब कोई पुकार नही शामिल
तुम्हें मुड़ते हुए देखना चाहती हूँ
उस मोड़ से
जहां चौराहे छोड़ देते है रास्तों का साथ
मुसाफिर जहां असमंजस के साथ
बदल लेता है रास्ता
इस उम्मीद पर
वो पहुंच जाएगा एकदिन कहीं न कहीं

यही मैं चाहती हूँ
तुम पहुँच जाओं कहीं न कहीं
बस अब यहां नही।

© डॉ.अजित

Sunday, January 29, 2017

विकल्प

यात्रा का आरम्भ बिंदु
होता है बेहद कोमल निस्पृह और पवित्र
फिर विकल्प उपस्थित होते है आसपास
कौतुक की शक्ल में

यही से होता है आरम्भ चयन भेद विशेषण का
विकल्प एक सुविधा है
जिसकी असुविधा व्याप्त रहती है दूर तक

शब्द भाव संवेद जब होते है हस्तांतरित
संकल्प मुस्कुराता है विकल्प की चालाकी पर
विकल्प देता है हौसला हंसी के प्रतिउत्तर में

ये नही वो तो सही
बहुत है अभी चमन में दीदावर।

© डॉ. अजित

ग्लानि

कुछ दिनों से
उससे खिंचा खिंचा सा रहता हूँ
मेरे जवाबों मे तल्खियां रहती है
जानता हूँ सब बेवजह की है
मगर
उसको एक सिरे से खारिज़ करता चला जाता हूँ

किसी को खारिज़ करना सुखप्रद हो सकता है
मगर उसको खारिज़ करके
हमेशा गहरे पश्चाताप से गुजरता हूँ
हैरत इस बात की है
ये पश्चाताप मुझे बदलता नही है

मुझे कोई नाराजग़ी नही है
मैं खुद से भी खफा नही हूँ

दरअसल
क्यों कर रहा हूँ ये सब
मुझे खुद पता नही है

इसलिए लिख कर कम कर रहा हूँ
अपनी ग्लानि
ग्लानि केवल लिख रहा हूँ
महसूस करते समय बंद कर लेता हूँ दरवाजा

जहां मुझे कोई नही देख रहा
वहां तुम देख रही हो मुझे

मैं छिपने के लिए जगह तलाश रहा हूँ
यह कविता उसी जगह की तलाश के नाम
की गई एक ज्यादती है।

© डॉ.अजित

Thursday, December 29, 2016

शुभकामना

मत भेजना नए साल पर कोई शुभकामना
जिस साल में तुम न हो
वो नया कैसा हुआ भला

भले नए साल कई महीने बीतने पर
कर देना अचानक से विश
जैसे आईस-पाईस में बोल दिया हो ‘धप्पा’

मत भेजना कोई धुंध में लिपटी शुभकामना
फॉरवर्ड किए संदेशो से उकताया हुआ मेरा मन
नही पढ़ सकेगा तुम्हारा कोई मैसेज

और पढ़कर भी क्या करना है
जब फिलहाल शुभकामना के बदले
शुभकामना नही मेरे पास

इनदिनों मैं प्रार्थनाओं में व्यस्त हूँ
ईश्वर से मांग रहा हूँ रोज़ माफियाँ
न किए गए गुनाहों की भी
मुझे माफ़ी मिले न मिले कोई बात नही
मुझे कोई अफ़सोस न होगा इस पर  

मगर
नए साल पर तुम्हें देखना चाहता हूँ
बेवजह खुश

जब जब तुम किसी कारण से खुश हुई हो
उस ख़ुशी ने ली है हमेशा एक बड़ी कीमत
नये साल पर मत भेजना मुझे कोई शुभकामना
यदि हो सको हो
हो लेना बस एक बार बिना वजह खुश

ईयर न्यू हैप्पी
तभी सीधा पढ़ सकूंगा मैं.


डॉ. अजित 

रास्ता भूल

मैं कही खो गई हूँ शायद
शायद इसलिए कहा
क्योंकि
अब मै पता नही पूछ रही हूँ
पता पूछने वाला
जरूर एकदिन कहीं पहुँच ही जाता है
मुझे जहां या कहां जाना था
ये मैं ठीक से शायद बता भी दूं
मगर क्यों जाना था
ये बता पाना मुश्किल होगा मेरे लिए

अनुमानों के जरिए एक चित्र बनाती हूँ मै
चित्र में शायद जोड़ रही हूँ क्योंकि
रास्ता भूलने के कारण
चित्र की ध्वनि लग सकती है
कुछ कुछ मानचित्र जैसी

उस चित्र में मैं हूँ तुम हो
मगर कोई दृश्य नही है
मसलन इस चित्र की कोई मनोदशा नही है
ये रास्ता भूले किसी दूसरे मुसाफिर से नही मिलवाता
यदि ऐसा करता तो शायद
मैं हंसते हंसते रो पड़ती
मैं नाचते हुए उदास न होती

मैं रास्ता भूल गई हूँ
मैं कहीं खो गई हूँ
ये फ़िलहाल मुकम्मल बयान है मेरे लिए
जिसकी पुष्टि के लिए
कविता की शक्ल में जगह जगह
'शायद' टांक दिए है
किसी पार्टी वियर फॉर्मल शर्ट के एक्स्ट्रा बटन की तरह

मैं रास्ता भूल गई हूँ
इसलिए औपचारिक होकर मिटा रही हूँ
अपना थोड़ा भय
थोड़ा अपराधबोध

बुरा मत मानना यदि मै पूछूं कई बार
कैसे हो !
वैसे भी
जो रास्ता भूल जाए
उसकी बात का क्या बुरा मानना भला।

©डॉ.अजित

Wednesday, December 28, 2016

झूठ

झूठ सिर्फ मैं प्रेम में बोलूंगी
इतना भर झूठ कि
तुमसे नफरत और प्रेम
एक साथ किया मैंने
रख दूंगी
छटांक भर मुस्कान
गुमशुदा चेहरे पर
ताकि मुझे खुश देख
तुम महसूस कर सको
आसपास बिखरी छोटी छोटी खुशियां
प्रेम में इतना झूठ जरूर बोलूंगी
तुम्हें कितनी दफा
भूलने के लिए संकल्प
मगर नही भूल पाई कभी
प्रेम में झूठ बोलना जरूरी है मेरा
क्योंकि
प्रेम में बोला गया सच
एकदिन शापित होता है
झूठ बन जाने के लिए।

© डॉ.अजित

Tuesday, December 20, 2016

उम्मीद

कविताएं
जो सुनानी थी
खत जो दिखाने थे
फोटो जो साथ क्लिक करने थे
छूटे हुए सपनें जो गिनाने थे

जिंदगी के ऐतबार पर
किस्सों को बुनना था
कुछ बिखरे हुए हिस्सों को
हंसते हुए रोज़ चुनना था

काम सब के सब अधूरे रहे
कहे अनकहे ख्याल सब लौट आए
मुझ तक देर सबेर

तुम्हारा पता सही था
खत भी खुले थे
डाकिया भी भरोसे का था

बस तुम अनुपस्थिति थी चित्र से
तुम्हारी अनुपस्थिति की तह बना रख ली है
एक धुंधली सम्भावना की शक्ल में

उम्मीद मनुष्य को बार बार निराश होने के लिए
प्रशिक्षित करती है
मैं उम्मीद की शक्ल में देखता हूँ तुम्हें

निराशा इसलिए सबसे अधिक प्रिय है मुझे।

©डॉ.अजित

Sunday, December 18, 2016

तुम बिन

तुम मेरे जीवन में
पूर्ण विराम थे
आधे अधूरे वाक्य
और प्रश्नचिन्ह के बाद
अनिवार्य थी तुम्हारी उपस्थिति
तुम्हारा बिना अर्थ छूटे सब अधूरे
बिगड़ा जीवन का व्याकरण
अब कोई यह तय नही कर पाता
मुझे पढ़ते हुए
उसे कहाँ रुकना है।
*****
तुम मेरे जीवन में
अवसाद की तरह व्याप्त थे
तुम्हारे बिना लगता था खालीपन
तुम रह सकते थे
सुख और दुःख में एक साथ
तुम्हारे बिना
सुख और दुःख में मध्य अटक गया मै
इसलिए
नजर आता हूँ
हंसता-रोता हुआ एक साथ।
***
दो दिन से मुझे बुखार है
माथे पर रखा हाथ याद आता है मुझे
ताप जांचता हूँ गालों को छूकर
आँखों बंद करता हूँ तो
नजर आती हो तुम नसीहतों के साथ
बीमार हूँ मगर खुश  हूँ
ये खुशी
तुम्हारी बात न मानने की है।
***
उन दिनों और इन दिनों में
ये एक बुनियादी फर्क है
अब बुरा लग जाता है
बेहद मामूली बातों का
तुम्हारे बिना खुद को बचाना पड़ता है
दुनिया और उसकी धारणाओं से
तुम्हारे साथ लड़ना अनावश्यक लगता था
उन दिनों अनायास लापरवाह था
इन दिनों सायास सावधान हूँ मैं।

© डॉ.अजित 

Saturday, December 10, 2016

सर्दी की बातें

बहुत दिन बाद उसने पूछा
कैसे हो?
मेरे पास इस सवाल का
एक अस्त व्यस्त जवाब था
इसलिए मैंने कहा
बिलकुल ठीक
उसके बाद
बहुत दिनों तक हालचाल नही पूछा उसने
सम्भवतः वो समझ गई थी
बिलकुल ठीक के बाद
मुद्दत लगती है सब कुछ ठीक होने में।

***
परसों उसका फोन आया
जब तक फोन जेब से निकाला
फोन कट गया
इसका एक अर्थ यह लगाया मैंने
वो उसी क्षण चाहती थी मेरी आवाज़ सुनना
लेशमात्र का विलम्ब शंका पैदा कर गया होगा
जैसे ही कॉल बेक के लिए फोन किया टच
दूसरा फोन आ गया अचानक से
इस तरह टल गया मेरा भी वो क्षण
जब कुछ कहना था मुझे
प्रेम में टलना एक बड़ी दुर्घटना थी
ये बात केवल जानता था हमारा फोन।
***
उस दिन मैंने मजाक में कहा
प्लास्टिक मनी नही मेरे पास
वरना कॉफी पिलाता तुम्हें
उसने हंसते हुए कहा
अच्छा है नही है तुम्हारे पास
वरना कॉफी नही
शराब पिलाने के लिए कहती तुमसे
मैंने कहा यूं तो कैशलैस एक अच्छा अवसर हुआ
उसने उदास होते जवाब दिया
जब तुम होपलैस हो
फिर कोई अवसर अच्छा कैसे हो सकता है?
***
लास्ट दिसम्बर की बात है
एक धुंध भरी सुबह
उसने कहा
मौसम को चिढ़ा सकते हो तुम
मैंने कहा वो कैसे?
उसके बाद उसने मुझे गले लगा लिया
और हंसने लगी
उस हंसी के बाद
दिसम्बर उड़ गया धूप बनकर
पहली बार हंसी के बदले
मुझे सूझ रहा था
केवल मुस्कुराना।

© डॉ.अजित

Friday, December 9, 2016

माया

कॉपी पेस्ट
वहां की उत्कृष्ट रचनात्मकता थी
और शेयर करना अधिकतम कृतज्ञता
ब्लॉक करना दण्ड का अधिकतम रूप था
फ्रेंड बनाकर अन्फ्रेंड करना
तकनीकी का मानवोचित प्रयोग
फेक प्रोफाइल अय्यारी का स्कूल था
जिसमे दीक्षित होते दोनों
ब्लॉक करने वाले भी
ब्लॉक होने वाले भी
चित्रों की निजता बचाए रखने के लिए
एक मात्र उपाय ओनली मी था
जिसे करने वाला खुद पर गुस्सा होता था पहले
वायरल वीडियो और वायरल पोस्ट
दोनों बीमारी नही थी मगर बीमारी से कम भी न थी
लाइक और दिल में महज इतना फर्क था
दोनों को उलटा समझ लिया जाता था कभी कभी
इनबॉक्स मंत्राणाओं यातनाओं और परनिंदा के शिविर थे
जहां घायल योद्धा अचेत बड़बड़ाते रहते थे
यह पहली ऐसी आरोग्यशाला थी
जहां बीमार करते थे बीमार का इलाज़
वो पश्चिम के एक युवा का अंतरजाल पर षड्यंत्र था
जिसमें बुरी तरह फंस गए थे पूरब के लोग
दक्खिन के लोग हसंते थे
उत्तर के लोग रोते है ये सब देखकर
वो फेसबुक थी जिसका उच्चारण स्त्रीलिंग था
मगर जिस पर पसरा था टनों पुल्लिंग का अहंकार
पुराणों और सत्यनारायण की कथाओं से ऊबी औरतें देख रही थी वहां औसत मनुष्य का दैवीय खेल
उनका हंसना रोना महज दर्शकीय प्रतिक्रिया न थी
मंच का नाम जरूर था
मगर खेल जाते थे वहां रोज नाटक नेपथ्य में
सबके पास थे अपने अपने सच के अलौकिक संस्करण
वो मायावी दुनिया कतई नही थी
वहां के लोग मगर मायावी थे
इतने मायावी कि
ये पहचाना मुश्किल था
कौन सी प्रोफ़ाइल एक्टिवेट होकर भी
डिएक्टिवेट थी
और कौन सी डिएक्टिवेट होकर भी
एक्टिवेट।

© डॉ.अजित

Thursday, December 8, 2016

निकलना

हंसी तुमने देखी है हमारी
मगर हम रो कर निकले है

जितना हासिल किया तुमने
उतना हम खो कर निकले है

धूप में भी छांव मिल जाएगी
बीज एक हम बो कर निकले है

पहुँच ही जाएंगे खत सब पते पर
ख्याल  दिल भिगो कर निकले है

कोई रहता था हमेशा वहां
जहां से हम हो के निकले है

©डॉ.अजित

Tuesday, December 6, 2016

गजल

पहले कह देता था
अब कहता नही हूँ

मान लो आदमी हूँ
कोई खुदा  नही हूँ

बेखबर हूँ थोड़ा सा
तुझसे जुदा नही हूँ

रो नही सकता अभी
खुद पे फ़िदा नही हूँ

बिछड़ नही सकता
तुमसे मिला नही हूँ

थोड़ी सी पीने दो
अभी खुला नही हूँ

© डॉ.अजित

Monday, December 5, 2016

ईश्वर

कुछ सवालों के जवाब
इसी जन्म में पूछे जाने चाहिए ईश्वर से
नही कर देना चाहिए उसे दोषमुक्त
प्रारब्ध के नाम पर

क्यों मर जाता है वो पिता
जिसकी जरूरत सबसे अधिक उसके बच्चों को है?
क्यों पराजित होता जाता है
एक सीधा सच्चा इंसान हमेशा

रोटी पर पहला हक क्यों नही उसका
जिसका सबसे ज्यादा पसीना शामिल है उसमें
क्यों कुछ लोग तय कर देते है
भीड़ का भविष्य बिना उनकी रायशुमारी के

दुःखो से ऐतराज़ नही
मगर क्यों मिलते है ऐसे अकथनीय दुःख
जिनका कोई उपचार नही

कब तक ईश्वरीय सत्ता के भरोसे
अपने प्रश्न टालता रहेगा
एक मजबूर हैरान परेशान मनुष्य
कब तक धर्म और आध्यात्म के नाम पर
गलत ठहरा दिया जाएगा
उसके बेहद बुनियादी और जरूरी सवालों को

कैसा लगता होगा उस दयालु ईश्वर को
जब मनुष्य को देखता होगा बेबस और मजबूर
यदि वो न्याय कर रहा पूर्वजन्मों के कर्मो से

तो
इस जन्म में मैं खारिज़ करता हूँ
ईश्वर का दयालु होना

ईश्वर दयालु नही बेहद चालाक है
वो हमेशा छोड़ना चाहता
उसको पूजने के कारण
भले ही इसके बदले
घुटकर मर जाए
एक सीधा सच्चा आदमी बेवजह

ईश्वर पर सवाल खड़े करने के लिए
भले दण्डित किया जाए मुझे
मगर बतौर इंसान मुझे ईश्वर का चरित्र लगता है
हमेशा संदिग्ध
उसका न्याय का दर्शन नही आता समझ
खोखली लगती है आस्था की तकरीरे
कई बार ईश्वर लगता है
मनुष्य से ज्यादा मजबूर और असुरक्षा से घिरा

मनुष्य के कष्ट
उसके शाश्वत बने रहने का
एक मात्र उपाय है।

© डॉ.अजित

Sunday, November 27, 2016

घर

उस घर में रंग बिरंगे तकिए थे
परदों का था अपना वास्तु शास्त्र
खाने की मेज़ और पढ़ने की मेज़ पर
चीनी और कोरियाई खिलौने अलग-अलग थे

किताबें वहां ऐसी सजी थी
मानों मुद्दत से वे देख रही हो
मनुष्यों के बेवकूफियां

घर के तौलिए अनुशासन में गीले थे
कोई नही गिन सकता था उनकी सिलवटें
फ्रिज के नजदीक टंगा था
बी पॉजिटिव रहने का एक निस्तेज विचार
किसी महंगी पेंटिंग की शक्ल में

उस घर के बर्तन जरूरत से ज्यादा भारी थे
उनमें थी अजीब किस्म की भारी खनक
जिसे सुन भूख मर जाती थी आधी
पानी पीते हुए लगता था डर
पानी पीने आवाज़ बिगाड़ न दे घर की शान्ति

मेहमान उस घर का बहुप्रतिक्षित व्यक्ति जरूर था
मगर वो भेद नही कर पाता था
कौन असल में मालिक है और कौन मेहमान
वो कोशिश करता बैठे रहने की
बिना दायीं टांग को हिलाए

उस घर में दरअसल कई घर थे
मेहमान की शक्ल में
इसकी खबर असल घर को थी
मगर घर के मालिक को बिलकुल भी नही थी

वो हाईजीन जैसी
छोटी छोटी बातों से बहुत खुश था
उसकी खुशी झलकती थी बातों में

मैनें जब दुःख पर बातें करना चाही
उसने कहा कौन दुखी नही इस दुनिया में
जबकि मैं दुनिया की नही उसकी बात कर रहा था

उस घर में दुःख और सुख की नही
किसी तीसरी मनोदशा पर बात की जा सकती थी
तब मुझे वो घर लगा थोड़ा सा मायावी

डर के मारे नही जाता उस घर कभी
मगर वो घर अक्सर करता है मेरा पीछा
जबकि मेरे पास नही है कोई भी छिपी हुई बात
तीसरी मनोदशा पर।

© डॉ.अजित