Sunday, June 25, 2017

मोक्ष

मैं भूल गया उन लोगों को
जिनसे मैनें दुःख में पूछा था हालचाल
मेरे पास उनकी अस्थाई समस्या के
स्थाई समाधान नही थे
फिर भी मैनें दार्शनिक होकर कहा
बुरा वक्त है बीत जाएगा

जबकि जानता था मैं
वक्त न बुरा होता है और न अच्छा

मुझे याद है वे लोग
जो अपनी खुशी में करना चाह रहे थे
मुझे शामिल
मैनें झूठे उत्साह के साथ उन्हें दी
बधाई और शुभकामना एक साथ
इन दो शब्दों से उन्होंने मुझे शामिल समझा
और इन्ही दो शब्दों से मैंने खुद को अनुपस्थित

दोनों किस्म के लोग
पीछा करते है मेरा रोज़ सपनों में
वे मुझसे कुछ कहते नही
बस कभी टांग देते है मुझे किसी मचान पर
तो कभी फेंक देते पहाड़ की ऊंचाई से
दोनों की स्थितियों में
मुझे डर नही लगता है
और न ही मैं होता हूँ चोटिल

जिन्हें मैं भूल गया
या जो मुझे याद रह गए
वे न मेरे मित्र है और न शत्रु
फिर भी
वो मुझसे पूछते रहते है
एक ही बात बारम्बार
'तुम्हारा नम्बर कब आएगा'

जब तक मैं समझ पाता हूँ उनका सवाल
और जवाब देना चाहता हूँ
वे एक साथ हंसने और रोने लगते है
उस कोलाहल में दब जाता है
मेरा जवाब

फिर मैं याद करता हूँ उन लोगों को
जो न मुझे याद है
और न ही जिन्हें भूला हूँ मैं

वे हाथ पकड़कर ले जाते है मेरा
और छोड़ आते है उस एकांत में
जहां रोटी और पानी की नही
प्रेम की बातें जिंदा रखती है मुझे

मैं मुद्दत से रोटी और पानी को भूल गया हूँ
प्रेम भी मुझे कोई खास याद नही है
मुझे केवल प्रेम की कुछ बातें याद हैं

जिन्हें सुनकर और पढ़कर
दुनिया कर देती है मुझे माफ़
फिलहाल मेरी मोक्ष में
इसलिए भी दिलचस्पी नही है
क्योंकि
माफीयाफ्ता शख्स के लिए
जीना जरूरी होता है।

©डॉ. अजित

Saturday, June 24, 2017

इंतजार

बारिश का इंतजार
वो करते है
जिनकी मुट्ठी में बीज है
या फिर वो
जिनके पास धरती की प्यास का
पोस्टकार्ड है

बारिश का इंतजार करना
ठीक वैसा है
जैसे घर मे खोई अपनी
चप्पल ढूंढना।

©डॉ. अजित

कायदे से

कायदे से
इतनी मुस्कान तो होनी ही चाहिए
मनुष्य के पास
कि बुरे वक्त में
जिसे दिया जा सके
किसी जरूरतमंद को उधार

मगर मुस्कान होती है
खुद के पास महज इतनी
जिसे खर्च किया जा सकता है
फोटो खिंचवाते वक्त
जब फोटो क्लिक करने वाला कहे
स्माइल प्लीज़
और आप फैला दें
होंठो का अधिकतम विस्तार

कायदे से
इतनी हंसी तो होनी ही चाहिए
मनुष्य के पास
वो हंस सके बुक्का फाड़कर
दोस्तों के बीच

मगर हंसी होती है मूड की गुलाम
आप तब हंसते है
जब हंसना हो एक शिष्टचार
रोने की तर्ज पर जब हंसी आती है
तब वो बन जाती है एक ध्यान
रोने की तर्ज़ इसलिए
सबके लिए सीखनी जरूरी है

कायदे से तो यह भी होना चाहिए
जब कोई कहे अपने दुःख
हम जवाब में अपने दुःख भी कहे
दुःख के लिए यह हौसले से बड़ी
सांत्वना है

मगर दुःख सुनकर मनुष्य
करना चाहता है सलाह का कारोबार
जिनके पास अपने दुःख का निदान नही
उनके पास बी पॉजिटिव रहने के कोट्स
मिलेंगे हजार

कायदे से बहुत कुछ
नही होना दुनिया में
मगर वो सब कुछ मौजूद है
अपनी तीव्रता के साथ

और कायदे से जो होना चाहिए
वो घटित होता है हमेशा
अनुचित और अवांछित ढंग से

इसलिए
तमाम दुनियावी कायदे पढ़ने के बाद भी
मनुष्य है एकदम अनपढ़

सभ्यता मनुष्य के अनपढ़ होने का विज्ञापन है
जिसे प्रचारित किया गया है
ज्ञान के  विकास के तौर पर

कायदे से
मनुष्य को सबसे पहले करनी चाहिए
खुद से एक गहरी मुलाकात
ताकि जान सके
खुद के धूर्त होने की अधिकतम सीमा

मगर वो फिलहाल व्यस्त है
मनुष्य को मनुष्य के तौर पर
खारिज़ करने में
समझ का यह क्रूर पक्ष है
जो दिखाई नही देता है।

©डॉ. अजित

Friday, June 23, 2017

अनुमान

सोकर उठा तो लगा कि
धरती के सबसे निर्वासित कोने पर
अकेला बैठा हूँ

नींद की थकान के बाद
देख रहा रहा हूँ
जागे हुए चेहरों की उदासी

धरती घूम रही है अपनी गति से
इसका अनुमान लगाने के लिए मैं थम गया हूँ
मेरी गति अब पुराण की गति के बराबर है

जिसे दुर्गति, निर्गति, सद्गति
कुछ भी समझा जा सकता है
अपनी अपनी समझ के हिसाब से

जिस जगह मैं हूँ
वहां से एक रास्ता दुनिया की तरफ जाता है
एक रास्ता दुनिया की तरफ से आता है
मगर मैं जिस पगडंडी पर खड़ा हूँ
वहां से दोनों रास्ते अलग नही दिखते है
इसलिए मैं देखने की ऊब से
आसमान की तरफ देखने लगता हूँ

आसमान मुझसे पूछता है
धरती के इस कोने का तापमान
मगर मेरे पास मात्र अनुमान है
इसलिए छूने से डरता हूँ धरती के कान

जब से सोकर उठा हूँ
मैं नींद को देख रहा हूँ बड़ी हिकारत से
दोबारा सोने से पहले मेरे कुछ डर है

मसलन अगर

इस बार आसमान ने पूछ लिया
मेरा ही द्रव्यमान
तो क्या कहूँगा उसे

फिलहाल जिस कोने पर बैठा हूँ मैं
वहां से कुछ भी नापा जाना सम्भव नही

मैनें आसमान की तरफ कर ली है पीठ
और धरती की आंखों में देख रहा हूँ
अपनी नींद में डूबी आंखें
शायद देखते-देखते फिर आ जाए नींद

और मैं सोते हुए बच सकूं सवालों से
लेकर कुछ अधूरे सपनों की ओट
नींद और जागने के मध्य
मैं तलाश रहा हूँ वो कोना
जहां मैं खुश हूँ ये बताना न पड़े किसी को
और मैं उदास हूँ छिपाना न पड़े किसी से।

©डॉ. अजित

Friday, June 16, 2017

सलाह

शब्दों को बड़ी सावधानी से चुनना सखी
शब्द रास्ता रोकेंगे
शब्द मन को भरमाएंगे

रहना हमेशा इतना सावधान
जितनी रहती हो मंदिर में ईश्वर के समक्ष
रहना इतनी लापरवाह
जितनी रहती हो विंडो सीट पर बैठकर

शब्दों के फेर में उलझ मत जाना सखी
हो सके समझना शब्दों की माया
सन्देह मत करना मगर सोचना यह भी
शब्दों की होती है अपनी एक काया

कहना या सुनना
मगर बहुत ध्यान से चुनना
एक-एक शब्द
इनकार हो या मनुहार
सबसे भरोसेमंद क्यों न हो प्यार

शब्दों पर देना गहरा ध्यान
मत बन जाना थोड़ी सी अनजान
मत ढोना शब्दों का बोझ सखी
कह देना अपनी खोज सखी

शब्दों को ब्रह्म बताने वाले
नही बता कर गए ब्रह्म का पता
शब्दों के जरिए ब्रह्म को
मत खोजने लग जाना सखी

हो सके तो खुद को भरम से बचना सखी।

©डॉ.अजित

Thursday, June 8, 2017

हार

मैं जीत नही पाया
इसका यह अर्थ कतई नही है
मैं हार गया हूँ

दरअसल
मैं जीत नही पाया
ये एक मुकम्मल कथन है

हार की बात
जीतेने वालों नही करनी चाहिए
और आदतन
हारने वाला  तो कभी नही करता

हार के औचित्य को
जीत की अनिच्छा से
नही ढ़का जा सकता यह सच है

हार-जीत के मध्य एक कोना है
जहां सच,सच नही लगता
और झूठ, झूठ नही लगता

वहां से सम्बोधित किया जा सकता है
सही गलत के लंबित पड़े मुकदमों के अभियुक्तों को

फिलहाल,वही कर रहा हूँ मैं।

©डॉ. अजित

सुख है

मुद्दत से मैं इस कदर खाली हूँ
जिससे एक बार बातें 
करना करता हूँ शुरू
फिर भूल जाता हूँ समय का बोध
उसकी रूचि के केंद्र
मैं उघड़ता जाता हूँ 
किसी पुराने टाट की तरह

मेरे पास निजी दुःखों के 
इतने रोचक आख्यान है कि
श्रोता उनमें तलाश लेता है
अपने दुःखों के लिए सांत्वना
यह मेरे दुःखों की सबसे बड़ी
भावनात्मक उत्पादकता है 

दुःखों के आख्यान रोचक है 
मगर असल मे दुःख है बहुत बोरिंग
वो मुद्दत से मेरी शक्ल देखकर 
ऊब के शिकार है
उनकी ऊब आप पूछ सकते है
मेरे छिट-पुट सुखों से

मैं इस कदर खाली हूँ कि 
बातचीत में भूल जाता हूँ 
छोटी छोटी बात
मगर मुझे ठीक से याद 
अपने जीवन के सारे अपमान

मैं जब सुना रहा होता हूँ अपने दुःख
मुझे लगता है दुःख निरपेक्ष होकर
सुने जाते है
दुःख को सुनने वाला जानता है
दुःख का आदर करना
कई बार सही साबित होता हूँ
कई बार होता हूँ गलत साबित

मुद्दत से यह मेरी दबी कामना रही है 
कि मैं अपने दुःखों को कुछ तरह से 
करूँ प्रस्तुत 
कि मेरा पीड़ित होना हो जाए
सम्प्रेषित 

मैंने खालीपन के दौरान ही जाना
यह ब्रह्म सत्य
दुःखों को सुनने के बाद
आप सिद्ध होते है बेहद मामूली
जबकि
सुखों को सुनकर मिलती है प्रेरणा
इसलिए दुःख नही आते 
आपके किसी काम 
पर्याप्त संख्या के बाद भी 

लड़ता गिरता सम्भलता व्यक्ति
बहुत देर तक नही बांध पाता 
अपनत्व की तिरपाल 
उखड़ जाते है उसके पैर 
एक छोटे से अनौपचारिक मजाक से

जिनसे मैनें कहे अपने अनकहे दुःख
वे कान चिपक गए दिमाग से
वे आंखें प्रार्थनारत हो गई नींद के लिए
वे मनुष्य जुट गए तैयारी में
उनके हृदय पर भारी पड़ गई 
अपने दुःखों को लांघने की जल्दबाज़ी

मुद्दत तक दुःखों पर बात करने के बाद
अब मुझे कोई दुःख नही है
दुःख वास्तव में होने चाहिए 
बेहद निजी
दुःख से उपजी आत्मीयता
इतनी चलताऊ चीज़ है
इधर आप सुना रहे हो 
अपने जीवन का
सबसे त्रासद किस्सा
उधर कोई कहे
क्या बात है !

मैनें दुःखों की बातें बंद कर दी अब
हालांकि खाली उतना ही हूँ अभी भी
फोन पर जब कोई पूछता है हालचाल
तब अनिल यादव की तरह कहता हूँ
सुख है !

©डॉ. अजित 




Thursday, June 1, 2017

शिकायत

एकदिन थककर स्त्री
वापिस ले लेती है
अपने पूरे सवाल
आधे सन्देह
और एक चौथाई सम्भावना

वो ओढ़ लेती है
एक जीवट मुस्कान

पुरुषार्थ की अधिकांश विजय
ऐसी मुस्कानों पर ही खड़ी होती है तनकर

स्त्री के पास होता है
बेहद एकांतिक अनुभव
जिसे नही बांटती वो किसी अन्य स्त्री से भी

यही बचाता है उसके अंदर
एकालाप की ऐसी हिम्मत
जिसके भरोसे वो
पुरुषों की दुनिया में बनी रहती है
एक अबूझ पहेली

प्रेम स्त्री की थकन नही नाप पाता
घृणा स्त्री की अनिच्छा नही देख पाती
दोनों की मदद से
जब पुरुष करता है
किसी की किस्म का कोई दावा

तब स्त्री रोती है अकेले में

ये बात केवल जानता है ईश्वर
मगर वो नही बताता
किसी पुरूष का कान पकड़कर
एकांत का यह अन्यथा जीया दुख

और भला बता भी कैसे सकता है
पुरुष ने उसका हाथ चिपका रखा है
हमेशा से खुद के सिर पर
एक स्थाई आशीर्वाद की शक्ल में

स्त्री इसलिए ईश्वर से नही करती
कोई शिकायत
वो जानती है ठीक ठीक यह बात
जो सबका है
कम से कम उसका तो
बिल्कुल नही हो सकता है।

©डॉ. अजित

Wednesday, May 24, 2017

पिता का जूता

मेरे पिता जी
बाटा का जलसा जूता पहनते थे
बाटा पर उनका यकीन
मुझ पर यकीन से ज्यादा था

गांधी को वो मात्र
खादी भंडार से जानते थे
शहर में जाते तो जरूर जाते गांधी आश्रम
उन्हें कपड़े की उतनी समझ थी
जितने मुझे आदमी की नही है

पिता जी को मोहम्मद रफी पसन्द थे
मुकेश के लिए वो कहते
गाता अच्छा है मगर नाक से गाता है
मैनें उन्हें जब मिलवाया किशोर कुमार से
उन्होंने कहा
ये नौजवानों का गायक है

ज्वार भाटा और वक्त
उनकी पसंदीदा फ़िल्म थी
नए लोगो में उन्हें अजय देवगन थे पसन्द
हमनें कई फिल्में साथ देखी
मगर हमारी पसन्द हमेशा रही जुदा

पिता के मरने पर
मैनें उनका जूता नही दिया किसी को
कभी कभी उसमें पैर डालकर
देखता हूँ अकेले में
आज भी वो ढीला आता है मुझे

जब कभी दुनिया के धक्के और धोखे खाकर
हो जाता हूँ थोड़ा हैरान थोड़ा परेशान
जी करता है पिता जी का
वही बाटा जलसा जूता उठाकर
दो चार जड़ लूं
खुद ही खुद के सिर पर

पिछली दफा जब ऐसा करना चाहा मैनें
तो ऐसा करते मुझे देख लिया मेरी माँ ने
पिता के मरने के बाद
पहले बार वो रोई एक अलग स्वर में

मेरे पास पिता का जूता है
मेरे पास मेरा सिर है
और मेरा पैर है
मगर तीनों में कोई मैत्री नही है
तीनों अकेले और असंगत है

जीवन की यह सबसे बड़ी शत्रुता है मेरे साथ
जिसे मैं अकेला खत्म नही कर सकता।

©डॉ. अजित

Friday, May 19, 2017

बबली

बबली मेरी बड़ी बहन है
उम्र में मुझसे दो साल बड़ी है
उसके ब्याह में अट्ठारह साल का था मैं
पिता की तरह पेश आया मैं
उसके ब्याह में
हलवाई, किरयाने का सामान, फ़र्नीचर
कपड़े गहने सबके लिए दिया पैसा

उसके ब्याह में
पिता मुझे प्रशिक्षित कर रहे थे या दंडित
नही समझ पाया आज तक

पिता के जाने के बाद
बबली मुझसे नाराज़ है
उसे शिकायत है
न मैं पिता रहा और न भाई
हम भाई बहन बचपन मे कभी नही लड़े
लड़ते आज भी नही है
हमारी लड़ाई अब खत्म हो गई है
और दिखने वाला प्यार भी

बबली की शिकायतें
सीधी नही पहुंचती है मुझ तक
वो सामने हमेशा दिखती है सामान्य
मगर उसकी कुछ गहरी शिकायतें है
हम तीन भाईयों में
उसे लगता  हूँ
मैं सबसे कम जिम्मेदार
जबकि वो साक्षी है अपने ब्याह में
मेरी बगल में दबे बैग की
टूटी तनियों के चप्पलों की

बबली जिस शहर में रहती है
वो पुराना जिला है मेरा
मैं वहां कम जाता हूँ अब
पहले पिताजी के साथ जाता था कचहरी
बबली को लगता है
वो वहां रहती है
इसलिए अब वहां नही जाता मैं

मैं भाग रहा हूँ
हर रिश्तें नाते से रात-दिन
मेरे पास नही है कोई ऐसी उपलब्धि
जिसे सुना मेरी सगी बड़ी बहन
कुछ दिन गर्व से रह सके
अपनी ननद और सास के बीच

वो एक आश्वस्ति चाहती है
अपने बच्चों को लेकर
कि मैं कम से कम मतलबी मामा न बनूँ
पढ़ा-लिखा पीएचडी हूँ
गाइड करूँ उन्हें उनके करियर के लिए
मदद कर सकूं दो पैसों की
कम से कम इतना लायक बनूं जरूर

मैं बबली से बात करना चाहता हूँ
अपनी सगी बड़ी बहन के सामने
मेरे इतने संकोच घिर आए है
मैं कुछ भी कहूँगा
तो उसे लगेगा सफेद झूठ
वो अब बिल्कुल नही पहचानती मुझे

वो भूल गई कि पिछले सत्रह सालों में
वक्त ने इस कदर तोड़ा और
बदलने पर किया मजबूर  मुझे
अब मैं बबली का तो क्या
किसी का भाई ,पति, पिता,बेटा कुछ न रहा

बबली के पास एक वाजिब शिकायत है
खुद में खो गया हूँ मैं
यह सच है  इस कदर खो गया हूँ मैं
कि आप शायद ही
किसी पारिवारिक उत्सव में हो सकूं
शामिल अपने बड़प्पन के साथ

बबली मुझसे दो साल बड़ी है
मैं बबली से कई बड़ा हूँ
हम दोनों एक दूसरे से छोटे है
यही हम भाई बहन की
वास्तविक आयु है।

©डॉ. अजित

Thursday, May 18, 2017

चुप्पा

आजकल हमारे बीच चुप्पा चल रहा है
चुप्पा और अबोला में एक बुनियादी फर्क है
अबोला किसी नाराजगी में होता है
चुप्पा अकारण हो जाता है
लगता है जैसे बातचीत के
सारे विषय समाप्त हो गए है

हम एक दूसरे से ऊबे हुए प्रेमी है
जैसे पतझड़ में धरती ऊब जाती है सूखे पत्तो से
और दिन में हरियाली से ऊब जाता है आसमान

एक मंजिल पर पहुँच कर
हम दिख रहें हैं चुके हुए
प्रेमी युगल की तरह
जैसे आख़िरी बस छूट गई हो
किसी दूरस्थ देहाती गाँव के लिए
और हम अकेले खड़े रह गए हो
किसी सुनसान कस्बें में  

एक दुसरे की शक्ल देखते देखते
हम भूल गये है अपना-अपना सौन्दर्यबोध
इसलिए नही कर पाते तारीफ़
अब किस अच्छी चीज की

स्मृतियों के वातायन में
सूख रहे है सांझें स्वप्न
उन्हें तह करके रखना होगा
अब हिज्र के  मौसम के लिए  

फिलहाल
छूट रहे है हाथ
जैसे पतवार से छूट जाते है किनारे
और नदी समझती है कोई उसे पार गया


ये विचित्र संधिकाल है
यहाँ किसी के पास कोई आरोप नही है
कोई महानताबोध से ग्रसित भी नही है
विलगता का कोई नियोजन भी नही है

इस चुप्पा में
उड़ रही है  रिश्तों की मीठास
अपनी लय और गति के साथ
बेहद धीमी गति से.

बिना किसी औपचारिक भूमिका के
यह कहना पड़ रहा है मुझे  
अब  मिट रही है हमारी संयुक्त पहचान

समय को इस पर खेद है
मगर हमें समय पर कोई खेद नही है
ये विचित्र मगर खराब बात है
जिसे  जान पाया हूँ मै
 इस  अनजानी चुप के बीच.


© डॉ. अजित 

Tuesday, May 16, 2017

दूरी

उसने कहा
तुम्हें स्त्री से बात करनी नही आती
मैंने पूछा
कैसे की जाती है स्त्री से बात?

ये किसी से पुरुष से पूछना
मुझसे नही,उसने हंसते हुए कहा

मेरे पास कोई ऐसा पुरुष नही है
जिससे ले सकूं ये ज्ञान
मैंने अपनी असमर्थता जाहिर की

इस पर थोड़ा गम्भीर होकर उसने कहा

स्त्री से ठीक वैसे की जाती है बात
जैसे कोई रास्ता पूछता है मुसाफिर
जैसे बादल बरसता है
जंगल मे अलग और शहर में अलग
जैसे बच्चा करता है जिद
जैसे दर्द को छिपाता है एक नव वयस्क
जैसे धरती से पूछा जाता है उसका जलस्तर

मैनें कहा यदि मैं
इस तरह न कर पाऊँ बात तो?

फिर एक स्त्री तुम्हें सुनती है
और मुस्कुराती है मन ही मन
और करती है ईश्वर से प्रार्थना
तुम्हें दुनियादारी से बचाने की

वो फिर नही सुन पाती
तुम्हारी कोई लौकिक बात
वो सौंपती है अपनी
अधिकतम सद्कामनाएं
और ढ़ेर सारा अमूर्त प्रेम
तुमसे एक दूरी की शक्ल में।

© डॉ. अजित

Friday, May 12, 2017

रोजनामचा

हमनें थोड़ी देर राजनीति की बातें की
हर बहस बीच आधी अधूरी छोड़ी
गोया हमारे पास सब समस्याओं का समाधान है
मगर हमारी मानने वाला कोई नही है

फिर कुछ कॉमन फ्रेंड्स की निंदा का सुख लिया
दोस्तों की अनुपस्थिति में उनकी बातें
ये बताती रही कि वो अभी भी
कितने बचे हुए है
हमारी जिंदगियों में

वैचारिक बातों से ऊबकर
हम अतीत में खो गए
और याद करने लगे अपनी भावुक मूर्खताएं

बीच-बीच में याद करते बदलता मौसम
हैरत से देखतें गए विकास के
रियल एस्टेट संस्करण को

दिन में थोड़ी शराब भी पी
तोड़कर नैतिकता के सारे आवरण

दिन ढ़लता गया और हमारी बातें होती गई बोझिल
बीच बीच में हम केवल चुपचाप देखते रहें
एक दूसरे की शक्लें
ऐसा करने को क्या कहते है कविता में
नही है मुझे मालूम

शाम तक जब लगभग सारे किस्से तमाम हुए
फिर थोड़ी शराब पी
रात को सोने से पहले
हम साफ कर देना चाहतें थे
यादों की स्लेट

सोने से पहले हमनें देखा एक दूसरे का चेहरा
हल्के से मुस्कुराए
और सो गए बिन शुभ रात्रि कहे
एक उल्लासित दिन के बाद
ये सबसे शुभ रात थी हमारी
क्योंकि
इस रात नही आया कोई ख्वाब
अतृप्त कामना का

हम सोते गए बेसुध
जैसे इस नींद की तलाश में
मुद्दत से भटक रहे थे हम
सुबह जगे और निकल गए
अपने अपने रास्तों पर

हमनें एकदूसरे को विदा नही कहा
और इसलिए नही कहा
हमें फिर मिलना था किसी दिन
ठीक इसी तरह
क्यों मिलना था नही जानता था कोई
इसलिए बचा लिया विदा
और मुड़ गए उन रास्तों पर
जो आपस में कहीं नही मिलते।

©डॉ. अजित

Sunday, May 7, 2017

बातें

उसने पूछा
खाली वक्त में क्या करते हो तुम?
मैंने कहा
यदा-कदा
व्हाट्स एप्प पर तुम्हारी डीपी
देख लेता हूँ
उससे क्या होता है
उसने हंसते हुए पूछा
कुछ नही ऐसा लगता है
तुम्हें अभी तक खोया नही मैंने
मैंने थोड़ा गम्भीर होकर जवाब दिया
फिर मैंने सवाल किया
और तुम क्या करती हो
अपने खाली वक्त में?
आज के बाद व्हाट्स एप्प पर
तुम्हारा लास्ट सीन देखा करूंगी
इतना कहकर वो हंस पड़ी
फिर देर तक हंसता रहा मैं भी।
***
एकदिन मैंने कहा
जब हिचकी आती है मुझे
तो ऐसा लगता है
जैसे तुमनें याद किया हो
मैं इस मान्यता में यकीन नही करती
उसने ये कहकर मेरी बात काट दी
फिर अचानक एकदिन कहने लगी
हिचकी वाली बात सही थी तुम्हारी
मैंने कहा क्यों?
अब तुम्हें भी आने लगी क्या हिचकियाँ
उसने कहा नही
अब हिचकी नही बस तुम्हारी याद आती है।
***
कुछ दिनों से
हमारी बातचीत बंद थी
संपर्कशून्य जी रहे थे हम दोनों
अचानक उसका मैसेजे आया
आओ ! चाय पीते है शाम को
मैनें जवाब दिया शराब क्यों नही?
उसने कहा पहले चाय फिर शराब पीएंगे
हमने उस दिन कुछ नही पीया
बस बातें की जी भर
चाय और शराब इसलिए भी पाती रही
आदर मेरे जीवन में
दोनों ने हमेशा बचाए रखा
सम्वाद हमारे बीच।
***
उस दिन उसे
मुझे एक शर्ट दिलाने की
जिद चढ़ी हुई थी
मैं बार बार करता रहा इनकार
इस बात पर वो नाराज़ हो गई
दो दिन बाद
उसने पूछा परसों क्या हो गया था तुम्हें?
मैंने थोड़े संकोच से कहा
हुआ कुछ नही था
दरअसल
नीचे बनियान नही पहना था मैंने
और तुम्हारी जिद
तुम्हारे सामने ही ट्राई करने की
रहती है हमेशा
देखा जाए यह बात हंसने की थी
मगर वो हंसी नही
थोड़ा उदास होकर उसने कहा
तुम्हारी यही आदत
तुम्हें कभी छोड़ने नही देगी मुझे।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 26, 2017

एकदिन

सबकुछ ठीक चल रहा था हमारे बीच
दिन भी सात ही होते थे
और महीना भी तीस ही दिन का था
हर तिमाही पर मौसम बदलता था
और छटे छमाही याद की जाती थी
पुरानी प्यारी बातें

फिर अचानक एकदिन
बदल गया काल चक्र
आंधी में उड़ गया हमारा निजी पंचांग
अब सप्ताह होता था दो दिन का
दुनिया जिसे वीकेंड समझ
जश्न की तैयारी में मशगूल होती
उन दो दिनों में भटकता था मैं बेहताशा
महीना अब कोई एक पूरा नही होता था
जेठ में बैसाख और चैत में आषाढ़ के बादल दिखने लगते थे आसमान पर

मौसम अब एक जैसा रहता था
मैं उसके बदलने के इंतज़ार में
थक गया था
दो जोड़ी कपड़ो से बीत गया था साल
न ठंड में ठंड लगी न गर्मी में गर्मी
बरसात रूमानी भी होती है
नही था मालूम
जिस बरसात को जानता था मैं
वो अचानक आती और भिगो देती थी
तार पर टँगी उल्टी बुरशट को

सब कुछ ठीक चलने के बाद
एक दिन चलता है
सब कुछ ठीक न चलना
जो बदल देता है
सारे विशेषण सर्वनाम में

ऐसा नही अब सब कुछ ठीक चल रहा है हमारे मध्य
जो लिख रहा हूँ मैं एक कविता
या बांट रहा हूँ ज्ञान मनुष्य की त्रासदी पर

अब बस इतना है कि
ठीक चलने और ठीक न चलने के बीच
जो कुछ अच्छी बातें याद रह जाती है
एकदम अपनी निरपेक्ष प्रकृति के साथ
उनके भरोसे मैं देख रहा हूँ
माया के उस विचित्र नियोजन को

जिसका दुनिया का
कभी एक कुशल अभियंता था मैं
उसी का आज दिहाड़ी मजदूर हूँ मैं
भूल गया हूँ अपनी सारी निपुणताएं
कर दिया खुद को मांग के हवाले
बस इतना भर याद है
कभी सब कुछ ठीक चल रहा था हमारे मध्य
जो अब नही है।

©डॉ. अजित


Saturday, April 22, 2017

उम्मीद

ये जो तेरी पलकों के छज्जे पर
सूखते हुए ख़्वाबों की परछाई है
जो हो इजाज़त मैं थोड़ी देर इसमें पनाह ले लूं
मेरा जिस्म जज्बाती धूप में झुलस गया है

ये जो तेरी आँखों में गुमशुदा इश्तेहार है
मैं उनसे रास्ता पूंछ लूं ज़रा
भटक गया हूँ मैं सही गलत के कबीले में

फ़कत इतनी इल्तजा है मेरी
तेरी जुल्फों के साए में
अपनी यादों की गुल्लक फोड़ कर
गिन लूं जमा की गई हसीं बातों की चिल्लर

एक बोसा तेरे कान पर टांग दूं
जो हवा देता रहे गर्म लू में तुम्हें हमेशा

मेरे पास कुछ ख्वाहिशों के अधूरे वजीफे है
कुछ शिकायतों के आड़े-तिरछे नक़्शे है
अनकही बातों  का शरबत है
जिसे घूँट घूँट लुत्फ़ लेकर पीना तुम कभी

ये सब तुम्हें सौंपकर मैं अब आराम चाहता हूँ
अपनी बेचैनियों से इंतकाम चाहता हूँ

इसलिए
मुन्तजिर हूँ तुम्हारी फुरसत और बेख्याली का
उम्मीदन तुम आओगी एकदिन
बारहा यूं ही खुद चलकर

उसी दिन आमद होंगी
कुछ कतरों की समन्दर में
और मुक्कमल होगा एक बेवजह का सफर
अपने तमाम अधूरेपन के साथ.

© डॉ. अजित


Friday, April 21, 2017

अन्यथा

ये बातचीत को अन्यथा
लिए जाने का दौर है
आप कहे पूरब
और कोई समझ ले
इसको निर्वासन की दशा

आप कहे मेरा वो मतलब नही था दरअसल
और तब तक मतलब निकल चुका हो हाथ से

इसलिए
बातचीत करते हुए लगता है डर
और बोल जाता हूँ कुछ ऐसा भी
जिसका ठीक ठीक मतलब नही पता होता
मुझे भी।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 19, 2017

तुम उदास करते हो कवि...

पहले उसे मैं औसत लगा
फिर बेहतर
उसके बाद थोडा और बेहतर
मैं बेहतरी में आगे बढ़ ही रहा था कि
अचानक उसने कहा एक दिन
तुम कोई ख़ास पसंद नही हो मुझे
बल्कि कभी-कभी लगते हो बेहद इरिटेटिंग भी
मुझे अपनी घटती लोकप्रियता का दुःख नही था
मुझे दुःख इस बात का हुआ  
मैं सतत मूल्यांकन में था.
****
हमारी कुछ ही संयुक्त स्मृतियाँ ऐसी थी
जिनका एक सामूहिक अनुवाद संभव था
अन्यथा
हम चल रहे थे आगे-पीछे अपने अपने हिसाब से
जिस दिन हम अलग हुए चलते -चलते
उस दिन हमारे पास कुछ ऐसी स्मृतियाँ बची थी
जिन्हें बांचते समय लगता कि
हम साथ चल नही साथ बह रहे थे
किनारों से पूछने कोई नही जाएगा
मगर ठीक से वही बता सकता है
हम दोनों की अभौतिक दूरी.
***
ऐसा कई बार हुआ
उसे फोन किया और स्क्रीन पर नम्बर दिखने के बाद
काट दिया तुरंत
ठीक इसी तरह कुछ एसएमएस किए टाइप
और मिटा दिए तुरंत
ये घटनाएं मेरे द्वन्द, संकोच  या अनिच्छा को नही बताती है
ये दोनों बातें बताती है
समय से चूक जाने के बाद
तुम्हें किसी भी वक्त डिस्टर्ब करने का हक़ खो  बैठा था मैं.
***
हमारी बातें इतनी निजी है
जितनी धरती की अंदरूनी दुनिया
हमारी बातें इतनी सार्वजनिक है
जितना आसमान का फलक
हमारी बातों में थोड़ी थोड़ी
सबकी बातें शामिल है
इसलिए जब उदास होता हूँ मैं तो
कभी कभी
सुबक कर रो पड़ता है कोई अनजाना भी.
***
‘तुम उदास करते हो कवि’
किसी ने कहा ने एकदिन
कोई कविता पढ़ने के बाद
मैने जवाब में एक मुस्कान बना दी
यह सच है कि प्राय: लोगो को उदास करता हूँ मैं
क्यों करता हूँ
इसका सही-सही जवाब केवल तुम्हारे पास है
मगर तुमने कोई पूछने नही जाएगा
इसलिए मुस्कान मेरे पास
स्थाई प्रतीक है
अपना दोष स्वीकारने का.

© डॉ. अजित






Tuesday, April 18, 2017

अनिच्छा

ये जो तुम्हारा गूंथा हुआ जूड़ा है
मैं इसमें दूरबीन की तरह झांककर देखना चाहता हूँ
जिसके लिए कर लूंगा
मैं अपनी एक आँख बंद
किसी कुशल खगोल विज्ञानी की तरह
मैं  देखना चाहता हूँ कि
ये  दुनिया कितनी दिमाग के भरोसे  चल रही है
और कितनी दिल के

ये जो तुम धोकर और खोलकर सुखा रही हो अपने बाल
मैं इन्हें हवा में उड़ता हुआ देखना चाहता हूँ एक बार
ताकि पता कर सकूं हवा दक्खिनी है या पहाड़ा
परवा और पछुवा जानने के काफी है तुम्हारी लटें

तुम्हारी गर्दन पर प्रकाशित है
उस समंदरी टापू का नक्शा
जहां ठुकराए हुए लोग जी  सकते है सम्मान के साथ
उनसे  कोई नही करता वहां सवाल  
उसकी प्रतिलिपि मैं ले जाना चाहता हूँ अपने माथे पर
तुम्हारी अनुमति के बाद

तुम्हारे हाथों में सुना है बड़ी बरकत है
आज तक कभी कम नही पड़ा खाना रसोई में
मैं अपनी कलम एक बार तुम्हारे हाथों में देना चाहता हूँ
ताकि क्षमा और प्रशंसा के लिए
कभी कम न पड़े मेरे पास शब्द

ये जो तुम्हारी पलकें है
इनके बाल गिनना चाहता हूँ एक बार
ताकि मैं अपनी बोझ उठाने की क्षमता को परख सकूं
तरलतम परिस्थितियों में

मेरे इस किस्म के छोटे छोटे स्वार्थ और भी है
मगर उनका जिक्र नही करूंगा आज
आज केवल पूछूंगा इतना
क्या तुम्हें इतना भरोसा है खुद पर कि
मैत्री को बचा ले जाओगी
प्रेम के मायावी प्रेत से?

तुम्हें हो न हो मगर मुझे भरोसा है
इसलिए मैं कहता हूँ
ये जो तुम्हारी आँखें है
इनमें साफ-साफ़ दिखता है
भूत और भविष्य एक साथ
मैं दोनों के बीच में वर्तमान
टिकाना चाहता हूँ थोड़ी देर
बशर्ते तुम अनिच्छा से आँखें न मूँद लो.

© डॉ. अजित




Saturday, April 15, 2017

दोस्ती

एक बुरे दौर में
मैंने दोस्तों की तरफ
मदद की उम्मीद भरी निगाह से देखा
कभी ये मदद आर्थिक थी
तो कभी मानसिक
कुछ दोस्तों को मेरी उम्मीद नही दिखी
बस केवल मैं दिखा
मजबूरी की एक कमजोर
प्रस्तुति थी शायद मेरे पास
कुछ दिन ऐसे दोस्तो से मैं रहा बेहद नाराज़
फिर मैंने पाया
मेरी नाराज़गी कोरी भावुकता से भरी थी
जो लगने लगी अप्रासंगिक
कुछ महीनों बाद
दरअसल
बुरे वक्त में दोस्त की मदद न कर पाना
जरूरी नही दोस्त की काहिली हो
कई बार हमारी पात्रता होती है कमजोर
और मदद हो जाती है किसी
लौकिक जटिलता की शिकार

कई बार एक बुरे दौर में
मैने दोस्तो की तरफ
मदद की भरी निगाह से देखा
और दोस्तों ने
मदद की मेरी उम्मीद से बढ़कर
पढ़ लिया मेरा मन
कई कई साल जिक्र तक नही किया
उधार के पैसों का
जो उनके गाढ़े खून पसीने की कमाई थी
शराब के बाद की मेरी 'झक' को
झेला पूरी विनम्रता के साथ
सार्वजनिक रूप से बताते रहें वो
मुझे बेहद प्रतिभाशाली
ऐसे दोस्तो के प्रति
मैने कोई कृतज्ञता प्रकट नही की आजतक
हमेशा लिया इसे एक हक की तरह

ये दो अलग अनुभव नही दरअसल
ये दोस्ती की दो आंखें हैं

इसलिए
नही लिया जाना चाहिए
दोस्तों की बातों को बहुत व्यक्तिगत
बचाए जाने चाहिए रिश्तें
नाराजगियों के बावजूद
दोस्त दरअसल हमारे दोस्त के अलावा
अलग अलग मोर्चो पर लड़ते मनुष्य भी है
जो कहीं जीतते है तो
कहीं हार जाते है

दोस्ती के हिस्से में हमेशा जीत नही होती
मगर दोस्ती के साथ कोई हार
कभी स्थाई भी नही होती

दोस्ती को बचाना
ज़िन्दगी में हार को स्थगित करना है
इस स्थगन के लिए अपेक्षा की हत्या
करनी अनिवार्य पड़े तो
कर देनी चाहें यकीनन
चाहें दिल मानें या न मानें।

©डॉ. अजित

Wednesday, April 12, 2017

कमतर

उसने कहा एकदिन
तुम तो औसत से भी कमतर निकले
मैं तुम्हें बेहतर समझ रही थी
मैंने पूछा
ये बात गुस्से में कह रही हो या सच में
उसने कहा
जैसा तुम समझो तुम्हारी मर्जी
मैंने कहा कमतर को
इतनी छूट देने के लिए शुक्रिया
तुम बेहतर हो अब इस पर
कोई संदेह नही है मुझे।
***
मैंने कहा एकदिन
देखना आंख में कुछ चला गया है
उसने कहा मुझे दिखाई न देगा
मैंने कहा क्यों?
इसलिए क्योंकि मैं ज्यादा
नजदीक हूँ तुम्हारे।

***
हमारी अधिकतर लड़ाईयां
बेवजह की थी
मसलन एकदिन उसने पूछा मुझे
प्यार आदमी की जरूरत है या
आदमी को जरूरत से प्यार करना पड़ता है?
मैंने कहा एक ही बात तो हुई
इस पर वो बिगड़ गई और कहा
तुम हमेशा सवालों से बचते हो
मैंने कहा हां !
मै सवालों से नही जवाबों से बचता हूँ।
***
परसों उसने पूछा
मेरे बिन रह सकोगे तुम
मैंने कहा शायद
उसने मुस्कुराते हुए कहा
अच्छी बात है
इस शायद को कभी मत छोड़ना
चाहे मैं रहूँ या न रहूँ।

©डॉ. अजित 

ब्रेकअप के बाद

ब्रेकअप के बाद
उठ गया था रेखाओं से विश्वास
शुक्र बुध मंगल पर्वत डूब गए थे
अविश्वास के समन्दर में
हथेली देखते वक्त नजर आता था बस पसीना
वो उड़ रहा था
बहने के लिए नही मिलती थी उसको जगह
हाथ तंग हो गया था मेरा

भटक गया था मन का भूगोल
अटक गया था यादों का खगोल

कलाई पर जो बंधा था शुभता का धागा
उसको काटने की तमन्ना होती थी रोज़
चाहता था रास्ते मे न आए कोई मंदिर
प्रसाद को न करना पड़े इनकार

ब्रेकअप के बाद
सूरज शाम को चिढ़ा कर जाता था
सुबह आकर जगाती नही थी
पक्षियों की आवाजें लगती थी कोलाहल
डायरी में दर्ज हर्फ उलटे हो गए थे सब के सब

शराब का ख्याल आता मगर दिल न करता था
एक भी घूंट पीने को
अपने सुकूँ के लिए बड़ी लगती थी ये कीमत

ब्रेकअप के बाद
दिल मे क्या तो कोई सवाल न था
या फिर जवाब ही जवाब थे
जवाब कोई सुनता न था
और सवाल पूछने के लिए जगह न बची थी

ब्रेकअप के बाद
सम्वेदना का था एक बुद्धिवादी संस्करण
भावुकता का था एक लिजलिजा कलेवर
इन दोनों के मध्य दिल था
थोड़ा उदास ज्यादा निरुपाय

ब्रेकअप के बाद जो भी था
वो ठीक नही था
कितना ठीक नही ये नही बता सकता
क्यों नही बता सकता
इसकी वजह समझ आई
ब्रेकअप के बाद।

©डॉ. अजित

Friday, March 31, 2017

बोध

लौटते वक्त उसका चेहरा उदास नही था
लौटते वक्त उसके पास कहने के लिए
बहुत कुछ था
लौटते वक़्त उसके पास वक्त का अनुमान नही था
लौटते वक्त उसके पास एक सीधी पगडंडी थी
जिसके रास्ते में कई चौराहे थे

लौटते वक्त मंजिल सामने थी या पीछे
यह बता पाना जरा मुश्किल था
लौटते वक्त आसमान थोड़ा टेढ़ा था
और धरती थोड़ी चकोर
लौटते वक्त हवा कानों के नीचे से बह रही थी
हवा की छुअन में कोई नूतनता न थी

लौटते वक्त उसने घड़ी को देखा
उसे लगा देर हो गई लौटने में
लौटते वक्त घड़ी को देखना
बेहद नीरस घटना थी
इसलिए नही कि देर हो गई थी
बल्कि इसलिए कि
लौटते वक्त उसे समय का बोध हो गया था।

©डॉ.अजित

Monday, March 27, 2017

गाँव

कहीं दूर हमारी स्मृतियों का
एक गाँव है
जहां थोड़ी धूप थोड़ी छाँव है
एक पगडण्डी उस तरफ जाती है
जहां रास्ता खत्म होता है
और मंजिल नजर आती है

ये गाँव इतनी दूर है
कि हम पहुँच जाते है पल भर में
ये गाँव इतना नजदीक है
देख नही पाते फिर भी उम्र भर में

स्मृतियों के गाँव में
बेवकूफियों का एक टीला है
प्यार में पल पल मरते-जीते
अहसासों का भी एक कबीला है

हम जब खुद से खफा होते है
चाहे अनचाहे बस यहां होते है
दर दर भटकते थक जाते
जब मन के पाँव
किसी आंगन में यहीं मिल पाती
फिर ठंडी छाँव

देस-बिदेस रहे कहीं भी
छूटे चाहे मन की मीत
यही वो गाँव है
छूटे न जिससे कभी प्रीत

स्मृतियों के गाँव के अनगिनत किस्से है
मिले बिछड़े लोगो के भी अपने हिस्से है

पुनर्पाठ:

स्मृतियों का गाँव अजनबी आबादी से भी आबाद हो सकता है और परिचय के संसार के बाद की वीरानियाँ भी यहां बची रह सकती है।ये गाँव हम सब के अंदर बसता है मन के भूगोल के हिसाब से इसका मानचित्र तय करना जरा मुश्किल काम है। इस गाँव जाने का रास्ता हम भी नही जानते कोई हाथ पकड़ कर ले जाता है फिर लौटना हमें खुद होता है,कभी मुस्कुराते हुए तो कभी उदास होते हुए।

©डॉ.अजित

भूलना

मुझे भूलने की कोशिश में
पहले उसने संपर्क कम किया
फिर खुद को मजबूत किया
और बाद में खींच दी एक रेखा
जिसके आर पार
नही देख सकते थे हम
एक दूसरे की शक्ल

सम्बन्धो की कर्क रेखा पर
कोई बाड़ ऐसी न थी
जिससे रोका जा सकता हो
यादों की पुरवाई को
बस यही एकमात्र
तकलीफदेह बात थी

मुझे भूलना उसने
एक चुनौती की तरह लिया
और भूल गई जिद करके
वो जिद की इतनी पक्की है
नही करेगी कभी याद भूलकर भी
ये बात पता है मुझे

मैं याद करता हूँ उसे तो
इतनी अच्छी बातें याद आती है
उदासी में भी मुस्कुरा पड़ता हूँ
तल्खियां सब लगने लगती है हास्यास्पद

वो मुझे भूल गई है हमेशा के लिए
ऐसा भी नही है
हमेशा के लिए कोई
किसी को नही भूल पाता है
बस आजकल वो याद नही करती मुझे

जब याद आती है मुझे
उसके भूलने को कर लेता हूँ याद
फिर भूल जाता हूँ
खुद का वजूद
फिर न उसकी याद आती है
न खुद की

भूलना अतीत का बुद्धिवादी अनुवाद है
जिसका कभी पाठ नही होता है
जिल्द चढ़ाकर रख दिया जाता है जिसे
रिश्तों के अजयाबघर में।

©डॉ.अजित