Friday, January 11, 2019

मोक्ष

एक छोटा सा जीवन मिला था
कितना कुछ करना था उसमें
एक पूरा जीवन तो चाहिए था
केवल प्रेम के लिए

प्रेम करने के जो संस्मरण थे
मेरे पास
वो दरअसल
प्रेम को जानने के दावें भर थे

प्रेम ठीक वहीं से होता था
आरम्भ
जहां से सारे दावें हो जाते थें
समाप्त

एक जन्म में मैं केवल
प्रेम करूँगा
फिर शायद बता सकूंगा
ईश्वर के बारें-बारें में
वो सब बातें
जो खुद ईश्वर भी नही जानता था
अपनें बारें में

मुझे भय है
कहीं इसी डर से ईश्वर
इसी जन्म में मुझे न दे दे
मोक्ष

© डॉ. अजित

Tuesday, January 8, 2019

भार

उसे सब कुछ अच्छा
अपने पास चाहिए था
सबसे अच्छे दोस्त
सबसे अच्छी किताबें
सबसे अच्छे फोटो
वो हर अच्छाई की तलाश में व्याकुल थी

उसके निजी संग्रहालय में
रौशनी की सख्त दरकार थी
जिसके लिए वो भरोसे थी
अच्छे दोस्तों के
अच्छी किताबों के
और अच्छी फोटो के

उसकी अधीरता देख
ईश्वर हंसता था अकेले में
और मनुष्य रोता था भीड़ में

वो मुद्दत से जोड़ रही थी
सब बढ़िया ही बढ़िया
इसलिए उसके पास नही बची थी
जगह किसी खराब चीज़ के लिए

खराब चीजें उसके पास से
हट गई थी स्वत:
अच्छाई के भार से
वो इस कदर दबी थी

उसे दिलाना पड़ता था याद
कोई खराब प्रसंग
ताकि जीवन में बचा रहे
अच्छे-खराब का संतुलन

जिसे वो समझती थी ईर्ष्या।

©डॉ. अजित

कविता में याद

जब-जब मेरे जीवन से
अनुपस्थित रही तुम
कविता ने निरस्त कर दिया
मेरा चुनाव

कविता का कौन सा
अनुबन्ध था तुम्हारे साथ
नही मुझे मालूम

मगर कुछ कविताओं के साथ
कसक के साथ याद आती रही तुम
और कुछ कविताओं ने की मेरी मदद
तुम्हें फिलहाल भूल जाने में

जब भी पढ़ता था
अपनी पुरानी कविताएं
याद आती थी हमेशा वो बातें
जो चूक गया था मैं कविता में कहने से

मगर नही बनती थी
उन बातों से कोई नई कविता
धीरे-धीरे शब्द उड़ जाते थे व्योम में
देकर मुझे सतही सांत्वना

तुम्हें याद करने के लिए
मुझे नही जरूरत थी
किसी बहाने की
मगर तुम याद आती रहती
गाहे-बगाहे किसी बहाने से

कल ही मैंने
तुम्हारा नाम पढ़ा किसी की कविता में
मुझे ठीक-ठीक प्रेमी जितनी ईर्ष्या हुई
जबकि तुम्हारा प्रेमी नही था मैं

बाद में वो कविता इतनी भायी मुझे
उसे लिखकर तकिए नीचे रख सो गया मैं
मुझे नही आया तुम्हारा कोई स्वप्न
यह सोचकर उदास नही हुआ मैं

कुछ कविताओं में जगह-जगह
आज भी तुम बैठी हो चुपचाप
एक गम्भीर श्रोता की शक्ल में
कुछ कविताओं में तुम नही हो
मैं दोनों किस्म की कविताएं
मिला देता हूँ आपस में

ऐसा करना यह भरोसा देता है मुझे
तुम कहीं हो तुम कहीं नही हो।

©डॉ. अजित

Saturday, January 5, 2019

इतवार

वैसे तो याद नही रही
कभी दिनों की मोहताज़
मगर इतवार के दिन
जो कसक के साथ आती है याद
उसकी आह बनी रहती है
हफ्ते भर

इतवार यादों को छांटने का दिन नही
इस दिन यादें खुद हो जाती है
अलग-थलग
फिर सबसे पहले जो आती है याद
बनी रहती है वो देर रात तक

वैसे तो यह दिन छुट्टी का है
मगर यादों के हिस्से नही होती
एक भी छुट्टी
जैसे ही भूलने को होते है किसी को
इतवार आ जाता है

फिर दिन भर
यादों के भरोसे
अच्छी बुरी बातों को सोचतें
किस्सों को मन की आंच पर सेंकते
बीत जाता है इतवार

रात को सोने से पहले
कहता है मन एक बार
यूं होता तो क्या होता
इसके बाद
सपनों की दुनिया से बैरंग
लौट जाती है इतवार की यादें

क्योंकि
सपनों में उन यादों का नही मिलता
कोई जिक्र
सपनों में आते है जो
वो सुबह होते-होते नही रहते याद

इसलिए
हमेशा बची रह जाती है
इतवार की यादें।

© डॉ. अजित

Sunday, December 30, 2018

कैप्शन

वो हमेशा खराब
कैप्शन देने के लिए
जाना जाता था

सारांश उसकी
समझ से परे था
वो हमेशा जीता रहा सार को
जीवन समझकर

हंसी को वो कह देता रात
मुस्कान को वो कहता था चिड़िया
रोने के लिए वो चस्पा कर देता
स्माइली

चाहे जीवन हो या कविता
उसके शीर्षकों में हमेशा रहा
सम्प्रेषणदोष

वो प्यार को कहता था दोस्ती
और नाराज़गी को लिख देता था
अधिकार

गुस्से में वो हँसता था विद्वानों की तरह
नि:सहायता में देने लगता था सलाह

खराब फोटो के लिए उसे
अक्सर माफ कर दिया
उन दृश्यों ने जो किए गए थे कैद

क्योंकि
वो हमेशा लेता था उनकी अनुमति
क्लिक करने से पहले

उसके कैप्शन से जो
विकसित किए गए अर्थ
वो हुए गल्प साबित बाद में

इसलिए जिन्होंने उसे पढ़ा
उसके क्लिक किए फोटो देखें
और नजरअंदाज कर दिए कैप्शन

वो जानते है यह बात कि
खत्म करने के बाद भी
उसके पास कितना रह जाता था
कितना अनकहा

खराब कैप्शन उसी की
एक बानगी भर थी
इसलिए यदि सारे कैप्शन
रख दिए जाएं एक पंक्ति में
वो लगेंगे एक कविता के जैसे

एक ऐसी कविता
जो किसी कविता का सार नही है।

©डॉ. अजित

Friday, December 28, 2018

उपयुक्त नही

वो एक खराब प्रेमी था
मगर कवि अच्छा था
वो एक औसत दोस्त था
मगर दोस्तों को लेकर
सबसे ज्यादा शिकायतें उसके पास थी

लोग उससे प्रेम करते थे
और दोस्त उससे रश्क

वो न प्रेम के लिए बना था
न दोस्ती के लिए

हिन्दी का एक जटिल शब्द है
उपयुक्त
जिसका भावार्थ हमेशा रहा है
शब्दार्थ से भिन्न

वो इस शब्द का सच्चा
किरदार था
जिसके बाद में सुंदर लेख में लिखा था
'नही'

इसलिए उसे जल्द भूल गई प्रेमिकाएं
माफ किया दोस्तों ने
मदद की हमेशा उम्मीद से बढ़कर

जो नही भूल पाए उसे
और जो नही कर पाए माफ
वो करते थे उसका जिक्र
अलग-अलग अवसरों पर
एक अलग सन्दर्भ के साथ

उसकी कविता और बात
दोनों ही जोड़ लेती है
कुछ अपिरिचित लोगों को एकसाथ

उसे कोई नही कहता था
खराब प्रेमी
या कमजोर दोस्त

सबकी बातों का
एक ही निकलता था सारांश
'उपयुक्त नही'

©डॉ. अजित

Monday, December 24, 2018

बहस

पिता के जाने के बाद
पिता पर लिखी
पांच कविताओं में
सिमट गई पिता की स्मृतियां

कविताएं पढ़कर
याद आती रही
सम्वेदना के स्तर पर
की गई खुद की बेईमानी
होता रहा विचित्र किस्म का
अपराधबोध

धीरे-धीरे सपनों में भी
आना बंद कर दिया पिता ने
पुराणों के अनुसार
हो सकता है
मिल गई हो उन्हें मुक्ति

पिता चले जाने के बाद
जीवन में बचे
किसी शोध प्रबन्ध की
सन्दर्भ सूची की तरह

रुचि और प्राथमिकताओं का
यह सबसे लज्जित समय था

घर की दीवार पर टँगी
पिता की युवा तस्वीर से
बमुश्किल आँख मिला पाता था मैं

लगता था जैसे
फिर शुरू हो जाएगी
एक नई बहस

पिता के जाने के बाद
बाहर की दुनिया से
बहस हो गई थी विदा
और अन्दर शुरू हो गई थी
एक नई मगर सतत बहस
जो नही ले रही थी थमने का नाम

ये बात केवल जानता था
मेरे अन्दर का पिता।

© डॉ. अजित

Saturday, December 22, 2018

स्माइल प्लीज़


ज़िन्दगी में
अलग-अलग अवसरों पर
फोटो क्लिक करते समय
बहुत से लोग कहतें है
स्माइल प्लीज़
और हम फैला देते है
अपनी मुस्कान
मगर
जब उसने फोटो लेते वक्त कहा
स्माइल प्लीज़
उसके बाद
होंठो पर जो मुस्कान आई
उसका एक रास्ता
अंदर आत्मा में उतरता था सीधा
इसलिए
आत्मा पर छप गई उसकी परछाई
उसके बाद की मुस्कानें
अलग-अलग मतलब और रास्तों से आई
उनका अंदर कहीं नहीं मिलता प्रमाण
देह त्यागने के बाद भी
आत्मा जरूर तलाशेंगी वो चेहरा
और कहेगी उसे धन्यवाद
अपनी ही भाषा में
जिसके कहने पर
पहली दफा आई थी
हमारे चेहरे पर
एक सच्ची मुस्कान।
©डॉ. अजित

Wednesday, December 19, 2018

संभव-असम्भव


जब उसे पता चला
प्रेम कविताएँ लिखता हूँ मैं
उसनें बातें कम कर दी

जब उसको बताया मैंने
एक कहानी लिख रहा हूँ मैं
उसने सुनाए अपने यात्रा वृत्तांत

मैं कहने ही वाला था
कि तुमसे प्रेम करता हूँ मैं
उसने मुझे कहा
अलविदा

प्रेम की स्मृति का
यह सबसे ताजा शब्द था मेरे जीवन का

जो आता रहा याद
हर प्रेम कविता में.
**
क्या ऐसा संभव था
कि हाथों में लेकर हाथ
कहा जा सकता
मुझे तुम्हारी सदा जरूरत है

क्या ऐसा संभव था
कि आँखों में आखें मिलाकर
कहा जा सकता
हमेशा के लिए
जा रहा है कोई

तुमनें जब पूछा
क्या ऐसा संभव है...?

मैंने दो जवाब दिए एक साथ

प्रेम में हर संभव के आगे असंभव था
और हर असंभव के आगे संभव.  

© डॉ. अजित

दुःखों का एकांत

अपने जीवन के
विकटतम दुःखों में
वो मुझसे सम्पर्क काट
लेती थी
बतौर दोस्त यह बात
मुझे लगती थी
बेहद खराब

उसे नही था पसन्द
अपने दुःख बांटना किसी के साथ
हमारी अधिकांश बातें
छिटपुट सुखों की बातें हैं
चाय या शराब की बातें हैं
यात्राओं और दर्शन की बातें है

हमारी बातों में यदि तलाशा जाए
कोई एक केंद्रीय भाव
तो मुश्किल होगा यह तय करना
वो किस किस्म की बातें हैं

उन्हें एक साथ पढ़कर
कोई कर सकता है
हमारी मित्रता पर भी
सन्देह

उसके विकट दुःखों में
मेरा कोई हस्तक्षेप नही रहा
इस बात का रहेगा
मुझे हमेशा बड़ा दुःख

उसे सांत्वना जैसे औपचारिक शब्दों से
होती थी एक खास चिढ़
इसलिए हमेशा रहना पड़ता था
शब्द चयन में थोड़ा सावधान

वो हमेशा लड़ी अपने
दुःखों से एकदम अकेले
उसके दुःखों की
औपचारिक सूचना के अलावा
कोई जानकारी नही मेरे पास

मेरे सुख
इस बात पर हिकारत से
देखतें थे मुझे
मुझे हंसते हुए होती थी बहुधा ग्लानि

क्योंकि

जब इधर हँस-मुस्कुरा रहा होता हूँ मैं
हो सकता है
ठीक उसी समय वो
घिरी बैठी हो जीवन के
सघन दुःखों के बीच
नितांत अकेली।

©डॉ. अजित

Sunday, December 9, 2018

निर्धन

तुमने बना लिए
अपने सूरज चांद
हवा और बादल

मगर नही बना पाई
अपना आसमान
ये बात जब
आसमान ने बताई मुझे

मैं देखता रहा धरती की तरफ

आसमान को उम्मीद थी
मैं बताऊंगा तुम्हें
अपना आसमान बनाने का
गुप्त कौशल

मैंने जब कहा
भूल गया हूँ मैं
समानान्तर प्रकृति रचने के सभी सूत्र

धरती ने देखा आसमान की तरफ
और मुझे किया घोषित

धरती-आसमान के मध्य फंसा
सबसे निर्धन प्राणी।

©डॉ. अजित

Monday, December 3, 2018

दिसम्बर

सड़क पार करने के लिए
जब करता हूँ इंतजार
ठीक उस वक्त लगता है
पार करना
जरूरत भले ही रही हो
फायदेमंद कभी नही रहा।
**
भीड़ गुजरती है आंखों के सामने से
अनजानी भीड़
मैं सोचने लगता हूँ
उनके परिजनों के बारें में
इतंजार के बारे में सोचना
सलीके से
भीड़ ने सिखाया मुझे
**
मेरी बातों में रस सूख गया है
मगर उनकी डंठल अभी हरी है
उस पर तुम सुखा देती हो
अपनी मुस्कान
मेरे बातों का पुनर्जन्म
तुम्हारी नमी के भरोसे है।
**
इनदिनों नींद कम आती है
मगर जब आती है
तब सपने में दिखते है पुरखे
बनकर भूत-प्रेत
डराना मनुष्य मरकर भी नही छोड़ता
प्यार करना कैसे भूल सकता है
जीते जी भला?

©डॉ. अजित

Monday, November 12, 2018

खत और किताब


सागर के किनारे इसलिए
मीठे रहते है
उनके पास सुरक्षित होते है
नदी के अंतिम पदचिन्ह
**
पहाड़ इसलिए खड़े रहते है
सदा
उन्हें दिखते है
घाटी के उलझाव
पहाड़ का एकांत
इसलिए भी घाटी से बड़ा है.
**
हवा की नही होती
एक तय दिशा
वो बहती है दिशा बदल-बदल कर
इसलिए
हवा को लेकर होते है
अपने अपने अनुमान
अनुमान नही बदल पाते इसलिए
कभी जीवन की दिशा.
**
झील धैर्य का
अज्ञात भाषा में अनुवाद है
जिसकी लिपि को लेकर है  
सबके अलग-अलग दावे
धैर्य का मूल पाठ
इसलिए है संसार से विलुप्त.
**
रास्तों सबसे
चुस्त गवाह है
दोस्ती और प्रेम के
मध्य अटके किसी खूबसूरत रिश्तें के
मगर कोई नही लेता उनकी गवाही
एक समय के बाद रास्तों को भूलना
बाध्यता है
मगर रास्तें नही भूलते कभी किसी को
इस बात को सबसे बेहतर समझते है
दोराहे-चौराहे.
**
पेड़ जब छोड़ते है
अपना कोई पत्ता
उस पर लिखा होता है
धरती के नाम एक सन्देश
धरती उसे नही पढ़ती
क्योंकि पत्ते पर जिस तरफ लिखा होता है खत
धरती पर उस तरफ से कभी नही पड़ता वो
ये बात पेड़ नही जानता
हवा जानती है, धूल जानती है.

© डॉ. अजित


Sunday, November 4, 2018

प्रेम की स्मृतियाँ


जिससे प्रेम किया जाए
वो हम उम्र हो
यह जरूरी तो नही
ये किसी फिल्म या नाटक का
संवाद हो सकता है
वो उससे दस साल बड़ी थी
मगर वो उससे दस साल छोटा नही था
किसी की तार्किकता पता करने के लिए
किया जा सकता है
इस वाक्य का प्रयोग
मगर जीवन हो या प्रेम
वो संवाद या तर्क के भरोसे नही चलता
वो चलता है
उन बातों के भरोसे
जिनका कोई ठीक-ठीक
जवाब नही होता है हमारे पास.
**
बातों में मनोविज्ञान न हो
तो बचने लगते है लोग
हर कोई खुद को तलाशता है
बातों और मुलाकातों में
आदमी जब होता है गुमशुदा
उसे देख कर
कहा जा सकता है
गुमशुदगी एक निजी चीज है
जो दिखती जरुर सार्वजनिक है.
**
प्रेम मिलता रहा मुझसे
भेष बदल-बदल कर
हर बार मैंने जाना प्रेम को
प्रेम के खो जाने के बाद
इस मामलें में किसी काम नही आयी
मेरी स्मृतियाँ
दरअसल प्रेम की स्मृतियाँ
पीड़ाओं को याद रखने के लिए थी
हमेशा तत्पर
मनुष्य को समझना
मुझे कभी नही समझा पाया प्रेम
**
मेरे हाथों में
तुम्हारी रेखाओं की प्रतिलिपियाँ
चस्पा थी
मेरी रेखाएं जोर से देती थी मुझे आवाज
मगर तुम्हारे स्पर्श
आवाज़ को हमेशा रोक लेते थे
अपने इर्द-गिर्द
मेरे जीवन में आशाएं
तुम्हारी रेखाओं के फलादेश का परिणाम था  
तुम्हारे कारण
मैं भूल गया था अपना प्रारब्ध
इस  पर हंसती थी मेरी रेखाएं
और मैं समझता था
वक्त बदलने वाला है.
© डॉ. अजित




Monday, October 29, 2018

कवि,कविता और कुछ बातें


मूलत: कवि
कम बचे है अब
जो बचे है
वो थोड़े मूलत: कवि है
थोड़े कविता के जानकार
**
निजी कविताओं के
पाठक कम बचे है
जो बचे है
उनकी निजता खो गई है
निजी कविताओं के बहाने
**
कविता लिखी नही जाती
कविता आती है
और निकल जाती है कवि के आर-पार
मनुष्य और कवि में विभाजन रेखा
देखनें के लिए
कविता की मदद ली सकती है हमेशा.
**
एक कवि
कविता लिखता है
एक कविता पर बात करता है
और एक कविता का आन्दोलन करता है
तीनों को छोड़कर कविता
पाठक के पास चली जाती है
फिर हंसती है कवि के संताप पर
कविता का हंसना
कवि के रोने में देखा जा सकता है साफ-साफ.
**
कविता कवि का करती है चुनाव
और कवि मानता है उसे अपनी कविता
मगर
दोनों ही वास्तव में एकदूसरे से होते है
गहरे अजनबी
कवि यह बात जानता है
कविता यह बात कभी जानना नही चाहती.
**
एकदिन धरती से खत्म हो जाएंगी
कविताएँ
तब कहानी रोया करेगी अपने एकांत में
कवि देखा करेंगे आसमान
अपनी कविताओं के पदचिन्ह
और ईश्वर से माँगा करेंगे
पुनर्जन्म की भीख.


© डॉ.अजित   

Saturday, October 27, 2018

चेहरें

कुछ फोटो में
पिता नही थे
जबकि असल में वो थे

कुछ फोटो में
माता नही थी
जबकि असल में वो थी

कुछ फोटो में
पति नही थे
जबकि असल में वो थे

कुछ फोटो में
पत्नी नही थी
जबकि असल में वो थी

कुछ फोटो में भाई नही था
जबकि असल में वो था
कुछ फोटो में बहन नही थी
जबकि असल में वो थी

कुछ फोटो में केवल वो था
जबकि असल में वो नही था

प्रत्येक फोटो में
कोई उपस्थित था
तो कोई अनुपस्थित

ऐसे विरले फोटो थे
जिसमें सब एक साथ रहे हो

फोकस की अपनी सीमाएं थी
जो उसके दायरे में था
वही आता था नजर

आउट ऑफ फोकस
इतने चेहरे थे कि
उन्हें मिलाकर बन सकता था
एक स्वतंत्र देश

मगर इसलिए नही बन सका
क्योंकि आपस में मिलती थी
सबकी शक्लें

अपने पराए के भय से
नही बन सका वो देश
जहां का हर नागरिक निर्वासित था।

©डॉ. अजित

विवाह और प्रेम: कुछ विवादास्पद स्थापनाएं

विवाह और प्रेम: कुछ विवादास्पद स्थापनाएं
--

विवाह के पक्ष
और विपक्ष मे
देखे/पढ़ें जा सकते है
अनेक तर्क-वितर्क
प्रेम का नही होता है
कोई विपक्ष
इसलिए
यह बनाता है व्यक्ति को अधिनायक
**
विवाह मे प्रेम न हो
या प्रेम की परिणिति विवाह में न हो
खुद को अधूरा समझते है लोग
दरअसल
प्रेम और विवाह दोनों ही होते
एक वृत्त की तरह
जहां से चलतें है एक दिन
लौटकर आना होता है वहीं.
**
कुछ प्रेमियों ने
विवाह किया
और प्रेम को भूल गए
कुछ लोगो ने विवाह किया
और प्रेम को तलाश्तें रहें
दोनों किस्म के लोग
आपस में कम ही मिलें
मगर जब भी मिलें
एक दूसरे को देखकर कहा
‘धप्पा’
**
सभी विवाहित
दुखी है
ऐसी ध्वनि
लोक के सस्ते चुटकुलों में
मिलेगी हमेशा
सभी प्रेमी विशिष्ट है
ऐसी ध्वनि
प्रेम कविताओं में
मिलेगी हमेशा
विवाह और प्रेम
यथार्थ की तराजू में टंगे मिलेंगे सदा
सुख या दुःख
दरअसल इस तराजू का पासंग है.
**
मैंने पूछा
जिससे प्रेम किया
क्या उसी से विवाह किया तुमनें?
उसनें बदलें में यह नही पूछा
जिससे विवाह किया
क्या उसी से प्रेम करते हो तुम?
प्रेम का सबसे बड़ा आदर यही था.

© डॉ. अजित

नोट- ( सुदर्शन शर्मा जी की कविता पढ़कर उपजे कुछ कवितानुमा फुटकर ख्याल)

Wednesday, October 24, 2018

कुछ बीमारी:कुछ कविताएं

कुछ बीमारी: कुछ कविताएं
---
आँखों के सामने
तेजी से बदलतें है दृश्य
अंधेरा-रौशनी मिलकर
खेलते है आइस-पाइस
अपने ही ग्रह से
उखड़ने लगते है पांव
गुरुत्वाकर्षण छोड़ देता है साथ
गिरने से नही, सम्भलने से लगता है डर
विज्ञान इसे चक्कर कहता है
जिसके हो सकते है
एक से अधिक कारण
मैं अज्ञानी बन मूंद लेता हूँ आँखें
सुनता हूँ कान में
तुम्हारी चैतन्य, मगर मद्धम आवाज़
गिरने का भय
सम्भलनें का प्रशिक्षण है।
**
पिछले दिनों
मेरी एक कंधे की
एक हड्ड़ी चटक गई
जिम्मेदारी जब चटकती है
तब चटक जाते है
आसपास के नजदीकी तंतु भी
दर्द से करहाते वक्त
अपनी देह से की मैंने
सबसे गहरी बात
जिसका नही मिला कोई जवाब
जितना एकतरफा बातें करता हूँ मैं
सब मेरे अंदर से
कुछ चटक जाने का परिणाम है।
**
शिरा और धमनी
का अंतर नही है मुझे ज्ञात
भूल गया हूँ
मैं विज्ञान के आरंभिक सभी पाठ
वसा जमनें लगा है मेरे अंदर
रक्त प्रवाह को कर सकता है अवरुद्ध
ऐसा बताया मेरे डॉक्टर ने
साथ चेताया मुझे कि
हृदय केवल आघात से मरता है
मैं कहने ही वाला था कि
हृदय मरता है प्रेम में उपेक्षा से भी
मगर चुप रह गया यह सोचकर
क्या पता विज्ञान न मानता हो प्रेम।
**
देह नश्वर है
एकदिन नष्ट हो जानी है
अपनी यात्रा पूर्ण करके
दर्शन पढ़कर हो जाता हूँ
मैं थोड़ा बेफिक्र
व्याधियां जब घेरती है मुझे
दर्शन नही विज्ञान आता है याद
दर्शन और विज्ञान
आगे पीछे खड़े है मेरे
मैं दोनों के मध्य
पंजो के बल उचक-उचक कर
देख रहा हूँ दुनिया
इसलिए
मेरे व्यक्तित्व का एक दर्शन
और कृतित्व का है एक विज्ञान।
**

©डॉ. अजित



Monday, October 15, 2018

दिल की बेकली


शराब पीकर वो पूछता था
लोगो के फोन नम्बर
ताकि दिल की बेकली के साथ
किसी दिन कर सके वो बात

चाय पीकर वो पूछता
लोगो के घर के पते
ताकि लिख सके फुरसत में खत

पानी पीकर वो पूछता था
घर के राजी-खुशी का समाचार
ताकि जान सके सुख-दुःख के सूचकांक

न उसनें कभी किसी को फोन किया
न कभी किसी को कोई खत लिखा
नही था उसके पास दुखों का को ज्ञात समाधान
सुखों का था वो सबसे बोझिल श्रोता

उसके पूछने को लिया जाता था
इतने हल्के में कि
हंस पड़ता था फोन नम्बर बताने वाला
विषय बदल देता था घर का पता बताने वाला
सुख-दुःख से इतर दर्शन की बातें करने लगता था
घर की राजी-खुशी बताने वाला

जब उसने पूछना कर दिया बंद
तब लोग बताते थे खुद का फोन नम्बर
घर का पता
और दिखाते थे सुख-दुःख के सच्चे मानचित्र

चीजें उसके पास आती थी
तब लौटकर
जब वो खो चुकता था उनमें
अपना आकर्षण

इस तरह से मतलबी समझा गया उसे
और दुनियावी ढंग से बेकार
शायद तभी
अधूरी रह गई
कुछ बात
कुछ खत
और कुछ सलाहितें

इस तरह पूरा हुआ एक
आधा-अधूरा इन्सान.

© डॉ. अजित