अधिकार एवं अपनत्व
दोनों के मूल मे
होती है
एक अंतरंगता
मौन संवाद ही
काफ़ी होता है
परस्पर भाव
संप्रेषित करने के लिए
और यदि
कभी कुछ कहना हो
विशेष
शब्दों का आभाव
प्रतीत होता है
हमे
संबंधो की दिशा
होती है स्वत उन्मुक्त
बन्धन मे बांधना भी
चाहे तो
सम्भव नही होता है
आज अधिकार से
यह भूमिका लिखी है मैंने
मगर
अपनत्व
मुझे कायर बना देता है
अपने भाव भी
ठीक ढंग से संप्रेषित नही
कर पा रहा हूँ
संभवत
तुम असमंजस मे हो
कि
मैं क्या कहना चाहता हूँ
दरअसल
ये अपनत्व का भय
मुझे बना रहा हैं
अधिकार शून्य
क्योंकि
मैं जानता हूँ
कि
भावावेश मे
अधिकारवश कही गई
हरेक बात का
तुम आजीवन
पालन करोगी
जबकि
मैं
अपनत्व एवं अधिकार से
तुम्हे भावनाओ का
संवाहक मात्र
नही देखना चाहता हूँ
देखना चाहता हूँ
तुम्हे पार्थसारथी की
भूमिका मे
यह तभी सम्भव होगा
जब हम
परस्पर मुक्त हो
महसूस करे
जीवन समर
और
देखें मित्रता पर
'अनुभव' का असर ..."
डॉ.अजीत
Tuesday, February 5, 2008
अपनत्व
Tuesday, January 22, 2008
प्रश्नचिन्ह
Thursday, January 17, 2008
पलायन
डॉ.अजीत
Thursday, January 10, 2008
यथार्थ
डॉ.अजीत
शिल्प
डॉ.अजीत
Sunday, January 6, 2008
परिणाम
डॉ. अजीत
Saturday, January 5, 2008
प्रतिबिम्ब
डॉ.अजीत
नियति
डॉ. अजीत
Thursday, January 3, 2008
अपराधबोध
डॉ.अजीत
परिपक्वता
डॉ.अजीत
Wednesday, January 2, 2008
उन्मुक्तता
डॉ. अजीत
अनभिज्ञ....
डॉ.अजीत
Saturday, December 22, 2007
आपसे अपनी बात
जैसा की आप सब लोग जानते ही हैं की उत्तरप्रदेश का एक जनपद है मुज़फ्फरनगर ! खासियत भी आप जानते होंगे ही अपने देश के ही नही विदेश के भी विभिन्न मीडिया माध्यमो को आपराधिक समाचारों की सतत सप्लाई यंही से होती है...इसी मिटटी में मेरे जैसा एक भावुक और संवेदनशील जीव का जनम हुआ गाँव था हथछोया...संयोग से ऐसे परिवार मैं जनम हुआ जंहा कला, कल्पना और कविता को सम्मान की नजरो से नही देखा जाता धुर दबंग और जमीदार परिवार...लेकिन पता नही कंहा से इस कुलकलंक के मन में सम्वेदना, कविता और साहित्य का बीज रोपण हुआ और जिसकी आज एक अच्छी खासी फसल लह लहरा रही है ..... इस कला, कल्पना और कविता के चसके ने मुझे अपनी बिरादरी से निकाल कर एक नई दुनिया का हिस्सा बना दिया शायद यह नियति थी या प्रारब्ध अभी तक तय नही कर पाया ...वैसे तो दुनियादारी की भाषा मैं बोलू तो २५ साल की इस अल्पायु मैं मनोविज्ञान, हिन्दी और जनसंचार मैं स्नातकोत्तर उपाधि और मनोविज्ञान मैं पी-एच. डी की उपाधि प्राप्त करने के बाद अभी गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में मनोविज्ञान विभाग में बहैसियत प्रवक्ता कार्यरत हूँ..लिखना तो स्कूल के दिनों से ही शुरू कर दिया था लेकिन जो शुरुआत लेख एवं संपादक के नाम पत्र लिखने से हुई वह स्नातक होने तक कविता मैं बदल गयी.. अब थोड़ा बहुत लिख पढने के बाद जब कभी मन मन में बेचैनी होती है तो कुछ पंक्तिया लिख लेता हूँ ज्यादा कविता का तकनीकी पक्ष नही जानता बस यूं ही जो महसूस करता हूँ उस सम्वेदना, अनुभूति को कागज़ पर उडेल देता हूँ.. बस यही परिचय है अपना !