Monday, February 19, 2018

विदा

उसकी नजरों में मेरी इज्जत बढ़ गई थी
यही कारण था कि
हमें लगता था कि
हम एक साथ नही रहने वाले है अब

विदा का समय
कभी दुबके पाँव नही आता
इसकी पदचाप सुनाई देती है
बहुत पहले से साफ-साफ

ये अलग बात है
उस वक्त हमारे कान लगे होती है
दिल के इर्द-गिर्द

जब हम अलग हो गए
मैं दोहराता रहा यह बात
एक दूसरे की नजरों में
इज्जत कम नही हुई हमारी

यही एक कारण था
अक्सर आता रहा याद हम दोनों को
एक दूसरे का साथ
तमाम अनिच्छाओं के बावजूद.

© डॉ. अजित

Sunday, February 11, 2018

एकबार

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं बांच सकूं
नदी की तलहटी से
लौटते हुए बंसत के खत

और सुना सकूं
हवा को धरती की धूल के
दो प्यार भरे गीत

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं स्वप्न को बचा सकूं
नींद के सघनतम आलोक और
भोर की भूल से

मुझे तुम्हारे गले लगना था एकबार
यह कथन कोई मलाल नही
फिर यह क्या है
तुम बेहतर समझती हो

नींद की बड़बड़ाहट की तरह
मैं दोहराना चाहता हूँ यह बार-बार
मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार।

©डॉ. अजित

गहरा एकांत

उसके जीवन में
मैं अपने जैसा
अकेला नही था
यह बात सालती थी बहुत

न जाने क्यों
मैं यह चाहता था
उसके परिचय के
आंतरिक वलय में
सबसे निकटतम
रहूँ मैं अकेला

उसे यह बात
कभी कह नही पाया
यह मेरे जीवन का स्थायी खेद है

उसके पास नही थे
मेरे लिए सम्वाद का कोई
संरक्षित संस्करण
मैं चाहता था
वो कुछ शब्द रखें बचाकर
केवल मेरे लिए

उन शब्दों को विषय प्यार हो
ऐसा भी कभी नही चाहा मैंने

ऐसा क्यों चाहता था मैं
नही पता मुझे
बस इतना जरूर पता है
उसे भीड़ से घिरा देखकर
महसूस होता था
जीवन का सबसे गहरा एकांत।

©डॉ. अजित

Thursday, February 8, 2018

बसंतराग

बसंतराग
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बसंत का रंग ग्रे है
पीले रंग का बसंत
अब केवल कविताओं में मिलेगा
जो मन राग की चासनी में डूबे हैं  
वो दृष्टिबंधन के भी है शिकार
वो बता सकते है
हर रंग को पीला
बसंत का रंग ग्रे है
ये बात मुझे उसने बतायी
जिसने कभी रंगो का किया था नामकरण.
**
बसंत पतझड़ की भूमिका है
 कह सकते है बसंत को
पतझड़ का पूर्व पाठ भी
बसंत पतझड़ को नही करता याद
और पतझड़ कभी भूल नही पाता
बसंत.
**
तुमनें कहा
हम इस बसंत में बिछड़ रहे है
तो फिर किस बसंत में मिलेंगे हम
मैंने कहा
बसंत के बिछड़े मिला करते है
केवल पतझड़ में.
**
धरती नाचती है बसंत में
आसमान रोता है बसंत में
दो एक साथ जब
नाचते और रोते है
तब आता है
असली बसंत.
**
कोई देता है उदाहरण
सुनाता है यह गीत
‘मन रे तू काहे न धीर धरे’
मैं बुदबुदाता हूँ
आँखों में एक नमी के साथ
‘शायद आ गया है फिर से बसंत’ .

© डॉ.अजित


हँसना

जो हँसना भूल गए है
उन्हें होती है आपत्ति
हर उन्मुक्त हंसी से

जो पसन्द करते है
निस्तब्धता
उनके लिए हँसना है एक बाधा

हर काल में उन्मुक्त
हँसना माना गया
शिष्टाचार के विरुद्ध

मनुष्य क्या तो चुप था
या रो रहा था
दोनों से किसी ने नही पूछा कारण

मगर जो हँस रहा था उन्मुक्त
उसकी हँसी की, की गई
भांति-भांति की व्याख्याएं

हँसना अपराध नही मगर
अपराध से कम भी नही था
हँसने से हर उस शख्स को थी
एक गहरी आपत्ति

जो कहता था
अनुशासन मनुष्य को महान बनाता है

दरअसल
हर उन्मुक्त हँसी
मनुष्य की महानता में बाधा थी

इसलिए चुप्पी में
तलाशी गई सहमति
और हँसने में महाकाव्य के पात्र

मनुष्येतर लोगों के लिए
हँसना नही बना था
उनके लिए बना था
हँसने पर ऐतराज़ करना

इस बात पर भी
जोर से हँसा जा सकता है
मगर एकांत में।

©डॉ. अजित

Sunday, February 4, 2018

पिता: भाई और बहन

बेजी जैसन की किताब पप्पाको पढ़ते हुए-
--
पुत्र के लिए पिता
पुत्री के लिए पिता से भिन्न होता है
पुत्री पिता की व्याख्या कर सकती है
पुत्र केवल जानता है पिता का व्याकरण

दिवंगत पिता की स्मृतियाँ
दोनों के लिए होती है एकदम भिन्न
पुत्र याद करता है अपने अभाव
पुत्री करती है याद
पिता के समय की सम्पन्नता

पिता जब होते है
जीवन से अनुपस्थित
पुत्र और पुत्री दोनों
उसके बाद आते है
पिता की तरह पेश

इस तरह पिता बने रहते है
जीवन में सदा अबूझ

जब मेरे पिता नही रहे
मेरी बहन का मुझ पर
अविश्वास हो गया गहरा
उसने माना पिता की जगह
कोई नही ले सकता
और मैं तो बिलकुल भी नही

इस दौरान मैं देख पाया
बहन का पिता हो जाना

पुत्र के तौर पर मेरे पास है जो स्मृतियाँ
अवज्ञा उनकी केंद्रीय विषय वस्तु है
पुत्री के तौर पर जो मेरी बहन के पास है स्मृतियाँ
उसमें थोड़ा गुस्सा और अधिक प्यार है

पिता इसी तरह विभाजित है
हम भाई बहन के मध्य

पिता के जाने पर
मेरे अंदर का पिता
अब मेरा पिता बना बैठा है
जो रोज़ देखता है मेरी चाल-ढ़ाल
और होता है थोड़ा खिन्न

जब अपनी बहन से पूछा मैंने
तुम्हें किस तरह आतें है पिता याद
उसनें इस बात का नही दिया कोई जवाब
वो मेरे सामने नही करती कभी
पिता का कोई जिक्र

ये पिता की सबसे सघन याद थी
जो मैंने की महसूस
पिता के चले जाने के बाद.

© डॉ. अजित


आदर

मेरे हृदय में इतना भर जगह थी
जहाँ आधी तुम रह सकती थी
आधी जगह अनारक्षित थी
मगर मेरे किसी काम की नही थी
मैंने आधी जगह तुम्हें दे दी

इसके बाद अपने हृदय में
नही देख पाया कभी झांककर
कि तुम वहां खुश हो या उदास

हम समानांतर चलते हुए
बना रहे थे एक वृत्त
जिसे हम चलना समझ रहे थे
वो एक चक्कर भर था
जो लौट आता था एकदिन
प्रस्थान बिंदु पर

हमें एकदूसरे से कोई शिकायत नही है
यह खुद में एक बड़ी शिकायत है
जिस पर नही की हमनें कोई बात

हमारी बातें इतनी एकनिष्ठ है
वो जाती है मगर लौटकर नही आती
ऐसी बातों के भरोसे हमे थी उम्मीद
कि बचा रहेगा हमारा प्रेम

हमारे मध्य जो बचा रहा
प्रेम से मिलती है उसकी शक्ल
इसलिए प्रेम को गुमशुदा होने में रही आसानी

हमारी अपने हिस्से की आसानियाँ चुनी
यह एक उदास करने वाली बात है
मगर इस पर मुस्कुरा रहे है हम

इससे पहले हँसना लगने लगे अभिनय
हमें तोलने होंगी अपनी-अपनी खुशी
बांटने होंगे अपने-अपने गम
खोजनी होंगे सांझी नींद

ये आहत प्रेम का उपचार नही
यह प्रेम का आदर भर होगा
जिसे हमेशा के लिए भूल गए है हम.


© डॉ. अजित 

Friday, February 2, 2018

बहाना

उसके हिसाब से
मेरी एक से अधिक प्रेमिकाएं थी
उसे हमेशा लगता था यह
एक साथ कई स्त्रियों के सम्पर्क में रहता हूँ मैं

वो कहती थी
मेरी बातों में होता है सम्मोहन

सक्रियता के आधार पर
जो जोड़ती घटाती रहती थी कुछ नाम
उसके अनुमानों की तराजू पर
हमेशा भारहीन टंगा रहता था मैं

कभी मजाक में, तो कभी उन्माद में
वो मुझे कहती थी छलिया
जबकि उसके या किसी के साथ
मेरे द्वारा किए गए
किसी किस्म के छल का
उसके पास नही था कोई भी प्रमाण  

उसको यह विश्वास दिलाने में
मैं रहा था असमर्थ कि
नही है मेरी रूचि
एकाधिक स्त्रियों में
और न ही मैं था किसी आदर्श प्रेमिका की प्रतीक्षा में

अपने साथ नए-पुराने नाम जुड़ते देख
पहले आता रहा मुझे गुस्सा
बाद में इसी बात पर आयी हंसी
मैं ये तो नही कहूंगा कि
वो मुझे ठीक से समझ नही पायी
मगर इतना जरुर कहा जा सकता है

मुझे लेकर राय बनाने में रही हमेशा थोड़ी अधीर
 न जाने क्यों?

संदेह को वो समझती रही अपना कौशल
और पुरुष को आदतन अविश्ववसनीय
ऐसा भी नही था कि
उसे किसी ने धोखा दिया हो
फिर भी उसके हिसाब से
हर छटे-छमाही बदलती रही
मेरी प्रेमिका

जब मैं खारिज करता उसकी स्थापनाएं
उसे और अधिक संदेह होता
मेरे पूर्ण पुरुष होने पर
वो मेरी अनिच्छा को
समझने लगती मेरी हीनता

बावजूद इस सबके
मुझे अच्छी लगती थी उसकी बातें
वो फ़िक्र करती थी मेरी
उसे हमेशा लगता था
मैं काबिल इंसान हूँ
बस अपनी अनिच्छा से बैठा हूँ
सफलता से दूर दुबककर

उसके भरोसे
मैं जान पाया स्त्री मनोविज्ञान का यह सच
वो जिसे करती है पसंद
उसे खोने के उसके पास होते  है
अनेक बहाने
ताकि वक्त बीतने पर
समय को दे सके दोष

मेरी एक से अधिक प्रेमिका बताना
यह भी था एक बहाना
ताकि जब हम साथ न रहें
उसे रहूँ मैं याद
किसी न किसी शक्ल में.

© डॉ. अजित




Thursday, February 1, 2018

पसंद

मैं एक ऐसे  मनुष्य के प्रेम हूँ
जो दिन को दिन
रात को रात कहता है
हालांकि ये बात
एक गीत के उस मुखड़े के खिलाफ जाती है
जिसमें प्रेमी कहता है
‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे’

हमारे प्रेम में है न्यूनतम सहमतियाँ
अधिकतम प्रेम का भी कोई दावा नहीं  है मेरा
मगर जितना प्रेम है वो पर्याप्त है
एक दूसरे के आंसू समेटने के लिए

लड़ाई और प्यार का अनुपात
हमेशा से असंतुलित रहा है हमारा
मगर फिर भी हर बार बच जाता है
रूठने मनाने लायक प्यार
और व्यंग्य रहित लड़ाई के लिए गुस्सा

मैं इन दिनों विरोधाभासों के प्रेम में हूँ
इसलिए मेड फॉर इच अदर जैसे आप्त वचन में
कोई दिलचस्पी नही है मेरी
हम जिस पल में होते है साथ
उस पल का दिया जा सकता है उदाहरण

 मैं इन दिनों एक ऐसे मनुष्य के प्रेम हूँ
जो एक बेहतर मनुष्य बना रहा है मुझे
और उसे थोड़ा बिगाड़ रहा हूँ मैं
हमारी इस जुगलबन्दी पर
वो भी हंस पड़ता है
जिसका हाल ही में हुआ है ब्रेकअप

मैं एक ऐसे मनुष्य के प्रेम में हूँ
जो मात्र मेरे प्रेम में नही है
इस बात पर मैं खुश हो सकता हूँ

हंस सकता हूँ जोर-जोर से
जब आप कहें
‘ये भी कोई प्रेम हुआ भला’?

© डॉ. अजित


Wednesday, January 31, 2018

नींद

स्त्री ने नींद मांगी
ईश्वर मुस्कुराया
और पुरुष की तरफ देखा
जैसे ईश्वर खुद पुरुष पर आश्रित हो
नींद के मामलें में

स्त्री ने साथ माँगा
पुरुष ने इसे हाथ समझा
उसने पकड़ लिया कसकर
वो खुद फिसलकर गिरा
और गिरा दिया स्त्री को भी अपने साथ
इस तरह से गिरना बनी एक दैवीय घटना

इस बात के लिए  
ईश्वर को नही दिया गया कोई दोष
स्त्री जरुर समझी जाती रही कमजोरी का प्रतीक

स्त्री मांगने में करती रही संकोच
वो देती रही नि:संकोच
ईश्वर ने इस बात पर नही थपथपायी उसकी पीठ
वो व्यस्त रहा पुरुष के पलायन पढ़ने में

जब थक कर नींद न मिली
चाह कर साथ न मिला
तब भी ईश्वर पर संदेह नही किया एक स्त्री ने

तमाम उपेक्षाओं के बावजूद
ईश्वर से सर्वाधिक संवाद रहा स्त्री का
प्रार्थनाओं की शक्ल में

दरअसल
ईश्वर और पुरुष दोनों इस बात पर सहमत थे
स्त्री को नींद की जरूरत नही है

इसलिए मुद्दत से
जाग रही है स्त्री
और बेफिक्र होकर  सो रहा ईश्वर
पुरुष के ठीक बगल में.

©डॉ. अजित


Friday, January 5, 2018

बातें अनकही

उसने कहा
मेरा पार्टनर कहता है
राइटर्स और पोएट्स से दूर रहा करो
होते है वो आदतन लंपट
बिछाते है शब्दों का जाल
दिखाते है सपनों की दुनिया
कल्पना की लगा देते है लत
तो रहना चाहिए तुम्हें दूर
मैंने कहा
ये तुम कह रहे हो?
उसने आश्चर्य में भरकर कहा
हां ! रहना चाहिए दूर हर उस चीज़ से
लग जाती हो जिसकी लत
मैंने कहा
उसके बाद उसने कहा
क्या तुमने खुद पर तो नही ले ली ये बात
मैंने कहा,ले भी लूं तो क्या फर्क पड़ता है?
उसने जाते हुए कहा
अब पता चला बॉस
एकदम सही कहता है पार्टनर।
***
मैं तुम्हें एकदिन
खाने पर बुलाना चाहती हूँ
मगर सोचती हूँ
क्या कहकर मिलवाऊंगी तुम्हें सबसे
वो जो तुम हो नही या वो जो तुम हो
मैं हंस पड़ा यह सुनकर
ठीक है चाय पर बुलाते है किसी दिन
क्यों चाय पर मिलवाना नही पड़ता क्या?
मैनें हंसते हुए पूछा
तुम चाय पीते हुए लगते हो इतने जहीन
कि तार्रुफ़ की जरूरत नही होगी मुझे
वो चाय आज तक उधार है।
***
मैंने आजतक शराब नही पी
मगर एकबार पीना चाहती हूँ
वो भी तुम्हारे साथ
उसने एकदिन गम्भीरता से कहा
मेरे साथ ही क्यों
मैंने पूछा
तुम्हारे पास अतीत के किस्से है
बाकि के पास मेरे हिस्से है
इसलिए
ये क्या बात हुई भला
मैंने हंसते हुए कहा
तुम नही समझोगे
ये बात समझ आई मुझे
कभी पीने के बाद।
***
जब मैं नही रहूंगी
तुम्हारे पास
तब मेरी बातें रहेंगी
ये बड़ी तसल्ली है मेरे लिए
मैनें कहा
ये सच कहा तुमनें
एक झूठ भी कहूँ उसने कहा
तुम्हें और तुम्हारी बातों को
जल्द भूल जाऊंगी मैं।

©डॉ. अजित

Thursday, January 4, 2018

अच्छा

कितना अच्छा हो
जिसकी आए याद
आ जाए तभी उसका एक फोन

कितना अच्छा हो
जिससे नाराज़ हो
उसे कर दे माफ,उसकी एक माफी पर

कितना अच्छा हो
धूप और छाँव बैठे एक साथ
और सूरज हो जाए
थोड़ा बेफिक्र

कितना अच्छा हो
रोती हुई स्त्री
कांधे से लगकर हो जाए एकदम चुप

कितना अच्छा हो
बच्चा हंसते हुए पकड़े
रोज़ हमारे गाल

कितना अच्छा हो
कि अच्छा होने की कल्पना में
दो अजनबी पेश आए
एक दुसरे से दोस्त की तरह

चाहे जितना बुरा हो जीवन में
मगर इतना अच्छा भी होना चाहिए

ताकि
आदमी कह सके बेझिझक
प्यार मेरी जरूरत है
और मैं जरूरतमंद नही हूँ।

©डॉ. अजित

Sunday, December 24, 2017

प्रशंसा

लिखे हुए में आप
अपने मतलब की चीजें निकाल लेते है
और कर देते है तारीफ़

ऐसे में जो बचा रहा जाता है ऐसा
जो आपके मतलब का नही था
मगर मेरे जरिए जो हुआ प्रकट
वो घेरता है मुझे एकांत में
करता  है प्रश्न पर प्रश्न

मैं थक जाता हूँ देता हुआ जवाब
मगर वो नही सुनता मेरी कोई सफाई
और  कोसता हुआ मुझे
हो जाता है नेपथ्य में विलीन

जितना लिखता हूँ मैं
वो सब उन्हीं उपेक्षित शब्दों और भावों के
अपराध से मुक्ति होती है एक कोशिश
मगर हर बार बच जाता है ऐसा कुछ
जिसे नही मिलती आपकी तारीफ़
इसलिए कभी खत्म नही होता
मेरे लिखने का क्रम

आप जिसे कहते है बहुत अच्छा
वो मैं पढ़ नही पाता हूँ
क्योंकि
मैं लगा रहता हूँ उनकी मनुहार में
जो अच्छा था
मगर खो गया अधिक अच्छे की भीड़ में

मेरी प्रशंसा की तृष्णा इसलिए नही होती शांत
क्योंकि कोई प्रशंसा नही आती मुझ तक अकेले.

©डॉ. अजित