Sunday, August 20, 2017

रंग भेद

दवाई के पत्तों पर
बैंगनी स्याही में लिखी है
एक्सपायरी डेट
मैंने इंद्रधनुष में देखता हूँ
बैंगनी रंग
जो नज़र आता है बेहद गाढ़ा

मैं खींच कर कर देना चाहता हूँ इसे अलग
इसलिए पढ़ने लगता हूँ
कोई धार्मिक किताब

दवाई के पत्ते एक दिन
जहर बन जाते है
उस दिन की कोई नही करता प्रतिक्षा

जिंदगी का रंग
इन्द्रधनुष के रंग से मिलता जुलता है
मगर वो बैंगनी नही है
दवाई के पत्ते पर जो बैंगनी स्याही में छपा है
वो एक तारीख है
जिसके इस पार खड़े होकर
प्रार्थना की जा सकती है

यही प्रार्थना काम आएगी
जीवन के दुर्दन क्षणों में
जब रंग छोड़ने लगे हो साथ
दवा और आसमान के रंग से
मिलाकर बनाना होगा
एक वो नया रंग
जिसकी कोई एक्स्पायरी डेट ना हो.

© डॉ. अजित


Saturday, August 19, 2017

बोला चाली वाया कहा सुनी

बोला चाली वाया कहा सुनी
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पिछली दफा हम इस बात पर लड़ें
कि चाय बनाते वक्त
पत्ती दूध में डालनी चाहिए या पानी में
अंत तक दोनों अपनी बात पर अड़े रहे
यह जानना जरूरी नही कि
किसकी बात सही थी
बल्कि ये बताना जरूरी है
अपनी-अपनी बात सही सिद्ध करने के लिए  
मुद्दत बाद कई चाय साथ पी हमने
और नही पहुंचे किसी निष्कर्ष पर
हमारी ज्यादातर लड़ाईयां
रही  बिना निष्कर्ष के
बस एक  जिंदगी को छोड़कर.
**
उस दिन बेवजह तुनकर
तुमने कहा ‘शट अप’
मगर मैंने सुना ‘ग्रो अप’
इसलिए मैं फिर भी बोलता रहा लगातार
यकीन करना दोस्त !
तुम्हें चिढ़ाने के लिए नही
बल्कि ये समझाने के लिए
तुम्हारे साथ लगातार
बड़ा हो रहा था मैं.
**
तुम इस बात पर खफा थी
मुझे गुस्सा कम आता है
जबकि मैं इसे प्रचारित करता था
अपनी एक खूबी की तरह
और जब-जब मुझे गुस्सा आया
तुम्हें उस पर हंसी आई
इसलिए नही कि वो बचकाना था
बल्कि इसलिए
मुझे गुस्सा ठीक से जताना नही आता था
ये बात मेरे अलावा
केवल तुम जानती थी.
**
तुम खुद को समझते क्या हो?
ये तुम्हारा आम डायलोग था
मैंने हर बार इसका गलत जवाब दिया
थोड़ा फ़िल्मी टाइप का
अगर मैं सही से बता पाता
मैं खुद को क्या समझता हूँ
फिर शायद तुम पूछती
मैं खुद को तुम्हारा क्या समझाता हूँ?
जो तुमने कभी पूछा नही
और मैंने कभी बताया नही.
**
महीने भर ऐसा रहा
हमने एक दूसरे की शक्ल नही देखी
सम्पर्कशून्य होकर जीते रहे
अपनी-अपनी जिंदगी
महीने भर ऐसा भी रहा
हमनें देखा एक दूसरे को
और बदल लिया रास्ता
महीने भर बाद ऐसा हुआ
हम भूल गए महीना
और याद आया वीकेंड
फिर हसंते रहे अपनी बेवकूफ़ियों पर
हमारे साथ हंसता रहा वीकेंड
और रोता रहा बीता महीना.

©  डॉ. अजित 

Thursday, August 17, 2017

भरोसे से चूकना

नदी पर बांध
खेती पर ऋण
मजदूरी पर आधार कार्ड
जरूरी हो गया है

मरने के लिए
कोई बड़ी बीमारी जरूरी नही है अब
आप मर सकते है
कुछ छींक आने भर से

लोग उजड़ जाए
किसान मर जाए
मजदूर परदेस को जाए
अब कुछ फर्क नही पड़ता
किसी को

लड़कियाँ लकड़ी की तरह चूल्हे में लगी है
राख बनने पर उन्ही की राख से
पोता जाएगा चूल्हा

देश अब एक बड़ी कंपनी के माफिक है
सीईओ के भरोसे है अब जनकल्याण
लोकतंत्र का इंक्रीमेंट और इंसेंटिव
भरोसे है अम्बानियों और अडानियो के

विकास देश का बिन ब्याहा लड़का है
जो थोड़ा बिगड़ैल भी है
जिधर को निकलता है
लील जाता है मासूम सपनें

विकास का ब्याह पूंजी से कराने की तैयारी है
देश के बड़े बुजुर्गों और मालिकान को
इससे उसके अंदर
दिख रही सुधार की बड़ी गुंजाईश

बच्चें सांस ले रहे है असामान्य गति से
उनका रक्तचाप छूट गया है
नापने के पैमानों से
हम उन्हें देखकर लगाते है अनुमान
कौन कितनी दूर से दौड़कर आया है

बच्चों को गोद नही शोक नसीब है

और आप पूछते है मुझसे
मैं चुप क्यों बैठा हूँ
कुछ करता क्यों नही

मैं उलटा पूछता हूँ आपसे
क्या देश मुझे वो करने देगा
जो करना चाहता हूँ मैं

मैं चाहता हूँ खाल के नगाड़े बनाना
मैं चाहता हूँ इतना शोर
कि नींद में सोते हुए लोग
बहरें हो जाए सोते हुए ही

मेरी चाहतें अब इतनी वीभत्स है
मैं कर सकता हूँ
किसी दिन अपनी ही हत्या
और रख दूंगा इल्ज़ाम
किसी अपने गहरे दोस्त पर

मैं भरोसे से चूक गया हूँ
देश के अंदर
समाज के अंदर
और खुद के अंदर

इसलिए
मुझसे डरना बेहद जरूरी है
क्योंकि मैं खुद से बहुत डरा हुआ हूँ।

©डॉ.अजित

Wednesday, August 16, 2017

अकेला

कुछ लड़ाईयों को
समाप्त किया जाना चाहिए था
समय रहते
चाहे कितना ही प्रेम क्यों न रहा हो
ऐसी  लड़ाईयां एक दिन लील लेती थी
बचे हुए अधिकार को

एक बादल का अकेला टुकडा
हवा के भरोसे आसमान में रह नही पाता
बादलों की लड़ाई  उसे
कर देती है इस कदर अकेला
वो दौड़ पड़ता है सूरज की तरफ नंगे पैर  

लड़ाई को खत्म करने के लिए
धरती करना चाहती है कोशिश
मगर उसके पैर समंदर में धंसे है

ये बची हुई लड़ाईयां
एकदिन करती है मिलकर शिकार
इनके विजय उत्सव में
भले कोई न होता हो शामिल

ये कर देती है मनुष्य को
इस कदर अकेला
कि वो भूल जाता है
हंसते हुए रोना
और रोते-रोते हंसना.

© डॉ. अजित




शुभकमनाएं

लगातार विजय के कारण
मैं अब  थकने लगा हूँ
अब मैं हारना चाहता हूँ

सहमत लोगो से मैं
उकता गया हूँ
मुझे  स्थायी तौर पर
कुछ असहमत दोस्त चाहिए
जो बता सके मेरे गलती
मेरी आँखों में आँखें डालकर

मैं कुछ दिन भीड़ की बीच रहना चाहता हूँ
जहां कुछ इस तरह का एकांत हो कि
कोई किसी को न जानता हो आपस में

मैं मरने से पहले
जीने का पता चाहता हूँ
ताकि उसके गले मिलकर
कह सकूं धन्यवाद

अब मैं दुखों पर कोई निजी बात
नही करना चाहता हूँ
अब मैं बस इतना चाहता हूँ कि
मैं क्या चाहता हूँ
ये किसी को बताना या समझाना न पड़े

ये थोड़ी मासूम सी चाहत है
इसलिए मैं इसे रखने के लिए
वो दिल तलाश रहा हूँ
जो न भरा हो और ना खाली ही हो
हो सके तो
वापसी की उम्मीद के बिना
फ़िलहाल
सच्ची शुभकमनाएं दीजिए मुझे.

© डॉ. अजित


Friday, August 11, 2017

स्वप्न

 दृश्य एक:

नींद में नदी मुझे जगाती है
स्वप्न में पहाड़ मुझे बुलाते है
बुखार में समंदर मुझे समझाता है
हंसते हुए रास्ता मुझे टोकता है
रोते हुए झरना मुझे देखता है
मंदिर मेरी योजनाओं का साक्षी बनता है
सीढ़ियों पर मेरे सपने हाँफते पड़े रहते है
मेरी जिद खरपतवार  के यहाँ
चाय की पत्ती उधार मांगने चला गई है

और मुझे अज्ञात दृश्यों की हाजिरी के लिए नियुक्त किया गया है
मैं देखता हूँ और गिनती भूल जाता हूँ
मेरे स्मृतियों में कुछ चेहरे है
जो आपस में कतई में नही मिलते है
इसलिए
मेरी याद अब संदिग्ध हो गई है.

दृश्य दो:
स्पर्शो की प्रतिलिपि
कहीं रख कर भूल गया हूँ
फिलहाल उनकी गवाही की सख्त जरूरत है
यदि ये स्पर्श नही मिलें
मेरी सजा  तय हो जाएगी
मैं सजा से नही
बल्कि
अपनी स्मृतियों के चूक जाने से घबरा रहा हूँ
तुम्हारे स्पर्शों के बिना
निर्वासन भी कहाँ आसान होगा?

दृश्य तीन:
ईश्वर से पूछता हूँ
तुम्हारी आँखें नही थकती
हस्तक्षेप शून्य दुनिया को देखते हुए
अच्छा होता थोड़ी देर सो लेते तुम
ईश्वर मेरी बिन मांगी सलाह पर रो पड़ता है
फिर मुझे याद आता है
खुद का मनुष्य होना और मैं भी रोने लगता हूँ
फिर पुन:
मैं देखने लगता हूँ आसमान की तरफ
और ईश्वर देखने लगता है धरती की तरफ.

©डॉ. अजित  


Friday, August 4, 2017

वियोग की कविताएँ

वियोग की कविताएँ
--
ब्रेक अप की ध्वनि
थोड़ी चलताऊ किस्म की थी
इसलिए मैंने कहा इसे वियोग
ब्रेक संभवानाशून्य था
जबकि वियोग में थी
संजोग की थोड़ी संभावनाएं
भाषा के स्तर पर
लड़ता रहा मैं खुद से
एक सांत्वना भरी लड़ाई
बाद में जिसे समझा गया
मेरा डिफेन्स मैकेनिज्म.
**
तुम्हारी अनुपस्थिति में
मेरी वाणी पर व्यंग्य आकर बैठ गया
मैं देखता था हर जगह मतलब
मैं सूंघता था हर जगह षड्यंत्र
तुम्हारे बिना
एक औसत मनुष्य भी नही रहा मैं
इसलिए तुम्हारा साथ
याद आता रहा लोगो को
एक आदर्श की तरह.
**
इन दिनों अकेला
धरती पर लगाता हूँ कान
आसमान मेरे दूसरे के कान के जरिए
हो जाता है धरती के अंदर दाखिल
इस दौरान वो छोड़ जाता है
मेरे दिमाग में कुछ अफवाहें
मैं खड़ा हो जाता हूँ तुंरत
मैं आसमान को तब तक
वापसी का रास्ता नही दूंगा
जब तक वो
इनके गलत होने की
खुद नही करेगा
आकाशवाणी
**
दूर कहीं एक पक्षी गा रहा है
विरह का कोई गीत
उसकी तान में एक उदासी है
मैं गुनगुना चाहता हूँ
ठीक ऐसा ही कोई गीत
मेरे पास उदासी तो  है
मगर कोई गीत नही है
इसलिए मैं देखता हूँ
हसंते हुए लोगो को
और हो जाता हूँ उदास
**
तुम्हारे बाद
मेरा चीजो से तादात्म्य टूट गया है
स्मृतियाँ हो गई है आगे-पीछे
अभी किसी ने पूछा मुझसे
क्या ये रास्ता जाता है बस स्टैंड?
मैंने कहा
जरुर, मगर तभी यदि आप जा पाएं
उसके बाद उसने कोई सवाल नही किया
इस तरह अनायास ही
घोषित हुआ मैं
एक गलत रास्ता बताने वाला.
© डॉ. अजित


Thursday, August 3, 2017

दीपा के नाम

दीपा के नाम
__
दीपा मेरे साथ तीसरी कक्षा में पढ़ती थी
हम पांचवी तक साथ पढ़ें
उसके बाद दीपा कितनी पढ़ी
मुझे याद नही
मैं जरुर एमए पीएच.डी कर गया

दीपा से मेरी दोस्ती नही थी
तब लड़के और लड़की दोस्त नही होते थे
हम सहपाठी थे

मेरे पास रेनोल्ड्स का एक पेन था
जो मैंने अपने एक दूर के चाचा की जेब से चुराया था
दीपा को वो पेन पसंद था
मगर चूंकि मुझे भी वो उतना ही पसंद था
इसलिए कभी मुझसे मांग नही पाई

वो बचपन में एक दूसरे की पसंद का
ख्याल रखने का दौर था
इसे आप मित्रता का एक लक्षण समझ सकते है

दीपा को मुझसे ज्यादा पहाडे याद थे
मेरी अंग्रेजी दीपा से ठीक थी
एकदिन मैंने दीपा से पूछा तेरह का पहाड़ा
उसके जवाब में दीपा ने मुझे पूछी फ्रेंड की स्पेलिंग
हम दोने के जवाब में थी कुछ गलतियां
मगर हम संतुष्ट थे

बीस साल  से ज्यादा वक्त हो गया
दीपा मुझे नही दिखी
मेरी तरह वो भी अब होगी बाल बच्चोदार

कभी कभी याद आती है दीपा
क्यों आती है नही मालूम
दीपा को भी याद आता होगा 
अपना स्कूल का बचपन
यह नही मालूम
मगर दीपा नही भूली होगी

वो रेनोल्ड का पेन
वो उसको याद आता होगा किसी दिन सपने में
डराता होगा उसे भेष बदल बदल कर

मैं ये बात इतने विश्वास से इसलिए कह सकता हूँ
पिछले कुछ दिनों से
दीपा मुझे डरा रही है सपनों में
भेष बदल-बदल कर

वो हंसती है अब मेरी अंग्रेजी पर
और सुनाती है पैंतीस का पहाड़ा
इतने जोर से कि
मैं उठ जाता हूँ सोता हुआ.
©डॉ. अजित