Wednesday, March 17, 2010

सपनें

एकांत के कुछ
पल अधुरे सपनो की
बुनावट के सच्चे
गवाह हो सकते है
भले ही इनकी गवाही की
कभी जरुरत न पडे
लेकिन
इन सपनो की उधेडबुन
मे उलझा मन अपनी झुठी
तारीफ से कुछ पल के लिए ही सही
सुलझ सकता है
जी सकता है कुछ पल अपनी तरह से
अपने वजूद के साथ
सपनें देखना और जीना इनके साथ
आज की नही कल की जरुरत थी
और कल के सहारे आज की हकीकत
मन के अवसाद
को संजो कर रखने का साहस
इतना आसान भी नही कि
हम जी सके बिना सपनो की
समीक्षा किए
अधुरे सपने
दरअसल एक अहसास है
खुद के अधुरे होने का
जिसे पुरा करने के लिए
दिल की नही दिमाग की जरुरत है
ऐसे सपनों के सहारे
एक समानांतर जिन्दगी जीने बाद
सपनों पर बहस करना
जरुरी नही लगता
लेकिन
जब कोई अपना सपना
बदलता है
किसी भी वजह से
तब अधुरे सपनें
भर देते है
एक अजीब एहसास से
और दिल करता है
एक और उधार के
सपने के साथ जीने का
अपने अधुरेपन के साथ...।
डॉ.अजीत

3 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

माणिक said...

एक अजीब एहसास से
और दिल करता है
एक और उधार के
सपने के साथ जीने का
अपने अधुरेपन के साथ...।

theek theek likhaa hai