Friday, August 26, 2011

शून्य

दोस्तों से शेयर

करने के लिए

उपलब्धि या दुख

का होना जरुरी है

लेकिन क्या

दोस्ती के व्याकरण

मे ऐसा भी कोई

नियम है कि

जब मन के उस

विराट शून्य को

जहाँ न कोई

उपलब्धि हो

न कोई दुख

बस एक निर्वात हो

और उसे बिना

कहे शेयर किया जा सके

जहाँ न किन्तु हो न परंतु

बस अबोला संवाद हो

सुख-दुख हार-जीत

अपेक्षा से परे एक ऐसा भाव

जिसमे ठहराव है जन्मजात

बैचेनी है

और शून्य मे विलीन होने

की एक मूकबधिर सी अभिलाषा

अफसोस!

ऐसे दोस्त संविदा पर नही मिलते

होते है किसी-किसी के पास

फिर वहाँ ऐसा शून्य

आधार बनता है किसी

नए आत्मीय संवाद का....!

डॉ.अजीत

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

फिर वहाँ
ऐसा शून्य
आधार बनता है
किसी नए
आत्मीय संवाद का...

ऐसे दोस्त मिलना सच ही कठिन है .. पर असंभव नहीं .. अच्छी प्रस्तुति .

अंजलि माहिल(ममता ) said...

बेहद सटीक प्रश्न है ....की उपलब्धि की क्यूँ शामिल करें .....कुछ मन के शून्य को भी उभारना चाहिए .....बहुत बहुत बधाई आपको कविता के लिए !!

संजय भास्कर said...

बेहद ख़ूबसूरत और उम्दा