Saturday, April 22, 2017

उम्मीद

ये जो तेरी पलकों के छज्जे पर
सूखते हुए ख़्वाबों की परछाई है
जो हो इजाज़त मैं थोड़ी देर इसमें पनाह ले लूं
मेरा जिस्म जज्बाती धूप में झुलस गया है

ये जो तेरी आँखों में गुमशुदा इश्तेहार है
मैं उनसे रास्ता पूंछ लूं ज़रा
भटक गया हूँ मैं सही गलत के कबीले में

फ़कत इतनी इल्तजा है मेरी
तेरी जुल्फों के साए में
अपनी यादों की गुल्लक फोड़ कर
गिन लूं जमा की गई हसीं बातों की चिल्लर

एक बोसा तेरे कान पर टांग दूं
जो हवा देता रहे गर्म लू में तुम्हें हमेशा

मेरे पास कुछ ख्वाहिशों के अधूरे वजीफे है
कुछ शिकायतों के आड़े-तिरछे नक़्शे है
अनकही बातों  का शरबत है
जिसे घूँट घूँट लुत्फ़ लेकर पीना तुम कभी

ये सब तुम्हें सौंपकर मैं अब आराम चाहता हूँ
अपनी बेचैनियों से इंतकाम चाहता हूँ

इसलिए
मुन्तजिर हूँ तुम्हारी फुरसत और बेख्याली का
उम्मीदन तुम आओगी एकदिन
बारहा यूं ही खुद चलकर

उसी दिन आमद होंगी
कुछ कतरों की समन्दर में
और मुक्कमल होगा एक बेवजह का सफर
अपने तमाम अधूरेपन के साथ.

© डॉ. अजित


4 comments:

Onkar said...

वाह, बहुत सुन्दर

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पृथ्वी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Publisher BookBazooka said...

excellent post
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