Wednesday, April 18, 2018

एकदिन


एकदिन बीत जाती है
सारी बातें
याद करने के लिए सोचना पड़ते है
चेहरें,प्रसंग और कुछ शिकवे-शिकायत 

प्यार दुबक जाता है
किसी निर्वासित कोने में

मैं आँख बंद करके सोचता हूँ
तुम्हारी बेहद मामूली बातें
और मुस्कुरा पड़ता हूँ
जैसे कोई ध्यानस्थ योगी
पा गया हो कैवल्य का मार्ग

इनदिनों जब
तुम नही हो
तो मैं भी नही हूँ कुछ-कुछ जगह

मैं जहां हूँ वहां नही आती तुम्हारी आवाज़
नही दिखती तुम्हारी शक्ल
इनदिनों मैं अतीत नही
भविष्य में भटकता हूँ
एकदम निर्जन अकेला

और
सोचता हूँ
तुम अगर साथ होती तो
कभी बीतता ही नही
हमारा सांझा अतीत.

©डॉ. अजित

6 comments:

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2018/04/blog-post_19.html

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर

'एकलव्य' said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २३ अप्रैल २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

निमंत्रण

विशेष : 'सोमवार' २३ अप्रैल २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक में दो अतिथि रचनाकारों आदरणीय सुशील कुमार शर्मा एवं आदरणीया अनीता लागुरी 'अनु' का हार्दिक स्वागत करता है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

विश्वमोहन said...

वाह!

Unknown said...

अंतिम पंक्तियां .....हृदयस्पर्शी

Unknown said...
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