Wednesday, November 24, 2010

शर्त

रास्ते आपस मे मिल गये होते

रहबर वादे से अपने न मुकर गये होते

लबो की तौहीन बनने से बेहतर था

किसी के चश्मेतर मे उतर गये होते

मंजिल बहुत करीब होती ख्वाबो की

मुसाफिर सफर मे बदल गये होते

शर्त बडी अजीब लगाई थी उसने

वरना खोने से पहले संवर गये होते

मिलना-बिछडना उसका दस्तुर था

हम किसके लिए ठहर गये होते

दायरे मे उडना गर सीख लेता

पर पंछी के कतर गये होते

मयकदे मे संभलना मुश्किल था

महफिल से अगर बच गये होते...।

डा.अजीत

8 comments:

वन्दना said...

बेहद खूबसूरत रचना दिल को छू गयी।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

'dayre me udna gar seekh leta
par panchhi ke katar gaye hote'
bahut achchh laga.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दायरे मे उडना गर सीख लेता
पर पंछी के कतर गये होते ..


बहुत खूब ...अच्छी अभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

http://charchamanch.blogspot.com/

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अनुपमा पाठक said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

रंजना said...

हर शेर सुन्दर..

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल...वाह !!!

Dorothy said...

दायरे में उड़ना गर सीख लेता
पर पंछी के कतर गए होते

खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

दायरे मे उडना गर सीख लेता
पर पंछी के कतर गये होते ..
हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ .... सुंदर रचना