Saturday, November 27, 2010

मंजर

रास्तों की शह पर मंजर बदल गये

मंजिल नज़र तब आई जब दिन ढल गये

शिकस्त मिलना मुकाम की तौहीन था

हसरत न बदली सपने बदल गये

वो समझ न पाया कभी मेरी खुद्दारी को

गलत ही समझा जब भी देर से घर गये

साजिश वजूद का हिस्सा बन गई इस कदर

उसे समझाने की कोशिस मे खुद उलझ गये

अदब का अन्दाज भी अजीब ही निकला

अल्फाज़ रंज़ के तवज्जों मे ढल गये

बर्बाद मेरे अक्स का हर कतरा-कतरा

शुक्र करो कुछ अजीज़ो के घर तो बच गये

सफर की तन्हाई पर कैसे जश्न मनाऊं

हमसफर मेरे मुझसे आगे निकल गये

हादसों की हकीकत पैमाने ही जाने

मयकदे मे आकर अक्सर लोग बिखर गये...।
डा.अजीत

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शिकस्त मिलना मुकाम की तौहीन था
हसरत न बदली सपने बदल गये

बहुत खूब ..अच्छी गज़ल ..

केवल राम said...

रास्तों की शह पर मंजर बदल गये
मंजिल नज़र तब आई जब दिन ढल गये
यह तो इंसान की फितरत है उसे मंजिल तब नजर आती है जब दिन ढल जाते है ..और तब बहुत देर हो चुकी होती है ...बहुत खूब
चलते- चलते पर आपका स्वागत है

Sunil Kumar said...

खुबसूरत गज़ल हर शेर दाद के क़ाबिल, मुबारक हो

संजय भास्कर said...

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

Mukesh Kumar Sinha said...

रास्तों की शह पर मंजर बदल गये
मंजिल नज़र तब आई जब दिन ढल गये
शिकस्त मिलना मुकाम की तौहीन था
हसरत न बदली सपने बदल गये

sach kahun aapke iss blog ko dekh kar ye sahi me pata chala ki jaruri nahi ki jo blogger bahut shandar rachnakar ho usko comment bhi bahut mile..........sayad iski wajah aapki khuddhari hai ya samay ki kami...lekin sir sach kahun, aapko thora samay dena chahiye ...taki aisee rachna sabke samne aaye...


bahut bahut badhai sir!!

Neelam said...

सफर की तन्हाई पर कैसे जश्न मनाऊं
हमसफर मेरे मुझसे आगे निकल गये..
jo safar main tanha chhor jaaaye
wo hum safar nahi hota,Ajit ji.

हादसों की हकीकत पैमाने ही जाने,
मयकदे मे आकर अक्सर लोग बिखर गये...।
Ajit ji..aaj yunhi sabke blogs dekh rahi thi..aur aapke blog par aakar jo thehri to oss ki boondon ki tarah kuchh taazgi mehsus hue.