Sunday, April 29, 2012

सफीना

लम्हों में खुद को कैद कर नही सकता
महफिल उनकी है हद से गुजर नही सकता 


तकसीम जब दिल के अफसाने हो जाए
जख्म हल्का भी हो तो भर नही सकता


खुद की जुस्तजु में सफर पर निकला हूँ
एक तेरे लिए ये सफीना डूबो नही सकता 


शिकवे शिकायत छोड यूँ भी मिलना कभी
हमारा अहसास इतनी जल्दी खो नही सकता


बारहा कभी यूँ ही तन्हाई में रो लेंगे हम भी
आपकी तरह सबके सामने मै रो नही सकता


डॉ.अजीत

4 comments:

raj said...

wah!!!
yatharthwaad..!!!

Shah Nawaz said...

वाह! बेहद खुबसूरत ग़ज़ल.....

M VERMA said...

बहुत खूब

raj said...

safar!!