Monday, October 2, 2017

संतोष

मैनें विपत्ति में
कभी याद नही किया तुम्हें
ना तुम्हें बनाया
अपने विकट एकांत का साथी

इन दोनों के लिए
मैं अकेला ही पर्याप्त था

दुःखों पर तुमसें बात की हो
ऐसा भी नही आता याद

दरअसल, दुःख इतने निजी थे मेरे
उन्हें हर हाल में बचाना था मुझे
प्रेम की छांव से
यदि ऐसा न करता मैं
वो सूख नही पाते असुविधाओं की धूप में

तुम्हें मैं हाथ पकड़ ले गया उस जगह
जहां न एकांत था न दुःख और न कोई विपत्ति

मैंने जोखिम लिया
बात न करने का इन विषयों पर
मेरे पास दूसरे विषय कम थे
मगर मैं बातचीत को हमेशा मोड़ता रहा
भीड़,सुख,योजना और महत्वकांक्षा की तरफ

प्रेम की कल्पना में
यही सहारा था मेरे पास
और इतनी ही थी मेरी बातचीत में गुणवत्ता कि

मैं जितना कह पाया
उससे कई गुना ले गया बचाकर
अपने साथ

इसलिए
नही मिलेगा मेरी बातों से तुम्हें कोई अनुमान
मैं कब खुश था और कब नाखुश

तुम्हें मिलेगी मेरी बातों में एक पुनरावृत्ति
जैसे मैं अटक गया हूँ
एक खास मनःस्थिति में

मेरा मिलना इसलिए संदिग्ध है
मेरा कोई पता नही मिलता आपस में
मेरी बातों को जोड़कर नही बनता एक सारांश

हम दोनों की आश्वस्ति की
एकमात्र बड़ी वजह यही है
जिसे समझा गया है
प्रेम का आत्मिक सन्तोष।

©डॉ. अजित

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर।

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 05-10-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2748 में दिया जाएगा
धन्यवाद