Saturday, January 5, 2008

प्रतिबिम्ब

" तुम नेत्र सजल
करती रही
हर बार मेरी विदाई पर
मैं चाह कर भी
सुखा गीलापन ला न सका
अव्यक्त भाव कभी समझा
न सका
शायद
मैं तुमसा दृढ नही था
इसलिए
डर से अपनी पीड़ा
बतला न सका
मुझे भय था कंही
मेरी अंतर्व्यथा
तुम्हे अपराधबोध से
न भर दे
जो विश्वास
मुझे पर प्रकट किया था तुमने
उसमे शंका न खड़ी कर दे
इस तरह
मैं जीता रहा एक
द्वंदात्मक जीवन
और
तुम तो पीड़ा की
मनोविज्ञानी बन बिखेरती रही
उत्साह पल-प्रतिपल
और आज जब,
तुम विदा हो रही हो
मेरे विकल जीवन से
शायद हमेशा के लिए
मैं इतना भयभीत हूँ
कि
नेत्रों में गर्म पानी भर तो आया
परन्तु
साहस मुझसे दूर
जा खड़ा हुआ है
और
आज फ़िर पूर्व कि भांति
भाव अव्यक्त हो गए हैं
और साथ ही
तुम्हारी प्ररेणा अप्रासंगिक ...
एवं
मेरा जीवन
मुझे से इतना ही दूर ...
जितनी कि तुम मुझसे
दूर खड़ी हो...."

डॉ.अजीत

1 comment:

kamlesh said...

mera jivan mujhase itna hi dur.........
ye line bahut hi gahrai me le jati hai sir,,.. thanks sir