Tuesday, January 21, 2014

वरदान





तुम आशीर्वाद मांगने ठीक
उस वक्त मेरे पास आये
जब मै लगभग निस्तेज़ था
तुम प्रेम मांगने ठीक
उस वक्त मेरे पास आए
जब मै अन्दर से रिक्त था

तुम मुझे मांगने ठीक
उस वक्त मेरे पास आए
जब मै बिक चुका था

तुम्हारे समीकरण
कभी ठीक नही रहे
मांगने के मामले में  
बावजूद इसके
मै आज तुम्हे देता हूँ
एक शब्द
‘तथास्तु’
यह महज़ एक शब्द नही
व्याकरण है जिन्दगी का
आदतन
इसका संधि विच्छेद मत करना
मेरी तरह  
यह शर्त सौप रहा हूँ तुम्हें
वरदान की शक्ल में। 

डॉ.अजीत

7 comments:

रश्मि प्रभा... said...

'तथास्तु' का अर्थ ही है भीतर एक शक्ति है
जिसे ईश्वर मानो,या कर्ण

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

प्रभावी भाव सम्प्रेषण ....

Ratanjeet singh gurjar said...

aap ka likha padhna gaurav k skhan hai ,risto ka aankalan kya gazab tarike se ,waah hi nikle muhh se aur dil se aahh !! ratanjeet

संजय भास्‍कर said...

हमेशा की तरह सुंदर पंक्तियाँ

Madhulika Tripathi said...

रिक्तता के भाव को भावनात्मक लेखन से संतृप्त कर दिया...
साधुवाद

Ashok Kumar Pandey said...

अच्छी कविता लगी अजीत जी. सधा हुआ स्वर है आपका