Monday, April 28, 2014

फेसबुक

कई बार मेरे लाइक को
कमेन्ट से बढकर समझना
कई बार मेरे कमेन्ट को
अनमना समझना
मुझे समझना तो
लाइक कमेन्ट से हटकर समझना
क्योंकि
मै तुम्हारा लिखा ही नही
तुम्हे भी पढ़ता हूँ
जिसकी तुम्हे खबर हो न हो
बिना तुम्हारा लिखा शेयर किए
मेरा जज्बातों का उधार बढ़ता जा रहा है
और
तुम्हे समझने और पढ़ने के चक्कर में
चश्में का नंबर भी
एक दिन तुम मेरे चश्में के लैंस देखकर
मुझ पर हंसोगी
और कहोगी
ये क्या हाल बना रखा है
मेरे फेसबुकिया पाठक !
और मै तुम्हारे स्टेटस की किताब
में उस स्टेटस को खोजता रहूँगा
जो तुमने मेरे लिए नही लिखा था
मगर
मै उसे खुद के लिए समझ बैठा था।

'फेसबुक से उपजी एक कविता'

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया है :)

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

मीनाक्षी said...

सहज भाव से सरल मन को खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है..ब्लॉग बुलेटिन का आभार

कविता रावत said...

ये फेसबुकिया भी अच्छा ख़ासा ड्रामा है। .
...बढ़िया जज्बात