Sunday, July 16, 2017

काजल

काजल स्त्री का
वो अंतिम और पहला मित्र है
जो सुख और दुःख में
सदा देता है एक समान साथ

काजल लगाने के लिए
कभी मन का खिला होना जरूरी होता है
तो कभी जी का बुझा होना

काजल मुस्कान का सहपाठी है
जो अक्सर कम नम्बर लाता है
रोजाना की भगदौड़ के बीच

रोज़ जीवन की परीक्षाओं में
काजल के भरोसे पास होती है
असंख्य स्त्रियां

काजल एक किस्म का भरोसा है
जो जानता है स्त्री मन के
तमाम गोपनीय द्वंद,उल्लास और सन्देह

काजल की छाया में सुस्ताती है
लोक की अपेक्षाओं से लड़ती स्त्रियां
ये उनके एकांत का है
सबसे विश्वसनीय साथी

अनिच्छा से लगाया गया काजल
नही पकड़ पाता प्रायः कोई पुरुष
स्त्री इसलिए काजल को रखती है
अपने नजदीक
मगर
बेहद लापरवाही के साथ।

©डॉ. अजित

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "थोड़ा कहा ... बहुत समझना - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Arun Roy said...

बढ़िया

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 2672 में दिया जाएगा
धन्यवाद