Thursday, July 27, 2017

ख्वाहिश

तुम्हारी आँखों के काजल को देखता हूँ
तो लगता है कि
रात भर तन्हा जले दिए से
हथेली पर स्याही निकाल कर
समन्दर की चारदीवारी कर दी गई हो जैसे 
नीले पानी में ये स्याह रंग इस कदर चमकता है कि
समंदर चाह कर भी कभी
अपनी हदों से बाहर नही निकेल सकेगा
झूठ नही कहूंगा विष कन्याओं की तरह
तुम्हारा माथा थोड़ा तिलिस्मी है
मेरी तर्जनी पर कुछ उच्चाटन मन्त्र छपे है
मैं उन्हें तुम्हारे माथे के हवाले करता हूँ
इसके बाद कोई मुझे सिद्ध न माने
मुझे कोई तकलीफ नही होगी
तुम्हारे दो कानों पर अलग अलग
टापूओं के नक्शे दर्ज़ है
मैं दोनों का मिलान करना चाहता हूँ
दोनों की शक्लें बेहद मिलती है
मगर दोनों एकदम जुदा है
तुम्हारी नाक पर हरसिंगार का
एक फूल अटका हुआ है
वो तुम्हारे गुस्से से दोस्ती करना चाहता है
मगर तुम खुद से खफा हो ये जानकर
वो अपने मंसब से भटक गया है

तुम्हारे शुष्क लबों पर
ना कोई तमन्ना है और ना कोई शिकायत ही है
ये देखकर मेरा दिल थोड़ा बैठ जाता है
तुम्हें अपलक देखतें हुए
मैं अब तक का अपना प्यार पर दिया हुआ
सबसे बेवकूफी भरा बयान याद करता हूँ
ताकि तुम उसे सुन खिलखिलाकर हंस सको
और आदतन मुझसे कहो
‘तुम्हें अभी और बड़ा होना है’
© डॉ. अजित

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " न्यू यॉर्कर बिहारी के मन की बात “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

shashi purwar said...

सुन्दर अभिव्यक्ति

शारदा अरोरा said...

badhiya...lagi rachna.